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शिक्षा सुधार का आधार

अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा देने के लिए वे अपनी सामर्थ्य में बड़ी से बड़ी फीस देने को तैयार होते हैं। स्कूल-पूर्व शिक्षा के बाद भी बच्चों को वही पुरानी रटने तथा दोहराने की परंपरागत पद्धति से ही गुजारा जाता है
Author August 8, 2017 05:37 am
प्रतीकात्मक तस्वीर (Source: Agency)

इधर चौदह हजार बच्चों को शामिल कर स्कूल-पूर्व की शिक्षा के अगले चार साल की पढ़ाई पर पड़े प्रभाव को लेकर किए गए यूनीसेफ के सर्वेक्षण की रिपोर्ट पर लोगों का ध्यान गया है। निष्कर्ष कुछ इस प्रकार है: सरकारी (आंगनवाड़ी) तथा निजी स्कूलों में स्कूल-पूर्व शिक्षा में कुल मिलाकर जोर औपचारिक शिक्षा पर ही हो जाता है, सरकारी स्कूलों द्वारा अनेक प्रकार की ‘मुफ्त’ मिलने वाली सुविधाओं के बावजूद जहां भी संभव हो पाता है माता-पिता बच्चे को गैरसरकारी स्कूल में ही दाखिल कराना पसंद करते हैं। अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा देने के लिए वे अपनी सामर्थ्य में बड़ी से बड़ी फीस देने को तैयार होते हैं। स्कूल-पूर्व शिक्षा के बाद भी बच्चों को वही पुरानी रटने तथा दोहराने की परंपरागत पद्धति से ही गुजारा जाता है। ब्लैकबोर्ड से देख कर नकल करना आज भी लगभग वैसे ही प्रचलित है जैसे पहले था।

इन निष्कर्षों को देख कर (विशेषकर रटने को लेकर) कुछ आधुनिक निजी स्कूलों से जुड़े लोग अस्वीकार्यता में तर्क देने लगते हैं, पर अधिकतर स्कूलों में स्थिति यही है। शिक्षण पद्धतियों में मूलभूत सुधार होने में आगे भी सघन प्रयासों की आवश्यकता पड़ेगी। केवल कंप्यूटर और इंटरनेट आ जाने से बच्चों पर पड़ने वाला दबाव न कम हुआ है न होने की संभावना है। यह तभी संभव है जब शिक्षक प्रशिक्षण संस्थान अपने शैक्षिक कलेवर को पूरी तरह बदलने को तैयार हों। इसके लिए इन संस्थाओं में अत्यंत कर्मठ तथा ‘पढ़ाने को प्यार करने वाले’ शिक्षक प्रशिक्षक को लाना होगा। अधिकतर राज्य सरकारों की प्राथमिकता में ये संस्थान हैं ही नहीं! दशकों तक इनमें नियमित नियुक्तियां और प्रोन्नतियां की ही नहीं जाती हैं। प्रतिनियुक्ति पर अधिकतर वे लोग लाए जाते हैं जो या तो मंत्री महोदय से पूर्व-परिचित रहे हों या अन्य प्रकार से साधन-संपन्न हों। जो शिक्षक-प्रशिक्षण गैरसरकारी संस्थानों में हो रहा है उसमें से अधिकांश खानापूरी तक सीमित रह गया है। और इससे कोई भी अपरिचित नहीं है। इस स्थिति में मूल्यों की शिक्षा या पूर्ण व्यक्तित्व विकास जैसी अपेक्षाएं कागजों पर लिखे शब्दों तक सीमित रह जाती हैं।

आज अनेक लोग यह पूछते हुए पाए जाते हैं कि शिक्षा संस्थानों में जो कर्मठता, मूल्यपरकता, सहजता तथा कर्तव्यनिष्ठा 1950-60 के समय देखी जाती थी वह अब ढूंढ़ने पर भी क्यों नहीं मिलती है! पिछले कुछ दशकों में हुए इस नकारात्मक परिवर्तन को समझने और उससे निजात पाने के लिए आज भी मोहनदास करमचंद गांधी द्वारा 1909 में लिखी गई कालजयी रचना ‘हिंद स्वराज’ राह दिखा सकती है। इसमें गांधीजी ने प्रसिद्ध अंग्रेज विद्वान हक्सले के कथन को उद्धृत किया था:‘उस आदमी ने सच्ची शिक्षा पाई है, जिसके शरीर को ऐसी आदत डाली गई है कि वह उसके बस में रहता है, जिसका शरीर चैन से और आसानी से सौंपा हुआ काम करता है। उस आदमी ने सच्ची शिक्षा पाई है, जिसकी बुद्धि शुद्ध, शांत और न्यायदर्शी है। उसने सच्ची शिक्षा पाई है, जिसका मन कुदरती कानूनों से भरा है और जिसकी इंद्रियां उसके बस में हैं, जिसके मन की भावनाएं बिलकुल शुद्ध हैं, जिसे नीच कामों से नफरत है और जो दूसरों को अपने जैसा मानता है। ऐसा आदमी ही सच्चा शिक्षित (तालीमशुदा) माना जाएगा, क्योंकि वह कुदरत के कानून के मुताबिक चलता है। कुदरत उसका अच्छा उपयोग करेगी और वह कुदरत का अच्छा उपयोग करेगा।’

इस प्रकार की शिक्षा उसी स्कूल या संस्था में दी जा सकती है जहां के अध्यापक ‘मनुष्य की इस संकल्पना’ से न केवल परिचित हों, वे स्वयं के जीवन में उन मूल्यों को आत्मसात कर चुके हों, उन्हें साकार रूप में विद्यार्थियों के समक्ष (बिना कहे अपने आचार-विचार व व्यवहार में) प्रस्तुत कर रहे हों। भारत की शैक्षिक परंपरा में गुरु (अध्यापक) से हर प्रकार के आदर्श की अपेक्षा की जाती रही है। जब अध्यापकों से इस दिशा में चर्चा की जाती है तब फिर एक बार वही तथ्य सामने आकर खड़े हो जाते हैं कि केवल अध्यापक से सारी नैतिकता की अपेक्षा करना उचित होगा? क्या अध्यापक के ऊपर उसके आसपास हो रहे घटनाचक्र का कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा? ‘महाजनो येन गत: सा पन्था:’ क्या आज प्रभावशाली नहीं होगा? अधिकाधिक संग्रहण करने के उदाहरण जो नित्यप्रति उजागर होते हैं वे क्या अध्यापकों तथा उनके विद्यार्थियों पर कोई प्रभाव नहीं डालेंगे?एक उदाहरण सर्वविदित है।1960 में यह कल्पना करना भी असंभव था कि विश्वविद्यालय या महाविद्यालय का कोई प्राध्यापक ट्यूशन करेगा! वे कक्षाओं से अलग हट कर विद्यार्थियों को आवश्यकतानुसार पढ़ाते अवश्य थे मगर वह धनार्जन का स्रोत नहीं होता था। परिवर्तन इतनी तेजी से हुआ है कि देश की अधिकतर नियामक संस्थाओं की साख लगभग समाप्त हो चुकी है। इनके द्वारा नियुक्त विशेषज्ञ समितियां ऐसे संस्थानों को मान्यता दे देती हैं जो मापदंडों पर खरे नहीं उतरते हैं। आज जब व्यापम जैसे प्रकरण सामने आते हैं, अधिकतर व्यावसायिक प्रवेश परीक्षाओं के प्रश्नपत्र ‘लीक’ हो जाते हैं तब नैतिकता के ह्रास का दंश देश के भविष्य को डंसता है। अध्यापक इस सब से अछूता कैसे रह सकता है?

आधुनिकता में शिक्षा से अपेक्षाएं अनेक प्रकार से भले प्रस्तुत की जाती हों, उसका मूल उद््देश्य तो ऐसे व्यक्ति का निर्माण करना है जो अपने जीवन के निर्णय स्वयं ले सके, अपने जीवन से संतुष्ट हो सके, समाज से केवल लेता न रहे, अंत:करण से उसकी प्रगति में योगदान करने का लक्ष्य बनाए, अपने अधिकारों से पहले अपने कर्तव्यों पर ध्यान देता हो। आज भी देश के अध्यापन जगत में हर स्तर पर ऐसे शिक्षक मिलते हैं। चिंता केवल इसलिए है कि यह वर्ग सिमटता जा रहा है। इनके कार्य के सुचारुनिष्पादन के लिए यह भी आवश्यक है कि बच्चे को घर से लेकर स्कूल तक एक प्रेरणाप्रद वातावरण मिले।यह हर बच्चे का नैसर्गिक अधिकार है कि ऐसे अध्यापक से ही उसका वास्ता पड़े जो अंत:करण से अपने कार्य की श्रेष्ठता को जानता हो, जो स्वयं सदा याद रखे कि वह हर बच्चे के लिए ‘आइकॉन’ है। घर से बाहर स्कूल में आने पर बच्चों को एक निरंतरता मिलनी चाहिए जो संवेदनशील अध्यापक ही दे सकता है। इसीलिए प्रारंभिक कक्षाओं में महिला शिक्षकों को प्राथमिकता दी जाती है, या दी जानी चाहिए। शिक्षा की गुणवत्ता उन्हीं देशों में निखरी है जहां स्कूल-पूर्व तथा प्राथमिक शिक्षा में नियुक्त अध्यापकों के चयन, प्रशिक्षण तथा उपयुक्त कार्यकारी परिवेश उपलब्ध करने पर विशेष ध्यान दिया जाता है। भारत में स्कूल-पूर्व शिक्षा की समझ तथा उसका प्रचलन देर से प्रारंभ हुआ और धीरे-धीरे ही आगे बढ़ पा रहा है। सरकारी तंत्र उससे घबराता रहा है। संविधान में जहां ‘चौदह वर्ष की आयु तक’ अनिवार्य तथा नि:शुल्क शिक्षा की व्यवस्था का उत्तरदायित्व सरकार को दिया गया था, उसे शिक्षा के अधिकार अधिनियम में ‘छह से चौदह वर्ष’ कर दिया गया। यह गुणवत्ता के सुधार के लिए सकारात्मक कदम तो कतई नहीं कहा जा सकता।

जब सारी दुनिया शिक्षा के सार्वजनीकरण को चौदह से बढ़ा कर अठारह वर्ष तक ले जा रही है, भारत में हम प्रारंभिक कक्षाओं में केवल नामांकन के प्रतिशत को बढ़ा हुआ देख आत्ममुग्ध हो रहे हैं। यह अपने में शैक्षिक प्रगति की एक विडंबना ही मानी जानी चाहिए। सरकारी व्यवस्था में शिक्षक प्रशिक्षण संस्थानों को सब प्रकार के संसाधन उपलब्ध कराना तुरंत प्रारंभ होना चाहिए। थोड़े-से मानदेय पर अध्यापकों की नियुक्ति बंद होनी चाहिए, भले इसके लिए कितने ही अधिक संसाधन क्यों न जुटाने पड़ें। भावी पीढ़ी की तैयारी में कोताही कर समावेशी प्रगति का लक्ष्य कभी भी प्राप्त नहीं किया जा सकता।

 

 

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