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सड़क सुरक्षा की खातिर

सर्वोच्च न्यायालय के ताजा और अहम निर्णय के मुताबिक अब राष्ट्रीय राजमार्गों और राज्यों के राजमार्गों से पांच सौ मीटर तक शराब की दुकानें नहीं होंगी।

Author December 19, 2016 12:21 AM
तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

सर्वोच्च न्यायालय के ताजा और अहम निर्णय के मुताबिक अब राष्ट्रीय राजमार्गों और राज्यों के राजमार्गों से पांच सौ मीटर तक शराब की दुकानें नहीं होंगी। हालांकि सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया है कि जिनके पास लाइसेंस है वे उसके समाप्त होने तक यानी 31 मार्च 2017 तक इस तरह की दुकानें चला सकेंगे। यानी 1 अप्रैल 2017 से राजमार्गों पर शराब की दुकानें नहीं होंगी। साथ ही राजमार्गों के किनारे लगे शराब के सारे विज्ञापन और सूचना पट्ट भी हटाए जाएंगे। न्यायालय का यह निर्णय सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में लागू होगा। गौरतलब है कि ‘अराइव सेफ’ नाम के गैर-सरकारी संगठन ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका डाल कर कहा था कि राजमार्गों पर आसानी से शराब उपलब्ध होना सड़क दुर्घटनाओं की एक बड़ी वजह है और ऐसे हादसों में ज्यादातर लोगों की मौत शराब पीकर गाड़ी चलाने के कारण होती है। यही वजह है कि उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि यह फैसला सुरक्षा के मद््देनजर लिया गया है। रास्ते में शराब की दुकानों को देख वहां से गुजर रहे लोगों का मन विचलित होता है और जो लोग शराब का सेवन करते हैं उनके साथ दुर्घटना का खतरा भी बढ़ जाता है।

बीते कुछ सालों में तमाम देशों के मुकाबले हमारे देश की सड़कों पर हो रही दुघर्टनाओं में मौतों की संख्या तेजी से बढ़ी है। ऐसे में सड़क दुर्घटनाएं रोकने की दिशा में वाकई ठोस प्रयास की दरकार है। इन हादसों के आंकड़े साल-दर-साल बढ़ ही रहे हैं। गौरतलब है कि देश में हर वर्ष करीब पांच लाख सड़क दुर्घटनाएं होती हैं, जिनमें करीब डेढ़ लाख लोग अपनी जान गंवा बैठते हैं। इससे दोगुनी संख्या में लोग अपंग हो जाते हैं। इन दुर्घटनाओं में बड़ी संख्या में अकाल मौतें तो होती ही हैं, देश को आर्थिक नुकसान भी होता है।
हाल ही में आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन की ताजा रिपोर्ट में हुए एक खुलासे ने भी स्वास्थ्य विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है। इस रिपोर्ट के मुताबिक भारत में बीते दो दशक में शराब की खपत पचपन फीसद बढ़ी है। वैसे भी हमारे यहां पूरे देश में ही शराब पीने की बढ़ती प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने की मांग और बहस काफी लंबे समय से चल रही है। खासकर महिलाएं तो शराबबंदी को लेकर कई आंदोलन भी कर चुकी हैं। कई बार चुनावों में शराबबंदी एक अहम मुद््दा रही है। ऐसे में यह सराहनीय निर्णय कहीं न कहीं आमजन की सुरक्षा से ही जुड़ा है। मौजूदा दौर में लोगों के बीच शराब के बढ़ते चलन को देखते हुए ऐसे सख्त निर्णय लिये जाने की जरूरत भी है। जीवन शैली के बदलाव के नाम पर शराब का बढ़ता सेवन शारीरिक-मानसिक व्याधियां तो दे ही रहा है, सड़क दुर्घटनाओं के पीछे भी यह सबसे बड़ा कारण है। फिर, इस लत के साथ हिंसात्मक व्यवहार भी जुड़ा है।

ओईसीडी (आॅर्गनाइेशन फॉर इकोनोमिक कोआॅपरेशन एंड डेवलपमेंट) के अनुसार, दुनिया भर में शराब पीना असामयिक मौत और अपाहिज होने का पांचवां सबसे प्रमुख कारण बन गया है। एड्स, हिंसा और क्षय रोग की वजह से जितनी जानें जा रही हैं, उनसे ज्यादा जानें शराब के सेवन की वजह से जा रही हैं। अल्कोहल के अत्यधिक इस्तेमाल से दुनिया भर में समाज और अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान हो रहा है। आंकड़े बताते हैं कि 2012 में दुनिया भर में शराब पीने के बाद हुई हिंसा या दुर्घटना में तैंतीस लाख लोगों की मौत हुई, यानी हर दस सेकेंड में एक मौत। बीते चार सालों में शराब पीने वालों की संख्या बढ़ी ही है। नतीजतन इससे जुड़े हादसों और हिंसात्मक घटनाओं में भी इजाफा ही हुआ है। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों में शराबखोरी की बड़ी भूमिका रहती है। शराब के कारण होने वाले अपराधों में बड़ी संख्या घरेलू हिंसा जैसे अपराधों की भी है, जिनके अधिकतर मामलों की रिपोर्ट दर्ज नहीं कराई जाती। शोध पत्रिका ‘ड्रग ऐंड अल्कोहल रिव्यू’ के मुताबिक लैंगिक अपराध और शराब के संबंध पर किए गए सर्वेक्षण बताते हैं कि लैंगिक अपराध के लगभग आधे मामले नशे की हालत में होते हैं। यानी सड़क दुर्घटनाओं के साथ-साथ शराब का सेवन और भी कई त्रासदियों का सबब बनता है।

अधिकतर विश्लेषण यही बताते हैं कि कुल सड़क दुर्घटनाओं में 78.7 प्रतिशत दुर्घटनाएं चालकों की गलती से होती हैं। इस गलती के पीछे शराब का सेवन सबसे प्रमुख कारण है। 2015 में सड़क हादसों की संख्या 2014 की तुलना में 2.5 फीसद बढ़ कर पांच लाख का आंकड़ा पार कर गई। साल-दर-साल बढ़ते इन आंकड़ों को देखते हुए जागरूकता पैदा करने को प्रतिबद्ध लोग लंबे वक्त से राजमार्गों के किनारे बनी शराब की दुकानें बंद करने की मांग कर रहे थे। दरअसल, तेज गति से चलते हुए होने वाली गलतियों के मामले में अक्सर कारण शराब के सेवन का ही रहता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक शराब का ड्राइविंग पर गहरा असर पड़ता है। नशे की वजह से वाहन चालक की मुस्तैदी का स्तर काफी गिर जाता है, मांसपेशियों की प्रतिक्रिया ज्यादा समय लेती है और इसका आंखों की रोशनी पर भी गहरा असर पड़ता है। नतीजतन दुर्घटनाएं हो जाती हैं। राजमार्ग यों भी लंबी यात्राओं के लिए होते हैं, इसलिए तेज रफ्तार से चल रहे वाहन के चालक का नशे में होना दुर्घटना के अंदेशे को कई गुना बढ़ा देता है।

यह वाकई चिंतनीय है कि हमारे यहां सड़क हादसों की सालाना संख्या लाखों में पहुंच गई है। भारत आज सड़क हादसों और इनमें अपना जन व धन गंवाने के मामले में दुनिया में अव्वल है। महानगर हों या दूरदराज के ग्रामीण क्षेत्र, आए दिन सड़कों पर लोगों के जान गंवाने की खबरें आती हैं। यह कैसी विडंबना है कि प्रतिवर्ष जन-धन की इतनी बड़ी क्षति के बावजूद ऐसी दुर्घटनाओं का होना जारी है? यह अफसोसनाक है कि जन-जागरूकता लाने के गंभीर प्रयासों के बावजूद ऐसे दुस्साहसी चालकों की बड़ी संख्या हर दिन सड़कों पर उतरती है जो शराब का सेवन कर वाहन चलाते हैं। हमारे देश में हर साल जितने लोग इन दुर्घटनाओं में घायल हो रहे हैं उनमें पचासी फीसद बीस से पच्चीस के युवा हैं। रफ्तार के रोमांच के चक्कर में नियमों की अनदेखी करने वाले कितने ही युवा सड़क हादसों का शिकार बन रहे हैं। इतना ही नहीं, लापरवाही-जनित दुर्घटनाओं का शिकार होने वाले अधिकतर लोग भी पच्चीस से चालीस वर्ष के आयु समूह के होते हैं। ये वह आयु वर्ग है जिस पर परिवार, समाज और देश की उम्मीदें टिकी होती हैं। इसीलिए इस मामले में सार्थक कदम उठाते हुए सख्ती बरतना आवश्यक है। हालांकि इन हादसों को रोकने का जिम्मा केवल सरकार पर नहीं छोड़ा जा सकता। सुरक्षा के मामले में जन-सहभागिता और जन-सहयोग भी जरूरी है।

यह बेहद अफसोसनाक है कि सड़क दुर्घटनाओं में अकाल मौतों के बढ़ते आंकड़ों के बावजूद समाज में न केवल यातायात नियमों के प्रति घोर उपेक्षा का भाव झलकता है बल्कि शराब पीकर गाड़ी चलाने के आंकड़े भी बढ़ते जा रहे हैं। सरकार और समाज, अब दोनों का ही इस गंभीर विषय पर चेतना आवश्यक है। यकीनन नियमों की सख्ती और जन-जागरूकता ही जीवन बचाने का आधार बन सकती है। ऐसे में सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि शीर्ष अदालत के निर्णय का सही ढंग से पालन हो।

 

 

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