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तंबाकू से निजात दिलाने की चुनौती

विश्व भर में तंबाकू की बिक्री पर 2040 तक रोक नहीं लगी तो इस सदी में एक अरब लोग धूम्रपान और तंबाकू के उत्पादों की भेंट चढ़ेंगे और इनमें अस्सी प्रतिशत लोग गरीब और मध्य आय वर्ग वाले देशों के होंगे।

Author May 31, 2017 5:11 AM
तम्बाकू।

 रीता सिंह

एक रिपोर्ट के मुताबिक अगर विश्व भर में तंबाकू की बिक्री पर 2040 तक रोक नहीं लगी तो इस सदी में एक अरब लोग धूम्रपान और तंबाकू के उत्पादों की भेंट चढ़ेंगे और इनमें अस्सी प्रतिशत लोग गरीब और मध्य आय वर्ग वाले देशों के होंगे। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक तंबाकू के सेवन से प्रतिवर्ष साठ लाख लोगों की मौत होती है। इसके अलावा लोगों को तरह-तरह की बीमारियां भी झेलनी पड़ती हैं। विशेषज्ञों की मानें तो तंबाकू का असमय सेवन मौत की दूसरी सबसे बड़ी वजह और बीमारियों को उत्पन करने के मामले में चौथी बड़ी वजह है। यही नहीं, दुनिया में कैंसर से होने वाली मौतों में भी तीस मौतें तंबाकू उत्पादों के सेवन से होती हैं। अगर विभिन्न देशों की सरकारें सिगरेट कंपनियों के खिलाफ राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाएं और कठोर कदम उठाएं तो विश्व 2040 तक तंबाकू और इससे उत्पन होने वाली भयानक बीमारियों से मुक्त हो सकता है। आकलैंड विश्वविद्यालय के विशेषज्ञ रॉबर्ट बिगलेहोल के मुताबिक सार्थक पहल के जरिए तीन दशक से भी कम समय में तंबाकू को लोगों के दिलोदिमाग से बाहर किया जा सकता है। इसके लिए सभी देशों, संयुक्त राष्ट्र और विश्व स्वास्थ्य संगठन जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को एक मंच पर आना होगा और मिलकर प्रयास करने होंगे। सरकारों को चाहिए कि वे तंबाकू उत्पाद से जुड़ी कंपनियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई तो करें ही, लोगों को जागरूक करने के लिए तंबाकू उत्पादों के पैकेटों पर बड़े आकार की स्वास्थ्य संबंधी चेतावनी भी प्रकाशित करें। दुनिया में वैधानिक चेतावनी प्रकाशित करने के मामले में भारत की स्थिति बेहद कमजोर है। 2014 की कनाडियन कैंसर सोसायटी की एक रिपोर्ट ने पाया कि चेतावनी के आकार के मामले में 198 देशों की सूची में भारत का 136वां स्थान था, जबकि 2012 में 123वां स्थान था।

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दरअसल, कई देशों में चेतावनी संबंधी कड़े कदम उठाए जाने के बाद भारत रैंकिंग में पिछड़ गया है। जागरूकता की कमी और सिगरेट कंपनियों के प्रति नरमी का ही नतीजा है कि तंबाकू सेवन से मरने वाले लोगों की तादाद लगातार बढ़ती जा रही है। लोगों को अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा तंबाकू सेवन से उत्पन बीमारियों से निपटने में लगाना पड़ता है। स्वास्थ्य मंत्रालय तथा विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2011 में केवल तंबाकूजनित बीमारियों के इलाज पर देश के सकल घरेलू उत्पाद का 1.16 फीसद खर्च हुआ। गौर करें तो यह धनराशि केंद्र तथा राज्य सरकारों द्वारा स्वास्थ्य के क्षेत्र में 2011-12 में जितना खर्च किया गया उससे तकरीबन बारह फीसद अधिक है। जबकि यह राशि गरीबी और कुपोषण मिटाने पर लगनी चाहिए। तंबाकू उत्पादों की गिरफ्त में सबसे ज्यादा युवा हैं और इसका दुष्प्रभाव उनके स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। देश में नशाखोरी किस कदर बढ़ी है यह इसी से समझा जा सकता है कि पिछले दो साल में मादकपदार्थों की तस्करी के करीब पैंतीस हजार मामले दर्ज हुए हैं। इनमें से सबसे अधिक मामले पंजाब के हैं। पिछले साल भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद के एक सर्वेक्षण से भी खुलासा हो चुका है कि बच्चे धूम्रपान की ओर तेजी से आकर्षित हो रहे हैं और यह उनके स्वास्थ्य के लिए बेहद खतरनाक है। रिपोर्ट में कहा गया है कि सत्तर प्रतिशत छात्र पंद्रह साल से कम उम्र में ही पान मसाला, सिगरेट, बीड़ी और खैनी का सेवन शुरू कर देते हैं। बीते वर्ष स्वीडिश नेशनल हेल्थ एंड वेलफेयर बोर्ड और ब्लूमबर्ग फिलांथ्रोपिज की रिसर्च से भी उजागर हो चुका है कि धूम्रपान से हर साल छह लाख से अधिक लोग मरते हैं जिनमें दो लाख से अधिक बच्चे व युवा होते हैं।

धूम्रपान केवल इसके व्यसनी लोगों को नुकसान नहीं पहुंचाता, बल्कि जो सेकंड स्मोकिंग करते हैं यानी जो खुद तंबाकू सेवन नहीं करते, मगर पास में मौजूद रहने के कारण जिनकी सांस में तंबाकू का धुआं जाता है वे भी खमियाजा भुगतते हैं। प्रसिद्ध मेडिकल जर्नल ‘लैंसेट’ की एक रिपोर्ट बताती है कि चालीस फीसद बच्चों और तीस फीसद से अधिक महिलाओं-पुरुषों पर सेकेंड धूम्रपान का घातक प्रभाव पड़ता है। उनमें से बहुत-से शीघ्र ही दमे और फेफड़े के कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों के शिकार बन जाते हैं। बीते वर्ष विश्व स्वास्थ्य संगठन के टुबैको-फ्री इनिशिएटिव के प्रोग्रामर डॉ एनेट ने धूम्रपान को लेकर गहरी चिंता जताते हुए कहा था कि अगर लोगों को इस बुरी लत से दूर नहीं रखा गया तो गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। अच्छी बात यह है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने विकासशील देशों में तंबाकू उत्पादों की वजह से होने वाली मौतों को संजीदगी से लिया है और इनकी रोकथाम के लिए यूएनडीपी (यूनाइटेड नेशंस डेवलपमेंट प्रोग्राम) के साथ मिल कर तंबाकू पर नियंत्रण की प्रतिबद्धता जताई है। पिछले साल ग्रेटर नोएडा के एक्सपो मार्ट में फ्रेमवर्क कन्वेंशन आॅन टोबैको कंट्रोल (एफसीटीसी) कॉप-7 (कॉन्फ्रेंस आॅफ पार्टीज-7) में विश्व के कई देशों ने शिरकत की थी। इस सम्मेलन में भारत की ओर से भी (विभिन्न संस्थानों के सहयोग से) तंबाकू की वजह से कैंसर, हृदय रोग और मुंह की बीमारियां होने के बारे में एक विस्तृत रिपोर्ट पेश की गई थी। इस रिपोर्ट के मुताबिक भारत में सात करोड़ महिलाएं भी चबाने वाले तंबाकू उत्पादों का सेवन कर रही हैं।

यह किसी से छिपा नहीं है कि गांवों और शहरों में हर जगह तंबाकू उत्पाद उपलब्ध हैं और युवा वर्ग उनका आसानी से सेवन कर रहा है। अगर इसकी बिक्री पर रोक लगती तो निश्चित ही इसका दुष्प्रभाव युवाओं की रगों में नहीं बहता। बेहतर होगा कि सरकार इस पर विचार करे कि नौजवानों को इस जहर से कैसे दूर रखा जाए और उन्हें किस तरह स्वास्थ्य के प्रति सचेत किया जाए। यह आवश्यक है कि नशाखोरी के विरुद्ध कड़े कदम उठाए जाएं। सही है कि सरकार द्वारा सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान को रोकने के लिए कानून और कठोर अर्थदंड का प्रावधान किया गया है लेकिन हकीकत है कि युवाओं के मन-मस्तिष्क में जहर घोलती यह बुरी लत फैलती ही जा रही है। कानून के बावजूद बस स्टैंड, रेलवे स्टेशनों, अस्पतालों व अन्य सार्वजनिक स्थलों पर लोगों को धूम्रपान करते देखा जा सकता है। यह स्थिति इसलिए बनी हुई है कि कानून का सख्ती से पालन नहीं हो रहा है।धूम्रपान के खिलाफ न सिर्फ कड़े प्रावधान हों बल्कि उनका सही ढंग से क्रियान्वयन भी हो। क्यों न तंबाकू की बिक्री पर ही रोक लगा दी जाए या वह अत्यधिक सीमित कर दी जाए। इसके अलावा, लोगों को धूम्रपान से दूर करने और दूर रखने के लिए तंबाकू के सेवन से उत्पन होने वाली खतरनाक बीमारियों से अवगत कराया जाना जरूरी है। इसके लिए सरकार और स्वयंसेवी संस्थाओं, सभी को आगे आना होगा। इस दिशा में स्कूल अहम भूमिका निभा सकते हैं। इसलिए कि स्कूलों में होने वाली सांस्कृतिक गतिविधयां तथा खेलकूद बच्चों के मन पर सकारात्मक असर डालते हैं। इन गतिविधियों के सहारे बच्चों में नैतिक संस्कार विकसित किए जा सकते हैं।  पहले स्कूली पाठ्यक्रमों में नैतिक शिक्षा अनिवार्य होती थी। शिक्षक बच्चों को आदर्श व प्रेरणादायक किस्से-कहानियों के माध्यम से सामाजिक-राष्ट्रीय सरोकारों से जोड़ते थे। धूम्रपान के खतरनाक प्रभावों को रेखांकित कर उससे दूर रहने की सीख देते थे। लेकिन अब स्कूली पाठ्क्रमों से नैतिक शिक्षा गायब है। प्रधानमंत्री नौजवानों को नशाखोरी के विरुद्ध सचेत कर रहे हैं, अच्छी बात है। लेकिन देश की कार्यपालिका के प्रमुख से केवल नसीहत की नहीं, ठोस कार्रवाई की भी उम्मीद की जाती है।

 

 

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