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समान कार्य असमान वेतन

वेतन में लैंगिक असमानता के संदर्भ में अगर भारत की बात की जाए तो यह अंतर बहुत अधिक है। दोनों की औसत आय में 67 प्रतिशत का अंतर है।

Author November 6, 2017 4:41 AM
प्रतीकात्मक चित्र।

ऋतु सारस्वत

हाल ही में पेरिस स्थित थिंक टैंक ‘आॅर्गनाइजेशन फॉर इकोनोमिक कोआॅपरेशन एंड डेवलपमेंट’ (ओईसीडी) की रिपोर्ट ने उस मिथक को दूर कर दिया है कि विकसित देशों में महिलाओं की स्थिति पुरुषों के समकक्ष है। ओईसीडी की रिपोर्ट के अनुसार कनाडा, जापान और नार्वे से लेकर आस्ट्रेलिया तक युवा महिलाएं पुरुषों के मुकाबले औसतन पंद्रह प्रतिशत कम कमाती हंै, जबकि वे पुरुषों से ज्यादा पढ़ी-लिखी हैं। यह रिपोर्ट यह भी बताती है कि अगर 2025 तक महिलाओं और पुरुषों के वेतन में अंतर को पच्चीस प्रतिशत भी कम कर लिया जाता है, तो ओईसीडी के पैंतीस सदस्य-देशों में आर्थिक विकास की संभावनाएं बेहतर होंगी। ब्रिटेन के ‘इक्वॅलिटी ऐंड ह्यूमन राइट्स कमीशन’ की ‘एज ऐंड अर्निंग्स इनइक्वॅलिटी’ रिपोर्ट बताती है कि ‘मूल रूप से जेंडर पे गैप (वेतन में लैंगिक असमानता) का मामला बहुत बड़ा है…।’ कार्यक्षेत्र कोई भी हो, विश्व भर में, महिलाओं की योग्यता को कमतर आंकने और पुरुषों की अपेक्षा कम वेतन देने की परंपरा ‘समान काम के लिए समान वेतन’ के विभिन्न कानूनों के बाद भी बदस्तूर कायम है। ‘समान काम और समान वेतन’ पर केंद्रित एक शोध से पता चला है कि महिला वैज्ञानिकों को समान कार्य करने के बावजूद पुरुष सहकर्मियों की तुलना में चौदह प्रतिशत कम वेतन मिलता है। वेतन में लैंगिक असमानता के संदर्भ में अगर भारत की बात की जाए तो यह अंतर बहुत अधिक है। दोनों की औसत आय में 67 प्रतिशत का अंतर है।

जॉब पोर्टल ‘मॉन्स्टर इंडिया’ के मार्च 2017 में जारी आंकड़े बताते हैं कि देश में पुरुष एक घंटे में औसतन 345.80 रुपए कमाते हैं जबकि महिलाओं की आय सिर्फ 259.8 रुपए है। हैरान करने वाली बात तो यह है कि तथाकथित आधुनिक कहे जाने वाले कॉरपोरेट सेक्टर में भी यही स्थिति है। विभिन्न अध्ययन वेतन में लैंगिक असमानता का कारण, कार्यस्थलों पर पुरुषों की नेतृत्वशाली भूमिका, शिक्षा, कौशल और काम करने के घंटे ज्यादा होना मानते हैं, पर क्या वाकई इसमें सच्चाई है? क्या महिलाओं के कौशल और काम के प्रति उनके समर्पण में कमी है? या वास्तविकता इससे परे है? श्रम मंत्रालय (भारत सरकार) के अधीन काम करने वाले श्रम ब्यूरो के मजदूरी दर के आंकड़े (जनवरी 2017 के लिए जारी) उस वास्तविकता को सामने लाते हैं, जो कि पुरुषसत्तात्मक समाज की सोच में गहराई से बसी है। क्या यह विश्वास किया जा सकता है कि झाड़ू लगाने जैसे कार्य के वेतन में भी लैंगिक असमानता पाई जाती है? अखिल भारतीय स्तर पर पुरुषों को सफाई के काम के लिए 218.6 रुपए तो महिलाओं को 209 रुपए का भुगतान किया जा रहा है। कुछ समय पूर्व, ग्रामीण विकास मंत्रालय ने कहा कि एक भी राज्य महिला मजदूरों को पूरा वेतन नहीं दे रहा है। राष्ट्रीय औसत को लें, तो महिलाओं को निर्धारित न्यूनतम मजदूरी का केवल अठहत्तर प्रतिशत हिस्सा मिलता है।

श्रम ब्यूरो के आंकड़े यह भी बताते हैं कि आंध्र प्रदेश में बुआई के काम में पारिश्रमिक में असमानता 25.3 प्रतिशत है। पुरुषों को बुआई के काम के लिए 276.5 रुपए मजदूरी मिलती है जबकि महिलाओं को 206.5 रुपए। बिहार में इस काम के लिए पुरुषों को 252.6 रुपए रोज मिल रहे हैं, पर महिलाओं को 214.6 रुपए। देश में मजदूरी में सबसे ज्यादा गैर-बराबरी तमिलनाडु में है, 34.8 प्रतिशत। इसी तरह फसल कटाई के काम में आंध्र प्रदेश में मजदूरी की असमानता 22.3 प्रतिशत है। निर्माण मजदूरी में भी लैंगिक असमानता प्रभावी रूप से मौजूद है। कर्नाटक में यह अंतर 34.9 प्रतिशत है, वहीं तमिलनाडु में 34.5 प्रतिशत।
अकुशल कार्यों में भी वेतन असमानता को जायज ठहरा कने वाले तर्क ढूंढ़ पाना संभव नहीं है, विशेषकर उन अध्येताओं के लिए जो पुरुषों को मानसिक तौर महिलाओं से कहीं अधिक सक्षम मानते हैं। पर शोध इसे सिरे से नकार देते हैं। ‘इंटरनेशनल जर्नल आॅफ बिजनेस गवर्नेन्स ऐंड एथिक्स’ के शोध यह बताते हैं कि महिला मस्तिष्क कई तरह की सूचनाओं को एक साथ संचारित कर सकता है और विपरीत परिस्थितियों में त्वरित निर्णय ले सकता है। बावजूद इसके अगर महिलाओं को वेतन संबंधी भेदभाव का सामना करना पड़ रहा हो तो इसका स्पष्ट कारण, महिलाओं को दोयम मानने की सोच है और यह शिक्षित व प्रभावशाली वर्ग में भी उसी तरह कायम है जैसे कि आम लोगों के बीच। मार्च 2017 में, यूरोपीय संसद में पौलेंड के जानुस कोविंन मिक्की ने अपने एक बयान में कहा था कि ‘यह बीसवीं शताब्दी का एक घिसा-पिटा विचार है कि महिलाएं बौद्धिक रूप से पुरुषों के बराबर होती हैं। इस घिसे-पिटे विचार को जरूर खत्म होना चाहिए, क्योंकि यह सही नहीं है।’

असमान वेतन की सच्चाई उजागर न हो, इसके लिए विश्व भर के निजी संस्थानों ने वेतन संबंधी नीतियों तथा अपने कर्मचारियों को दिए जाने वाले वेतन को, सार्वजनिक न करने का रवैया अपना रखा है। हाल ही में अमेरिकी कंपनी गूगल के खिलाफ वेतन और पदोन्नति में महिलाओं के साथ भेदभाव के आरोप में कानूनी कार्रवाई की गई है। यह मुकदमा कंपनी की तीन पूर्व महिला कर्मचारियों ने दर्ज कराया था। बीते माह प्रकाशित हुई एक शोध-रिपोर्ट बताती है कि भारत के कार्यालयों में काम करने वाली बावन प्रतिशत महिलाओं का मानना है कि कार्यस्थलों में उन्हें पुरुषों के खराब व्यवहार का सामना करना पड़ता है। पचहत्तर प्रतिशत महिलाओं का यह भी कहना है कि पुरुष उन्हें नेतृत्वकारी भूमिकाओं में नहीं देख सकते। यहां तक कि स्वयं उनसठ प्रतिशत पुरुषों ने भी यह स्वीकार किया कि उन्हें किसी महिला के नेतृत्व में काम करने में असहजता महसूस होगी। हैरानी की बात तो यह है कि परंपरागत कार्यक्षेत्रों में ही नहीं, खेलों से लेकर फिल्म उद्योग तक में यह लैंगिक असमानता पाई जाती है।

असमान वेतन को लेकर कई बार विद्रोह के स्वर मुखरित हुए हैं। दिसंबर 2016 में पेरिस के प्रमुख प्रशासनिक और सांस्कृतिक कार्यालयों की महिला कर्मचारियों ने ठीक साढ़े चार बजे अपना काम रोक दिया था। यह बात भी उल्लेखनीय है कि फ्रांस में हुआ यह प्रदर्शन आईसलैंड में 24 अक्टूबर 2016 को हुए ऐसे ही प्रदर्शनों की तर्ज पर था जहां हजारों महिलाओं ने उस दिन ठीक 2.38 बजे अपना काम रोक दिया था ताकि उनके देश में पुरुषों व महिलाओं के वेतन के बीच चौदह प्रतिशत की विषमता को उजागर किया जा सके।जनवरी 2017 में जर्मनी की सरकार ने एक कानून पारित किया, जिसके मुताबिक जिस कंपनी में दो सौ से अधिक कर्मचारी काम करते हैं वहां कर्मचारियों को एक-दूसरे के वेतन को जानने का अधिकार होगा। यह इसलिए किया गया है ताकि समान कार्य करने वाले महिला और पुरुष के वेतन में किसी तरह की असमानता हो तो वह दूर की जा सके, क्योंकि अध्ययन यह बता रहे थे कि जर्मनी में समान काम के लिए महिलाओं को पुरुषों से इक्कीस प्रतिशत कम वेतन दिया जाता है। इसी तरह, आईसलैंड ने वेतन संबंधी असमानता दूर करने के लिए अप्रैल में एक ऐसा विधेयक पेश किया, जिसके तहत सार्वजनिक एवं निजी उद्यमों को इस बात का प्रमाण देना होगा कि वे महिला व पुरुष कर्मचारियों को समान वेतन दे रहे हैं।  यों तो भारत में भी, समान पारिश्रमिक अधिनियम 1976, बनाया गया, जिसमें बिना किसी भेदभाव के समान कार्य अथवा समान प्रकृति के कार्य के लिए पुरुष व महिला कामगार को समान पारिश्रमिक का भुगतान सुनिश्चित करने का प्रावधान किया गया। बावजूद इसके, अगर यहां समान कार्य के लिए स्त्री-पुरुष के पारिश्रमिक में असमानता व्यापक रूप से बनी हुई है, तो ऐसा क्यों है?

 

 

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