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क्योंकि महिला क्रिकेट भी एक खेल है

भारतीय क्रिकेट के इतिहास में उसे गौरव का एक क्षण माना जाता है जब हमारी टीम पड़ोसी देश पाकिस्तान की टीम को शिकस्त दे दे।
Author July 5, 2017 04:06 am
पाकिस्तान को हराने के बाद जश्न मनाती भारतीय महिला क्रिकेट टीम। Photo-PTI

भारतीय क्रिकेट के इतिहास में उसे गौरव का एक क्षण माना जाता है जब हमारी टीम पड़ोसी देश पाकिस्तान की टीम को शिकस्त दे दे। जरूरी नहीं कि ऐसा मैच किसी टूर्नामेंट का फाइनल हो, पर पाकिस्तान से मुकाबले और जीत को काफी अहमियत दी जाती है। इस दृष्टि से देखें तो आइसीसी महिला क्रिकेट विश्व कप के राउंड रॉबिन मुकाबले में भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने वह शानदार मुकाम हासिल कर लिया है। मिताली राज की कप्तानी में क्रिकेट टीम ने पाकिस्तान को 95 रनों से मात दी। इस जीत के बाद कहा गया कि इस तरह हमारी महिला क्रिकेट टीम ने 18 जून को ओवल में हुई चैंपियंस ट्रॉफी के फाइनल में पाकिस्तान के हाथों पुरुष क्रिकेट टीम की हार का बदला ले लिया। यानी जो लड़के नहीं कर पाए, लड़कियों ने कर दिखाया।

कहा जा रहा है कि यह शायद पहला मौका है जब महिला क्रिकेट की स्थिति और हैसियत में बड़ा बदलाव दिख रहा है। इन बदलावों के कुछ अहम कारण हैं, जिनकी चर्चा से पहले यह बताना जरूरी है कि भारतीय महिला क्रिकेट की अनदेखी एक बड़ा मुद््दा रही है। महिला क्रिकेटरों के शानदार रिकॉर्ड के बाद भी यह अनदेखी लगातार जारी रही है। ऐसे ही भेदभाव से परेशान होकर वर्ष 2013 में टीम की कोच के रूप में डायना एडुलजी ने आरोप लगाया था कि जो भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआइ) पुरुष क्रिकेट टीम पर पानी की तरह पैसा बहाता है, वह महिला क्रिकेट को आगे बढ़ाने के लिए कुछ खास काम नहीं करता है। बकौल एडुलजी, इस मामले में उनकी राष्ट्रीय महिला आयोग और तत्कालीन खेलमंत्री अजय माकन से भी बात हुई थी। हर तरफ से उन्हें कई आश्वासन तो मिले थे, लेकिन उनके कहने-सुनने का भी कोई असर नहीं हुआ। पुरुष और महिला क्रिकेट में एक आम भेदभाव दोनों टीमों के खिलाड़ियों को मिलने वाली फीस का अंतर है। पुरुष खिलाड़ियों को जहां एक टैस्ट मैच के लिए न्यूनतम सात-आठ लाख रुपए मिलते हैं, वहीं महिला खिलाड़ी को पूरी अंतरराष्ट्रीय सीरीज के लिए सिर्फ एक-सवा लाख रुपए मिलते रहे हैं।

आखिर महिला क्रिकेट में पुरुष क्रिकेट जैसी चमक-दमक और ग्लैमर क्यों नहीं है? इसका एक कारण यह बताया जाता है कि हमारा मर्दवादी समाज महिलाओं के कौशल को तरजीह नहीं देना चाहता, वह सिर्फ उनका शारीरिक सौंदर्य देखना चाहता है। इस सोच की पुष्टि इससे होती है कि महिला टेनिस और बीच वॉलीबॉल के मैच तो खूब देखे जाते हैं, पर महिला क्रिकेट मैच न तो देखे जाते हैं और न ही सराहना और मदद पाते हैं। जिन खेलों में स्त्री शरीर की लोच और स्कर्ट जैसे लिबास का खेल नजर नहीं आता, उन्हें इसी तरह की उपेक्षा झेलनी पड़ती है। इसका उदाहरण छह वर्ष पहले बैडमिंटन वर्ल्ड फेडरेशन (बीडब्ल्यूएफ) द्वारा जारी किए गए निर्देश के रूप में दिखाई दिया था। वर्ष 2011 में बीडब्ल्यूएफ ने फरमान जारी किया था कि पूरी दुनिया में होने वाले ग्रां प्री टूर्नामेंट्स में महिला खिलाड़ी शॉर्ट्स के स्थान पर स्कर्ट पहन कर ही हिस्सा ले सकेंगी। कुछ विशेषज्ञों ने तब कहा था कि बीडब्ल्यूएफ को यह नेक विचार इसलिए सूझा कि इससे इस खेल में भी ग्लैमर आएगा और इसे भी टेनिस की तरह पैसे व प्रायोजक मिलने लगेंगे। बीडब्ल्यूएफ की दलील के कई समर्थक रहे हैं। ऐसे लोगों का कहना और मानना है कि कई महिला खेलों-टीमों को न तो खेलप्रेमी दर्शक मिल रहे हैं, न विज्ञापन न प्रायोजक। इसकी एक बड़ी वजह उन खेलों का ग्लैमरहीन होना है। लेकिन अगर स्कर्ट से खेल में ग्लैमर जगता होता तो स्कर्ट पहनने वाली टेनिस की महिला खिलाड़ी इस बात का रोना क्यों रोती हैं कि उन्हें पुरुष-टेनिस के मुकाबले कम इनामी राशियां दी जाती हैं। कम से कम टेनिस में तो स्कर्ट महिला खिलाड़ियों को ज्यादा रकम दिला रही होती। पुरुष वर्चस्व क्रिकेट में खासतौर से दिखता है। पुरुष क्रिकेट को पैसा और मीडिया कवरेज, किसी चीज की कमी नहीं रहती। लेकिन महिला क्रिकेटरों का शानदार प्रदर्शन भी उन्हें मीडिया कवरेज नहीं दिला पाता है।

हालांकि इधर महिला क्रिकेट में जो जोश और जज्बा दिख रहा है, उसमें एक भूमिका डायना एडुलजी की भी बनती है। कुछ महीने पहले सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर क्रिकेट की नियामक संस्था बीसीसीआइ में विनोद राय की अध्यक्षता में जिन चार प्रशासकों की नियुक्तिकी गई थी, उनमें पूर्व महिला क्रिकेटर डायना एडुलजी की उपस्थिति अहम बताई गई थी। बीसीसीआइ में डायना एडुलजी की उपस्थिति इसलिए महत्त्वपूर्ण नहीं है कि वह खुद एक बेहतरीन महिला क्रिकेटर रही हैं, बल्कि इसकी वजह महिला क्रिकेट के उत्थान में उनका अब तक का योगदान और यह इच्छा है कि वे इसे पुरुष क्रिकेट के बराबर ला खड़ा करना चाहती हैं। हालांकि एक खिलाड़ी रहने के अलावा क्रिकेट के प्रबंधन और प्रशासन में वह लगातार योगदान देती रही हैं, पर बीसीसीआइ में उनकी मौजूदगी से उन चीजों में अंतर आ पाएगा जिनकी वजह से महिला क्रिकेट का पिछड़ापन दूर नहीं किया जा सका है। डायना का मुख्य संघर्ष महिला क्रिकेट को पुरुष क्रिकेट के समकक्ष लाना ही है। यह विडंबना ही है कि हमारे देश में जहां पुरुष क्रिकेट के लिए इतनी दीवानगी है और इस पर बेशुमार पैसा लुटाया जाता है, वहीं महिला क्रिकेट दयनीयता की स्थिति में ही रहा है, भले ही महिला क्रिकेटरों का प्रदर्शन उम्दा ही क्यों न रहा हो।

महिला क्रिकेटरों ने कई कीर्तिमान स्थापित किए हैं। जैसे 1978 से, जब से भारत ने क्रिकेट वर्ल्ड कप में हिस्सा लेना शुरू किया है, भारतीय महिला क्रिकेट टीम 1978, 1982, 1993 में वर्ल्ड कप में चौथे स्थान पर, 1997 और 2000 में सेमीफाइनल, 2005 में फाइनल (रनर अप) और 2009 में तीसरे नंबर पर रही। इसी तरह वर्ष 2013 में भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने अप्रैल में बांग्लादेश को 10 रन से हरा कर टी-ट्वेंटी सीरीज भी जीती थी और वह भी 3-0 से। इसी तरह वर्ष 2016 में पुरुषों के टी-ट्वेंटी विश्वकप के समानांतर आयोजित महिला टी-ट्वेंटी की भारतीय टीम ने कैप्टन मिताली राज की अगुआई में अपने पहले ही मैच में बांग्लादेश की टीम को 72 रन से हराकर बड़ी जीत दर्ज कर बेहतरीन शुरुआत की थी। बाद के मैचों में भी यह टीम हारने के बावजूद अपने तीखे तेवर दिखाती रही, जैसे इंग्लैंड के खिलाफ कम स्कोर करने पर भी इसने कड़ी टक्कर दी। पर शानदार शुरुआत करने और कड़ी चुनौती देने पर भी महिला क्रिकेट की चर्चा टीवी और अखबारों में कम ही रहती है। इसका दर्द टीम की कप्तान मिताली राज व्यक्त कर चुकी हैं। मिताली राज वनडे कैरियर के सौ मैच पूरे कर चुकी हैं और ऐसा करने वाली वे दुनिया की तीसरी खिलाड़ी हैं। मिताली का कहना है कि टीवी-मीडिया में महिला क्रिकेट को थोड़ी तवज्जो मिल जाती, उनके मैचों का भी सीधा प्रसारण किया जाता तो न दर्शकों की कमी रहती और न ही आयोजकों-प्रायोजकों का अकाल रहता।भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने क्रिकेट की हर शैली (फॉर्म) में खुद को कई बार शीर्षतम और श्रेष्ठतम साबित किया है, चाहे वह टेस्ट क्रिकेट हो, टी ट्वेंटी या फिर वन डे। इससे साबित होता है कि भारतीय महिला टीम को थोड़ा प्रोत्साहन, थोड़ी मदद और थोड़ी तवज्जो मिले, तो वह क्या नहीं कर सकती। साथ ही, कुछ और घरेलू व अंतरराष्ट्रीय स्तर के टूर्नामेंट उनके लिए करा दिए जाएं तो महिला क्रिकेट के दिन भी हमारे देश में फिर सकते हैं।

 

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