कानून-व्यवस्था की शर्तें

पुलिस सुधार का प्रकरण हो या फिर पुलिसकर्मियों के खाली पदों को भरने का, सुप्रीम कोर्ट कई बार केंद्र और राज्य सरकारों को फटकार लगा चुका है।

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मथुरा पुलिस ने वर्दी पर भगवान कृष्ण का लाेगो लगाने की खबर का खंडन किया है। (फाइल फोटो)

अमरनाथ सिंह

पुलिस सुधार का प्रकरण हो या फिर पुलिसकर्मियों के खाली पदों को भरने का, सुप्रीम कोर्ट कई बार केंद्र और राज्य सरकारों को फटकार लगा चुका है। लेकिन न केंद्र सरकार और न ही राज्य सरकारें ने उसे गंभीरता से लिया। सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर पुलिसकर्मियों के रिक्त पदों को लेकर सवाल खड़े किए हैं और नाराजगी जताते हुए कहा है कि राज्य सरकारें बताएं कि आखिर क्यों पुलिस महकमे में लाखों की संख्या में पद रिक्त पड़े हुए हैं। सर्वोच्च अदालत ने जिन राज्यों में काफी तादाद में पुलिस के पद रिक्त रहने से गृह सचिवों को तलब किया है उनमें उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, झारखंड, तमिलनाडु और कर्नाटक शामिल हैं। इन छह राज्यों में छह लाख से ज्यादा पुलिसकर्मियों के पद काफी समय से खाली हैं। इनमें सबसे ज्यादा उत्तर प्रदेश में 1,81, 958 पद रिक्त हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इस बार काफी नाराजगी जताई और कहा कि साल 2013 से रिक्तियों का मामला सुना जा रहा है। अदालत खाली पदों को भरने की बात कहती आ रही है लेकिन कुछ राज्य तो इस ओर बिल्कुल ही ध्यान नहीं दे रहे हैं। कई राज्यों ने अदालत के सामने रिक्तियों को भरने के लिए विज्ञापन निकालने की बात कह कर अपना पल्ला झाड़ने की कोशिश की है, लेकिन अदालत इससे कतई संतुष्ट नहीं है।

असल में पुलिस बल की कमी की वजह से ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मियों पर काम का बोझ बहुत है और राज्यों में कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ रही है। काफी सारे पद खाली रहने का मौजूदा पुलिस बल की सेहत और मनोदशा पर भी बुरा असर पड़ता है। कर्मी कम रहने से, छुट्टी बड़ी मुश्किल से मिल पाती है। कई बार निर्धारित समय से ज्यादा काम करना पड़ता है। इस सबसे ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मी कुंठित होते रहते हैं। चूंकि अनुशासन के चलते वे मुंह नहीं खोलते, इसलिए अमूमन जाहिर नहीं होता कि उन पर क्या बीत रही है। जब छुट्टी की अर्जी मंजूर न होने के कारण उपजी हताशा में कोई जवान खुदकुशी करने या अपने अफसर पर हमला करने जैसा अतिवादी कदम उठा लेता है, तब अचानक लोग हैरान रह जाते हैं।कानून-व्यवस्था की बुनियादी बाधा जाहिर है। एक तरफ, विभिन्न राज्यों में कुल मिलाकर पुलिस के लाखों पद खाली पड़े हैं, और दूसरी तरफ, उपलब्ध पुलिस बल के पास अत्याधुनिक संसाधनों की भी कमी है। कानून-व्यवस्था को लेकर पूरे देश में सवाल उठते रहते हैं, लेकिन पुलिस महकमे में जवानों की कमी आखिर चिंता का विषय क्यों नहीं बनती? ब्यूरो आॅफ पुलिस रिसर्च ऐंड डेवलपमेंट के आंकड़ों पर गौर करें, तो मालूम पड़ता है कि मानव संसाधन और वाहन जैसी बुनियादी सुविधाओं का भी पूरे देश में भारी अभाव है। कई थानों और चौकियों में तो न्यूनतम बुनियादी सुविधाएं भी राज्य सरकारें उपलब्ध नहीं करा पा रही हैं। मध्यप्रदेश की गिनती नक्सली हिंसा से सबसे ज्यादा पीड़ित राज्यों में होती है। लेकिन वहां के सौ से ज्यादा थानों में टेलीफोन तक की सुविधा नहीं है।

पूर्वाेत्तर के अधिकतर राज्यों में काफी दयनीय स्थिति में पुलिसकर्मी काम कर रहे हैं। उदाहरण के तौर पर मणिपुर को देखा जा सकता है। पूर्वाेत्तर में सबसे अधिक मणिपुर में ही विद्रोही संगठन सक्रिय हैं। यहां पर पैंतालीस से अधिक ऐसे थाने हैं जहां न फोन हैं और न वायरलेस सेट। लचर व्यवस्था के बीच ही वहां की पुलिस को छोटे-बड़े चालीस से ज्यादा उग्रवादी संगठनों से जूझना पड़ता है। ऐसे में किस तरह कानून-व्यवस्था पटरी पर आ पाएगी, इसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। पूरे देश की बात की जाए तो दूरदराज ग्रामीण क्षेत्रों में करीब बीस थाने ऐसे हैं जिनके पास एक भी वाहन नहीं है। विशेष परिस्थितियों में किराये के वाहन लेकर अपराधियों को पकड़ने के लिए अभियान चलाया जाता है। ऐसे अभावग्रस्त थाने सबसे ज्यादा छत्तीसगढ़ में हैं। स्वीकृत पदों की रिक्तियां केवल साधारण पुलिसकर्मियों के पदों तक सीमित नहीं हैं। आइपीएस अधिकारियों के भी बहुत-से पद खाली हैं। केंद्रीय गृह मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि देश में डेढ़ हजार आइपीएस अधिकारियों की कमी है।

पुलिस की कार्य प्रणाली को प्रभावी और निष्पक्ष बनाने के लिए तथा पुलिस सुधार और आदर्श पुलिस अधिनियम 2016 को लागू करने के लिए विधि आयोग से भी दिशा-निर्देश जारी करने की मांग काफी समय से की जा रही है। पूर्व में गठित आयोगों ने भी पुलिस के राजनीतिक इस्तेमाल पर चिंता जताई है और इसे रोकने की सिफारिशें की हैं। लेकिन जहां स्वीकृत पदों को भरने जैसी न्यूनतम अपेक्षा को लेकर भी सरकारें गंभीर नहीं हैं, वहां पुलिस सुधार की उनसे कितनी उम्मीद की जाए, जिसके लिए प्रबल राजनीतिक इच्छाशक्ति की दरकार है?
पुलिस सुधार और पुलिस बल में नियुक्तियां अदालत नहीं कर सकती, वह तो बस सरकारों को उनके दायित्व की याद दिला सकती है, तलब कर सकती है। अदालत के निर्देश को क्रियान्वित तो केंद्र और राज्य सरकारों को ही करना है। पुलिस बल को विशेष रूप से सक्रिय बनाने के लिए यह जरूरी है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा पुलिस सुधार के लिए वर्ष 2006 में दिए गए निर्देश को सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में यशाशीघ्र लागू किया जाए। राज्य सुरक्षा आयोग की स्थापना, पुलिस प्रतिष्ठान बोर्ड का गठन, पुलिस शिकायत प्राधिकरण का गठन, पुलिस प्रमुख का सही चयन और वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों का न्यूनतम दो वर्ष तक तबादला न होना, जांच और कानून व्यवस्था के लिए अलग-अलग स्टाफ की व्यवस्था, पुलिस एक्ट 1861 को पूरी तरह से खत्म करना आदि सिफारिशों पर अमल करने के निर्देश सर्वोच्च न्यायालय ने दिए थे, जो सिफारिशें असल में सोराबजी समिति की रिपोर्ट की देन थीं। सर्वोच्च अदालत की हिदायत को दस साल से ऊपर हो गए, पर वह आज भी अमल की बाट जोह रही है! इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि हमारी सरकारों में पुलिस सुधार के लिए इच्छाशक्ति कितनी है।

अगर सरकारें पुलिस सुधार के मामले में उदासीन बनी रही हैं, तो इसका कारण समझना मुश्किल नहीं है। असल में जो भी पार्टी सत्ता में होती है, वह पुलिस पर अपना नियंत्रण खोना या कम करना नहीं चाहती। इसके विपरीत, सत्ता में बैठे लोग अक्सर पुलिस का राजनीतिक इस्तेमाल करने से बाज नहीं आते। यही वजह है कि पुलिस का राजनीतिक उपयोग, बल्कि ज्यादा सही यह कहना होगा कि पुलिस का दुरुपयोग बढ़ता गया है। तबादलों और पदोन्नति में सबसे ज्यादा पक्षपात की शिकायतें भी पुलिस महकमे से ही ताल्लुक रखती हैं।
आजादी के बाद पुलिस सुधार को लेकर कई आयोग गठित हुए। उन सबने अपनी रिपोर्टों में राजनीतिक स्वार्थों के लिए पुलिस के इस्तेमाल के प्रति आगाह किया। पर वे रिपोर्टें धूल खाती रही हैं। वे सिफारिशें ठंडे बस्ते में डाल दी गर्इं। बीते पंद्रह सालों में पुलिस का राजनीतिकरण तेजी से बढ़ा है। ऐसी स्थिति में सोराबजी समिति की रिपोर्ट की अहमियत समझी जा सकती है। मगर इस रिपोर्ट का महत्त्व राजनीतिक दलों को समझ में नहीं आया, या उन्होंने जान-बूझ कर समझना ही नहीं चाहा। कारण वही कि पुलिस पर राज्य सरकार के नियंत्रण के बल पर ही अपने समर्थकों को बचाना और विरोधियों को डराना-धमकाना संभव हो पाता है। पर इससे कानून के शासन के सिद्धांत को चोट पहुंचती है।
यदि वाकई पुलिस सुधार पर सरकारें जोर दें तो पुलिस की कार्य प्रणाली स्वच्छ और प्रभावी होगी, अधिकारियों की नियुक्ति में पारदर्शिता होगी, मानवाधिकारों का संरक्षण होगा और पूरे देश में कानून का शासन सुनिश्चित होगा।

 

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