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कैसे बचेंगे ग्लेशियर

ग्लोबल वार्मिंग की वजह से एशियाई ग्लेशियरों के सिकुड़ने का खतरा बढ़ गया है और अगर इन्हें बचाने की कोशिश नहीं हुई तो सदी के अंत तक एक तिहाई एशियाई ग्लेशियर खत्म हो जाएंगे।
Author September 28, 2017 06:08 am
सियाचिन ग्लेशियर के 15 किमी पश्चिम में सलतोरो रिज शुरू होता है। सलतोरो रिज तक के इलाके पर भारतीय सेना का नियंत्रण है। सलतोरो रिज के पश्चिम में ग्योंग ग्लेशियर से पाकिस्तानी सेना का नियंत्रण शुरू होता है।

अभिजीत मोहन 

प्र्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय जर्नल ‘नेचर’ का यह खुलासा चिंतित करने वाला है कि ग्लोबल वार्मिंग की वजह से एशियाई ग्लेशियरों के सिकुड़ने का खतरा बढ़ गया है और अगर इन्हें बचाने की कोशिश नहीं हुई तो सदी के अंत तक एक तिहाई एशियाई ग्लेशियर खत्म हो जाएंगे। शोधकर्ताओं का कहना है कि अगर वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्शियस से कम नहीं किया गया तो पर्वतों से 36 प्रतिशत बर्फ भी कम हो जाएगी। और अगर तापमान वृद्धि इससे अधिक हुई तो कई गुना बर्फ पिघल जाएगी। वैज्ञानिकों का कहना है कि पृथ्वी का तापमान जिस तेजी से बढ़ रहा है अगर उस पर समय रहते काबू नहीं पाया गया तो अगली सदी में तापमान 60 डिग्री सेल्शियस तक पहुंच जाएगा। आज जब 48 डिग्री सेल्शियस की स्थिति में ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं तो फिर 60 डिग्री सेल्शियस में देखने को नहीं मिलेंगे।

बीते बरस कैंब्रिज विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने दावा किया था कि ग्लोबल वार्मिंग की वजह से आने वाले एक-दो वर्षों में आर्कटिक समुद्र की बर्फ पूरी तरह समाप्त हो जाएगी। अमेरिका के नेशनल स्नो एंड आइस डाटा सेंटर की सेटेलाइट से मिलीं तस्वीरें इसकी गवाह हैं। वैज्ञानिकों के मुताबिक आर्कटिक समुद्र के केवल 111 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में ही बर्फ बची है जो कि पिछले तीस साल के औसत 127 लाख वर्ग किलोमीटर से कम है। उनका दावा है कि तेजी से बर्फ पिघलने से समुद्र भी गर्म होने लगा है। यह स्वाभाविक भी है कि जब बर्फ की मोटी परत नहीं होगी तो पानी सूर्य की किरणों को ज्यादा मात्रा में सोखेगा। फिर ग्लोबल वार्मिंग को खतरनाक होने से कैसे रोका जा सकता है! पिछली जुलाई में ‘नेचर क्लाइमेट’ में प्रकाशित एक दूसरी रिपोर्ट के मुताबिक ग्लोबल वार्मिंग को दो डिग्री से कम रखने की सिर्फ पांच प्रतिशत संभावना है। पृथ्वी का वातावरण पूर्व औद्योगिक काल की तुलना में तकरीबन एक डिग्री अधिक गर्म हो चुका है। सदी के अंत तक तापमान में तीन डिग्री सेल्शियस वृद्धि हो जाएगी।
पेरिस जलवायु समझौते के तहत तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्शियस से कम रखने का लक्ष्य रखा गया है लेकिन ऐसा संभव नहीं लगता है। वैश्विक तापमान में 1.5 डिग्री वृद्धि से इस क्षेत्र के तापमान में 2.1 डिग्री वृद्धि होगी। अगर ऐसा हुआ तो फिर हिंदुकुश पर्वत शृंखला का तापमान 2.3 डिग्री और उत्तरी हिमालय का 1.9 डिग्री अधिक हो जाएगा। अगर तापमान अपने मौजूदा स्तर पर भी स्थिर बना रहता है तब भी ग्लेशियर कई दशकों तक अनवरत गति से पिघलते रहेंगे। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि गलेशियर के पिघलने में तेजी आई तो बाढ़ का खतरा उत्पन होगा और समुद्र के जल में भारी इजाफा होगा। इससे समुद्रतटीय शहरों के डूबने का खतरा बढ़ जाएगा।

पिछले दिनों मैक्सिको की खाड़ी में स्थित लुईसियाना का डेलाक्रोइस शहर देश-दुनिया में खूब चर्चा का विषय बना। यह शहर धीरे-धीरे समुद्र में समा रहा है। यहां समुद्र का पानी शहर के एक बड़े हिस्से को निगल चुका है और विगत एक सौ साल में लुईसियाना की 1880 वर्ग मील जमीन डूब चुकी है। एक रिपोर्ट के मुताबिक औसतन 17 वर्ग मील जमीन हर साल गंवानी पड़ रही है। अगर कहीं बड़ा समुद्री तूफान आया तो शहर का काफी हिस्सा समुद्र में समा सकता है। 2016 में हुए अध्ययन के मुताबिक पिछले सौ साल में समुद्र का पानी बढ़ने की रफ्तार पिछली 27 सदियों से ज्यादा है। वैज्ञानिकों की मानें तो अगर धरती का बढ़ता तापमान रोकने की कोशिश न हुई तो दुनिया भर में समुद्र का स्तर 50 से 130 सेंटीमीटर तक बढ़ सकता है।आर्कटिक क्षेत्र में आर्कटिक महासागर, कनाडा का कुछ हिस्सा, ग्रीनलैंड (डेनमार्क का एक क्षेत्र), रूस का कुछ हिस्सा, संयुक्त राज्य अमेरिका (अलास्का), आइसलैंड, नार्वे, स्वीडन और फिनलैंड में भी ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। अगर पृथ्वी के तापमान में मात्र 3.6 डिग्री सेल्शियस तक वृद्धि होती है तो आर्कटिक के साथ-साथ अंटाकर्टिका के विशाल हिमखंड भी पिघल जाएंगे और समुद्र के जल स्तर में दस इंच से पांच फुट तक वृद्धि हो जाएगी।

इसका परिणाम यह होगा कि समुद्रतटीय नगर समुद्र में डूब जाएंगे। ऐसा हुआ तो फिर न्यूयॉर्क, लॉस एंजिल्स, पेरिस और लंदन, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, पणजी, विशाखापट्टनम, कोचीन और त्रिवेंद्रम नगर समुद्र में होंगे। 2007 की इंटरगवर्नमेंटल पैनल की रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया भर के करीब तीस पर्वतीय ग्लेशियरों की मोटाई अब आधे मीटर से भी कम रह गई है। हिमालय क्षेत्र में पिछले पांच दशकों में माउंट एवरेस्ट के ग्लेशियर दो से पांच किलोमीटर सिकुड़ गए हैं और 76 फीसद ग्लेशियर सिकुड़ रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र की ग्लोबल फॉरेस्ट रिसोर्स एसेसमेंट की रिपोर्ट से पता चला है कि जलवायु परिवर्तन के कारण 1990 से 2015 के बीच वनक्षेत्र में तीन प्रतिशत की गिरावट आई है। वनों के विनाश से वातावरण जहरीला होता जा रहा है और प्रतिवर्ष दो अरब टन अतिरिक्त कार्बन-डाइआक्साइड वायुमंडल में घुलमिल रही है। इससे जीवन की सुरक्षा कवच मानी जाने वाली ओजोन परत को भारी नुकसान पहुंच रहा है। वैज्ञानिकों का कहना है कि ओजोन परत का क्षय होने से तापमान में वृद्धि होगी, जिससे सूर्य की किरणें कैंसर जैसे भयंकर रोगों में वृद्धि करेंगी। कहीं सूखा पड़ेगा तो कहीं गरम हवाएं चलेंगी। कहीं भीषण तूफान आएगा तो कहीं बाढ़ की विभीषिका का सामना करना पड़ेगा। दक्षिण एशिया के अधिकतर क्षेत्र बाढ़ग्रस्त होंगे। वैज्ञानिकों ने कहा है कि कश्मीर और नेपाल के बीच गंगोत्री ग्लेशियर भी तेजी से सिकुड़ रहा है।

2007 में पांच जून यानी पर्यावरण दिवस का सबसे ज्वलंत विषय ‘पिघलती बर्फ’ ही था। इस पर मुख्य अंतरराष्ट्रीय आयोजन नॉर्वे के ट्रामसे में संपन्न हुआ और दुनिया भर में ‘ग्लोबल आउटलुक फॉर आइस एंड स्नो’ की शुरुआत हुई। बताया गया कि तेजी से बर्फ पिघलने के लिए ग्रीनहाउस गैस का उत्सर्जन ही जिम्मेदार है। दुनिया के बीस सबसे ज्यादा क्लोरोफ्लोरो कार्बन उत्सर्जित करने वाले देशों के बीच ओजोन परत के क्षरण को रोकने के लिए 16 सितंबर, 1987 को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक संधि हुई जिसे मांट्रियाल प्रोटाकॉल नाम दिया गया। इसका मकसद ओजोन परत के क्षरण के लिए जिम्मेदार गैसों और तत्त्वों के इस्तेमाल पर रोक लगाना था। लेकिन इस दिशा में अभी तक अपेक्षित सफलता नहीं मिली है।

एक आंकड़े के मुताबिक अब तक वायुमंडल में 36 लाख टन कार्बन डाइआक्साइड की वृद्धि हो चुकी है और वायुमंडल से 24 लाख टन आॅक्सीजन समाप्त हो चुकी है। अगर यही स्थिति रही तो 2050 तक पृथ्वी के तापक्रम में लगभग चार डिग्री सेल्शियस तक वृद्धि होगी जिससे दुनिया भर में जलसंकट बढ़ जाएगा। जल संरक्षण और प्रदूषण पर ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाले दो सौ सालों में भूजल स्रोत सूख जाएंगे। नतीजतन, मनुष्य को मौसमी परिवर्तनों, मसलन ग्लोबल वार्मिंग, ओजोन क्षरण, ग्रीनहाउस प्रभाव, भूकम्प, भारी वर्षा, बाढ़ और सूखा जैसी आपदाओं से जूझना होगा। जलवायु परिवर्तन को लेकर 1972 में स्टॉकहोम, 1992 में रियो डी जेनेरियो, 2002 में जोहानिसबर्ग, 2006 में मांट्रियाल और 2007 में बैंकॉक सम्मेलन हुआ। जलवायु परिवर्तन को लेकर चिंता जताते हुए उसे संतुलित बनाए रखने के लिए ढेरों कानून गढ़े गए। लेकिन त्रासदी है कि उस पर ईमानदारी से अमल नहीं हो रहा है। लेक सम्मेलन 1949 में इस बात पर बल दिया गया कि प्रकृति के उपकरण एक नैसर्गिक विरासत के रूप में हैं, जिन्हें शीघ्रता से नष्ट नहीं करना चाहिए।

 

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