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और कितने आएंगे फतवे

मुसलिम समाज के भीतर इस तरह की कोई हलचल नहीं दिख रही है। लगता है कि मुसलिम समाज इन फतवों को लेकर निर्विकार भाव पाले हुए है।

Author January 18, 2017 4:32 AM
कोलकाता की टीपू सुल्‍तान मस्जिद के शाही इमाम सैयद मोहम्‍मद नुरुर रहमान बरकती ।

रवींद्र किशोर सिन्हा

एक के बाद एक फतवों के आने का सिलसिला रुकने का जैसे नाम ही नहीं ले रहा है। फिलहाल, दूर-दूर तक कोई उम्मीद भी नहीं है कि ये कभी थमेंगे भी। थमें तो तब, जबकि आम मुसलमान फतवे जारी करने वाले घोर प्रतिक्रियावादी मुल्लाओं के खिलाफ खड़े हों। मुसलिम समाज के भीतर इस तरह की कोई हलचल नहीं दिख रही है। लगता है कि मुसलिम समाज इन फतवों को लेकर निर्विकार भाव पाले हुए है। या मुल्लाओं की दहशत इन्हें सता रही है। ताजा फतवा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ आया है। मोदी के खिलाफ कोलकाता की टीपू सुल्तान मस्जिद के शाही इमाम सैयद मोहम्मद नुरुर रहमान बरकती ने फतवा जारी करते हुए मोदी की दाढ़ी काटने वाले को या उन पर काली स्याही फेंकने पर पच्चीस लाख रुपए का इनाम रख दिया है। देखिए किकितना खतरनाक है यह फतवा। वे पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के घोषित रूप से खासमखास हैं। हालांकि अब उन्हें खुद ही फतवे का सामना करना पड़ रहा है।

मुंबई के मदरसा-दारुल-उलूम अली हसन सुन्नत के मुफ्ती मंजर हसन खान अशरफी मिस्बही ने मोदी के खिलाफ जारी उनके फतवे को सिरे से खारिज कर दिया है। उन्होंने शाही इमाम के नमाज अदा करने के हक पर भी सवाल खड़े कर दिए। मिस्बही ने दावा किया कि बरकती मुफ्ती हैं ही नहीं और उन्हें अपनी राजनीतिक राय को फतवे के तौर पर पेश कर उसकी पवित्रता को खत्म करने की कोशिश हरगिज नहीं करनी चाहिए।  अकारण और बात-बात पर फतवे जारी करने वालों से समूचे इस्लाम की छवि प्रभावित हो रही है। पर मध्यवर्गीय मुसलमान भी इन फतवे जारी करने वालों के खिलाफ वे चुप हैं। उनकी चुप्पी डराने वाली है। मुझे प्रख्यात पाकिस्तानी पत्रकार-लेखक-विचारक तारिक फतह का उर्दू चैनल का इंटरव्यू याद आ रहा है जिसमें उन्होंने कहा था कि ‘‘भारत में ‘अल्ला का इस्लाम’ नहीं, ‘मुल्ला का इस्लाम’ चलाया जा रहा है जिसका मजहब से कोई वास्ता ही नहीं है।’’ वास्ता है सिर्फ वास्ते की राजनीति से।
अब देवबंद की बात कर लें। देवबंद भारत के मुसलमानों का महत्त्वपूर्ण केंद्र है। इधर कुछ समय पहले महिलाओं और पुरुषों के एक साथ काम करने को भी अवैध बताया गया था। जरा सोचिए कि किस अंधेरे युग में अब भी रहते हैं फतवे देने वाले। पर किसी भारतीय मुसलमान ने इस फतवे की निंदा नहीं की। इसी तरह से देवबंद ने अपने एक और फतवे में कहा कि इस्लाम के मुताबिक सिर्फ पति को तलाक देने का अधिकार है और पत्नी अगर तलाक दे भी दे, तो वह वैध नहीं है।

दरअसल, एक व्यक्ति ने देवबंद से पूछा था, पत्नी ने मुझे तीन बार तलाक कहा, लेकिन हम अब भी साथ रह रहे हैं, क्या हमारी शादी जायज है? इस पर देवबंद ने कहा कि सिर्फ पति की ओर से दिया गया तलाक जायज है और पत्नी को तलाक देने का अधिकार नहीं है। जब सारा संसार स्त्रियों को जीवन के हर क्षेत्र में बराबरी के लिए कृतसंकल्प है तो देवबंद औरत को दोयम दर्जे का इंसान बनाने पर तुला है।एक और उदाहरण। देवबंद ने अंगदान और रक्तदान को भी इस्लाम के मुताबिक हराम करार दे दिया। देवबंद से पूछा गया था कि रक्तदान करना इस्लाम के हिसाब से सही है या गलत? इसके जवाब में देवबंद ने कहा, शरीर के अंगों के हम मालिक नहीं हैं, जो अंगों का मनमाना उपयोग कर सकें, इसलिए रक्तदान या अंगदान करना अवैध है। इन फतवों को सुन कर तो यही लगता है देवबंद मुसलमानों को किसी और दुनिया में लेकर जाना चाहता है।

फतवा यानी वो राय जो किसी को तब दी जाती है जब वह अपना कोई निजी मसला लेकर मुफ्ती के पास जाता है। फतवा का शाब्दिकअर्थ असल में सुझाव है, यानी कोई इसे मानने के लिए कानूनी रूप से बाध्य नहीं है। यह सुझाव भी सिर्फ उसी व्यक्ति के लिए होता है और वह भी उसे मानने या न मानने के लिए आजाद होता है। इसे आलिम-ए-दीन के शरीअत के मुताबिक जारी किया जाता है। मगर जिन मुद््दों पर जिस तरह के फतवे आते हैं, उनसे साफ है कि इन्हें जारी करने वाले अपने समाज को घोर अंधकार के युग में ही रखना चाहते हैं। शायद यह मुल्लाओं द्वारा चलाई जा रही ‘वोट बैंक की राजनीति’ के मुआफिक भी है। दिल्ली की जामा मस्जिद के शाही इमाम अहमद बुखारी भी लंबे समय से मनचाहे फतवे दे रहे हैं। चुनावी मौसम में तो वे निश्चित रूप से फतवा किसी दल विशेष के पक्ष या विपक्ष में देने से भी पीछे नहीं हटते। यह सच है कि फतवे मुसलमानों पर ‘बाध्यकारी’ तो नहीं होते। पर इनसे एक नकारात्मक माहौल जरूर बन जाता है। इस्लाम के अधिकतर धर्मग्रंथ अरबी में उपलब्ध हैं। इन धार्मिक पुस्तकों तक सामान्य मुसलमानों की पहुंच नहीं है। इस पृष्ठभूमि में मुसलमानों को जो इमाम और मौलवी बताते हैं, वे उसी पर यकीन कर लेते हैं। इसलिए बहुत-से मुसलमान फतवों पर अमल करना शुरू कर देते हैं। यही समस्या की जड़ है।

कुछ बेतुके फतवों पर हंसी भी आती है। आपको याद होगा कि स्टार टेनिस खिलाड़ी सानिया मिर्जा की स्कर्ट से कोलकाता के एक इस्लामी संगठन को एतराज हो गया। इसलिए उसने फतवा जारी कर दिया कि सानिया ढंग के कपड़े पहन कर खेलें, नहीं तो उन्हें टेनिस खेलने नहीं दिया जाएगा। संगठन का कहना था कि सानिया छोटी स्कर्ट और टाइट टॉप पहन कर युवाओं को भ्रष्ट कर रही हैं। बेशक कोई भी सभ्य इंसान इस तरह के फतवा देने वालों की बीमार मानसिकता पर तरस ही तो खाएगा।मैं इधर भारत के शत्रु हाफिज सईद के खिलाफ बरेली में जारी फतवे का भी उल्लेख अवश्य करना चाहूंगा। बरेली की दरगाह आला हजरत से जुड़ी संस्था मंजर-ए-इस्लाम सौदागरान के मुफ्ती मुहम्मद सलीम बरेलवी ने मुंबई हमलों के मास्टरमाइंड हाफिज सईद के खिलाफ जारी एक फतवे में उसे इस्लाम से ‘खारिज’ कर दिया था। इसमें उसे मुसलमान मानने और उसकी बातों को सुनने को नाजायज बताया गया था। वास्तव में इस प्रकार के फतवे कम ही सुनने को मिलते हैं।

क्यों नहीं मुल्ला उन माता-पिता के खिलाफ फतवा देते हैं, जो अपने बच्चों को स्कूल भेजने से बचते हैं? क्यों फतवे परिवार नियोजन के पक्ष में नहीं आते? क्यों फतवे उन मुसलमानों के विरुद्ध जारी नहीं होते जो कट्टरपंथी इस्लामिक संगठन आईएसआई के प्रति नरम रवैया अपनाते हैं? यह भी सोचने का विषय है कि क्यों फतवे औरतों के खिलाफ ही ज्यादा से ज्यादा जारी होते हैं? मुझे आश्चर्य होता है कि कॉनवेन्ट स्कूलों और सरस्वती शिशु मंदिरों में पढ़ने वाले बच्चों और ‘को-एजुकेशन’ शिक्षा संस्थानों में पढ़ने वाली मुसलिम बालिकाओं के माता-पिता के समाज से बहिष्कार और कब्रिस्तान में जगह न देने तक के फतवे देने वाले मुल्ला उन बड़े मुसलिम अधिकारियों, जजों, वकीलों, डॉक्टरों और सांसदों के खिलाफ फतवा क्यों नहीं जारी करते जो आपने बच्चों को कभी मदरसों में नहीं भेजते, लड़के-लड़कियों को नामी-गिरामी कॉनवेन्ट और ‘को-एजुकेशनल’ स्कूल-कॉलेजों और आवासीय विद्यालयों में पढ़ाते हैं। यदि वे अंग्रेजी और ‘को-एजुकेशन’ में अपने बच्चों को पढ़ा कर भी ‘सच्चे मुस्लमान’ बने रह सकते हैं, तो मुल्लाओं का फतवा क्या ‘गरीब और कमजोर’ मुसलमानों के लिए ही है?
और अब मैं फिर से टीपू सुल्तान मस्जिद के इमाम सैयद मोहम्मद नुरुर रहमान बरकती पर लौटूंगा। वे नोटबंदी के बहाने भी प्रधानमंत्री मोदी पर हमला बोलते रहे। क्या उन्हें मालूम है कि काले धन की अर्थव्यवस्था क्या होती है? क्या उन्हें पता है कि काला धन देश को किस तरह से खोखला करता है? शायद नहीं। इसके बावजूद वे मोदी सरकार पर गुस्सा निकालते रहे। क्या यह सब इस्लाम सम्मत है?
(लेखक भाजपा के राज्यसभा सांसद हैं)

 

 

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