ताज़ा खबर
 

राजनीतिः नई चुनौतियों की पटरी

यात्री गाड़ियों को लेकर अकसर रोना रोया जाता है कि ये ट्रेनें केवल आम आदमी की सुविधा व सेवा की दृष्टि से घाटे में चलाई जा रही हैं। नतीजतन, इन्हें नियमित चलाने के लिए एक यात्री रेल पर दो मालगाड़ियां चलानी पड़ती हैं। इन गाड़ियों का घाटा बढ़ा-चढ़ा कर इसलिए दिखाया जाता है, जिससे नई यात्री ट्रेनें चलाने ...

Author February 10, 2016 3:02 AM
1 अप्रैल 2017 से भारतीय रेल के नियमों में कई बदलाव हुए है। (File photo)

प्रमोद भार्गव

भारतीयरेल विश्व का सबसे बड़ा व्यावसायिक प्रतिष्ठान है, लेकिन इस ढांचे को किसी भी स्तर पर विश्व-स्तरीय नहीं माना जाता। अलबत्ता इसकी सरंचना को विश्व-स्तरीय बनाने की दृष्टि से कोशिशें तेज जरूर हो गई हैं। सुविधा-संपन्न तेज गति की प्रीमियम और बुलेट ट्रेनों की बुनियादी शुरुआत हो गई है। अब नई चुनौतियों के रूप में रेल यात्रा को आधिकारिक रूप से सुविधाजनक, सुरक्षित व यात्री-हितैषी बनाने पर जोर संभवत: अट्ठाईस फरवरी को आने वाले रेल बजट में दिखाई देगा।

स्टेशनों का आधुनिकीकरण भी नई चुनौतियों में शामिल है। पर इसका विपरीत पहलू यह भी हो सकता है कि इन सुविधाओं की कीमत यात्रियों से ही वसूली जाए। इस नाते रेल बजट में वरिष्ठ नागरिकों को वातानुकूलित डिब्बों में मिलने वाली छूट से वंचित किया जा सकता है। साथ ही अगर सातवें वेतन आयोग की सिफारिशें रेलवे में लागू होती हैं तो रेलवे चालीस हजार करोड़ के इस अतिरिक्त बोझ की भरपाई के लिए यात्री किराए में दस प्रतिशत और मालभाड़े में पांच प्रतिशत तक की बढ़ोतरी कर सकता है। रेलवे को घाटे से उबारने के लिए सेवा-भाव से छुटकारे के उपाय भी दिखाई दे सकते हैं। नई चुनौतियों के अनुरूप रेलवे ढले, इस लक्ष्य में यह आशंका भी है कि कहीं आम आदमी की पहुंच से रेलवे की दूरी न बढ़ती चली जाए?

देश में आज भी रेल सबसे बड़ी सार्वजनिक परिवहन सेवा है तथा छोटी व लंबी यात्रा का सबसे सस्ता माध्यम है। देश में एक कोने से दूसरे कोने की यात्रा का इससे सुगम दूसरा कोई माध्यम नहीं है। आर्थिक उदारवादी नीतियां लागू होने के बाद मध्यवर्गीय युवा दूरदराज में रोजगार करने को विवश हुआ है। इसलिए ट्रेनों में आवाजाही के लिए भीड़ बढ़ने के साथ उच्चस्तरीय मांगें भी बढ़ी हैं। ऐसा इसलिए भी हुआ है, क्योंकि चीन व जापान समेत पूरी दुनिया में रेलवे में विस्तार, गति और सुविधाएं हैरतअंगेज हैं। इनकी तुलना में हम वाकई पिछड़े हैं। बावजूद इस होड़ में हम शामिल होते हैं और केवल खास आदमी की जरूरतों का खयाल बजट में रखते हैं तो यह आम आदमी को रेलवे से बहिष्कृत कर देने की शर्त पर ही होगा। जबकि सुविधा और सुरक्षा की जरूरत आम आदमी को भी है।

आम आदमी रेल का टिकट ले भी ले तो उसे सीट की बात तो छोड़िए, ठीक से खड़े होने की जगह भी नसीब नहीं होती। इस मुश्किल को दूर करने के लिए पैंतालीस अतिरिक्त डिब्बों की जरूरत है, जिससे हरेक ट्रेन में अतिरिक्त डिब्बे जोड़े जा सकें। अतिरिक्त रेल लाइनें बिछाने के साथ इकहरी लाइनों का दोहरीकरण भी जरूरी है, जिससे रेलगाड़ियों की संख्या बढ़ाई जा सके। इन बुनियादी सुविधाओं को जमीन पर उतारने के बजाय हमारे यहां अमदाबाद से मुंबई बुलेट ट्रेन चलाने की योजना पर कहीं ज्यादा जोर है। यात्री गाड़ियों को लेकर अकसर रोना रोया जाता है कि ये ट्रेनें केवल आम आदमी की सुविधा व सेवा की दृष्टि से घाटे में चलाई जा रही हैं। नतीजतन, इन्हें नियमित चलाने के लिए एक यात्री रेल पर दो मालगाड़ियां चलानी पड़ती हैं। इन गाड़ियों का घाटा बढ़ा-चढ़ा कर इसलिए दिखाया जाता है, जिससे नई यात्री ट्रेनें चलाने का दबाव न बनाया जाए।
फिलहाल रेलवे के पास साठ हजार सवारी डिब्बे हैं, जिनमें करीब डेढ़ करोड़ मुसाफिर रोजाना सफर करते हैं। इनमें से वातानुकूलित डिब्बों में महज दो फीसद यात्रियों की आवाजाही होती है। ऐसे में यह कैसे विश्वास कर लिया जाए कि सामान्य शयनयान और डिब्बों में सफर करने वाले अठानबे फीसद यात्रियों का घाटा दो फीसद कुलीन यात्री पूरा कर रहे हैं? क्यों नहीं रेल बजट में सामान्य और विशेष डिब्बों से होने वाली आय और खर्च का लेखा-जोखा अलग से दिया जाता? यहां गौरतलब यह भी है कि सामान्य सवारी और शयनयानों में क्षमता से कई गुना यात्री सफर करते हैं। इस आय को यदि वातानुकूलित यान की आय से जोड़ा जाए तो लगभग बराबर बैठती है। यही नहीं, टिकट निरीक्षक लाचारी के मारे इन्हीं यात्रियों से अवैध वसूली करते हैं। इस रिश्वतखोरी को रोकने के उपाय किसी रेल बजट में दिखाई देते हैं?

सवारी गाड़ियों को चलाने में यदि घाटा है भी, तो उसकी भरपाई पास की सुविधा प्रतिबंधित करके की जानी चाहिए। रेलवे में विशिष्ट व अति विशिष्ट लोगों को अट्ठाईस प्रकार के निशुल्क और रियायती पास दिए जाते हैं। देश के सभी वरिष्ठ नागरिकों को खैरात में यात्रा के लिए तीस प्रतिशत की छूट लंबे समय से जारी है। यह छूट हर दर्जे के यात्री किराए में तो है ही, करोड़पतियों को भी मिल रही है। उन पेंशनधारियों को भी मिल रही है, जो पचास-साठ हजार रुपए हर माह बतौर पेंशन ले रहे हैं। किसलिए? ये मुफ्त और रियायती यात्राएं रेलवे पर बोझ होने के साथ-साथ उसके घाटे का सबब भी बन रही हैं। हालांकि अब रेलवे ने प्रथम श्रेणी के वातानुकूलित डिब्बों में इस छूट को बंद करने के संकेत दिए हैं। ऐसा होता है तो यह रेलवे के हित में होगा।

सुरक्षा इंतजामों के प्रति भी रेलवे पर्याप्त मुस्तैद नहीं रहा है। रेलवे में 11,463 बिना चौकीदार के पार-पथ हैं। इन पर दुर्घटनाएं होती रहती हैं। लोगों के मारे जाने और घायल होने के साथ बड़ी मात्रा में धन-हानि भी होती है। अनेक रेलवे स्टेशनों पर एक से दूसरे प्लेटफॉर्म पर आवागमन के लिए पैदल पार-पुल नहीं हैं। इससे जल्दबाजी में यात्री पटरियों से गुजरते हैं और ट्रेन या मालगाड़ी की चपेट में आ जाते हैं। ये बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराने के बजाय रेलवे देश के प्रमुख स्टेशनों पर विद्युत स्वचालित सीढ़ियों (एक्सेलेटर) का संजाल बुनने में लगा है। एक एक्सेलेटर लगाने में करोड़ों रुपए खर्च होते हैं और उसके परिचालन में काफी बिजली खर्च होती है। जबकि इतनी ही राशि में कम से पांच पार-पथों को चौकीदार व बैरियर युक्त बनाया जा सकता है। इससे कम पढ़े-लिखे लोगों को बड़ी संख्या में रोजगार भी मिलेगा। हालांकि इन पथों के निर्माण में पिछले डेढ़ साल के भीतर तेजी आई है।

रेलवे के विकास से जुड़े ‘एक्सिस कैपिटल’ की ताजा अध्ययन रिपोर्ट आई है। ‘रेलवे 360 डिग्री: एक्चुअली वाट हैपेन’ नामक इस रिपोर्ट में रेलवे का 2030 तक का रोडमैप तैयार किया गया है। इसके मुताबिक रेलवे को अब पहले की तरह चलाना संभव नहीं रह गया है। अब इसे नई चुनौतियों के अनुरूप ढलना होगा। इसके तहत रेलों की चाल बढ़ाना, रेलवे स्टेशनों का आधुनिकीकरण करना और यात्री सुविधाओं में जबर्दस्त इजाफा करना शामिल है। 2018-19 से सत्तर फीसद मालगाड़ियां अलग से बनाए जा रहे ट्रैक पर चलने लग जाएंगी, जिसके प्रबंधन की जबावदेही रेलवे की ही सहायक संस्था डीएफसीसीएल को सौंप दी जाएगी। मालगाड़ियों से होने वाली कमाई भी इसी संस्था के खाते में जमा होगी। ऐसा शायद इसलिए किया जा रहा है, ताकि मालगाड़ियों और यात्रीगाड़ियों से होने वाले लाभ-हानि को अलग-अलग करके दर्शाया जा सके। साफ है, लेखे-जोखे की इस प्रक्रिया से यात्रीगाड़ियां घाटे का सौदा दिखने लगेंंगी और रेलवे को इस घाटे की भरपाई के लिए हर साल यात्री-किराए में वृद्धि का बहाना मिल जाएगा।

एकमुश्त निजीकरण करने के बजाय टुकड़े-टुकड़े कई विभागों को निजी हाथों में सौंपने का सिलसिला रेलवे में शुरू हो गया है। जलपान, स्वच्छता, माल ढुलाई, निजी कोच खरीद जैसे सत्रह क्षेत्रों में सौ फीसद एफडीआई की मंजूरी दी जा चुकी है। संकेतक प्रणाली के आधुनिकीकरण और रख-रखाव, लॉजिस्टिक पार्क निर्माण, लोकोमोटिव और कोच के निर्माण से लेकर द्रुत गति की प्रीमियम व बुलेट रेलों का ताना-बाना विदेशी पूंजी निवेश और निजीकरण के बल पर ही बुना गया है। कालांतर में इसके परिणाम अच्छे दिखाई दे सकते हैं। इसी दिशा में अगली कड़ी के तहत राज्यों के सहयोग से रेल परियोजनाओं का विस्तार किया जाएगा। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने इस फैसले को मंजूरी दे दी है। इस योजना के अनुसार प्रत्येक संयुक्त उद्यम में रेलवे और राज्य सरकार की ओर से पचास-पचास करोड़ रुपए की आरंभिक चुकता पूंजी का योगदान किया जाएगा। इस हिसाब से कुल सौ करोड़ का निवेश होगा।

इस दृष्टि से सीमेंट, स्टील व ऊर्जा संयंत्रों के लिए कच्चे माल की ढुलाई के मकसद से रेल संपर्क बनाने में मदद मिलेगी। देश के सुदूर अंचलों में यात्री सेवाओं का विस्तार भी संभव हो सकेगा। नए बजट में इस बाबत कुछ परियोजनाओं की घोषणा संभावित है। बैंकों से रेल आरक्षण की सुविधा भी इस बजट में मिल सकती है। फिलहाल पायलट प्रोजेक्ट के रूप में रेलवे ने एक निजी बैंक के साथ करार भी किया है। रेलवे ग्रामीण क्षेत्रों में अपने आरक्षित टिकट बेचने के लिए डाकघरों को पहले ही अपने कुनबे में शामिल कर चुका है।

निजीकरण के ये उपाय तत्काल तो ठीक लग रहे हैं, लेकिन कालांतर में ये बेरोजगारी का सबब बन सकते हैं। क्योंकि रेलवे में 1980 के पहले तक करीब चालीस लाख कर्मचारी हुआ करते थे, जिनकी संख्या घट कर अब साढ़े तेरह लाख रह गई है। जबकि इस कालखंड में ट्रेनों व मालगाड़ियों की संख्या बढ़ी है और रेल-संरचना का विस्तार हुआ है। ऐसे में छोटे कर्मचारियों की संख्या घटना एक बड़ा सवाल है। विषमतापूर्ण विकास को लेकर रेलवे से जुड़े श्रमिक संगठन लगातार विरोध जता रहे हैं। बहरहाल, रेलवे में आम आदमी से जुड़ी सुविधाओं को घाटे का सौदा मानने की मानसिकता से उबरने की जरूरत है।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App