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बढ़ती कीमतों के तर्क

महंगी कार चला कर सब्जी मंडी जाने के बावजूद एक किलो टमाटर खरीदने के बाद सब्जी वाले से पचास ग्राम धनिया मुफ्त में जुटा लेने की जुगत का सुख क्या है, इसे केवल वे लोग महसूस कर सकते हैं, जिन्होंने ऐसे टोटकों को आजमाया है।

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अतुल कनक 

भारत में आर्थिक सुधारों की दिशा में किसी भी पहल का आशय आम आदमी के लिए पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों में वृद्धि ही होता है। आज भी बजट पेश होने की पूर्व संध्या पर सैकड़ों लोग इस उम्मीद में कतार लगाकर पेट्रोल भराते देखे जा सकते हैं कि अपनी क्षमता के अनुसार वाहन में अतिरिक्त र्इंधन का जुगाड़ करके वे अगले कुछ दिनों के लिए बढ़े हुए दामों के भार से मुक्ति पा लेंगे। भारतीय मध्य वर्ग आज भी बचत के इसी तरह के छोटे-छोटे जुगाड़ों में अपना सुख तलाशता है, भले ही ये बहुत कारगर साबित नहीं हो पाते हों। महंगी कार चला कर सब्जी मंडी जाने के बावजूद एक किलो टमाटर खरीदने के बाद सब्जी वाले से पचास ग्राम धनिया मुफ्त में जुटा लेने की जुगत का सुख क्या है, इसे केवल वे लोग महसूस कर सकते हैं, जिन्होंने ऐसे टोटकों को आजमाया है।
पेट्रोलियम उत्पादों की लगातार बढ़ती कीमत से त्रस्त इस देश के आम आदमी के लिए बहुप्रतीक्षित अच्छे दिनों की एक झलक देखने का अवसर पिछले दिनों आया था, जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत तेजी से गिर गई थी। अमेरिका में पेट्रोलियम पदार्थों का रेकॉर्ड उत्पादन, यूरोपीय संघ के कई सदस्य देशों, चीन तथा ब्राजील में तेल की कम मांग और ईरान के एक बार फिर तेल बाजार में आगमन ने कच्चे तेल की कीमतों में तीस प्रतिशत से अधिक की कमी कर दी, लेकिन आम भारतीयों को अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की गिरती हुई कीमतों का लाभ नहीं मिला और न आगे मिलने की उम्मीद है। इसका सबसे बड़ा कारण यह रहा कि बाजार में तेल की गिरती हुई कीमतों के अनुपात में ही भारत में केंद्र में सत्ताधारी राजग की सरकार पेट्रोल पर उत्पाद शुल्क बढ़ाती रही। इस उत्पाद शुल्क को बढ़ाने के सरकार के अपने तर्क हैं लेकिन जनता उस लाभ से वंचित रही, जो लाभ उसे मिलना चाहिए था। आखिर क्यों देशवासियों को इस लाभ से वंचित किया जा रहा है?

पेट्रोल पर तीन वर्ष पहले के 9.48 रुपए उत्पाद शुल्क की तुलना में सितंबर के मध्य में उत्पाद शुल्क 21. 48 रुपए प्रति लीटर पहुच गया जबकि डीजल के संबंध में यह आंकड़ा 3.56 रुपए प्रति लीटर की तुलना में 17.33 रुपए प्रति लीटर रहा। महत्त्वपूर्ण है कि मई 2014 में जब केंद्र में भाजपा नीत राजग ने कार्यभार संभाला था, तब अंतरराष्ट्रीय बाजार में एक बैरल कच्चे तेल की कीमत छह हजार तीन सौ रुपए से अधिक थी जबकि इस वर्ष सितंबर के मध्य में यह गिर कर तीन हजार तीन सौ रुपए प्रति बैरल रह गई। लेकिन भारत के आम निवासियों को कच्चे तेल के दामों में इस भारी गिरावट का लाभ नहीं मिल सका। अब तो कतिपय विषय विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका में आए इरमा तूफान के कारण हुई तबाही की वजह से कच्चे तेल के दामों में गिरावट का सिलसिला थम सकता है।जब सारे देश में समान कर व्यवस्था लागू की गई तो आश्चर्यजनक रूप से पेट्रोलियम पदार्थों को वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के दायरे के बाहर छोड़ दिया गया। यह जानना दिलचस्प होगा कि भारत में पेट्रोलियम पदार्थों के दाम मुख्य रूप से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की औसत कीमत, परिवहन व्यय, रिफाइनरियों के खर्चे, केंद्रीय उत्पाद कर और विभिन्न राज्यों द्वारा निर्धारित वस्तु पर मूल्य आधारित कर या वैल्यू एडेड टैक्स या वैट के आधार पर तय होते हैं। इसी वर्ष 16 जून से पेट्रोलियम पदार्थों के दाम प्रतिदिन के हिसाब तय होने लगे हैं लेकिन इसके बावजूद आम आदमी को अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट का लाभ नहीं मिला है। विभिन्न राज्यों द्वारा आरोपित वैट भी इसके लिए जिम्मेदार है।

यही कारण है कि पिछले दिनों केंद्र सरकार के पेट्रोलियम मंत्री ने पेट्रोलियम पदार्थों को सस्ता करने के लिए उन्हें जीएसटी के अंदर लाने की आवश्यकता बताकर गेंद वित्त मंत्रालय के पाले में सरका दी थी।यह भी उल्लेखनीय है कि पेट्रोलियम पदार्थों के उत्पादन के मामले में भारत की आत्मनिर्भरता का स्तर पिछले सात सालों के निम्नतम स्तर पर पहुंच गया है और पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, नेपाल जैसे हमारे पड़ोसी देश भी नागरिकों को भारत से कम दरों पर पेट्रोल उपलब्ध करा रहे हैं। वेनेजुएला, सऊदी अरब, लीबिया, बहरीन, कुवैत, कतर, मिस्र, ओमान और अल्जीरिया जैसे पेट्रोलियम उत्पादक देशों में तो पेट्रोलियम पदार्थों की कीमत भारत की तुलना में बहुत ही कम है। क्या कोई विश्वास कर सकेगा इस तथ्य पर कि वेनेजुएला में पेट्रोल की कीमत सितंबर के मध्य में एक रुपए प्रतिलीटर से भी कम रह गई थी।

पेट्रोलियम पदार्थों की खपत की दृष्टि से भारत का अमेरिका और चीन के बाद सारी दुनिया में तीसरा स्थान है। यही कारण है कि भारत में तेल और गैस उद्योग देश के छह प्रमुख उद्योगों में से एक है। सरकार नियंत्रित कंपनियों के अलावा निजी क्षेत्र की भी कुछ प्रभावशाली कंपनियां इस क्षेत्र में सक्रिय हैं। उधर सरकारी नियंत्रण वाले तेल और प्राकृतिक गैस निगम (ओएनजीसी) ने पिछले सालों में सूडान, सीरिया, ईरान और नाइजीरिया के तेल क्षेत्रों में भी निवेश किया है। यह महत्त्वपूर्ण है कि ओएनजीसी आज भी पेट्रोलियम क्षेत्र में देश की सबसे महत्त्वपूर्ण कंपनी है। इसका अनुमान इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि 2016-17 में इस कंपनी का देश के कुल उत्पादन में आधे से अधिक योगदान रहा है। बारहवीं पंचवर्षीय योजना (2012 से 2017) के मध्य देश में पेट्रोलियम पदार्थों की मांग 5.6 प्रतिशत प्रतिवर्ष की दर से बढ़ी है। लोगों का मानना है कि बाजार में बढ़ी हुई मांग और आम उपभोक्ताओं के पास विकल्प का अभाव ही वह कारण है, जो नीति नियंताओं को ऐसी नीतियां बनाने के लिए उकसा रहा है जिनके कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के गिरते हुए दामों के बावजूद आम भारतीय को उसका लाभ नहीं पहुंच पा रहा।

दूसरी ओर सरकार की इस नीति के समर्थकों के अपने तर्क हैं। उनका कहना है कि पेट्रोलियम पदार्थों की बढ़ी हुई कीमतों के माध्यम से सरकार इनकी खपत पर अंकुश लगाना चाहती है क्योंकि इससे होने वाला प्रदूषण ही नहीं बल्कि पेट्रोल के आयात पर खर्च होने वाली बड़ी राशि भी सरकार के सरोकार का विषय है। उल्लेखनीय है कि एक केंद्रीय मंत्री ने तो एक सभा में यह तक कह दिया कि वे 2030 तक पेट्रोल-डीजल के उपयोग वाले वाहन बनाने वाले उद्योगों को जमींदोज कर देंगे। कुछ लोगों का यह भी कहना है कि बढ़े हुए कर संग्रहण का उपयोग देश के विविध हिस्सों में विकास योजनाओं के परिचालन और संचालन में होता है और इससे पैदा होने वाली रोजगार की नई संभावनाएं अर्थव्यवस्था और आम आदमी को नया संबल देती हैं। सरकार की नीतियों के विरोधियों और समर्थकों के अपने-अपने तर्क हैं लेकिन आम आदमी के मन में सरकार के सरोकारों को लेकर बहुत-सी उलझनें पनपने लगी हैं क्योंकि वह समझ नहीं पा रहा है कि आखिर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम गिर जाने के बावजूद ऊं चे दामों पर पेट्रोल या डीजल खरीदना उसकी विवशता क्यों है?

 

 

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