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बदलते परिदृश्य में शिक्षक

आज शिक्षा के बदलते स्वरूप और भारतीय शिक्षा प्रणाली को देखते हुए इस पर गंभीर विमर्श की जरूरत है और उसके लिए कुछ बुनियादी सवालों से जूझना होगा।

प्रतिकात्मक तस्वीर।

आज शिक्षा के बदलते स्वरूप और भारतीय शिक्षा प्रणाली को देखते हुए इस पर गंभीर विमर्श की जरूरत है और उसके लिए कुछ बुनियादी सवालों से जूझना होगा। सबसे पहला प्रश्न यह है कि शिक्षा क्या है और वह कौन-सा परिवेश है जिसमें शिक्षा बदल रही है? शिक्षा के इस बदलते परिवेश में शिक्षकों की नई भूमिका क्या होनी चाहिए? देखा जाए तो जैसे ही मनुष्य अपनी प्राकृतिक अवस्था से निकल कर सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था में संगठित हुआ, शिक्षा उसका अभिन्न अंग बन गई। दूसरे शब्दों में कहें तो शिक्षा के चलते ही वह अपने पशु समान जीवन से मुक्त हो सका। संस्कृत के एक पुराने नीति वचन में विद्या-विहीन व्यक्ति को पशु के समान कहा गया है। प्रारंभिक अवस्था में जहां मानव जाति की सबसे जरूरी आवश्यकता थी भूख मिटाना तथा अपने जीवन की रक्षा करना, वहीं उसकी एक और बड़ी जरूरत थी, ब्रह्मांड या इस दुनिया के बारे में जानकारी प्राप्त करना। देखा जाए तो जहां ज्ञान साध्य है वहीं शिक्षा उस ज्ञान को प्राप्त करने का साधन।

अब प्रश्न यह उठता है कि किस प्रकार का ज्ञान प्राप्त करना चाहिए? कुछ लोगों ने ज्ञान को जीवन की जरूरतों के साथ जोड़ कर देखा है, जिसे इहलौकिक ज्ञान कहा गया है। वहीं कुछ लोगों ने इसे जीवन के बाद की दुनिया यानी दैवीय सत्ता, स्वर्ग-नर्क, पुनर्जन्म आदि की कल्पना कर परलोक के साथ जोड़ कर देखा और इसे पारलौकिक या आध्यात्मिक ज्ञान की संज्ञा दी है। इसी के कारण अनेक विषयों का जन्म हुआ। असल में शिक्षा मुक्ति और आजादी का सशक्त माध्यम है। शिक्षा ऐसी ताकत है जो भय, अंधकार, अज्ञान, अंधविश्वास, घृणा तथा हीन भावना से मुक्त करती है। वह जीवंत है, ऊर्जा और उम्मीदों से भरी है, इसमें किसी प्रकार का अवसाद या किसी भी तरह की हताशा नहीं है। शिक्षा में सापेक्षता की भावना निहित है। यह जहां अपनी तकलीफों के प्रति सचेत करती है वहीं दूसरों के दुख को अनुभव करने की क्षमता भी उत्पन्न करती है।

इसलिए शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो हमारे मन में ज्ञान के लिए अनुराग और उसकी भूख पैदा करे। यदि वह असंख्य प्रश्नों को जन्म दे तो अनेक प्रश्नों के उत्तर भी तैयार करे। शिक्षा मनुष्य की इच्छाओं को नए अर्थ देती है जो कि सकारात्मक परिणामों की तरफ ले जाता है। यह जहां मानसिक और शारीरिक समस्याओं से दूर रखती है तो दूसरी तरफ आध्यात्मिक परिपूर्णता भी देती है। यह जीवन में संतोष और स्थिरता को जन्म देती है, साथ ही व्यक्ति को नवीनीकृत करते हुए उसे भविष्यद्रष्टा, समकालीन और नए विचारों से लबरेज भी करती है।

दूसरा महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह उठता है कि क्या शिक्षा का परिदृश्य बदला है? या, समाज का परिदृश्य बदला है? देखा जाए तो 1991 के बाद से भारत और विश्व के अन्य समाजों में सत्तर वर्षों से चली आ रही सोवियत साम्यवादी व्यवस्था की विदाई के बाद से ही बदलाव की शुरुआत होने लगी थी। समाज की सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक स्थितियों में अचानक परिवर्तन होने लगे। राष्ट्रीय स्तर पर जहां 1991 में नरसिंह राव के नेतृत्व में नई आर्थिक नीति का सूत्रपात किया गया, वहीं सोवियत पतन ने समूची दुनिया में भूमंडलीकरण की शुरुआत की, जिसने समाजवादी संरचनाओं और नीतियों को बदलना शुरू कर दिया।
भारत में लागू की गई नई आर्थिक नीति नई बोतल में पुरानी शराब की तरह थी। इस नीति के माध्यम से भूमंडलीकरण की प्रक्रिया शुरू की गई, जिसमें प्रमुख रूप से तीन बातें सम्मिलित थीं- उदारीकारण, निजीकरण और एकीकरण।

उदारीकरण के तहत समाजवादी नीतियों को बदलना शुरू किया गया। निजीकरण के जरिए राज्य की संपत्तियों तथा संसाधनों को निजी हाथों में सौंपा गया और एकीकरण के द्वारा इस बात पर बल दिया गया कि उक्त दोनों नीतियों की सहायता से बाहर की दुनिया के लिए बाजार को खोला जाए जिससे मानव, तकनीकी और संसाधनों का सरलता और सहजता से आवागमन संभव हो सके। भारत का बाजार दुनिया के अन्य बाजारों के साथ एकीकृत हो सके और बाहर के बाजार भारत के साथ खुला व्यापार कर सकें। इस प्रक्रिया ने बाजारीकरण की एक नई प्रक्रिया को जन्म दिया, जिसके चलते 1995 में विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) जैसी संस्थाओं का जन्म हुआ। इस तरह विधिवत भूमंडलीकरण या वैश्वीकरण की शुरुआत हुई। अब शिक्षा भी इस दायरे में आ गई।

शिक्षा में इतनी विषमता पहले कभी नहीं थी, जितनी उदारीकरण और वैश्वीकरण के इस दौर में दिखती है। कुछ स्कूल बहुत महंगे और हैसियत के प्रतीक हैं। दूसरी ओर, अधिकतर स्कूल ऐसे हैं जहां न पर्याप्त बुनियादी सुविधाएं हैं, न विद्यार्थियों के अनुपात में शिक्षक। व्यावसायिक पाठ्यक्रम वाले कॉलेजों में दाखिला पाने की मारामारी मची रहती है, क्योंकि इन पाठ्क्रमों से अच्छे कैरियर का रास्ता खुलता है। लेकिन इन कॉलेजों में प्रवेश पाना पैसे की ताकत पर निर्भर करता है। प्रकारांतर से, वहां की पढ़ाई खरीदी जाती है। यह योग्यता की पूछ है, या पैसे की?

इन परिस्थितियों ने समाज को प्रभावित करना और बदलना शुरू कर दिया। फलस्वरूप भारत में शिक्षा भी प्रभावित हुई और उसका परिदृश्य बदलने लगा। नब्बे के दशक में लागू की नई आर्थिक नीतियों के कारण सरकार ने स्वयं को कई जिम्मेदारियों से मुक्त करना शुरू कर दिया और राज्य के द्वारा संचालित अनेक क्षेत्रों को बाजार के हवाले कर दिया। नतीजतन, शिक्षा के क्षेत्र में निजीकरण की बाढ़-सी आ गई। बड़े शहरों से लेकर छोटे कस्बों और गांवों तक प्राइवेट स्कूलों तथा महाविद्यालयों की भरमार हो गई। शिक्षा अब सरकारी नीतियों से तय न होकर बाजार के नियमों से संचालित होने लगी। एक प्रतिस्पर्धा-सी मच गई और यह स्पष्ट हो गया कि यदि अस्तित्व बचाना है तो बाजार के नियमों के अनुसार चलना होगा। बाजार के नियम क्या हैं? बाजार परंपरागत रूप से लाभ और आपूर्ति तथा मांग के नियम से संचालित होता है। यह प्रतिस्पर्धा की नंगी तलवार पर चलता है, जिसमें माना जाता है कि सर्वोत्तम की विजय होगी।

इस प्रकार देखा जाए तो जिस तरह से समाज बदला बाकी चीजें भी उसी तरह से बदलने लगीं और इसका सबसे बड़ा प्रभाव पड़ा शिक्षा पर। यदि तन के लिए भोजन जरूरी है तो शिक्षा तन और मन दोनों के लिए समान रूप से जरूरी है। लेकिन राज्य पर जनता के दबाव की वजह से भारत में दो प्रकार की व्यवस्था लागू की गई। प्रारंभिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक में दोहरी नीति का पालन किया गया और सरकारी के साथ-साथ गैर-सरकारी संस्थाओं को चलाने की स्वीकृति दे दी गई। पर सरकारी संस्थाओं की तुलना में गैर-सरकारी संस्थाएं बहुत तेजी से बढ़ी हैं। और तो और, सरकारी संस्थाओं पर लगातार निगरानी चल रही है। कोशिश की जा रही है कि उनको भी बाजार के नियमों के अंतर्गत ले आया जाए। उनको गुणवत्ता और सामर्थ्य के आधार पर चलने से रोक दिया जाए।

ऐसी स्थिति में हम स्वयं यह अनुमान लगा सकते हैं कि इस बदलते परिवेश में शिक्षक की क्या भूमिका होगी? वह शिक्षक जो सरकारी अनुदान पर निश्चिंत और स्वतंत्र होकर बिना लाग-लपेट के विचारों को प्रस्तुत करता था, अब उस पर बाजार का डंडा चलने लगा है। अब शिक्षक को विचारों व आदर्शों तथा जीविकोपार्जन या समृद्धि में से किसी एक को चुनना होगा। इस दोहरी शिक्षा नीति के बीच दो प्रकार के शिक्षक हमारे समक्ष हैं- एक वे जिन्हें सरकारी संरक्षण प्राप्त है, और दूसरे वे, जो पूरी तरह से बाजार के खेल पर आश्रित हैं। ऐसे हालात में जहां एक शिक्षक की दूसरे शिक्षक से प्रतिस्पर्धा है, वहीं दोनों प्रकार के शिक्षकों के सामने बाजार के नियम मुंह बाए खड़े हैं। यानी बाजार से अब कोई भी नहीं बच सकता। आज दोनों तरह के शिक्षकों को अपनी भूमिका स्पष्ट करनी होगी और अपनी गुणवत्ता लगातार बढ़ानी होगी। बाजार में वही टिकेगा जो इस प्रतिस्पर्धा को न सिर्फ झेल पाएगा बल्कि उसका सामना सफलतापूर्वक कर पाएगा। उसके समक्ष जहां बाजार की चुनौती है वहीं उसके पास उत्कृष्ट प्रौद्योगिकी भी है, जिसका प्रयोग करके वह अपनी भूमिका की धार को तेज कर सकता है ताकि बाजार के हमले को निष्प्रभावी करने में सफल हो सके।

गौरतलब है कि देश की बदलती हुई आर्थिक स्थिति और कानूनों से शिक्षा प्रभावित हुई और स्वाभाविक है कि जब शिक्षा प्रभावित होगी तो शिक्षक भी उससे प्रभावित हुए बिना नहीं रहेगा। भूमंडलीकरण के चलते आर्थिक परेशानियों की दुहाई देकर सरकारें शिक्षा के क्षेत्र से अपने हाथ पीछे खींच रही हैं। नब्बे के दशक और नई सदी के प्रथम दशक में निजीकरण के तहत स्कूली और उच्च शिक्षण संस्थाओं की संख्या में भारी इजाफा हुआ है। यदि इसे एक आर्थिक सच्चाई मान कर स्वीकार किया जाए तो इसमें बहुत-सी सकारात्मक बातें भी देखी जा सकती हैं। इसका सबसे बड़ा सकारात्मक प्रभाव यह हुआ कि शिक्षा उन जगहों तक भी पहुंच गई जहां कोई सोच भी नहीं सकता था। न ही सरकारें इसे कर पाने में सक्षम हो पा रही थीं। दूसरा फायदा यह कि इस दबाव से शिक्षकों को अपनी गुणवत्ता बढ़ाने का मौका मिला है, या इसकी चुनौती उनके सामने दरपेश हुई है। आज के दौर में शिक्षकों की भूमिका और बढ़ गई है, जिसे सकारात्मक दिशा में ले जाकर नए रास्तों की तलाश की जा सकती है।

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