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दिल्ली को हरित नियोजन की दरकार

दिल्ली ही नहीं, पूरे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र को इन कवायदों के दायरे में लाना होगा। परिवहन, मार्ग, समय, वाहन उपयोग तथा कचरा प्रबंधन संबंधी कुछ व्यवस्थागत व कानूनी बदलाव करने होंगे। तबादले और तैनाती की ऐसी नीति बनानी होगी कि लोगों की दैनिक भागदौड़ की दूरी यथासंभव न्यूनतम हो तथा प्रशासनिक कार्यकुशलता भी कायम रहे।

केजरीवाल का सम-विषम फॉर्मूला

पंद्रह दिन सम-विषम। पहले मजाक, विरोध, लागू करने की जद््दोजहद। इस सब के लिए कितने बयान, कितने विज्ञापन, कितने स्वयंसेवक, कितना खर्च और इसकी तरफदारी को लेकर कितनी बहस-पड़ताल! इस सब की तारीफ करनी चाहिए, क्योंकि इन सभी सम-विषम प्रतिक्रियाओं ने मिल कर दिल्ली की जनता को जगाया; कम कारों के सड़कपर उतरने से यातायात जाम में राहत का अहसास हुआ। पंद्रह दिन बाद जब सड़कों पर चलते वाहनों का शीशा फिर खुला, तो कई आवाजें बाहर आर्इं-‘इससे अच्छा तो आॅड-ईवन के समय था; गाड़ी खिसकती तो थी।’

विज्ञान एवं पर्यावरण केंद्र की आकलन-रिपोर्ट ने सम-विषम प्रयोग के समापन के अगले दिन ही पार्टिकुलेट मैटर (पीएम 2.5) का स्तर सत्तावन फीसद अधिक हो जाने का दावा पेश कर यह स्पष्ट कर दिया कि साफ हवा चाहिए, तो सम-विषम को स्थायी तौर पर लागू रखना ही बेहतर होगा। यदि दिल्ली के अस्पतालों के आपातकालीन वार्ड में आने वाले सांस के मरीजों की संख्या का तुलनात्मक आंकड़ा सामने आया होता, तो संभवत: यह दावा और मजबूत हो जाता।

सम-विषम के आर्थिक पक्ष में दावा करना हो, तो उन पंद्रह दिनों के दौरान दिल्ली के पेट्रोल पंपों से र्इंधन की बिक्री में पैंतीस प्रतिशत गिरावट के आंकड़े को सामने जरूर रखना चाहिए। आकलन करना चाहिए कि यदि बायपास रास्तों की उपलब्धता वाले सभी शहरों में सम-विषम फार्मूला लागू हो जाए, तो भारत में र्इंधन-बिक्री में कितनी कमी आएगी, भारत को विदेश से कितना कम र्इंधन खरीदना पड़ेगा और इससे विदेश जाने वाली भारतीय पूंजी की कितनी बचत होगी।

इस प्रयोग की सफलता का लाभ यह हुआ कि दिल्ली सरकार प्रोत्साहित हुई। उसने हौसला दिखाया कि वह जल्द एक हजार बसें सड़कोंं पर उतारेगी। वह कोयले से चलने वाले बदरपुर बिजली संयंत्र को बंद करेगी। दिल्ली के वायु प्रदूषण में धूल का बड़ा योगदान है। लिहाजा, दिल्ली की सड़कों की सफाई इंसानी नहीं, मशीनी वैक्यूम क्लीनर से करेगी। कुछ सड़कों पर पार्किंग को प्रतिबंधित करेगी। ट्रकों की आवाजाही रोकेगी। साइकिल-पथ बना कर साइकिल सवारों की सुरक्षा सुनिश्चित करेगी, ताकि लोग साइकिल सवारी को प्रोत्साहित हों। विशेषज्ञों के मुताबिक एक डीजल गाड़ी, पांच से सात पेट्रोल गाड़ियों के बराबर प्रदूषण फेंकती है; लिहाजा, राष्ट्रीय हरित पंचाट ने आदेश दिया कि दिल्ली अब डीजल गाड़ियों का कोई नया पंजीकरण न करे।

कहा जा रहा है कि सिर्फ इतने से नहीं होगा; दिल्ली को जेनरेटरों के लिए बायो-डीजल की तरफ बढ़ना होगा। औद्योगिक प्रदूषण को आंख दिखानी होगी। दिल्ली ही नहीं, पूरे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र को इन कवायदों के दायरे में लाना होगा। सिर्फ योजना नहीं, परिवहन, मार्ग, समय, वाहन उपयोग तथा कचरा प्रबंधन संबंधी कुछ व्यवस्थागत व कानूनी बदलाव करने होंगे। तबादले और तैनाती की ऐसी नीति बनानी होगी कि लोगों की दैनिक भागदौड़ की दूरी यथासंभव न्यूनतम हो तथा प्रशासनिक कार्यकुशलता भी कायम रहे। लकड़ी व गोबर चूल्हे को आबोहवा के लिए नुकसानदेह मानते हुए केंद्र सरकार, किस्तों पर गैस कनेक्शन उपलब्ध कराने की तैयारी कर रही है। इसके लिए दूरदराज इलाकों में गैस वितरकों का व्यापक तंत्र खड़ा करने की खबर अखबारों में आपने पढ़ी ही होगी।

केंद्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने वाहन निर्माता कंपनियों से कहा है कि वे वर्ष 2020 तक यूरो-6 की गाड़ियां भारत की सड़कों पर उतारने की तैयारी कर लें। भारतीय वाहन निर्माता कह रहे हैं कि यूरो-4 से यूरो-6 में जाने में दस साल तो कम से कम चाहिए ही होते हैं। वे कितनी भी तेजी करेंगे, तो 2023 से पहले यूरो-6 के वाहन सड़कों पर नहीं उतार पाएंगे। स्पष्ट है कि परिणामस्वरूप बाहर से कल-पुर्जे खरीद कर वाहन बनाने वाली कंपनियों को बढ़त मिलेगी और मुनाफा भी। भारत का पैसा भी बाहर जाएगा। सांसें भी बचानी हैं और भारत का पैसा भी। क्या करें? विकल्प क्या है?
विकल्प है कि जितनी चिंता हम क्लोरो-फ्लोरो यानी नुकसानदेह गैसों का उत्सर्जन कम करने की कर रहे हैं, उतनी ही चिंता नुकसानदेह गैसों के अवशोषण की भी करें। कार्बन उत्सर्जन के अवशोषण का सबसे बड़ा माध्यम है- हरियाली। हरियाली बढ़ाएं। हम उत्सर्जन क्यों रोकना चाहते हैं? इसलिए कि तापमान न बढ़े और जलवायु में घातक बदलाव न हों। सोचिए कि तापमान-वृद्धि को कौन रोक सकता है? हरियाली ही तो? हरित घर, हरित पास-पड़ोस, हरित तकनीक और शांत हरित सोच। क्या सौर ऊर्जा उपकरणों से बिजली उत्पादन को प्रोत्साहन इसमें सहायक होगा? क्या शीतल जल के संचयन ढांचे तापमान-वृद्धि रोकने में सहायक नहीं होते? क्या मिट्टी की नमी इसमें मददगार नहीं होती? क्या खाली पड़ी जमीन इसमें कुछ मदद कर सकती है? दिल्ली की खाली पड़ी जमीन का क्या किया जाए? दिल्ली की बेलगाम होती आबादी का समाधान क्या यह है कि हर खाली जगह को आवासीय अथवा व्यावसायिक निर्माण से भर दिया जाए?

इसी नजरिए का नतीजा है कि आज शहरों में तालाब नहीं बचे हैं। तमाम तालाब और झीलें अंधाधुंध होने वाले वैध-अवैध निर्माण-कार्यों की बलि चढ़ गए। उन्हें पाट कर वहां रिहाइशी कॉलोनियां बना दी गर्इं। इस तरह शहरों में जो कुदरती जल-स्रोत और जल संग्रहण क्षेत्र थे वे नष्ट होते गए। आज दिल्ली की नई पीढ़ी को अंदाजा भी नहीं होगा कि यहां कितने तालाब थे। यही दूसरे राज्यों, महानगरों और नगरों में भी हुआ है। रेहड़ी-पटरी वालों के अतिक्रमण के खिलाफ राज्य सरकारें और नगर निगम जब-तब मुहिम छेड़ते रहते हैं। पटरियों पर लगी दुकानों के सामान जब्त कर लिए जाते हैं। पर नदियों-तालाबों-झीलों पर हुए अतिक्रमण के खिलाफ कब कार्रवाई होगी? इस तरह के अतिक्रमण और अवैध कब्जे का परिणाम जहां जल संकट के रूप में आया है, वहीं कुदरती जल संचयन के सहारे नष्ट होने से शहरों में बाढ़ का खतरा बढ़ा है।

सरकारें यही सोचती हैं कि निर्माण ही खाली पड़ी जगह का एकमात्र उपयोग है। यमुना की जमीन पर खेल गांव निर्माण के विरोध में हुए ‘यमुना सत्याग्रह’ को याद कीजिए। इस बाबत तत्कालीन लोकसभाध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी के एक पत्र के जवाब में दिल्ली की तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने लिखा था- ‘हाउ कैन वी लेफ्ट सच एन वैल्युएबल लैंड अनयूज्ड’ अर्थात ‘इतनी बहुमूल्य भूमि को हम बिना उपयोग किए कैसे छोड़ सकते हैं।’ दिल्ली ने एक ओर शीला दीक्षितजी को यमुना सफाई अभियान चलाते देखा और दूसरी ओर, यमुना की जमीन को लेकर यह नजरिया! कभी इसी नजरिए के चलते भाजपा के केंद्रीय शासन ने यमुना की जमीन पर अक्षरधाम मंदिर बनने दिया और कालांतर में खेलगांव, मेट्रो डिपो, मॉल और मकान बने। जिस यमुना तट के मोटे स्पंजनुमा रेतीले एक्यूफर में आधी दिल्ली को पानी पिलाने की क्षमता लायक पानी संजो कर रखने की क्षमता है, उसे हमारी सरकारों ने कभी इस नजरिए से जैसे देखा ही नहीं।

खाली जमीन को लेकर ऐसे ही नजरिये का अगला शिकार बनने जा रही दिल्ली की जमीन है: मुंडका में मौजूद 147 एकड़ में फैला मैदान। जुझारू कार्यकर्ता दीवान सिंह कहते हैं कि मुलाकात के बावजूद वे इस बाबत दिल्ली के मुख्यमंत्री का नजरिया नहीं बदल पाए। वे मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को नहीं समझा पाए कि वायु प्रदूषण में उद्योगों का योगदान, वाहनों से कम नहीं है।

दिल्ली का पानी और हरियाली बचाने को लेकर करीब एक दशक से दीवान सिंह जद्दोजहद कर रहे हैं। उनकी मांग है कि मुंडका और आसपास की आठ लाख की आबादी को सांस लेने के लिए कोई खुली जगह चाहिए कि नहीं? कहते हैं कि यहां खेलने व खुले में सांस लेने के लिए ले-देकर यही तो एक जगह है। सरकार को चाहिए कि वह इसे एक जैव विविधता पार्क और खेल के विविध मैदानों के रूप में विकसित करे, न कि औद्योगिक क्षेत्र के रूप में। गौरतलब है कि दिल्ली सरकार, मुंडका की इस जमीन पर औद्योगिक क्षेत्र बनाने के फेर में है और स्थानीय कार्यकर्ता, दीवान सिंह के नेतृत्व में, ‘मुंडका किराड़ी हरित अभियान’ चला कर इसका विरोध कर रहे हैं।
उक्त नजीरों से स्पष्ट है कि आबोहवा को लेकर सरकारों को अपने नजरिये में समग्रता लानी होगी। समझना होगा कि दिल्ली को उद्योग भी चाहिए, पर दिल्लीवासियों की सेहत की कीमत पर नहीं।

दिल्ली को स्मार्ट सिटी का सपना दिखाने वालों को समझ भी स्मार्ट ही चाहिए। नगर नियोजन की स्मार्ट समझ यह है कि सिर्फ हवा नहीं होती आबोहवा! आबोहवा को दुरुस्त रखने के लिए हवा के साथ आब यानी पानी को भी दुरुस्त रखना होगा। हमारे नगर नियोजकों को सोचना होगा खाली पड़ी जमीन बेकार नहीं होती। बेहतर आबोहवा सुनिश्चित करने में खाली और खुली जमीन का भी कुछ योगदान होता है। अत: स्वस्थ आबोहवा चाहिए, तो नगर नियोजन करते वक्त कुल क्षेत्रफल में हरित क्षेत्र, जल क्षेत्र, कचरा निष्पादन क्षेत्र व अन्य खुले क्षेत्र के लिए एक सुनिश्चित अनुपात तो पक्का करना ही होगा।

कुल नगरीय क्षेत्रफल में निर्माण क्षेत्र की अधिकतम सीमा व प्रकार भी सुनिश्चित करना ही चाहिए। इससे छेड़छाड़ की अनुमति किसी को नहीं होनी चाहिए। हमें यह भी समझना होगा कि निराई-गुड़ाई-जुताई होते रहने से जमीन का मुंह खुल जाता है। जल संचयन क्षमता बरकरार रहती है। अत: जहां पार्क की जरूरत हो, वहां पार्क बनाएं, पर पूर्व इकरारनामे के मुताबिक यमुना की शेष बची जमीन पर बागवानी मिश्रित सहज खेती होने दें; पूर्णतया अनुकूल जैविक खेती। रासायनिक खेती की अनुमति यहां न हो। समग्र सोच से ही बचेगी आबोहवा की शुद्धता और दिल्ली हो सकेगी ‘सिटी स्मार्ट’।

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