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स्त्री के श्रम का अवमूल्यन क्यों

महिलाओं के घरेलू अवैतनिक कार्य के साथ एक कठोर सच्चाई यह जुड़ी हुई है कि आर्थिक गणनाओं में ही नहीं, भावात्मक रूप में भी उनके कार्यों को नगण्य माना जाता है। उन्हें निरंतर यह विश्वास दिलाया जाता है कि वे घर में रह कर कुछ नहीं करतीं और इसी की परिणति है कि लगभग सभी घरेलू महिलाएं यह स्वीकार कर चुकी हैं कि वे कुछ नहीं करतीं।

Author July 31, 2017 05:28 am
पिछली बार न्यूनतम मजदूरी दो साल पहले बढ़ाई गई थी। तब इसे 115 रुपए से 137 रुपए किया गया था।

स्त्री के श्रम का अवमूल्यन क्यों

हाल ही में मद्रास उच्च न्यायालय ने अपने एक फैसले में अहम टिप्पणी देते हुए कहा, ‘एक महिला बिना कोई भुगतान लिये घर की सारी देखभाल करती है। उसे होम मेकर (गृहणी) और बिना आय वाली कहना सही नहीं है। यही नहीं, महिला सिर्फ एक मां और पत्नी नहीं होती, वह अपने परिवार की वित्तमंत्री और चार्टर्ड अकाउंटेंट भी होती है।’ न्यायालय का यह वक्तव्य पुदुुच्चेरी बिजली बोर्ड की उस याचिका के संदर्भ में था, जहां बोर्ड को बिजली की चपेट में आकर मृत एक महिला को क्षतिपूर्ति के तौर पर चार लाख रुपए देने थे, जो कि बिजली बोर्ड को इसलिए स्वीकार नहीं थे, क्योंकि महिला एक गृहणी थी और उसकी आय नहीं थी। न्यायालय ने बोर्ड की याचिका खारिज कर दी, साथ ही यह भी कहा कि ‘हमें खाना पकाना, कपड़े धोना, सफाई करना जैसे रोजाना के कामों को अलग नजरिए से देखने की जरूरत है।’ यकीनन न्यायालय के इस फैसले ने एक गृहणी के गैर-मान्यता प्राप्त अवैतनिक कार्य को वैतनिक, स्वीकृत श्रम के समान माना और उसके कार्य को बराबरी का दर्जा दिया। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि न्यायालय ने घरेलू अवैतनिक कार्यों की आर्थिक गणना करने की बात कही है। पूर्व में उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश जीएस सांघवी और एके गांगुली के पीठ ने एक आदेश में परिवार में महिला के श्रम का मूल्यांकन कर, मुआवजा राशि को बढ़ाने का आदेश दिया था। जबकि देश में आधिकारिक तौर पर कराए जाने वाले अध्ययनों व सर्वेक्षणों में आज भी गृहणियों की गिनती एक गैर-उत्पादक वर्ग में की जाती है।

गौरतलब है कि उच्चतम न्यायलय ने इस बात पर भी आपत्ति जताई थी कि क्यों 2001 की जनगणना में समाज के आर्थिक वर्गों की गणना करते हुए घरेलू महिलाओं को कैदियों, भिखारियों और यौनकर्मियों के समकक्ष रखा गया। न्यायालय का कहना था कि जब स्वयं सरकार की ओर से आर्थिक वर्गीकरण करते हुए देश की आधी आबादी को इस दृष्टिकोण से देखा जाएगा तो न केवल उनके श्रम की गरिमा के प्रति यह घोर संवेदनहीनता होगी बल्कि यह भेदभाव और लैंगिक पूर्वाग्रह की पराकाष्ठा भी होगी। पर इस लताड़ से भी कोई विशेष फर्क 2011 की जनगणना में देखने को नहीं मिला। सरकार ने घरेलू महिलाओं को पुन: कैदियों और भिखारियों के आर्थिक वर्ग की गणना में शामिल कर अपने कर्तव्य की इतिश्री की; उसकी दृष्टि में यौनकर्मियों को अलग श्रेणी में रखना ही घरेलू महिलाओं के साथ न्याय करना था। सबसे दुखद पहलू तो यह है कि उनके काम को काम ही नहीं माना जाता। जाति, वर्ग और आयु की परवाह न करते हुए सभी महिलाओं से यह अपेक्षा की जाती है कि वे घर के अदृश्य कार्यों की जिम्मेदारी निभाएं, पर इसके बावजूद उनके हिस्से में ‘असहिष्णुता’ आती है। यूनीसेफ की ‘लड़कियों के लिए आंकड़े एकत्र करना: समीक्षा करना और 2030 के बाद की दूरदृष्टि’ नामक शीर्षक से जारी हालिया रिपोर्ट बताती है कि ‘घरेलू कार्यों का बोझ जल्दी बढ़ जाता है। पांच से नौ साल के आयु वर्ग की लड़कियां, अपने ही उम्र के लड़कों के मुकाबले एक दिन में तीस प्रतिशत ज्यादा समय काम करती हैं।’

यह रिपोर्ट यह भी बताती है, ‘संख्या उम्र के साथ बढ़ती है, दस से चौदह साल तक की लड़कियां रोजाना पचास प्रतिशत ज्यादा समय काम करती हैं।’ एक राष्ट्रीय सर्वे के मुताबिक चालीस प्रतिशत ग्रामीण और पैंसठ प्रतिशत शहरी महिलाएं, जिनकी आयु पंद्रह साल या उससे ज्यादा है, पूरी तरह घरेलू कार्यों में लगी रहती हैं। यह भी गौरतलब है कि साठ साल से ज्यादा आयु वाली एक चौथाई महिलाएं ऐसी हैं जिनका सबसे ज्यादा समय इस आयु में भी घरेलू कार्य करने में ही बीतता है। इन आंकड़ों से जाहिर है कि पितृसत्तात्मक समाज में यह तथ्य बड़ी ही गहरी पैठ बनाए हुए है कि स्त्री का जन्म, सिर्फ सेवा-कार्यों के लिए ही हुआ है, और अगर हम यह मान कर चल रहे हैं कि यह सोच केवल विकासशील देशों की है तो हम गलत हैं। अमेरिका के ताजा आंकड़े बताते हैं कि वहां महिलाएं प्रति सप्ताह 14.58 घंटे घरेलू अवैतनिक कार्यों में बिताती हैं। महिलाओं के घरेलू अवैतनिक कार्य के साथ एक कठोर सच्चाई यह जुड़ी हुई है कि आर्थिक गणनाओं में ही नहीं, भावात्मक रूप में भी उनके कार्यों को नगण्य माना जाता है। उन्हें निरंतर यह विश्वास दिलाया जाता है कि वे घर में रह कर कुछ नहीं करतीं और इसी की परिणति है कि लगभग सभी घरेलू महिलाएं यह स्वीकार कर चुकी हैं कि वे कुछ नहीं करतीं।

माउंटेन रिसर्च जर्नल के एक अध्ययन के दौरान उत्तराखंड की महिलाओं ने कहा कि वे कोई काम नहीं करतीं, लेकिन विश्लेषण में पता चला कि परिवार के पुरुष औसतन नौ घंटे काम कर रहे थे, जबकि महिलाएं सोलह घंटे। अगर उनके काम के लिए न्यूनतम भुगतान किया जाता तो पुरुष को 128 रुपए प्रतिदिन और महिला को 228 रुपए मिलते। घरेलू अवैतनिक कार्यों को निरंतर करने वाली महिलाओं को ‘घर बैठे रहने’ का उलाहना, उनके जीवन का ऐसा सच बन चुका है, जिससे वे अवसाद का शिकार हो रही हैं और जिसकी परिणति कई बार आत्महत्या भी होती है। बीते माह जयपुर (राजस्थान) की एक सुशिक्षित महिला ने इन्हीं कारणों के चलते आत्महत्या कर ली। किसान की आत्महत्या की निरंतर चर्चा करता मीडिया यहां उन महिलाओं के साथ अन्याय करता नजर आता है, जो अवैतनिक रूप में अपने खेतों में घंटों काम करती हैं, पर न तो सरकारी महकमा उन्हें किसान मानता है और न ही समाज। एनसीआरबी की ताजा रिपोर्ट बताती है कि हर घंटे पंद्रह लोग आत्महत्या करते हैं। इनमें से सत्रह प्रतिशत मामले घरेलू महिलाओं के हैं।शायद बुद्धिजीवी वर्ग से लेकर आमवर्ग यह मान कर चलता है कि घरेलू महिलाएं आरामदायक जीवन व्यतीत करती हैं। पर सच इसके विपरीत है। आम अनुभव तो इस सच की गवाही देते ही हैं, अनेक देशों में हुए कई शोध भी इसकी पुष्टि करते हैं।

हाल ही में कुछ देशों व संस्थानों ने घरेलू अवैतनिक कार्यों का मूल्यांकन करने के लिए कुछ विधियों का प्रयोग शुरू किया है। इन विधियों में से एक ‘टाइम यूज सर्वे’ है। इस विधि से यह गणना की जाती है कि घरेलू कार्यों में गृहणी द्वारा प्रयुक्त वास्तविक समय की गणना अवसर लागत में कितनी होगी, यानी जितना समय महिला घरेलू अवैतनिक कार्यों को देती है यदि उतना ही समय वह वैतनिक कार्य के लिए देती तो उसे कितनी मुद्रा (तनख्वाह) मिलती। ‘टाइम यूज सर्वे’ के अलावा कई देशों ने अवैतनिक कार्यों की गणना के लिए ‘मार्केट रिप्लेसमेंट कॉस्ट थ्योरी’ का भी इस्तेमाल किया है। इसके जरिए यह जानने की कोशिश की जाती है कि जो कार्य अवैतनिक रूप से गृहणियों द्वारा घर पर किए जा रहे हैं, यदि उन सेवाओं को बाजार के माध्यम से उपलब्ध कराया जाएगा तो कितनी लागत आएगी।

अमदाबाद स्थित ‘सेंटर फॉर डेवलपमेंट आॅल्टर्नविज’ की निदेशक इंदिरा हिरवा का कहना है कि अवैतनिक घरेलू कार्यों की ‘आर्थिक उत्पादन’ के रूप में गणना की जानी चाहिए न कि ‘उपभोग’ के रूप में। उनका यह भी कहना है कि घरेलू अवैतनिक कार्यों में वे सभी गुण हैं जो कि ‘मानक आर्थिक वस्तु’ में होते हैं, क्योंकि अगर उनकी प्राप्ति बाजार से की जाए तो ये न तो मुफ्त है और न ही असीमित। पर आज भी, घरेलू महिलाओं के अवैतनिक कार्यों के मूल्यांकन के प्रति चुप्पी हैरान करती है।

 

 

 

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