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विकास के पैमाने और हकीकत

इन सबके बावजूद मूडीज ने भारत को ऋण और सकल घरेलू उत्पाद के ऊंचे अनुपात पर चेताया है। उसने यह भी कहा कि भूमि और श्रम सुधारों का एजेंडा अभी पूरा नहीं हुआ है।
Author November 23, 2017 05:03 am
ग्लोबल रेटिंग एजेंसी मूडीज (रॉयटर्स फाइल फोटो)

राहुल लाल

हाल ही में अंतरराष्ट्रीय क्रेडिट रेंटिंग एजेंसी ‘मूडीज’ ने एक तरह से भारतीय अर्थव्यवस्था के पक्ष में अपनी राय दी। इसे कसौटी माना जाए तो अब शायद रेटिंग एजेंसियों को नोटबंदी और जीएसटी पसंद आ रहे हैं। इन दोनों कदमों और बैंकों में फंसे कर्ज का बोझ कम करने की सरकारी कवायद के कारण मूडीज ने भारत की रेटिंग बढ़ाई। उसने भारत की रेटिंग में तेरह वर्षों के बाद सुधार किया है और उसे बीएए-3 से बेहतर करके बीएए-2 कर दिया है। रेटिंग में सुधार के साथ भारत को उन देशों की सूची में रखा गया है जहां निवेशकों के हित सुरक्षित होंगे। लेकिन इन सबके बावजूद मूडीज ने भारत को ऋण और सकल घरेलू उत्पाद के ऊंचे अनुपात पर चेताया है। उसने यह भी कहा कि भूमि और श्रम सुधारों का एजेंडा अभी पूरा नहीं हुआ है। इन सुधारों के लिए केंद्र को राज्यों के सहयोग की जरूरत है। मूडीज की यह रिपोर्ट सकारात्मक कही जा सकती है। हालांकि पिछले तीन वर्षों में मूडीज ने भी कई बार मोदी सरकारी की नीतियों की आलोचना की है। 2015 में तो इसने कथित कट्टरपंथी ताकतों को लेकर केंद्र को चेतावनी तक दे दी थी। सवाल है कि आखिर पुरानी और नई रेटिंग के मायने क्या हैं! मूडीज ने भारत की रेटिंग बीएए-3 से बीएए-2 किया है। बीएए-3 के अंतर्गत निवेश की संभावनाएं कमजोर मानी जाती हैं, लेकिन आर्थिक विकास की उम्मीदें सकारात्मक रहती हैं। वहीं बीएए-2 में निवेश की संभावनाएं अधिक होने के साथ अर्थव्यवस्था को स्थिर माना जाता है। भारत मात्र एक पायदान रेटिंग सुधरने से फिलिपींस और इटली जैसे ज्यादा निवेश वाले देशों में शुमार हो गया है।

नई रेटिंग का परिदृश्य स्थिर है। इसका मतलब है कि भारत की रेटिंग को सुधारने और बिगाड़ने वाले कारक अभी लगातार बराबर हैं। इससे पहले रेटिंग परिदृश्य सकारात्मक था, लेकिन रेटिंग कम थी। इसका अर्थ था कि रेटिंग में सुधार के बजाय गिरावट की आशंका अधिक थी। इससे छह माह पहले ही मूडीज ने चीन की ‘सॉवरिन रेटिंग’ एक पायदान घटाई थी। तब भी चीन को मिली रेटिंग भारत से दो पायदान ज्यादा थी। मूडीज द्वारा भारत की रेटिंग में सुधार किए जाने से भारतीय शेयर बाजार में एफपीआई यानी विदेशी पोर्टफोलियो निवेश का निवेश प्रवाह बढ़ने की उम्मीद है। हो सकता है कि इसमें मामूली वृद्धि दिखे, लेकिन भारतीय बॉन्ड की मांग में तेजी जरूर आएगी। ऋण बाजार में आगे चल कर प्रतिफल में नरमी से मौजूदा एफपीआई निवेशकों को फायदा होगा। विदेशी पॉर्टफोलियो निवेशकों ने भारतीय ऋण बाजार में इस साल बाईस अरब से अधिक का निवेश किया है, जबकि इक्विटी बाजार में एफपीआई का कुल निवेश करीब आठ अरब डॉलर रहा है। एफपीआई निवेश प्रवाह में ताइवान, मैक्सिको, दक्षिण कोरिया और चीन जैसे देशों की हिस्सेदारी भारत के मुकाबले कहीं अधिक है।

भारतीय कंपनियां मूडीज के रेटिंग बढ़ाने के बाद जश्न मना रही हैं, क्योंकि इस वजह से विदेशों में रकम जुटाने की उनकी लागत औसत 100 आधार अंक तक घट जाएगी। कैलेंडर वर्ष 2017 में मूडीज की तरफ से रेटिंग को ऐसे समय उन्नत बनाया गया है, जब भारतीय कंपनियों की निवेश बाजार की उधारी 40 फीसद तक कम हो गई है। नतीजतन, कई कंपनियां अपने उच्च कर्ज और काफी कम क्षमता प्रबंधन के लिए संघर्ष कर रही हैं। 2014 से भारत विदेशी मुद्रा वाले कर्ज की मात्रा और संख्या दोनों लिहाज से गिरावट देख रहा है। 2017 में सौदे की संख्या घट कर 41 रही और इसमें 37 फीसद गिरावट आई, जबकि 2016 में पैंसठ सौदे हुए। लेकिन 2018 में इसमें रेटिंग वृद्धि के कारण बदलाव हो सकता है। मूडीज के कदम के बाद उम्मीद है कि देश में निवेशकों के एक नए वर्ग का आगमन होगा जो अभी तक किसी खास सीमा से कम रेटिंग वाले देशों में निवेश न करने के उनकी अनिवार्यता तक सीमित था। इससे रुपया स्वाभाविक तौर पर मजबूत होगा, लेकिन यह केंद्रीय बैंक के लिए वांछनीय नहीं होगा।

देश की प्रतिस्पर्धी क्षमता बनाए रखने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक अभी शायद देखना चाहेगा कि निर्यात प्रतिस्पर्धियों के मुकाबले रुपया थोड़ा कमजोर रहे और इसका मतलब होगा केंद्रीय बैंक की तरफ से मुद्रा बाजार में सक्रिय हस्तक्षेप। मूडीज के नए आंकड़े से सरकार खुश है, लेकिन सच यह है कि इससे भारत का व्यापार घाटा बढ़ सकता है। रेटिंग बढ़ाने से अंतरराष्ट्रीय निवेशकों का भारत के प्रति भरोसा बढ़ सकता है और इस तरह से देश में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में वृद्धि हो सकती है। इस कदम से रुपया मजबूत होगा, लेकिन नोटबंदी और जीएसटी के चलते पहले से ही परेशानी का सामना कर रहे निर्यात क्षेत्र को अब और मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है। कम कीमत वाली मुद्रा सामान्य तौर पर किसी देश के निर्यात क्षेत्र को लाभ पहुंचाता है। 2016-17 में भारत का व्यापार घाटा 108.5 अरब डॉलर रहा, जो इससे पूर्व के 118.71 अरब डॉलर के मुकाबले थोड़ा कम है।

इस साल अब तक रुपए में 5.1 फीसद की बढ़ोतरी दर्ज हुई है। वैश्विक परिस्थितियों के चलते रुपए में निरंतर बढ़ोतरी के साथ-साथ यह अनुमान भी शामिल है अमेरिकी फेडरल रिजर्व अगली बैठक में ब्याज दरें बढ़ाएगा, लिहाजा पूंजी की निकासी हो सकती है। इस कैलेंडर वर्ष में कुल आयात की सबसे कम रफ्तार के बावजूद अक्तूबर में व्यापार घाटा बढ़ कर पैंतीस महीने के उच्चतम चौदह अरब डॉलर पर पहुंच गया है। जाहिर है, निर्यात में गिरावट को रोकने के लिए तत्काल उपचारात्मक कदम उठाए जाने की आवश्यकता है।आमतौर पर रेटिंग एजेंसियों के आकलन कई पूर्वाग्रहों से ग्रस्त हो जाते हैं या फिर कुछ रेटिंग उनके अधिकारियों के व्यक्तिगत विवेक पर निर्भर हो जाते हैं। कई बार ये पूर्वाग्रह देश के लिए नुकसानदायक साबित होते हैं। मसलन, भारत को हमेशा विनिर्माण अनुमतियों के लिए बहुत कमजोर रेटिंग प्रदान की जाती है। लेकिन यह भी तथ्य है कि एक बहुराष्ट्रीय कंपनी को अमेरिका के मेनहट्टन में विनिर्माण अनुमति लेने में भी पांच वर्ष से ज्यादा का समय लगा था। उभरते बाजारों को अक्सर कमजोर रेटिंग का सामना करना पड़ता है, क्योंकि धारणा ऐसी रहती है कि वहां भ्रष्टाचार अधिक होता होगा। लेकिन जर्मनी के रैंकिंग में उस समय सुधार हुआ, जबकि फॉक्स वैगन ने व्यापक, संगठित और पूरी कंपनी के स्तर पर धोखाधड़ी की बात स्वीकार की।

इस तरह भ्रष्टाचार के मुद्दे पर विकसित और विकासशील देशों के बीच रेटिंग एजेंसियों के भेदभाव को देखा जा सकता है। मूडीज इंडिया रेटिंग का इतिहास उसकी कहानी खुद कहता है। 1980 के दशक के आखिर में रेटिंग अपने उच्चतम स्तर पर थी। उस वक्त देश को ए-टू की उच्च-मध्य ग्रेड दी गई थी जो उच्च ग्रेड से ठीक नीचे थी। 1990 में विदेशी मुद्रा संकट उत्पन्न होने के बाद इसमें गिरावट आई और इससे पहले बीएए-1 और छह माह बाद बीएए-3 की रेटिंग दी गई। जून 1991 में मूडीज ने देश की निवेश रैकिंग को निवेश ग्रेड से नीचे बीए-2 का ग्रेड दिया। शायद ऐसा चुनाव के दौरान राजीव गांधी की हत्या से उपजी राजनीतिक अनिश्चितताओं और भुगतान संकट के चलते हुआ। इसके बाद तीन साल तक उसने देश की रैंकिंग में कोई सुधार नहीं किया, जबकि देश की अर्थव्यवस्था में तमाम मानकों पर सुधार देखने को मिल रहा था। यही कारण है कि भारत ब्रिक्स देशों के साथ मिल कर भेदभाव-रहित रेटिंग एजेंसी बनाने पर हमेशा जोर देता रहा है। कहने का मतलब यह है कि रेटिंग किसी चीज पर अंतिम निर्णय नहीं है, बल्कि कई बार तो गलत भी होती है और कई मौकों पर यह भ्रमित भी करती है। इस संदर्भ में 2008 के आर्थिक मंदी में कई उच्चतर रेटिंग को ध्वस्त होते दुनिया ने देखा था।

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