ताज़ा खबर
 

स्वच्छ जल के लिए आंदोलन

नागरिकों को दूषित पेयजल पिलाने के मामले में विश्व के 122 देशों के समूह में भारत, बेल्जियम और मोरक्को के बाद तीसरे स्थान पर है।

Author October 26, 2017 3:22 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

रिजवान निजामुद्दीन अंसारी 

यों तो जल प्रकृति का बहुमूल्य वरदान है लेकिन वर्तमान युग में कुछ कारणों से यह क्रमिक रूप से अभिशाप में बदलता जा रहा है। केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय के हालिया आंकड़े और प्रदूषित जल के कारण निरंतर हो रही मौतें कुछ और कहानी बयान कर रही हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि जल प्रदूषण और जलजनित रोगों की समस्या नई नहीं है लेकिन पिछले कुछ दशकों में जिस तीव्रता से एक घनी आबादी जलजनित रोगों से प्रभावित हो रही है, वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चिंता का विषय है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार शहर में सिर्फ 75 फीसद और ग्रामीण क्षेत्र में 40 फीसद लोगों को स्वच्छ पेयजल उपलब्ध है। प्रश्न है कि शेष 25 फीसद शहरी और 60 फीसद ग्रामीण क्षेत्रों में दूषित जल के उपयोग के लिए जवाबदेह कौन है? भारतीय संविधान में नागरिकों को स्वच्छ और शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने का प्रावधान है लेकिन असलियत कुछ और ही है।

जल संसाधन मंत्रालय के ताजा आंकड़े बताते हैं कि बीस राज्यों के 276 जिले फ्लोराइड से, इक्कीस राज्यों के 387 जिले नाइट्रेट से, दस राज्यों के 86 जिले आर्सेनिक से, चौबीस राज्यों के 297 जिले लौह से जबकि पंद्रह राज्यों के 113 जिले भारी धातुओं (सीसा, कैडमियम, क्रोमियम) से खासे प्रभावित हैं। इन आंकड़ों का गहन अध्ययन करने पर हैरान करने वाले तथ्य सामने आते हैं। इसके अनुसार राजस्थान, तमिलनाडु और मध्यप्रदेश जैसे बड़े राज्यों समेत तेरह राज्यों के आधे से ज्यादा जिले फ्लोराइड से प्रभावित हैं। इसी प्रकार सोलह राज्यों के आधे से ज्यादा जिले नाइट्रेट से, जबकि ग्यारह राज्यों के आधे से अधिक जिले लौह की समस्या से ग्रसित हैं। इतना ही नहीं, मध्यप्रदेश, राजस्थान, तमिलनाडु, पंजाब, ओडिशा और आंध्रप्रदेश जैसे छह राज्यों के सभी जिले नाइट्रेट की चपेट में हैं। अगर विषैले तत्त्व आर्सेनिक की बात करें तो यह धीरे-धीरे अपना दायरा बढ़ा रहा है। लिहाजा, सात की बजाय अब दस राज्यों को अपना शिकार बना चुका है। इन राज्यों में उत्तर प्रदेश, बिहार, असम और पश्चिम बंगाल सर्वाधिक प्रभावित हैं।

जल में उपरोक्त तत्त्वों का होना समस्या की बात नहीं है बल्कि इनकी तय सीमा से ज्यादा मौजूदगी परेशानी का सबब है। भारतीय मानक ब्यूरो ने सभी तत्त्वों की प्रति लीटर पानी में मौजूदगी के एक स्तर का निर्धारण किया है जो लोगों के स्वास्थ्य के लिए सुरक्षित माना गया है। जल प्रदूषण के लिए मानवीय और सांस्कृतिक स्रोतों के साथ प्राकृतिक स्रोत भी जिम्मेदार हैं, लेकिन पिछले कुछ दशकों से मानव ने जिस असंतुलन के साथ प्राकृतिक संसाधनों का दोहन किया है, उसने प्राकृतिक कारक को बौना साबित कर दिया है । 2011 की जनगणना के अनुसार राष्ट्रीय स्वच्छता कवरेज 46.9 फीसद है, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में यह औसत केवल 30.7 फीसद है। अब भी देश की लगभग बासठ करोड़ आबादी यानी राष्ट्रीय औसत का 53.1 प्रतिशत लोग खुले में शौच करते हैं।  कहना गलत नहीं होगा कि भूमिगत जल का अधिकांश प्रदूषण कृषिजन्य है। हरित क्रांति के कारण साठ के दशक से ही उर्वरक, कीटनाशी और शाकनाशी का प्रयोग तीव्र गति से हुआ। लिहाजा नाइट्रेट, पोटाश और फॉस्फोरस जैसे रसायन छन कर भूमिगत जल में मिलते चले गए। औद्योगीकरण के कारण सत्तर प्रतिशत नदियां प्रदूषित हैं। मसलन, कानपुर में 151 चमड़े के कारखानों से प्रतिदिन 58 लाख लीटर दूषित जल गंगा में बहा दिया जाता है। नगरीकरण जैसे कारणों पर गौर करें तो एक नगरवासी प्रतिदिन औसतन सौ लीटर इस्तेमाल किया हुआ पानी नदियों, झीलों में बहा देता है।

अगर जल प्रदूषण के प्रभावों पर गौर करें तो वर्तमान स्थिति चिंताजनक है। नागरिकों को दूषित पेयजल पिलाने के मामले में विश्व के 122 देशों के समूह में भारत, बेल्जियम और मोरक्को के बाद तीसरे स्थान पर है। यानी पड़ोसी देश नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका आदि ही नहीं, बल्कि चिर प्रतिद्वंद्वी पाकिस्तान भी हमसे बेहतर स्थिति में है। जल में विषैले प्रदूषकों के मिले होने से कैंसर, लीवर की समस्या, डायरिया, हैजा, पीलिया, क्षय आदि रोगों से दो चार होना पड़ता है, जो कई अवसरों पर मौत का कारण बनते हैं। एक अध्ययन के मुताबिक औसतन तीन करोड़ सतहत्तर लाख व्यक्ति हर साल जलजनित बीमारियों से प्रभावित होते हैं। पांच साल से कम आयु के बच्चों की 3.1 फीसद मौतों और 3.7 फीसद विकलांगता का कारण प्रदूषित पानी ही है। इनमें से पंद्रह लाख बच्चे केवल डायरिया के कारण अपनी जान गवांते हैं। अगर संसदीय समिति की रिपोर्ट की मानें तो केवल आर्सेनिक के कारण अब तक लाख से ज्यादा मौतें हो चुकी हैं।
सवाल यह है कि लोगों को उनके संवैधानिक अधिकार से वंचित रखने के लिए जिम्मेदार कौन है? बच्चे, जो देश का भविष्य हैं, का विभिन्न रोगों से ग्रसित होना उनके स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ नहीं तो और क्या है? एक अनुमान के अनुसार अगर स्वच्छ पेयजल और बेहतर सफाई व्यवस्था मुहैया कराई जाए तो प्रत्येक बीस सेकंड में एक बच्चे की जान बचाई जा सकती है। लेकिन दृढ़ इच्छाशक्ति की कमी के कारण हमारी सरकारें इन मौतों को रोकने में विफल हैं।

इतना ही नहीं, आमतौर पर सरकारें और जनप्रतिनिधि स्वच्छता और पेयजल उपलब्ध कराने के संबंध में कई बार गलत आंकड़े भी पेश कर देते हैं, जैसा कि हाल में शौचालय बनाने के मामले में देखा गया। इससे सबसे बड़ी समस्या यह होती है कि स्थिति सुधरने के बजाय और बिगड़ जाती है। यह सरकार की प्रतिबद्धता में कमी को दर्शाता है कि एक तरफ तो वह जल प्रदूषण में सुधार के लिए विभिन्न कदम उठाने का दावा कर रही है और दूसरी हालत बदतर होती जा रही है। तिहत्तरवें संविधान संशोधन में स्वच्छ पेय जलापूर्ति का प्रावधान, अलग से पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय का निर्माण, राष्ट्रीय जल नीति का निर्माण जैसी पहलें तो सरकार द्वारा की गई हैं लेकिन धरातल पर कोई उत्साहजनक नतीजे देखने को नहीं मिलते।

विडंबना है कि नदियों को पूजने वाला देश होने के बावजूद भारत जल प्रदूषण की ऐसी भयावह स्थिति से गुजर रहा है। आजादी के उनहत्तर वर्ष बाद भी हम अपने संवैधानिक अधिकार से महरूम हैं। हमें शिक्षा पर जोर देने की आवश्यकता है, क्योंकि शिक्षा के प्रकाश में लोग अपनी मांगों को जोरदार ढंग से उठा पाते हैं और पिछले कुछ दशकों से हम वोट तो डालते रहे हैं लेकिन अपनी जायज मांगों को सरकार के समक्ष पुरजोर तरीके रख नहीं पाए हैं। लिहाजा, नतीजे सामने हैं। इसलिए राजनीतिक दलों को जल को प्रमुखता से अपने चुनाव घोषणा पत्र में जगह दिए जाने की जरूरत है, क्योंकि जल की यह दुर्दशा का कारण भी राजनीतिक ज्यादा है। एक बात और, समुदाय अगर ठान लें कि उन्हें सुरक्षित पेयजल हर कीमत पर चाहिए तो सूरत-ए-हाल केन्या जैसा बन सकता है। केन्या में नागरिक संगठनों ने हुकूमत पर ऐसा दबाव बनाया कि स्वच्छ पेयजल हर नागरिक का मूलभूत अधिकार बन गया। इसके अलावा, एक बात समझ लेनी चाहिए कि नदियों को साफ करना और साफ रखना सिर्फ सरकारों का दायित्व नहीं है। इस काम में समाज की सक्रिय और समर्पित भागीदारी भी जरूरी है। भविष्य को बचाना है तो अभी से तैयार होना पड़ेगा और जल-प्रबंधन के कार्य को आंदोलन बनाना होगा।

 

 

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

X