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रेलयात्रा कैसे होगी मंगलमय

साफ-सफाई में कमियों से इतर जो बात रेलयात्रियों को सबसे ज्यादा परेशान करती है, वह यह है कि महंगी कीमत चुकाने के बाद भी कायदे का भोजन नहीं मिलता है।

रेल के पास से गुजरता शख्स। (प्रतीकात्मक तस्वीर)

इधर कुछ वर्षों से रेलवे की खानपान सेवा पर लगातार उंगलियां उठती रही हैं, लेकिन इसे सुधारने की शायद कोई खास कोशिश अब तक नहीं हुई। बीते सप्ताह संसद में पेश की गई कैग की रिपोर्ट के मुताबिक ट्रेनों और रेलवे स्टेशनों पर यात्रियों को परोसी जा रही चीजें खाने लायक नहीं हैं। एक तरफ ट्रेनों के भीतर और स्टेशनों पर परोसी जा रही चीजें प्रदूषित हैं तो वहीं दूसरी तरफ डिब्बाबंद और बोतलबंद वस्तुएं इस्तेमाल की समय-सीमा (एक्सपायरी डेट) के बाद भी बेची जा रही हैं। पेय पदार्थों में गंदे पानी का प्रयोग हो रहा है और खाने-पीने की चीजों को धूल-मक्खी से बचाने के लिए ढकने तक की व्यवस्था नहीं है। ट्रेनों में चूहों और तिलचट्टों की मौजूदगी पाया जाना साफ इशारा है कि गंदगी का असर खाने-पीने की चीजों तक पहुंच रहा होगा। कूड़ेदानों को न तो ढक कर रखा जाता है और न ही इनकी नियमित सफाई होती है।

साफ-सफाई में कमियों से इतर जो बात रेलयात्रियों को सबसे ज्यादा परेशान करती है, वह यह है कि महंगी कीमत चुकाने के बाद भी कायदे का भोजन नहीं मिलता है। रेलवे लंबी दूरी की कई ट्रेनों में पैंट्री कार उपलब्ध कराने में नाकाम रहा है, लेकिन जिन ट्रेनों में पैंट्री कारें हैं, उनमें बेची जा रही चीजों के रेट कार्ड नदारद होते हैं। साथ ही, यात्रियों से उन चीजों की ऊंची कीमत वसूली जाती है। कैग ने जांच के दौरान खाने की वस्तुओं का वजन भी तयशुदा मात्रा से कम पाया गया। बीते कुछ वर्षों में ट्रेनों में खराब भोजन परोसे जाने के इतने वाकये हुए हैं कि उनकी गिनती करना शायद रेलवे ने ही छोड़ दिया है। पर यात्रियों के हंगामे के कारण कई घटनाएं मीडिया में दर्ज की जा चुकी हैं। जैसे, तीन साल पहले (फरवरी, 2014 को) अमृतसर से दिल्ली आ रही प्रीमियम श्रेणी की ट्रेन स्वर्ण शताब्दी में नाश्ते और भोजन के नाम पर घटिया चाय-समोसे और पानी जैसी पतली दाल परोसी गई, तो करीब बीस यात्रियों ने इसकी लिखित शिकायत की थी। शिकायत-पुस्तिका में अपनी नाराजगी दर्ज कराने से पहले जब यात्रियों ने ट्रेन में मौजूद कैटरिंग स्टाफ से खाने की खराब गुणवत्ता की बात कही थी, तो संबंधित कर्मचारी अपनी गलती छिपाने के मकसद से अभद्रता पर उतर आए थे। अप्रैल, 2013 से लेकर सितंबर, 2014 तक कई ट्रेनों में मुसाफिरों ने पैंट्री कार की मार्फत परोसे गए भोजन को खाते ही बीमार पड़ जाने की कई शिकायतें दर्ज कराई थीं। उसी दौरान लखनऊ-दिल्ली शताब्दी ट्रेन में खराब भोजन दिए जाने के बाद दिल्ली स्टेशन पर यात्रियों ने काफी हंगामा भी किया था। ऐसा ही वाकया लखनऊ-नई दिल्ली स्वर्ण शताब्दी में हुआ, जब भोजन में खराब पनीर व घटिया दाल के कारण यात्रियों की तबीयत बिगड़ गई। अप्रैल, 2013 में भोपाल शताब्दी में घटिया खाना खाकर कई यात्री बीमार पड़ गए थे। मई, 2013 में नई दिल्ली से सियालदह जा रही राजधानी एक्सप्रेस में घटिया खाना खाकर दो दर्जन यात्री बीमार हो गए थे। इसके अलावा रांची राजधानी के तीस यात्रियों के बीमार होने पर काफी हंगामा मचा था। बाद में रेलवे बोर्ड ने ठेकेदार पर जुर्माना लगा कर मामला शांत कराया।

देखा गया है कि ज्यादा समस्याएं लंबी दूरी की उन ट्रेनों में हैं जिनके रास्ते में न्यूनतम ठहराव (स्टॉपेज) होते हैं और यात्रियों के सामने पैंट्री कार से मिलने वाले भोजन का ही विकल्प होता है। ऐसी ज्यादातर ट्रेनों में प्राय: हर हफ्ते यात्री यह शिकायत करते पाए जाते हैं कि उन्हें परोसा गया भोजन बेहद खराब किस्म का था। घटिया भोजन की कई शिकायतें खुद जनप्रतिनिधियों ने रेल मंत्रालय से की हैं। सितंबर, 2012 में रांची से हावड़ा जा रही शताब्दी एक्सप्रेस में यात्रियों ने खराब खाना मिलने पर विरोध जताया। उससे भी पहले मई में रांची जा रही राजधानी में खराब खाना खाने से बारह यात्री फूड पॉयजनिंग के शिकार हो गए, जिनमें एक सांसद भी थे। इसके बाद रेलमंत्री ने राज्यसभा में यह माना था कि रेलवे के खानपान को लेकर काफी शिकायतें आ रही हैं।यह हाल प्रीमियम श्रेणी की राजधानी और शताब्दी जैसी ट्रेनों के खानपान का है, फिर साधारण श्रेणी की मेल-एक्सप्रेस ट्रेनों में कैसा भोजन दिया जाता है इसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। पहले रेलवे की खानपान सेवा इतनी खराब नहीं थी। कीमत भी अधिक नहीं थी। मुसाफिर रेलवे के भोजन को जायकेदार न सही, ऐसा मानने लगे थे कि जरूरत पड़ने पर वह खाया जा सकता था और उसके लिए घर से भोजन बांध कर ले चलने की झंझट से बचा जा सकता था। रेलवे ने खानपान सेवा को निजी हाथों में सौंपते समय यह दलील थी कि इससे भोजन की गुणवत्ता भी सुधरेगी और कमजोर वर्ग को काम भी मिल सकेगा। अपनी कैटरिंग सेवा के जरिये कुछ लोगों को स्व-रोजगार उपलब्ध कराने का रेलवे का प्रस्ताव आकर्षक था, लेकिन धीरे-धीरे इस व्यवस्था में मुनाफाखोरों ने घुसपैठ कर ली, जिन्हें भोजन की गुणवत्ता से कोई मतलब नहीं रहा। आज हाल यह है कि ठेकेदार रेल अधिकारियों को येन-केन-प्रकारेण (घूस देकर?) संतुष्ट कर लेते हैं। न तो रेल अधिकारी रास्ते में इसकी जांच करने आते हैं कि परोसा गया भोजन खाने योग्य है भी या नहीं, न उन्होंने यात्रियों की शिकायतें सुनने की कोई व्यवस्था कर रखी है।

समस्या की एक अहम वजह यह भी है कि वर्ष 2005 के बाद से भारतीय रेलवे ने तीन मौकों पर अपनी खानपान नीति में तब्दीली की है। वर्ष 2005 में कई कैटरिंग सेवाएं पहले तो आइआरसीटीसी के हवाले की गई थीं। इसके बाद उससे यह काम छीन कर जोनल रेलवे कार्यालयों को इसका जिम्मा दिया गया। लेकिन जब शिकायतों में कोई कमी नहीं आई, तो एक बार फिर आइआरसीटीसी को कैटरिंग सेवा सौंप दी गई। प्रबंधन स्तर पर बार-बार किए गए इन बदलावों के कारण अनिश्चितता की स्थिति बनी और इसका खमियाजा यात्रियों को भुगतना पड़ा।यों तो इस बीच ट्रेनों में भोजन के कई आधुनिक स्वरूप भी इधर नजर आने लगे हैं, जैसे पहले से भोजन का आॅर्डर देने पर मुख्य स्टेशनों पर निजी खानपान सेवा की तरफ से ताजा और गर्म भोजन उपलब्ध कराया जाता है। बड़े स्टेशनों पर आधुनिक किस्म के रेस्तरां भी खुल गए हैं जो अच्छा भोजन मुहैया कराने की गारंटी लेते हैं। लेकिन इन सभी विकल्पों के मुकाबले ज्यादातर यात्री रेलवे की पैंट्री सेवा द्वारा उपलब्ध कराए जाने वाले भोजन पर निर्भर रहते हैं। इसीलिए खराब भोजन मिलने पर रेल यात्रियों ने दो चीजों की मांग रेल अधिकारियों से की। एक तो उन्हें प्रीमियम श्रेणी की ट्रेन का टिकट बुक कराते समय ही यह विकल्प दिया जाए कि वे रेलवे का भोजन लेना चाहते हैं या नहीं। यदि नहीं, तो उसकी कीमत टिकट में न जोड़ी जाए। और दूसरे, रेलवे के खानपान की शिकायत दर्ज कराने की माकूल व्यवस्था की जाए। ट्रेनों में भोजन की सप्लाई करने वाले ठेकेदारों और एजेंसियों की दलील है कि बढ़ती महंगाई के कारण एक निश्चित राशि में बढ़िया खाना देना उनके लिए संभव नहीं है। पर जब प्रीमियम ट्रेनों के खानपान की दरें 50 से 65 फीसद तक बढ़ा दी गर्इं, तब भी भोजन की गुणवत्ता में कोई सुधार क्यों नहीं हुआ? अगर रेलवे की खानपान सेवा का यही हाल रहा, तो रेल यात्रा मंगलमय और आनंदमय कैसे हो सकती है, जिसका आश्वासन हर वक्त रेलवे की जुबान पर रहता है।

 

 

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