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राजनीति: नेपाल के साथ नई संभावनाएं

भारत ने नेपाल में सड़क परियोजनाओं में तेजी लाने और दोनों देशों के बीच रेल संपर्क बढ़ाने के लिए पांच रेल परियोजनाओं को अमली जामा पहनाने का फैसला किया। भारत नेपाल संबंधों पर राहुल लाल का लेख।

Author September 20, 2016 11:32 PM
नई दिल्ली में गुरुवार (15 सितंबर) को नेपाल के प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल प्रचंड का स्वागत करतीं विदेश मंत्री सुषमा स्वराज। (पीटीआई फोटो)

राहुल लाल

भारत-नेपाल संबंध अद्वितीय हैं। किसी भी अन्य पड़ोसी देश के साथ भारत का इतना लगाव और सौहार्द नहीं रहा है। भौगोलिक निकटता, खुली सीमा, सांस्कृतिक जुड़ाव, ऐतिहासिक और सामाजिक बंधनों ने दोनों देशों के बीच प्राचीन काल से लेकर अब तक मित्रभाव बनाए रखा है। इक्कीसवीं शताब्दी में विश्व मानचित्र पर संघात्मक, धर्मनिरपेक्ष व लोकतंत्रात्मक गणराज्य के रूप में अवतरित नेपाल हिमालय की गोद में बसा प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण स्थलबद्ध देश है। यह समृद्ध जैव विविधता की विरासत धारण किए हुए व जलविद्युत ऊर्जा की अपार संभावनाओं वाला देश है। तिब्बत पर चीन के आधिपत्य के बाद भारत व चीन के मध्य नेपाल एक अवरोधक राज्य का काम करता है। इस कारण नेपाल भारत के लिए आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक दृष्टि से ही नहीं बल्कि सामरिक दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण है।

भारत-नेपाल संबंधों में तनाव के कुछ दौर के बाद जिस प्रकार पंद्रह से अठारह सितंबर के बीच नेपाली प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल प्रचंड की चार दिवसीय भारत यात्रा संपन्न हुई है, उससे भारत-नेपाल संबंधों को पुन: नवीन आयाम मिला है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 2014 की नेपाल यात्रा और अप्रैल 2015 में नेपाल में आए भीषण भूकंप में भारत की सक्रिय मदद के बाद दोनों देशों के संबंध एक नई ऊंचाई पर पहुंच गए थे। दोनों देशों के संबंधों में तनाव साल भर पहले नेपाली संविधान लागू होने के बाद आया। संविधान में अपना उचित प्रतिनिधित्व न होने से मधेसी समुदाय ने आंदोलन करते हुए, भारत से नेपाल को रसद और र्इंधन आपूर्ति के सारे मार्गों की नाकाबंदी कर दी। इससे नेपाल में रोजमर्रा की आवश्यक वस्तुओं की भारी किल्लत हो गई।

तत्कालीन नेपाली प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने इस नाकेबंदी का सारा दोष भारत पर मढ़ दिया और नेपाल में भारत-विरोधी स्वरों को हवा दी। इस तरह ओली के कार्यकाल में भारत-नेपाल संबंधों में कड़वाहट आई। पाकिस्तान और चीन ने इस स्थिति का भरपूर लाभ उठाने की कोशिश की। चीन ने ओली को कई प्रलोभन भी दिए। नेपाल की राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी का भारत दौरा रद््द होने तथा भारत में नेपाली राजदूत दीपकुमार उपाध्याय की वापसी से भारत-नेपाल संबंधों में और भी गिरावट आई। कटुता दूर करने के लिए स्वयं ओली ने फरवरी 2016 में छह दिन के लिए भारत आकर मतभेदों को शांत करने का प्रयास किया, पर वे बार-बार भारत को चुभने वाली टिप्पणी भी करते रहे।  जब मधेसी आंदोलन के कारण नेपाल में आपूर्ति बाधित हुई थी, तब बेजिंग ने पेट्रोलियम पदार्थों और दूसरी वस्तुओं की भी आपात आपूर्ति की। हालांकि चीन नेपाल की सभी जरूरतें पूरी नहीं कर सका। नेपाल ने चीन के साथ ट्रांजिट और ट्रांसपोर्ट समझौता किया, जिसके तहत चीन नेपाल को अपना बंदरगाह उपलब्ध कराएगा और दोनों देशों के बीच रेल संपर्क का विकास करेगा। इस प्रकार नेपाल ने चीनी कार्ड के द्वारा भारत को जवाब देने का प्रयास किया। ऐसे में नेपाली प्रधानमंत्री प्रचंड की भारत यात्रा से दोनों देशों के संबंधों में जो मधुरता आई है उसे भारतीय कूटनीति की विशिष्ट सफलता के रूप में देखा जा सकता है, क्योंकि प्रचंड का प्रधानमंत्री के रूप में प्रथम कार्यकाल भारत को नाखुश करने वाला ही रहा था।

भारत-नेपाल के संबंध कितने स्वाभाविक और घनिष्ठ हैं, यह इससे स्पष्ट होता है कि भारत ने 1947 में नेपाल के प्रधानमंत्री की मांग पर अपने वरिष्ठ राजनयिक श्रीप्रकाश को नेपाल भेज कर कूटनीतिक संबंधों की शुरुआत की। भारत ने बार-बार संयुक्त राष्ट्र में नेपाल की सदस्यता की सिफारिश की, जिसके परिणामस्वरूप नेपाल 1955 में संयुक्त राष्ट्र का सदस्य बना। अप्रैल, 1950 में जनरल विजय शमशेर और एनएम दीक्षित ने नेपाल सरकार के प्रतिनिधि के रूप में भारत यात्रा की और 30 जुलाई 1950 को दोनों देशों के बीच एक संधि हुई। इस मैत्री संधि द्वारा स्थापित विशिष्ट संबंधों को कायम रखने के लिए दोनों तरफ की सरकारें निरंतर प्रयास करती रहीं। दोनों पक्षों के समान दृष्टिकोण, सदियों पुरानी ऐतिहासिक-सांस्कृतिक कसौटियों पर खरे उतरे हैं। दोनों देश गुटनिरपेक्ष आंदोलन, संयुक्त राष्ट्र तथा समूह-77 के सदस्य भी हैं। नेपाली प्रधानमंत्री प्रचंड की पंद्रह से अठारह सितंबर की ताजा चार दिवसीय भारत यात्रा में दोनों देशों के बीच तीन प्रमुख समझौते व ‘पच्चीस सूत्री संयुक्त बयान’ पर हस्ताक्षर हुए। इन समझौतों में से एक के तहत भारत, नेपाल को (भूकम्प से हुई तबाही के मद््देनजर) पुनर्निर्माण के लिए पचहत्तर करोड़ डॉलर देगा, वहीं दूसरा समझौता तराई क्षेत्र में सड़क निर्माण से संबंधित है। उपरोक्त पचहत्तर करोड़ डॉलर की मदद भूकम्प के बाद दी गई एक अरब डॉलर की सहायता के अतिरिक्त है। द्वितीय समझौता नेपाल में तराई क्षेत्र में सड़क और बुनियादी संरचना को सुधारने और उसे उन्नत बनाने के लिए किया गया। इसके अलावा एक और समझौता नेपाल में भूकम्प के बाद की पुनर्निर्माण परियोजनाओं के लिए डॉलर में दिए गए पहले ऋण संशोधन को लेकर किया गया।

भारत दोनों देशों के बीच पांच नई रेल परियोजनाएं भी बिछाएगा। गौरतलब है कि जनवरी 2012 में अपने नेपाल दौरे के समय वेन जियाबाओ ने ल्हासा से लुंबिनी तक रेल लिंक के लिए बारह करोड़ डॉलर के पैकेज की घोषणा की थी। ऐसे में भारत ने भी चीनी चुनौती को स्वीकार करते हुए प्रचंड की भारत यात्रा के दौरान रेल संपर्क बढ़ाने के लिए जयनगर से जनकपुर और जोगबनी से विराटनगर परियोजनाओं में तेजी लाने पर सहमति जताई। बढ़नी से काठमांडो और कुशीनगर से कपिलवस्तु सहित एक अन्य रेल परियोजना शुरू करने पर भी सहमति बनी। इस प्रकार नेपाल में चीन के बढ़ते प्रभाव को कम करने के लिए भारत ने कमर कस ली है। इसके लिए भारत ने नेपाल में सड़क परियोजनाओं में तेजी लाने और दोनों देशों के बीच रेल संपर्क बढ़ाने के लिए पांच रेल परियोजनाओं को अमली जामा पहनाने का फैसला किया।  इस अवसर पर प्रधानमंत्री मोदी ने सदियों पुराने सांस्कृतिक, राजनीतिक और भौगोलिक रिश्तों को अद्वितीय करार देते हुए नेपाल में विकास के लिए हरसंभव मदद का आश्वासन दिया। प्रचंड ने नेपाल के विकास में भारत की भूमिका की सराहना की। प्रधानमंत्री मोदी ने प्रचंड से स्पष्ट कहा कि भारत को उम्मीद है कि नेपाल अपने विविधतापूर्ण समाज में सभी वर्गों की आकांक्षाओं का समावेश करते हुए वार्ता के जरिए संविधान को लागू करने में सफल रहेगा। दूसरी बार प्रधानमंत्री बनने के बाद पहली बार भारत आए प्रचंड ने कहा कि उनकी सरकार नए संविधान को लागू करने में सभी वर्गों के साथ चलने की ईमानदारी से कोशिश कर रही है। उन्हें यह आश्वासन देने की जरूरत इसलिए महसूस हुई होगी, क्योंकि नए संविधान के कुछ प्रावधानों का मधेसी जबर्दस्त विरोध करते रहे हैं।

कुछ माह पूर्व लंबे समय तक चले विरोध-प्रदर्शन और आर्थिक नाकेबंदी के कारण भारत और नेपाल के रिश्तों में तनाव आ गया था। भारत के प्रधानमंत्री ने एक बार फिर दोहराया है कि नजदीकी पड़ोसी और दोस्ताना राष्ट्र होने के नाते नेपाल की शांति, स्थिरता और समृद्धि हमारा साझा उद््देश्य है। इस पर प्रचंड ने कहा कि हमारे मन में भारत के प्रति सद््भावना के सिवाय और कुछ नहीं है, और दोनों देशों के भविष्य आपस में जुड़े हैं।  दोनों देशों ने स्पष्ट किया कि उनके सुरक्षा हित आपस में जुड़े हैं और दोनों देश इस बात पर सहमत हैं कि अपने समाजों को सुरक्षित रखना विकास के साझे उद््देश्यों को प्राप्त करने के लिए आवश्यक है। दोनों देशों की रक्षा और सुरक्षा एजेंसियों के बीच निरंतर सहयोग खुली सीमा की चौकसी के लिए महत्त्वपूर्ण है। नेपाल के साथ भारत विकास साझेदारी मजबूत करने के लिए तैयार है। नेपाल का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार भारत ही है। यही नहीं, दोनों पक्षों ने व्यापार व निवेश को और बढ़ाने का फैसला किया है।

नेपाल की अर्थव्यवस्था काफी हद तक भारत पर निर्भर है। भारत में लगभग पचास लाख नेपाली नागरिक काम करते हैं। इसी तरह वे खाड़ी के मध्य देशों में भी काम करते हैं, जहां से वे नेपाल में अपने परिवारों को अपनी आमदनी का हिस्सा भेजते हैं। इस तरह मिलने वाली विदेशी मुद्रा नेपाल के लिए एक बड़ा सहारा है। भारत नेपाल को औद्योगीकरण में भी सहयोग कर रहा है। भारत ने नेपाल की आधारभूत संरचना, स्वास्थ्य, ग्रामीण व सामुदायिक विकास तथा शिक्षा की अनेक परियोजनाओं में अहम भूमिका निभाई है। त्रिभुवन राजपथ के निर्माण में भी भारत की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है जो कि भारत-नेपाल को जोड़ने का एकमात्र स्थल मार्ग है। वर्तमान में भारत-नेपाल आर्थिक कार्यक्रम के तहत छोटी-बड़ी लगभग चार सौ परियोजनाएं चल रही हैं। प्रचंड ने स्पष्ट कर दिया है कि वे भारत के खिलाफ आतंकी गतिविधियों के लिए किसी को अपनी जमीन का इस्तेमाल नहीं करने देंगे।

भारत के लिए नेपाल में चीनी वर्चस्व को चुनौती देने के लिए आवश्यक है कि नेपाल में भारतीय परियोजनाएं समयबद्ध तरीके से पूरी हों। ऐसा न होने पर चीन इसका लाभ उठा सकता है। मसलन, चीन ने 760 मेगावाट वेस्ट सेती हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट झटक लिया, जिसके पूरा होने की मियाद 2019 रखी गई है। भारत के लिए नेपाल सामरिक, रणनीतिक, जैव विविधता, ऊर्जा, सुरक्षा व व्यापार की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण देश है। प्रचंड ने भारतीय प्रधानमंत्री को नेपाल आने का निमंत्रण दिया है, जिसे मोदी ने स्वीकार कर लिया है। अगले माह राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी नेपाल जाएंगे। ये दो संभावित यात्राएं भी दोनों देशों के रिश्तों को और प्रगाढ़ बनाएंगी।

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