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मुशर्रफ, पाकिस्तान और आतंकवाद

मुशर्रफ ने माना है कि उनकी सरकार ने कश्मीर में हिंसा फैलाने के लिए खूंखार आतंकवादी हाफिज सईद और उसके संगठन लश्कर समेत तमाम आतंकी गुटों का इस्तेमाल किया।

Author Published on: February 27, 2017 3:37 AM
पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति जनरल परवेज मुशर्रफ। (फाइल फोटो)

अरविंद शरण

जनरल परवेज मुशर्रफ पाकिस्तान के राजनीतिक प्रतिष्ठान में शीर्ष पद संभाल चुके पहले ऐसे शख्स हैं, जिन्होंने राजनीतिक उद्देश्य के लिए आतंकवाद को हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने की पाकिस्तान की आधिकारिक नीति कबूल की है। एक खबरिया चैनल को दिए इंटरव्यू में मुशर्रफ ने माना है कि उनकी सरकार ने कश्मीर में हिंसा फैलाने के लिए खूंखार आतंकवादी हाफिज सईद और उसके संगठन लश्कर समेत तमाम आतंकी गुटों का इस्तेमाल किया। बकौल मुशर्रफ जब उन्होंने भारत को कश्मीर समेत अन्य मुद्दों पर बातचीत के लिए मजबूर कर दिया, तब हाफिज सईद को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया। मुशर्रफ यहां तक बोल गए कि लश्कर या फिर जमात-उद-दावा को आतंकवादी गुट घोषित करना सरासर गलत है और उनकी नजर में हाफिज सईद आतंकवादी नहीं, हीरो है। मुशर्रफ की यह स्वीकारोक्ति पाकिस्तान की आंतरिक राजनीतिक हकीकत का आईना है और इसमें भावी कूटनीति का अक्स है।
पूरे साक्षात्कार के दौरान मुशर्रफ यह बताने में मशगूल रहे कि कैसे वह भारत पर दबाव बनाने में कामयाब रहे, कैसे अमेरिका पर हुए 9/11 के आतंकवादी हमले के बाद पाकिस्तान को मुश्किल हालात से निकाला और कैसे उन्होंने अवाम की बेहतरी के लिए तमाम काम किए। मुशर्रफ की यह बेताबी पाकिस्तान की राजनीति में अपनी नई पारी की गुंजाइश तलाशने के लिए है। लेकिन इस क्रम में उन्होंने उस पर्दे को ही हटा दिया जिसके उस पार पाकिस्तान की वह दुनिया थी जिसमें उसके राजनीतिक और सैन्य प्रतिष्ठान हिंसा फैलाने वाले आतंकवादियों के साथ कदमताल करते रहे हैं।

इस खुलासे के बाद पाकिस्तान सरकार की ओर से इस बात को साबित करने की पुरजोर कोशिश होनी थी कि मुशर्रफ अपनी हुकूमत की रणनीति की बात कर रहे हैं और इसे पाकिस्तान की सतत नीति के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। इसी रणनीति के तहत पाकिस्तान के रक्षामंत्री खुद सामने आए और खुले शब्दों में कहा कि हाफिज सईद समाज के लिए खतरा था और व्यापक राष्ट्रीय हितों को देखते हुए उसकी गतिविधियों पर अंकुश लगाया गया है। इस बयान के अगले दिन हाफिज सईद और उसके संगठन जमात-उद-दावा को जारी किए गए हथियारों के लाइसेंस रद्द किए गए। मानकर चलिए कि यह सिलसिला यहीं नहीं ठहरने वाला। आने वाले समय में हाफिज सईद और अन्य आतंकवादियों तथा विध्वंसक गतिविधियों में शामिल रहने की छवि वाले संगठनों के खिलाफ रह-रह कर कदम उठाए जाएंगे। रह-रह कर इसलिए कि पाकिस्तान कार्रवाइयों की चरणबद्ध श्रृंखला के जरिये यह संदेश देने की कोशिश करेगा कि यही उसकी राष्ट्रीय नीति है और उसने जो तमाम कदम उठाए वे इसी के अनुरूप थे, न कि किसी तात्कालिक हालात की परिणति।

मुशर्रफ का यह रहस्योद्घाटन ऐसे समय आया है जब आतंकवाद पर पाकिस्तानी नीतियों को लेकर वहां के सामाजिक और राजनीतिक हलकों में वैचारिक द्वंद्व चल रहा है। कुछ ही समय पूर्व पाकिस्तान के राजनीतिक नीति निर्धारकों की एक उच्चस्तरीय बैठक हुई थी जिसे आतंकवाद के मामले में आगे की रणनीति तय करने के लिए बुलाया गया था। बैठक में इस बात पर चिंता जताई गई कि आतंकवाद के मामले में भारत की योजना के मुताबिक पाकिस्तान अलग-थलग पड़ता जा रहा है। दुनिया अब उसे उपेक्षित नजर से देखने लगी है। अगर समय रहते सरकार के दामन पर लगे आतंकवाद के धब्बे नहीं मिटाए गए तो पाकिस्तान के लिए बहुत बड़ी मुसीबत खड़ी हो जाएगी। आतंकवादियों को सरपरस्ती के लिए खुफिया एजेंसी आइएसआइ को कठघरे में खड़ा किया गया और तमाम ऐसे उदाहरण दिए गए जब प्रशासन ने किसी आतंकवादी को पकड़ा हो और आइएसआइ के हस्तक्षेप के कारण उसे रिहा करना पड़ गया। बात ऐसी बढ़ी कि तब सरकार की ओर से यह सफाई देनी पड़ी कि यह तब की नीतियों के अनुसार हो रहा था और इसके लिए आइएसआइ को दोषी ठहराना ठीक नहीं। इसी बैठक का नतीजा था कि पाकिस्तान सरकार ने आतंकवादियों के खिलाफ सेना को सख्त रुख अख्तियार करने का आदेश दे दिया। हालांकि इस बैठक की खबर वहां के समाचारपत्र ‘डान’ ने लीक कर दी और उसके बाद सरकार ने आनन-फानन में इसका खंडन भी किया।

इस खंडन के कारणों पर गौर करें तो आतंकवाद पर पाकिस्तानी सत्ता की सोच का अंदाजा आसान हो जाएगा। जब पाकिस्तान आतंकवाद को राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति का हथियार बनाने के दौर से गुजर रहा था, उसने हिंसा पर भरोसा करने वाले कई जेहादी संगठनों को पाला-पोसा। धीरे-धीरे यह विष-बेल पाकिस्तानी समाज में काफी अंदर तक फैलती चली गई। बेशक आज पाकिस्तान में बुद्धिजीवियों का एक ऐसा वर्ग सामने आया है जो आतंकवाद के मसले पर पाकिस्तानी नीतियों का विरोध करता है और आम लोगों में भी ऐसे मत वाला वर्ग मुखर हो रहा है। लेकिन खुद पाकिस्तान सरकार को तब नहीं पता था कि आम लोगों में भी ठीक-ठाक पैठ बना चुके ऐसे संगठनों के खिलाफ किसी भी बड़ी कार्रवाई की प्रतिक्रिया कैसी होगी।

इसी कारण पाकिस्तान सरकार चाह रही थी कि जिस तरह उसने बिना हो-हल्ला किए इन हिंसक गुटों को अपने लिए हथियार के रूप में तब्दील किया, उसी तरह उन पर शिकंजे का अभियान भी धीरे-धीरे चले। इतना तय है कि पाकिस्तान में अभी विचार मंथन का दौर चल रहा है और मुशर्रफ की स्वीकारोक्ति इस प्रक्रिया को गतिमान ही करेगी।अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के सत्ता संभालने के साथ ही पाकिस्तान के लिए मुश्किलों का दौर शुरू हो गया है। हाफिज सईद पर आतंकवाद निरोधी अधिनियम के तहत तमाम पाबंदियां लगाना पाकिस्तान के लिए कोई आसान काम नहीं था। भारत ने देखा है कि मुंबई हमले में तमाम सबूत देने के बाद भी पाकिस्तान ने हाफिज सईद पर आंच नहीं आने दी। आखिर ऐसा क्या हो गया कि पाकिस्तान अपने अजीज हाफिज सईद को आतंकवादियों की सूची में डालने को मजबूर हो गया?

जाहिर है, इसका एक अहम कारक अमेरिका है। जेहादी आतंकवाद के प्रति डोनाल्ड ट्रंप इतने सख्त हैं कि खुद उनके ही देश में उनकी नीतियों का विरोध हो रहा है। लेकिन इसका सकारात्मक पक्ष है पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद पर कसता शिकंजा। दरअसल, ट्रंप प्रशासन की सख्ती के कारण पाकिस्तान के लिए मुश्किलें खड़ी हो गई हैं। मुशर्रफ का बयान एक तरह से भारत समेत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आकार लेते उस जनमत के अनुकूल है जिसने पाकिस्तान और आतंकवाद की गलबहियां महसूस की हैं। अब बात करें भारत की रणनीति और कूटनीति की। अपने भौगोलिक पड़ोसी को बदलना किसी के वश में नहीं होता। आप केवल अनुभवों के आधार पर यह सीखते हैं कि आपको उससे कैसे व्यवहार करना है जिससे आपके घर में सुख और शांति सुनिश्चित हो सके। भारत के साथ भी ऐसा ही है।

हाफिज सईद पर कार्रवाई तो पाकिस्तान ने पहले भी की है, अलबत्ता पहली बार उसे आतंकवादी माना है। इन सब में भारतीय कूटनीतिक पहल भी अहम रही है। वरना तो साल भर पहले तक अमेरिका भी अच्छे तालिबान और बुरे तालिबान की बात करता था।  आतंकवाद के प्रति इसी नजरिये के कारण पाकिस्तान को आतंकवाद के मोहरे चलने का मौका मिल जाता था। मौजूदा सरकार को पाकिस्तान के प्रति बड़ी कूटनीतिक सफलता तब मिली जब उसने पाकिस्तान के सत्ता प्रतिष्ठान से जुड़े तथाकथित अच्छे आतंकवाद की गर्भनाल काट डाली। इसी का नतीजा है कि अब दर्द सीधे पाकिस्तान को होने लगा है। सारे संकेतक सकारात्मक परिणाम की ओर इशारा कर रहे हैं, लेकिन मान कर चलिए कि पाकिस्तान के शस्त्रागार में आतंकवाद का हथियार हमेशा तैयार रहेगा और इसके इस्तेमाल से एक ही चीज उसे रोकेगी, और वह है कूटनीतिक दबाव।

अपने भौगोलिक पड़ोसी को बदलना किसी के भी वश में नहीं होता। आप केवल अनुभवों के आधार पर यह सीखते हैं कि आपको उससे कैसे व्यवहार करना है। भारत के साथ भी ऐसा ही है। हाफिज सईद पर कार्रवाई तो पाकिस्तान ने पहले भी की है, अलबत्ता पहली बार उसे आतंकवादी माना है।

 

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