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रोजगार सृजन की चुनौती

देश की अर्थव्यवस्था भले ही कई देशों के मुकाबले दोगुनी वृद्धि कर रही हो लेकिन युवाओं के लिए रोजगार सृजित करने के मामले में देश पिछड़ रहा है।
प्रतीकात्मक तस्वीर

देश की अर्थव्यवस्था भले ही कई देशों के मुकाबले दोगुनी वृद्धि कर रही हो लेकिन युवाओं के लिए रोजगार सृजित करने के मामले में देश पिछड़ रहा है। हाल ही में आर्थिक सहयोग तथा विकास संगठन की ताजा रिपोर्ट ने बताया है कि देश में पंद्रह से उनतीस वर्ष के तीस प्रतिशत से अधिक युवाओं के पास रोजगार नहीं है। पिछले वर्ष श्रम मंत्रालय की इकाई श्रम ब्यूरो के रिपोर्ट से भी खुलासा हुआ कि बेरोजगारी दर 2015-16 में पांच प्रतिशत पर पहुंच गई है जो पांच साल का उच्चतम स्तर है। यह स्थिति तब है जब सरकार ने रोजगार सृजन के लिए मेक इन इंडिया और स्किल इंडिया जैसे कई कार्यक्रम चला रखे हैं। इसके अलावा पहले से भी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम, समन्वित विकास कार्यक्रम, जवाहर रोजगार योजना, स्वर्ण जयंती ग्राम स्वरोजगार योजना, संपूर्ण ग्रामीण रोजगार योजना, महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार योजना (मनरेगा) जैसी प्रमुख योजनाएं चलाई जा रही हैं। बावजूद इसके जिस तेजी से बेरोजगारी की दर में वृद्धि हो रही है उससे साफ है कि देश में बेरोजगारी से निपटने का कोई ठोस रोडमैप नहीं है। यहां उल्लेख करना आवश्यक है कि भारत सरकार ने लोगों को रोजगार प्रदान करने के लिए स्किल इंडिया के जरिए 2022 तक चालीस करोड़ लोगों को प्रशिक्षित करने का लक्ष्य रखा है। लेकिन राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन का ताजा सर्वेक्षण बताता है कि इस लक्ष्य को हासिल करना आसान नहीं है। इसलिए कि रिपोर्ट के मुताबिक देश में हर दस युवाओं में से महज एक युवा को किसी तरह का कारोबारी प्रशिक्षण हासिल है। पंद्रह से उनसठ आयु वर्ग के सिर्फ 2.2 प्रतिशत लोगों ने औपचारिक और 8.6 प्रतिशत लोगों ने अनौपचारिक रूप से कारोबारी प्रशिक्षण हासिल किया हुआ है। अगर दोनों को जोड़ दें तो यह आंकड़ा 10.8 प्रतिशत ठहरता है।

लेकिन जिस गति से देश में बेरोजगारी की दर में वृद्धि हो रही है उस हिसाब से कारोबारी प्रशिक्षण की यह उपलब्धि ऊंट के मुंह में जीरे के समान है। इस समय देश में नौजवानों का रुझान मेडिकल और इंजीनियरिंग क्षेत्रों को लेकर ज्यादा है। लेकिन आंकड़े बताते हैं कि इस क्षेत्र में भी रोजगार हासिल करने के लिए सिर्फ ढाई प्रतिशत नौजवानों के पास शैक्षिक योग्यता है। यह स्थिति निराश करने वाली है। आमतौर पर पच्चीस से तीस वर्ष के बीच 95 प्रतिशत नौजवान अपनी पढ़ाई पूरी कर लेते हैं और फिर रोजगार की तलाश शुरू कर देते हैं। सीआइआइ की इंडिया स्किल रिपोर्ट-2015 बताती है कि भारत में हर साल तकरीबन सवा करोड़ शिक्षित युवा तैयार होते हैं। ये नौजवान रोजगार के लिए सरकारी और प्राइवेट क्षेत्र, सभी जगह अपनी किस्मत आजमाते हैं। लेकिन सिर्फ सैंतीस प्रतिशत कामयाब हो पाते हैं यानी उन्हें रोजगार मिल जाता है। इसके दो कारण हैं। एक, यह कि सरकारी क्षेत्र में नौकरियां सिकुड़ रही हैं, जबकि दूसरी ओर प्राइवेट क्षेत्र में उन्हीं लोगों को रोजगार मिल रहा है जिन्हें कारोबारी प्रशिक्षण हासिल है। देश में सालाना सिर्फ पैंतीस लाख लोगों के लिए कौशल प्रशिक्षण की व्यवस्था है, जबकि हर साल सवा करोड़ शिक्षित बेरोजगार युवा रोजगार की कतार में खड़े होते हैं। दो वर्ष पहले योजना आयोग ने एलान किया था कि शिक्षित बेरोजगार युवाओं को रोजगार देने के लिए पचास लाख स्किल सेंटर खोले जाएंगे। लेकिन अभी तक लक्ष्य पूरा नहीं हुआ। सवाल लाजिमी है कि जब स्किल केंद्रों की संख्या में वृद्धि नहीं होगी तो फिर रोजगार कैसे मिलेगा? उचित होगा कि सरकार कौशल प्रशिक्षण केंद्र्रों की संख्या बढ़ाए।

अगर छोटे कस्बों में नए विकास केंद्र खोले जाएंगे तो इससे औद्योगिक ढांचे का विकेंद्रीकरण होगा और अर्थव्यवस्था अधिक आत्मनिर्भर बनेगी।अभी तक अनुदान और प्रोत्साहन सिर्फ उत्पादन के आधार पर दिए जाते हैं। बेहतर होगा कि इस आधार को बदला जाए और इसे रोजगार के अवसर प्रदान करने के आधार पर दिया जाए। पिछले दिनों आई ‘एस्पाइरिंग माइंड्स’ की ‘नेशनल इम्पालयबिलिटी रिपोर्ट’ में कहा गया है कि इंजीनियरिंग डिग्री रखने वाले स्नातकों में कुशलता की कमी है और उनमें से करीब अस्सी प्रतिशत स्नातक रोजगार के काबिल नहीं हैं। यह रिपोर्ट देश भर के साढ़े छह सौ से अधिक इंजीनियरिंग कालेजों के तकरीबन डेढ़ लाख इंजीनियरिंग छात्रों पर किए गए अध्ययन पर आधारित है। पिछले साल एसोचैम की एजुकेशन कमेटी के सर्वेक्षण से भी उद्घाटित हुआ कि देश में चल रहे साढ़े पांच हजार बिजनेस स्कूलों में से सरकार द्वारा संचालित भारतीय प्रबंध संस्थानों तथा कुछ मुठ्ठी भर संस्थाओं को छोड़ कर शेष सभी स्कूलों व संस्थाओं से डिग्री लेकर निकलने वाले ज्यादातर छात्र-छात्राएं कहीं भी रोजगार पाने के लायक नहीं। हालत यह है कि इंजीनियरिंग और एमबीए की डिग्री रखने वाले बड़ी संख्या में लोग दस हजार रुपए से कम की पगार पर नौकरी कर रहे हैं जो एक तरह से अर्द्धबेरोजगारी ही है। इसका असर यह हुआ है कि पिछले दो साल के दौरान दिल्ली समेत राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र, मुंबई, कोलकाता, बेंगलुरु, अमदाबाद, लखनऊ, हैदराबाद, देहरादून आदि में कुल मिलाकर करीब 220 बिजनेस स्कूल बंद हो चुके हैं। कुछ यही हाल इंजीनियरिंग कॉलेजों का भी है। शिक्षा की निम्न गुणवत्ता की वजह से 2014 से 2016 के बीच कैंपस रिक्रूटमेंट में पैंतालीस प्रतिशत की गिरावट आई है।

आज की तारीख में ग्रामीण बेरोजगारी सबसे अधिक है। लेकिन इसे अवसर में बदला जा सकता है। पर यह तभी संभव होगा जब खेती, बागवानी, पशुपालन, वृक्षारोपण, कृषि यंत्रों की मरम्मत आदि के संबंध में आधुनिक तकनीक का प्रशिक्षण दिया जाएगा और ग्रामीण निर्माण कार्यक्रमों का विस्तार होगा। अब समय आ गया है कि बेकार पड़ी भूमि को कृषि के अंतर्गत लाया जाए। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार की मात्रा में वृद्धि होगी। देश में अच्छे बीजों, उर्वरक तथा यंत्रों की मांग बढ़ गई है। इनकी बिक्री तथा पूर्ति के कामों में काफी लोगों को रोजगार मिल सकता है। बेहतर होगा कि केंद्र व राज्य सरकारें ग्रामीण क्षेत्रों में स्किल इंडिया केंद्रों का विस्तार करें। इससे बुनाई, मैकेनिक, आपरेटरी और हस्तशिल्प को बढ़ावा मिलेगा और रोजगार के अवसर सृजित होंगे। चिकित्सा, रीयल एस्टेट, शिक्षा एवं प्रशिक्षण, आइटी, मैन्युफैक्चरिंग, बैंकिंग व अन्य वित्तीय सेवाओं आदि में भी युवाओं को अपना कैरियर संवारने का मौका मिलता है। लेकिन यह तभी संभव होगा जब सार्वजनिक और निजी क्षेत्र इसमें निवेश बढ़ाएंगे।

याद होगा कि 2012-13 में बैंक समूहों ने एक लाख लोगों को नौकरी देने का एलान किया था। इसके अलावा देशी-विदेशी कंपनियों ने भी कुछ इसी तरह की घोषणा की। लेकिन एलान के मुताबिक रोजगार उपलब्ध कराने में वे विफल रहीं। अगर सिर्फ बैंकिंग समूह ग्रामीण क्षेत्रों में अपना विस्तार करें तो यहां लाखों लोगों को रोजगार मिल सकता है। इसी तरह स्वास्थ्य क्षेत्र में भी सरकार निवेश को बढ़ावा देकर रोजगार सृजित कर सकती है। आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य केंद्रों की भारी कमी है। अगर सरकार इनका विस्तार करे तो न सिर्फ रोजगार का सृजन होगा बल्कि सुदूर क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को स्वास्थ्य लाभ भी मिलेगा।
रोजगार बढ़ाने के लिए छोटे उद्योगों का विकास सबसे ज्यादा जरूरी है। अर्थशास्त्रियों की मानें तो लघु उद्योगों में उतनी ही पूंजी लगाने से लघु उद्योग, बड़े उद्योग की तुलना में पांच गुना अधिक लोगों को रोजगार देते हैं। बेरोजगारी केवल आर्थिक समस्या नहीं है। यह एक ऐसा मसला है जो अपराध नियंत्रण और सामाजिक शांति से भी उतना ही वास्ता रखता है। अगर बेरोजगारी बढ़ती ही जाएगी तो तरह-तरह के असंतोष के रूप में फूटेगी।

 

 

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