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कृष्ण कुमार का लेख : इस संकट को समझना होगा

दिल्ली में शिक्षकों के आंदोलन का कारण यूजीसी का एक और नया आदेश है जिसके तहत प्रति सप्ताह ली जाने वाली कक्षाओं की संख्या बढ़ाई जाएगी।

Author नई दिल्ली | June 14, 2016 03:25 am
चित्र का इस्तेमाल सिर्फ प्रतीक के तौर पर किया गया है।

उच्च शिक्षा का दायरा जितना सीमित है, उसकी आंतरिक दुनिया उतनी ही रहस्यमय है। जनसामान्य की नजर से देखें तो कॉलेज या विश्वविद्यालय एक ऐसी जगह के रूप में दिखाई देंगे जहां बड़े लोगों के बच्चे डिग्री लेने जाते हैं। यह समझ इतनी गलत भी नहीं है, भले ही इधर के वर्षों में कॉलेज जाने वाले लड़के-लड़कियों का सामाजिक दायरा पहले की अपेक्षा कुछ फैला है। वहां डिग्री के दायरे से जाने वाली बात इसलिए सही है क्योंकि उच्च शिक्षा के अन्य उद््देश्य आज काफी सिकुड़े हुए नजर आते हैं। आज चल रहे अधिकांश संस्थानों को यदि कोई डिग्रियों के कारखाने की संज्ञा दे तो वह गलत नहीं होगी। ऐसी संस्थाएं कम ही दिखती हैं जहां डिग्री के अर्जन का अनुपात ज्ञान और विद्या से सजीव रूप से जुड़ा हो। भारत में उच्च शिक्षा तरह-तरह की कमजोरियों से ग्रस्त पहले से थी, आज उसके संस्थान नई-पुरानी कई गंभीर बीमारियों से ग्रस्त हैं। कोई एक संकट नहीं है जिसकी वजह से उच्च शिक्षा का ढांचा चरमराता नजर आता है।

समाचारों में आज यह तो कल वह संस्था किसी न किसी वजह से आ जाती है, पर विश्लेषण के लिए जरूरी वक्त मीडिया नहीं निकाल पाता। इसलिए जून के आरंभ में एक शाम एक टीवी चैनल ने अपने लोकप्रिय कार्यक्रम में उच्च शिक्षा को चर्चा का विषय बनाया तो मुझे कुछ सुखद आश्चर्य हुआ। प्रसंग था दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षकों द्वारा किया जा रहा विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के एक नए आदेश का विरोध। उपर्युक्त टीवी चैनल के संबंधित एंकर इन दिनों अपने कार्यक्रम की शुरुआत एक लंबी व्याख्या से करते हैं, फिर किसी मेहमान से बात करते हैं। उस शाम उनकी मेहमान थीं दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षक संघ की मौजूदा अध्यक्ष।

आधे घंटे का कार्यक्रम कब शुरू हुआ और कब बीत गया पता ही नहीं चला और यह टीस छोड़ गया कि हमारे संकट की बारी आई पर व्यथा समझाई न जा सकी। एक दर्शक के रूप में यह अनुभूति मुझे शायद इसलिए हुई क्योंकि उच्च शिक्षा या अपने विश्वविद्यालय का संकट एक विषय नहीं है, जिंदगी का हिस्सा है। विशेष कष्ट वह इस कारण देता है क्योंकि संस्था या नीति का संकट मेरे छात्रों के जीवन में धुएं की तरह भर गया है। उनके दृष्टिकोण से उच्च शिक्षा की भीषण समस्याओं को देखना देश और समाज के अवसाद और वैचारिक माहौल की सड़न को स्पर्श करने जैसा है। ऐसे निरंतर स्पर्श की हालत में कोई टीवी के पर्दे से आपका हाल पूछे तो यकायक तय करना कठिन होता है कि क्या बताएं और कहां से शुरू करें। टेलीविजन के संप्रेषण की अनिवार्य हड़बड़ी में यही हालत दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षक संघ की मौजूदा अध्यक्ष की थी।

पाठक अवश्य जानना चाहेंगे कि ऐसा क्या है इस संकट में जो टीवी जैसे व्यस्त माध्यम में आधा घंटा पाकर बेचैनी और घुटन को घटाने की जगह और बढ़ा देता है। इस स्वाभाविक जिज्ञासा का समाधान संकट के दो आयाम करते हैं। पहला आयाम उच्च शिक्षा के संकट के परिणामों का है जो समय बीतने के साथ-साथ गहनतर होते जा रहे हैं और जिनकी सांस्कृतिक कीमत तेजी से बढ़ती जा रही है। जाहिर है, यह कीमत समाज ही चुकाएगा, भले वह संकट को समझने में आज असमर्थ हो या उससे बेगाना हो। दूसरा आयाम शिक्षा और शिक्षक के दैनिक कष्ट का है। यूजीसी के नए आदेश पर अमल होगा तो शिक्षक के कर्म का अपमान और बढ़ेगा, युवा विद्यार्थियों के लिए शिक्षा का अनुभव, जो पहले ही काफी दुर्बल है, और खोखला हो जाएगा। यह दूसरा आयाम अंतत: पहले आयाम में समा जाएगा और समाज को दोनों आयामों के मिल जाने से पैदा हुआ अंधेरा भर नजर आएगा।

उच्च शिक्षा के संकट का पहला आयाम आज सबसे प्रखर रूप में शिक्षा के व्यापारीकरण के रूप में अभिव्यक्ति पा रहा है। केंद्रीय और प्रांतीय सरकारों द्वारा चलाए जाने वाले विश्वविद्यालय और कॉलेज वित्तीय अकाल से जूझ रहे हैं और निजी विश्वविद्यालय, इंजीनियरी व मेडिकल संस्थान और कॉलेज ऊंची से ऊंची फीस लेकर भी फल-फूल रहे हैं। इन दोनों स्थितियों में विरोधाभास देखना गलत है। दिल्ली विवि शिक्षक संघ की अध्यक्ष ने अपने वक्तव्य में कहा कि उच्च शिक्षा का निजीकरण इसलिए बढ़ रहा है क्योंकि सरकारी संस्थाएं उजाड़ी जा रही हैं। शिक्षा की सार्वजनिक बहसों में लोग अक्सर पूछते हैं कि यह कोई नीति है या महज एक परिस्थिति है। अनिल सदगोपाल कई वर्षों से लगातार कह रहे हैं कि शिक्षा का निजीकरण नब्बे के दशक में विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष के मसविदे को मान कर लागू की गई आर्थिक दृष्टि और नीतियों का तार्किक परिणाम है। उस मसविदे की राजनैतिक स्वीकृति से बाजार की शक्ति बढ़ी है, राज्य की शक्ति और उसकी जिम्मेदारी की परिधि घटी है। यही नीति है, यही दिशा है।

इस सैद्धांतिक नजरिए में कई विवरण जोड़े जाएं, तभी वह विश्लेषण के लिए उपयोगी सिद्ध होगा। कुछ विवरण औपनिवेशिक इतिहास की ओर इशारा करते हैं, कुछ अन्य विवरण राजनैतिक समीकरणों का महत्त्व दिखाते हैं। उच्च शिक्षा का समूचा ढांचा उपनिवेशकाल में बना। ज्ञान के किसी भी क्षेत्र में वह औपनिवेशिक छाप से कोई पुरजोर संघर्ष नहीं छेड़ सका। कोई आश्चर्य नहीं कि पूंजी की ताजी वैश्विक बटोर की लहर में भारत का ज्ञानतंत्र आसानी से बह गया। आज जो निजी संस्थान सरकारी विश्वविद्यालयों के उजाड़ में उभर रहे हैं, विशुद्ध रूप से व्यापारिक हैं। इंजीनियरी, कानून, प्रबंध विज्ञान और चिकित्सा जैसे क्षेत्रों में इन निजी संस्थानों के पास कोई सामाजिक दृष्टि नहीं है। उनके लिए आर्थिक लाभ ही स्वायत्तता का पैमाना है।

अमेरिका और आस्ट्रेलिया जैसे देशों में अपने जैसे संस्थानों से सहकार और विद्यार्थियों को बहुराष्ट्रीय कंपनियों में नौकरी दिलाने का दावा इन संस्थानों के लिए हैसियत के लक्षण हैं। उनकी यह सोच देश के नवधनिक वर्ग की विचारधारा से मेल खाती है और यह विचारधारा इधर के वर्षों में फैलती रही है। उच्च शिक्षा के क्षेत्र में आज इस विचारधारा का दबदबा है। विशेषकर तकनीकी विषयों की उच्च शिक्षा में निजी संस्थानों का वर्चस्व और सरकारी तंत्र का पराभव परस्पर जुड़ी हुई परिघटनाएं हैं। दोनों को मिला कर देखें तो उच्च शिक्षा पिछले तीन दशकों से एक ऐतिहासिक मोड़ से गुजरती हुई दिखाई देती है। इस मोड़ से गुजरते हुए उस पर यह दबाव बढ़ता चला गया है कि वह अपनी वैचारिक भूमिका को तिलांजलि दे दे।

उच्च शिक्षा का समाज और उसकी संस्कृति में वैचारिक योगदान प्रत्यक्ष रूप से समाज विज्ञान, दर्शन, साहित्य और भाषा की पढ़ाई के रास्ते होता है। इन विषयों का व्यापारिक महत्त्व बहुत कम है, अतएव निजीकरण के चलते इन क्षेत्रों की पढ़ाई के अवसर घटते चले गए हैं। अमेरिका की तर्ज पर हाल में थोड़े-से निजी विश्वविद्यालयों ने ‘बिबरल आटर््स’ की पढ़ाई के मंहगे कोर्स शुरू किए हैं। समाज विज्ञान और मानविकी के विषयों का अध्ययन बहुत कुछ उस माहौल पर निर्भर होता है जो संस्था के वृहत्तर उद्देश्यों और संस्था व समाज के बीच संवाद से बनता है। यह संवाद शिक्षक के पेशे का आधार है।

निजी संस्थानों में सामान्य शिक्षक की कोई हैसियत नहीं होती और सरकारी संस्थाओं में शिक्षक की गरिमा को लगातार चोट पहुंचाई जाती रही है। ऐसा लगता है जैसे देश ने अपने शिक्षकों के खिलाफ एक युद्ध छेड़ रखा है। पिछले बीस-पचीस वर्षों से शिक्षकों की नियुक्ति का सिलसिला टूटता चला गया है। प्रश्न अब भर्ती की निष्पक्षता का नहीं रहा। अब भर्ती ही नहीं होती। बड़े-बड़े विश्वविद्यालय में शिक्षक चार-चार महीने की तदर्थ नियुक्ति पर पढ़ाते हैं और हजारों कक्षाएं दिहाड़ी के हिसाब से पढ़ाई जाती हैं। हिंदी पट्टी के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में स्थायी शिक्षक विरले हैं। कुछेक पदों के लिए विज्ञापन निकलता है तो एक-एक जगह के लिए हजारों युवा आवेदन देते हैं। उनकी योग्यता का मूल्यांकन करने के लिए यूजीसी ने ‘एपीआई’ नाम की प्रणाली निकाली है। इस प्रणाली में हर काम के लिए नंबर मिलते हैं। नंबरों की होड़ ने फर्जी शोध पत्रिकाओं और सेमिनारों जैसी अभूतपूर्व प्रवृत्तियों को जन्म दिया है। मर्ज बढ़ता गया है जैसे-जैसे दवा हुई है।

दिल्ली में शिक्षकों के आंदोलन का कारण यूजीसी का एक और नया आदेश है जिसके तहत प्रति सप्ताह ली जाने वाली कक्षाओं की संख्या बढ़ाई जाएगी। दुनिया भर के विश्वविद्यालयों की तुलना में हमारी व्यवस्था इतनी ज्यादा कक्षाएं लगवाती है कि विद्यार्थी को स्वयं पढ़ने और सोचने का अवसर नहीं मिलता। सेमेस्टर प्रणाली थोपे जाने से यह अवसर और घट गया है और सारी पढ़ाई सिर्फ परीक्षा के लिए होने लगी है। पाठ्यक्रम को भी यूजीसी ने केंद्रीकृृत कर देने की कोशिश की है। इतनी सारी भ्रमित नीतियों और पहले से चली आ रही विकृतियों से जूझता हुआ शिक्षण का पेशा अपना आत्मविश्वास खो चुका है।

उच्च शिक्षा का दायित्व है कि वह युवा छात्र को वैचारिक साहस का अनुभव दे। ऐसा अनुभव आज दुर्लभ हो चुका है। ऐसा अनुभव पाना एक अधिकार है, यह बात विद्यार्थी भूल चुके हैं। युवा होने के नाते वे नहीं जानते कि भारत की उच्च शिक्षा के संस्थान किस हादसे से गुजरे हैं। शिक्षा एक धीमी प्रक्रिया होती है, अत: उसकी सेहत बिगड़ने के दुष्परिणाम भी धीरे-धीरे प्रकट होंगे और समाज व देश को लंबे समय तक झेलने होंगे।

(कृष्ण कुमार)

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