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वैज्ञानिक प्रगति की कसौटियां

हर साल जनवरी के पहले हफ्ते में भारतीय विज्ञान कांग्रेस अपना वार्षिकोत्सव मनाती है।

Author January 3, 2017 12:16 AM
रॉकेट इंजन

हर साल जनवरी के पहले हफ्ते में भारतीय विज्ञान कांग्रेस अपना वार्षिकोत्सव मनाती है। इस बार इसका आयोजन तिरुपति के श्रीवेंकटेश्वर विश्वविद्यालय में किया गया है। इसमें राष्ट्रीय विकास के लिए विज्ञान और तकनीक के योगदान पर चर्चा होगी। कोई भी सदस्य दस पंक्तियों का सारांश लिख कर इसमें भाग ले सकता है। कुछ विदेशी प्रतिनिधि भी बुला लिए जाते हैं। प्रचार के लिए प्रधानमंत्री से इसका उद््घाटन करा लिया जाता है। वास्तव में इस प्रकार की संस्था से भारतीय विज्ञान को कोई लाभ नहीं हो रहा है। होना तो यह चाहिए था कि इसमें देश भर के वैज्ञानिक संस्थानों और राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं के वैज्ञानिक मिलते और देश की समस्याओं पर चर्चा करके अपने-अपने क्षेत्र में अनुसंधान और विकास की भावी रूपरेखा प्रस्तुत करते। सरकार भी उन्हें यह बताती कि देश में किन-किन क्षेत्रों में कैसी समस्याएं हैं और उनके समाधान के लिए किस तरह के शोध और विकास की जरूरत है।

विज्ञान और तकनीक मेंयोगदान के मामले में भारत दुनिया में इक्कीसवें नंबर पर है। इस रैंकिंग का आधार यह है कि कौन-सा देश वैज्ञानिक शोध में कितनी हिस्सेदारी कर रहा है। यह हिस्सेदारी अनुसंधान-पत्रों से तय होती है। विज्ञान और तकनीक में किसी देश के योगदान को वैज्ञानिक व तकनीकी विषयों में पीएचडी करने वालों की संख्या से भी नापा जा सकता है। इस मामले में भारत की स्थिति अच्छी नहीं है। हमारे पास सीएसआईआर जैसी संस्थाएं हैं, कई स्तरीय अनुसंधान केंद्र हैं और विश्वविद्यालयों में विज्ञान के विभाग भी हैं। लेकिन सीएसआईआर का एक सर्वे बताता है कि हर साल जो करीब तीन हजार अनुसंधान-पत्र तैयार होते हैं, उनमें कोई नया आइडिया नहीं होता। वैज्ञानिकों तथा वैज्ञानिक संस्थानों की कार्यकुशलता का पैमाना वैज्ञानिक शोधपत्रों का प्रकाशन तथा पेटेंटों की संख्या है, लेकिन इन दोनों ही क्षेत्रों में गिरावट आई है। भारत में सील किए गए पेटेंटों की संख्या 1999-2000 में 1890 से गिर कर 2009-2010 में 1881 रह गई, जबकि अनुसंधान व विकास (रिसर्च एवं डेवलपमेंट- आर ऐंड डी) पर खर्च बढ़ता जा रहा है। पिछले दस वर्षों में यह 232 प्रतिशत बढ़ गया है। आंकड़ों से पता चलता है कि 2010 में भारत में कृषि, जीव विज्ञान, चिकित्सा विज्ञान, रसायन विज्ञान, गणित, भौतिक विज्ञान, इंजीनियरी तथा भू-विज्ञान में शोधपत्रों में भारत का योगदान केवल 2.2 प्रतिशत रहा।

देश के कई वैज्ञानिक संस्थानों और राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं पर ऐसे लोगों का कब्जा है जिनका अकादमिक कार्य इस स्तर का नहीं है कि वे किसी संस्थान के निदेशक बनाए जाएं, लेकिन अपनी पहुंच के बल पर वे वैज्ञानिक अनुसंधान के मुखिया बने हुए हैं। विज्ञान की दुनिया में जोड़-घटा कर यों ही कुछ हासिल नहीं किया जा सकता। विज्ञान में कुछ करने का मतलब है कि कोई नई खोज या नया आविष्कार किया जाए। लेकिन जब चुके हुए लोग राजनीतिक तिकड़म और भाई-भतीजावाद से वैज्ञानिक संस्थानों, प्रयोगशालाओं तथा केंद्रों के मुखिया होंगे तो क्या होगा? शायद इन्हीं सब कारणों से वैज्ञानिक समुदाय में कुंठा बढ़ रही है, जो त्यागपत्रों और आत्महत्या के रूप में भी समय-समय पर सामने आ चुकी है।

यह अकारण नहीं है कि जिन भारतीय वैज्ञानिकों ने नाम कमाया है, वे विदेशों में बस चुके हैं। लगभग दस लाख भारतीय वैज्ञानिक, डॉक्टर और इंजीनियर आज देश से बाहर काम कर रहे हैं। आज भी प्रतिभा पलायन से अरबों डॉलर का नुकसान हो रहा है। चरक और सुश्रुत के बाद चिकित्सा अनुसंधान के क्षेत्र में हमारा योगदान शून्य रहा है। इसी तरह से भास्कराचार्य, आर्यभट््ट के बाद गणित व ज्योतिष में भी भारत ने कोई मौलिक अनुसंधान या खोज नहीं की है।
अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में हमारी कुछ उपलब्धियां हैं। लेकिन दुनिया को बताने लायक हमने कोई नई खोज या आविष्कार नहीं किया है। वैज्ञानिकों और इंजीनियरों की संख्या के हिसाब से भारत का दुनिया में तीसरा स्थान है। लेकिन सारा का सारा वैज्ञानिक साहित्य पश्चिमी देशों के वैज्ञानिकों के कार्यों से भरा पड़ा है। उसमें किसी भारतीय का नाम नहीं मिलता है। अपने देश में आज कोई रामन, खुराना क्यों नहीं है? इतने सारे वैज्ञानिक संस्थानों में लगे हुए ढेरों वैज्ञानिक किस ऊहापोह में हैं। क्या हमारे देश में वैज्ञानिक प्रगति के लिए उपयुक्त वातावरण नहीं है?

दरअसल, सात-आठ दशक पहले ऐसा नहीं था। ब्रिटिश राज में परिस्थितियां एकदम प्रतिकूल थीं। इसके बावजूद भारत ने बड़े-बड़े वैज्ञानिक पैदा किए- रामानुजम, जगदीश चंद्र बोस, चंद्रशेखर वेंकट रामन, मेघनाद साहा और सत्येंद्रनाथ बोस। इन वैज्ञानिकों ने भारत में ही काम किया था, और दुनिया में भारत का गौरव बढ़ाया था। लेकिन आजादी के बाद हम एक भी अंतरराष्ट्रीय स्तर का वैज्ञानिक देश में पैदा नहीं कर सके। इस बारे में क्या कभी हमने सोचा है?
देश की 1138 औद्योगिक अनुसंधान एवं विकास इकाइयों में लगभग साठ हजार वैज्ञानिक कार्यरत हैं। लेकिन तकनीक के विकास में उनका योगदान कितना है? औद्योगिक जरूरतों और प्रयोगशालाओं के अनुसंधान के बीच कोई तालमेल नहीं है। वास्तव में विज्ञान और तकनीक के विकास के लिए हमारे पास धन और साधनों की उतनी कमी नहीं, जितना कि कहा जाता है। विदेशी सहायता का भी हम समुचित उपयोग नहीं कर पाते हैं। अनुसंधान और तकनीक के विकास के लिए विदेशी सहायता की नमूना-जांच के लिए भारत के नियंत्रक व लेखा परीक्षक ने दस परियोजनाएं चुनी थीं। इनमें से पांच परियोजनाएं पर्यावरण व वन मंत्रालय से और पांच परियोजनाएं गैर-पारंपरिक ऊर्जा-स्रोत मंत्रालय से संबद्ध हैं। इन परियोजनाओं का कुल परिव्यय 824.04 करोड़ रुपए था। इनमें अनुदान का उपयोग 0.81 प्रतिशत से लेकर सौ प्रतिशत के करीब हुआ। दो परियोजनाओं में उपयोग पचास प्रतिशत से भी कम रहा और दो अन्य परियोजनाओं में सहायता राशि के आंकड़े उपलब्ध नहीं थे। इन परियोजनाओं के प्रारंभिक लक्ष्य की पूर्ति की समयावधि के बारे में पांच से साठ माह तक संशोधन किया गया, फिर भी चार मामलों में लक्ष्य प्राप्त नहीं किए जा सके।

विश्व बाजार के इस युग में अब उत्पादन के रहस्य अंतरराष्ट्रीय व्यापार की वस्तु बन गए हैं। ज्ञान और तकनीक को अब धन अर्जित करने के स्रोत के रूप में स्वीकार कर लिया गया है। लेकिन इस नए विश्व में स्वामित्वपूर्ण ज्ञान से ही संपदा अर्जित की जा सकती है। ज्ञान आधारित प्रतिस्पर्धा के युग में बौद्धिक संपदा अधिकारी नीतिगत उपकरण के रूप में उभरे हैं। किसी भी देश की आत्मनिर्भरता में विज्ञान और तकनीक की शक्ति निर्विवाद रूप में सिद्ध हो चुकी है। ऐसा नहीं है कि हमारे पास प्रतिभावान और क्षमतावान वैज्ञानिक नहीं हैं। जहां कहीं भी हमें चुनौती मिली है और लक्ष्य निर्धारित किए गए हैं, वहां हमने सफलता भी प्राप्त की है। राकेट, उपग्रह, मिसाइल और परमाणु विस्फोट के क्षेत्र में हमारे वैज्ञानिकों की शानदार सफलताएं इसी बात का प्रमाण हैं।
दुनिया के अन्य देशों के आर्थिक विकास का सबसे सशक्त माध्यम तकनीक बन चुकी है। औद्योगिक दृष्टि से अग्रणी देशों ने जो विकास किया है उसमें से लगभग एक तिहाई से आधा हिस्सा टेक्नोलॉजी की प्रक्रिया से आया है। आर्थिक विकास के लिए टेक्नोलॉजी के लगातार सुधार के साथ-साथ नए आविष्कार करना भी बहुत जरूरी है। जब इस तरह के आविष्कार होते हैं तो इनसे पूरी औद्योगिक व्यवस्था बदल जाती है। देश की जरूरतों के हिसाब से विज्ञान और तकनीकी अनुसंधान की प्राथमिकताएं तय की जानी चाहिए। विज्ञान व तकनीकी अनुसंधान को अफसरशाही के शिकंजे से मुक्त करा कर देश के निर्माण के लिए समयबद्ध स्पष्ट कार्यक्रम तैयार किए जाने चाहिए।

 

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