कार्बन क्रेडिट का उपनिवेशवाद

1880 से अब तक के सबसे अधिक गरम वर्षों में सर्वाधिक दस गरम वर्ष 1998 से 2015 तक के रहे हैं, जिनमें 2015 अब तक का सबसे गरम वर्ष रहा है।

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विनय जायसवाल

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में जीवाश्म र्इंधन का इस्तेमाल रोकने की बराक ओबामा की नीतियों से परे जाते हुए कहा है कि पर्यावरण की रक्षा और हमारी अर्थव्यवस्था के विकास का पारस्परिक संबंध नहीं है। इससे अमेरिका के प्रति तमाम देशों की चिंता बढ़ गई है कि वह जलवायु परिवर्तन के पेरिस समझौते के प्रति ईमानदार रुख रखेगा या नहीं। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम ने कहा है कि अब समय किसी भी देश के लिए जलवायु परिवर्तन पर अपने रुख से पीछे हटने का नहीं रह गया है। ऐसे में एक बार फिर ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन रोकने का मिशन अपनी राह से भटकता दिख रहा है। एक बड़ा मुद््दा कार्बन क्रेडिट का भी है कि अविकसित और विकासशील देशों से कार्बन क्रेडिट खरीद कर विकसित देश और भी विकास कर रहे हैं, जबकि अन्य देश उनसे और पिछड़ते जा रहे हैं। इससे एक तरह का नया उपनिवेशवाद फैल रहा है, कार्बन क्रेडिट का उपनिवेशवाद। जिन विकसित देशों को धरती के अधिकतम दोहन के लिए उसकी कीमत अविकसित और विकासशील देशों को अदा करनी चाहिए, वे उलटे उनसे अपने विकास का बैनामा कराने में लगे हैं। विकसित देश जलवायु परिवर्तन के खतरे को टालने की बजाय उसे विकासशील, अल्पविकसित और अविकसित देशों की ओर खिसकाना चाहते हैं।

इससे यह खतरा भविष्य में कितना बड़ा हो जाएगा इसका अंदाजा इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि 1880 से अब तक के सबसे अधिक गरम वर्षों में सर्वाधिक दस गरम वर्ष 1998 से 2015 तक के रहे हैं, जिनमें 2015 अब तक का सबसे गरम वर्ष रहा है। बड़े जलवायु परिवर्तन से तूफान अब और खतरनाक तथा अधिक शक्तिशाली होते जा रहे हैं। जलवायु परिवर्तन पर सरकारों के अंतरराष्ट्रीय पैनल (आइपीसीसी) के सदस्य राजेंद्र पचौरी का कहना है कि समुद्री जल के गर्म होने की क्रिया तो जारी रहेगी, जिसके फलस्वरूप समुद्री क्षेत्र में फैलाव होना लाजमी है क्योंकि समुद्री जल-स्तर 0.04 मीटर से 1.4 मीटर तक बढ़ने की आशंका है। इसके अलावा बहुत-से अन्य प्रभाव जैसे गर्मी के मौसम में बढ़ोतरी, ठंड के मौसम में कमी, वायु-चक्रण के रूप में बदलाव, बिन मौसम बरसात, बर्फ की चोटियों का पिघलना, ओजोन परत में क्षरण, भयंकर तूफान, चक्रवात, बाढ़, सूखा आदि तेजी से जोर पकड़ रहे हैं। यही नहीं, इसका प्रभाव खेती पर भी पड़ने लगा है और जमीन की उत्पादकता में कमी आ रही है। वन्य और जल-जीवों की कई प्रजातियां विलुप्त हो गई हैं तो सैकड़ों प्रजातियां विलुप्त होने के कगार पर हैं। जलवायु परिवर्तन का प्रभाव मानव की आनुवंशिकी पर भी पड़ा है और इसके साथ ही कई तरह की नई बीमारियां पैदा होने लगी हैं। इस तरह से जलवायु परिवर्तन मानव सभ्यता के अस्तित्व की लड़ाई बनने जा रहा है।

वैसे जलवायु परिवर्तन मानवीय गतिविधियों के अलावा प्राकृतिक कारणों जैसे जैविक, सोलर रेडिएशन, धरती की सतह के खिसकने, ज्वालामुखी के फटने आदि कारणों से सदियों से होता रहा है, लेकिन प्रकृति की स्वाभाविक क्रिया होने के चलते इन घटनाओं का प्रकृति के साथ एक संतुलन बना रहता था। अप्राकृतिक जलवायु परिवर्तन की घटना सीधे तौर पर मानव सभ्यता के विकास से जुड़ी हुई है, जिसने औद्योगिकीकरण के बाद से निरंतर धरती की पारिस्थितिकी को असंतुलित किया है। इसके भयानक परिणाम उन्नीसवीं शताब्दी से ही दर्ज किए जाने लगे थे। वर्ष 1852 में मैनचेस्टर (ब्रिटेन) में राबर्ट स्मिथ ने एसिड रेन की पुष्टि की थी। स्मिथ ब्रिटेन के पहले वायु प्रदूषण निरीक्षक थे। इसके बाद 1952 में लंदन में स्मोग (घनी धुंध) की वजह से सामान्य से चार हजार अधिक लोगों की मृत्यु को रिकार्ड किया गया था।औद्योगिक क्रांति की शुरुआत ब्रिटेन से हुई थी और मैनचेस्टर इसका अगुआ हुआ करता था। इस तरह जहां सबसे पहले औद्योगिक गतिविधियां शुरू हुर्इं, वहां सबसे पहले इसके दुष्परिणाम सामने आने शुरू हुएथे। इन दुष्परिणामों से स्थानीय स्तर पर निपटने के यथासंभव प्रयास तो किए जा रहे थे लेकिन पूरी दुनिया में तेजी से फैलते जा रहे औद्योगीकरण के खतरे का किसी को जरा-सा भी भान नहीं था और न ही उस समय इसका कोई आकलन किया गया था। जब तक दुनिया भर के देशों को इसका अहसास हुआ, तब तक बहुत देर हो चुकी थी और पूरी धरती के सिर पर एक खतरे की घंटी टंग चुकी थी।

दरअसल, इसका सीधा संबंध पृथ्वी के चारों ओर ग्रीनहाउस गैसों की एक परत से है। इन गैसों में कार्बन डाइआॅक्साइड, मीथेन, नाइट्रस आॅक्साइड शामिल हैं। यह परत सूर्य की अधिकतर ऊर्जा को सोख लेती है और फिर इसे धरती की चारों दिशाओं में पहुंचाती है, जिससे वह गरम रहती है। नहीं तो धरती 30 डिग्री सेल्सियस ज्यादा ठंडी होती, यानी ग्रीनहाउस गैसें न होतीं तो पृथ्वी पर जीवन की संभावना न होती। वैज्ञानिकों का मानना है कि उद्योगों और कृषि के जरिए मानव समुदाय जो गैसें वातावरण में छोड़ रहे हैं उससे ग्रीनहाउस गैसों की परत मोटी होती जा रही है। यह परत अधिक ऊर्जा सोख रही है और धरती का तापमान बढ़ा रही है। इसके कारण ही धरती का जलवायु संतुलन बिगड़ता जा रहा है। एक आकलन के अनुसार 1750 की औद्योगिक क्रांति के बाद कार्बन डाइआॅक्साइड का स्तर 30 प्रतिशत से अधिक और मीथेन का स्तर 140 प्रतिशत से अधिक बढ़ा है। वातावरण में कार्बन डाइआॅक्साइड का स्तर आठ लाख वर्षों के सर्वोच्च स्तर पर है। इसके अलावा दूसरी ग्रीनहाउस गैसें जैसे हैलो कार्बन्स, क्लोरीन और ब्रोमाइन कम्पाउंड आदि वातावरण में एक साथ मिल जाती हैं और वातावरण के रेडियोएक्टिव संतुलन को बिगाड़ती हैं। उनके पास गर्म विकिरण को सोखने की क्षमता है जिससे धरती की सतह गर्म होने लगती है। इससे ओजोन परत में कमी आ रही है जिससे अंतत:ग्लोबल वार्मिंग में बढ़ोतरी होती है।

पर्यावरण रक्षा के लिए 1985 में विएना सम्मेलन, 1987 में मांट्रियल प्रोटोकाल और 1992 के रियो-डी-जेनिरियो सम्मेलन के शुरुआती प्रयासों के बाद एक मजबूत पहल की नींव 1997 में जापान के क्योटो शहर में पड़ी। क्योटो सम्मेलन में 141 देशों ने हिस्सा लिया और इस अवसर पर हुए समझौते को क्योटो प्रोटोकॉल के नाम से जाना गया। इस प्रोटोकॉल के तहत सभी 141 देशों ने ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में 1990 के स्तर पर 5.5% कटौती करने के प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए, जो विकसित देशों के लिए बाध्यकारी और विकासशील देशों के लिए बाध्यकारी नहीं था। यह 2005 से लागू हुआ और यह लक्ष्य 2012 तक पूरा करना था। लेकिन अमेरिका समेत विकसित देशों के नकारात्मक रवैये की वजह से यह लक्ष्य हासिल नहीं किया जा सका। क्योटो संधि को आगे बढ़ाने के लिए कोपनहेगन में वर्ष 2009 में सभी देशों ने धरती का तापमान 1.5 डिग्री से अधिक न बढ़ने देने के लिए कदम उठाने की बात कही। लेकिन अब तक कार्बन उत्सर्जन को रोकने के लिए कोई बड़े प्रयास नहीं किए गए। वर्ष 2016 के नवंबर में लागू पेरिस समझौते के तहत एक हरित जलवायु कोष बनना है, जिसकी मदद से हर साल गरीब और विकासशील देशों को सौ अरब डॉलर दिए जाने हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि इस कोष में अभी नाममात्र का पैसा जमा हुआ है। पिछले साल मोरक्को में हुए जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में निर्णय लिया गया कि पेरिस समझौते को लागू करने के लिए नियमावली 2018 तक बना ली जाएगी और इसमें पारदर्शिता बरती जाएगी। लेकिन एक बार फिर अमेरिका के बदले सुर से वैश्विक पर्यावरण को बचाने की लड़ाई अधर में जाती दिख रही है।.

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