ताज़ा खबर
 

गरीब कहां कराए इलाज

इक्कीसवीं सदी के भारत की यह कैसी तस्वीर उभर रही है! नाशिक के सरकारी अस्पताल में पिछले पांच महीने में 187 नवजात मर चुके हैं।

Author September 14, 2017 12:45 AM
गोरखपुर अस्पताल की ये तस्वीर इंटरनेट पर वायरल हो गयी थी। (एक्सप्रेस फोटो)

इक्कीसवीं सदी के भारत की यह कैसी तस्वीर उभर रही है! नाशिक के सरकारी अस्पताल में पिछले पांच महीने में 187 नवजात मर चुके हैं। इन बच्चों की मौत का कारण बताते हुए कहा गया कि सरकारी अस्पताल चिकित्सकों और नर्सों की भारी कमी से जूझ रहा है। ऐसे में बच्चों की मौत स्वाभाविक है। वैसे इलाज के अभाव में गरीबों की मौत की यह अकेली खबर नहीं है। उत्तर प्रदेश के कई जिलों से इलाज के अभाव में मौत की खबरें आती रहती हैं। फर्रुखाबाद जिले के सरकारी अस्पताल में एक महीने में 49 बच्चों की मौत हो गई। स्वास्थ्य विभाग के कुछ अधिकारियों पर कार्रवाई कर सरकार ने अपना फर्ज निभा दिया। इससे पहले गोरखपुर के बाबा राघवदास मेडिकल कालेज में करीब एक महीने में 140 से ज्यादा बच्चे मर गए थे। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के सर सुंदर लाल चिकित्सालय में औद्योगिक आक्सीजन सिलेंडरों की आपूर्ति के कारण 20 मरीजों की मौत हो गई थी। इस घटना के सामने आने के बाद पूरे देश में आम जन को उपलब्ध स्वास्थ्य सेवाओं पर सवाल उठना लाजिमी है।

सवाल था कि क्या सरकार अपनी जिम्मेवारी से भाग रही है। क्या सरकार निजी स्वास्थ्य सेवाओं को मुनाफा देने के लिए सरकारी अस्पतालों को पंगु बना देना चाहती है, ताकि लोग मजबूरी में मुनाफाखोर निजी अस्पतालों की तरफ रुख करने को मजबूर होने लगें। वैसे यह राष्ट्रीय शर्म की बात है कि एक तरफ हम अंतरमहादेशीय मिसाइल बना रहे हैं, अंतरिक्ष अनुसंधान में नए मुकाम हासिल करने में लगे हैं, लेकिन देश की जनता को जरूरी स्वास्थ्य सेवा मुहैया नहीं करवा पा रहे हैं।आजादी के 70 साल बाद भी उत्तर प्रदेश में पांच साल से कम उम्र के प्रति 1000 में से 78 बच्चे मौत के शिकार हो रहे हैं। मध्यप्रदेश में प्रति 1000 में 65, छत्तीसगढ़ में 64, बिहार में 58, झारखंड में 54 और बंगाल में 32 बच्चे असमय मौत के शिकार हो रहे हैं। इन आकंड़ों पर सरकार को कोई चिंता या शर्म नहीं है। सरकार का जोर इस बात पर है कि भारत पूरी दुनिया के लिए चिकित्सा पर्यटन का केंद्र बन जाए, भले देश की जनता को इलाज न मिले।
सरकार कल्याणकारी राज्य की जिम्मेवारी से भाग रही है। देश की स्वास्थ्य सेवाएं निजी क्षेत्र को सौंपने का काम जोरों पर है। भविष्य में पूरे देश की स्वास्थ्य सेवा ठेकेदारी व्यवस्था के हवाले हो जाएगी। एक तरफ सरकार राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति-2017 में लंबे-चौड़े दावे कर रही है, तो दूसरी तरफ बच्चों की मौतों का सिलसिला नहीं थम रहा है। सरकार की निजीकरण और ठेकेदारी नीति ने ही गोरखपुर में सैकड़ों बच्चों की जान ले ली। ठेकेदार को 69 लाख रुपए का भुगतान नहीं होने पर उसने आक्सीजन की आपूर्ति रोक दी। मरने वाले ज्यादातर बच्चे गरीब परिवारों के थे। अगर वे अमीर घरानों, नौकरशाहों और राजनेताओं के बच्चे होते तो उनकी जान बच जाती।

देश का अमीर तबका, राजनेता और नौकरशाह इलाज के लिए सरकारी अस्पतालों में नहीं भटकते। दिल्ली का एम्स, चंडीगढ़ का पीजीआई जैसे चिकित्सा संस्थान अपवाद हैं, जहां संपन्न लोग इलाज के लिए जाते हैं। क्योंकि इन संस्थानों के अनुभव और अनुसंधान का मुकाबला निजी क्षेत्र के अस्पताल नहीं कर पाते। राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति में साफ संकेत है कि सरकार अब आम लोगों के इलाज का बोझ नहीं उठाएगी। निजीकरण को बढ़ावा दिया जाएगा। इलाज महंगा होगा। एक कल्याणकारी राज्य में स्वास्थ्य को लाभकारी उद्योग बनाने का एजंडा सरकार ने बनाया है। इसकी झलक राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति में साफ दिखती है। हाल ही में सरकार ने दिल के इलाज में इस्तेमाल होने वाले स्टेंट की कीमतों में भारी कमी का दावा किया। लेकिन कीमत कम होने का लाभ दिल के मरीजों को नहीं मिला। निजी अस्पतालों ने स्टेंट के दाम तो घटा दिए, लेकिन दिल के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवाइयों और उपकरणों की कीमतों में भारी इजाफा कर दिया। इससे कुल इलाज खर्च में कोई कमी नहीं आई। सामान्य रूप से दिल के इलाज में पहले भी निजी अस्पताल में ढाई से तीन लाख रुपए का खर्च आता था। आज भी इतना ही आ रहा है।

सरकार के दावे तमाम हैं। लेकिन भारत में कुल जीडीपी का मात्र एक फीसद स्वास्थ्य पर खर्च होता है। जबकि जरूरत कम से कम तीन फीसद की है। सरकार का दावा है कि समयबद्ध तरीके से इसे 2.5 फीसद तक किया जाएगा। दूसरी ओर स्वास्थ्य सेवाएं इतनी महंगी हो गई हैं कि गरीब लोग इलाज से वंचित हो रहे हैं। सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं तो बदतर हो चुकी हैं। निजी क्षेत्र की स्वास्थ्य सेवाओं के लिए कोई नियम-कानून नहीं हैं। थोड़े बहुत जो हैं, उन्हें निजी क्षेत्र के अस्पताल मानने को तैयार नहीं हैं। सरकार बहुत खुश होकर स्वास्थ्य सेवाओं का विकास इसके मुनाफे से परिभाषित कर रही है। सरकार का कहना है कि भारतीय स्वास्थ्य सेवा उद्योग सन 2020 तक बढ़ कर 280 अरब डालर का हो जाएगा। आखिर इस उद्योग का विकास किन लोगों की कीमत पर होगा? गरीबों की जान के बल पर या सिर्फ अमीरों को इलाज देकर? सरकार की जो नीति है, उसमें गरीब को इलाज के लिए थोड़ी-बहुत बची जमीन बेचनी ही पड़ेगी। जिसके पास जमीन नहीं उसके पास तड़प कर मरने के सिवाय कोई चारा नहीं होगा।

निजी क्षेत्र की स्वास्थ्य सेवाओं की हालत देखिए। पिछले 25 सालों में निजी क्षेत्र को स्वास्थ्य सेवाओं के विकास के लिए तमाम छूट दी गर्इं, ताकि लोगों को अच्छी चिकित्सा मिल सके। इसके लिए काफी कम प्रत्यक्ष कर लगाए गए। ग्रामीण इलाकों में अस्पताल खोलने पर पांच साल तक आयकर से छूट दी गई। जीवन रक्षक उपकरणों पर सीमा शुल्क से छूट दी गई। शहरों में लोगों को बेहतर स्वास्थ्य सेवा देने के लिए निजी क्षेत्र को अस्पताल बनाने के लिए सरकार ने भारी छूट पर जमीन उपलब्ध करवाई। लेकिन इसका फायदा आम आदमी को नहीं मिला। सरकार से छूट लेने वाले निजी क्षेत्र के अस्पतालों को अपने यहां कम से कम 10 से 15 फीसद मरीजों का मुफ्त में इलाज करना होता है। खासकर उन मरीजों का जो गरीबी रेखा से नीचे के हैं। लेकिन निजी क्षेत्र का एक भी अस्पताल इस नियम को नहीं मान रहा है। नवजातों के इलाज में प्राइवेट अस्पताल लोगों को लूट रहे हैं। सरकारी अस्पताल में कम वजन के पैदा होने वाले बच्चे का एक हफ्ते तक भर्ती कर होने वाला इलाज-खर्च जहां से 800 से 1000 रुपए तक है, वहीं निजी अस्पताल में यह खर्च एक लाख रुपए है।

सरकार अब सरकारी जिला अस्पतालों के निजीकरण की तैयारी में है। जिला अस्पतालों के भवन निजी क्षेत्र के ठेकेदारों को दिए जाने की योजना बन रही है। नीति आयोग के प्रस्ताव में जिला अस्पतालों में सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) को बढ़ाया जाएगा। डाक्टर, नर्स, दवाइयां, जांच- सब कुछ निजी क्षेत्र के हवाले होगा। सरकार सिर्फ मुफ्त का भवन ठेकेदार को देगी। सरकार का यह प्रस्ताव अगर सिरे चढ़ गया तो निजी क्षेत्र के मजे हो जाएंगे, गरीबों के बुरे दिन आएंगे। निजी क्षेत्र को मुफ्त का भवन और इलाज के बदले अच्छा मुनाफा मिलेगा। क्योंकि भवन खड़ा करने में ही 100 करोड़ रुपए लग जाते हैं। अगर वही मुफ्त मिल जाए तो सिर्फ ठेके पर डाक्टर, नर्स, लैब टैक्नीशियन ही लाने होंगे। इलाज के बदले मरीजों से पैसा वसूले ही जाएंगे। जिला सरकारी अस्पतालों में इलाज के लिए जो पैकेज निजी क्षेत्र को देने की योजना बनाई जा रही है, उस पैकेज में गरीब जिला अस्पतालों में इलाज नहीं करवा पाएगा।

 

 

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App