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ढलान पर वैश्वीकरण

ब्रेक्जिट में एक बड़ा मसला यह था कि ब्रिटेन यूरोप के रोमानिया, चेक गणराज्य जैसे गरीब देशों के मजदूरों को अपने यहां आने नहीं देना चाहता था।

Author April 26, 2017 4:34 AM
वैश्वीकरण ।

 अरविंद कुमार सेन

ताकतवर लोग किस लहजे से कायदे-कानून हमेशा अपने पक्ष में मोड़ लेते हैं, इससे जुड़ी अंग्रेजी की एक पुरानी कहानी है। कहानी का नायक शेर जंगल के बाकी जानवरों से कहता है कि सभी का पूरे संसाधनों पर हक है। यह दीगर बात है कि सभी जानवरों की क्षमता बराबर नहीं होती। जो सबसे मजबूत होगा और सबसे तेज दौड़ेगा, वही सबसे ज्यादा संसाधनों का उपभोग करेगा। जब बाकी जानवरों ने इस अन्यायपूर्ण कायदे के खिलाफ आवाज उठाई तो शेर की अगुआई में मजबूत जानवरों ने कहा है कि धीरे-धीरे कायदे-कानून में बदलाव करके उन्हें कमजोर व छोटे जानवरों के माफिक बना दिया जाएगा। नियमों में बदलाव का वह दिन नहीं आया और एक दिन जंगल के लगभग सारे संसाधन समाप्त हो गए। वैश्विक कारोबार में आ रही मंदी और वैश्वीकरण की धारा उल्टी पड़ने (डी-ग्लोबलाइजेशन) की चर्चाओं के बीच मौजूदा आलम पर यह कहानी सटीक बैठती है।

वैश्वीकरण के झंडाबरदार रहे पश्चिमी यूरोप के देश और अमेरिका इस समय अपने दड़बों में घुसकर संरक्षणवाद (प्रोटेक्शनिज्म) की चादर ओढ़ने में लगे हैं। 1945 से 1994 तक ‘गैट’ (कारोबार व दरों पर सामान्य समझौता) के रूप में और 1995 से विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के रूप में अंतरराष्ट्रीय कारोबार की राह में आने वाली समस्त बाधाओं को हटाने का दावा करने वाला डब्ल्यूटीओ व्यावहारिक तौर पर खत्म हो चुका है, केवल औपचारिक घोषणा बाकी है। लेकिन क्या हम वैश्वीकरण के खात्मे की घोषणा करने में कुछ जल्दी कर रहे हैं? क्या वैश्वीकरण की धारा उलटी पड़ने का समर्थन करने वाली ठोस बातें हमारे पास हैं? सबसे पहले वैश्विक कारोबार की बात करते हैं। वैश्वीकरण के समर्थक और विरोधी, दोनों पक्ष वैश्विक कारोबार को वैश्वीकरण की नब्ज मानते हैं। 2008 की आर्थिक मंदी के बाद से वैश्विक कारोबार जिस फिसलन पर चल पड़ा है, उसे संभलने का मौका आज तक नहीं मिला है। 1998 के एशियाई आर्थिक संकट के बाद से लेकर 2008 तक के अच्छे दिनों में जो देश वैश्विक बाजार की राह में आ रही आर्थिक अड़चनों को हटाने की पुरजोर वकालत करते थे, आर्थिक मंदी के बाद से वे देश संरक्षणवादी कदम उठाने में लगे हैं। भारत, चीन और ब्राजील जैसे उभरते बाजारों का दोहन करने वाले विकसित देश घरेलू नौकरियां बचाने के नाम पर ऐसे नीतिगत फैसले ले रहे हैं जिनसे विकासशील देशों में जा रही नौकरियां खत्म होकर उनके अपने लोगों को ही मिलती रहें।

वैश्वीकरण और संरक्षणवाद एक-दूसरे के विपरीत हैं। संरक्षणवादी नीतियों से न केवल वैश्विक कारोबार को नुकसान पहुंचा बल्कि इससे विकासशील और पिछड़े देशों में हो रहे प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के प्रवाह में भी कमी आई है। मिसाल के तौर पर कुछ आंकड़ों पर गौर करें। फिलवक्त वैश्विक कारोबार बीते सत्तर सालों के सबसे निचले स्तर पर है। संयुक्त राष्ट्र कारोबार और विकास कॉन्फ्रेंस के आंकड़ों के मुताबिक बड़ी कंपनियों की ओर से किए जा रहे प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में बीते सात साल से लगातार कमी आ रही है। आर्थिक मंदी के बाद से एफडीआइ प्रवाह में लगभग सात सौ अरब डॉलर की कमी आ चुकी है।वैश्वीकरण की धारा मंद पड़ने की दूसरी वजह है राष्ट्र-राज्यों या देशों का हाथ खींचना। जानकारों ने पहले भी चेताया था कि वैश्वीकरण की छांव तले बहुराष्ट्रीय कंपनियों का बढ़ता दबदबा एक समय देशों की संप्रभुता पर ही सवाल खड़ा कर देगा। लेकिन उस वक्त इतना किसी ने नहीं सोचा था कि वैश्वीकरण के तहत विदेशी निवेश को बढ़ावा देने के लिए सरकारें अर्थव्यवस्था को खोलने और खोलकर नंगा होने के बीच के नाजुक फर्क को ही भूल जाएंगी; विदेशी निवेश को ध्यान में रख कर ही हर तरह का नीति-निर्माण किया जाएगा। वैश्वीकरण से न केवल राष्ट्र-राज्यों की संप्रभुता की साख को अपूरणीय क्षति पहुंची है बल्कि देशों की नीति-निर्माण की दिशा भी लोगों की तरफ से हट कर निर्णायक रूप से कंपनियों की तरफ मुड़ चुकी है। लिहाजा, जागरूक लोगों में इसके खिलाफ गुस्सा है। इस गुस्से की अभिव्यक्ति हम दुनिया भर में देख रहे हैं, जहां लोग कारोबारी हितों के करीब मानी जाने वाली राजनीतिक पार्टियों और स्थापित नेताओं को बाहर का रास्ता दिखा रहे हैं।

बात चाहे ब्रेक्जिट की हो, तुर्की में एर्दोगान की लगातार मजबूत होती स्थिति हो, अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप की जीत हो या यूरोप में दक्षिणपंथी पार्टियों के मजबूत होने का रुझान हो, सब जगह जीत रही पार्टियां अपने-आप को कारोबारी हितों से दूर रखने का प्रयास कर रही हैं। चूंकि कारोबारी हित, वैश्विक कारोबार और वैश्वीकरण आपस में गुंथे हुए हैं, इसलिए कारोबारी हितों पर पड़ रही चोट का सीधा असर वैश्वीकरण पर देखने को मिल रहा है। वैश्वीकरण की धारा कमजोर पड़ने का तीसरा और सबसे अहम कारण है लोगों का इस प्रक्रिया में छीजता भरोसा। शुरू में कहा गया था कि वैश्वीकरण के चलते पूंजी और श्रम का वैश्विक स्तर पर खुला प्रवाह होगा। इससे वैश्विक स्तर पर, खासकर विकासशील देशों में नई नौकरियां पैदा होंगी और खुशहाली सब लोगों तक पहुंचेगी। मगर अब यह लगभग साबित हो चुका है कि वैश्वीकरण की प्रक्रिया पूरी तरह से पूंजीपतियों के पक्ष में झुकी हुई है। वैश्वीकरण के तहत पूंजी का आवागमन तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खुले रूप से हुआ है लेकिन श्रम के प्रवाह पर अंकुश लगा हुआ है। विकसित देश अपनी पूंजी की राह में आने वाले सभी रोड़े डब्ल्यूटीओ जैसी संस्थाओं के जरिए हटवा लेते हैं मगर अपनी सीमाओं को इस तरह से बांधना चाहते हैं कि विकासशील देशों के मजदूर प्रवेश न कर पाएं।

ब्रेक्जिट में एक बड़ा मसला यह था कि ब्रिटेन यूरोप के रोमानिया, चेक गणराज्य जैसे गरीब देशों के मजदूरों को अपने यहां आने नहीं देना चाहता था लेकिन यूरोपीय संघ के साझा बाजार का दोहन करना चाहता था। अमेरिका भी मैक्सिको के बाजार का दोहन करना चाहता है लेकिन मैक्सिको के मजदूरों को रोकने के लिए दीवार बनवाने पर आमादा है। अमेरिकी कंपनियों को भारत का बाजार हर हाल में चाहिए मगर भारत के मजदूर तो दूर, कुशल कर्मचारियों के भी अपने यहां आने पर अमेरिका रोक लगाना चाहता है। एच1बी वीजा पर लंबे समय से चल रहा विवाद इसी का उदाहरण है। पिछले दिनों भारत दौरे पर आए आस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री मैलकॉम टर्नबुल ने भारत से जाते ही 457 वीजा योजना को बंद करने का एलान कर दिया। ध्यान रहे, 457 वीजा योजना का उपयोग भारतीय आइटी क्षेत्र के कुशल कामगारों द्वारा किया जाता था। लोग अब इस बात को समझ चुके हैं कि वैश्वीकरण से भले निवेश बढ़ता है, कारोबार के आकार में इजाफा होता है, लेकिन इसका फायदा तो बड़ी कंपनियों और उनके शेयरधारकों को ही मिलता है। इसमें आम लोगों को फायदा कहां है? सब देश निवेश के रूप में पूंजी चाहते हैं लेकिन मजदूरों को नौकरियां कोई नहीं देना चाहता। विडंबना देखिए, दुनिया के सबसे महत्त्वपूर्ण माने जा रहे कारोबारी समझौते (प्रशांत पार कारोबारी समझौता यानी टीपीपी) को डोनाल्ड ट्रंप सरकार ने एक झटके में रद््द कर दिया लेकिन कंपनियों और बड़े कारोबारियों के अलावा किसी ने इसका विरोध नहीं किया। क्योंकि इस समझौते से फायदा कंपनियों और बड़े कारोबारियों को होना था, आम लोगों को नहीं।  वैश्वीकरण की यही सबसे बड़ी खामी है कि इसका सबसे ज्यादा फायदा कंपनियों और बड़े कारोबारियों को ही मिला है। लोगों ने अपने रोजगार खोए हैं और देशों ने अपनी संप्रभुता एक हिस्सा खोकर कीमत चुकाई है। आज राष्ट्र-राज्य और लोग, दोनों ही वैश्वीकरण को लेकर उत्साहित नहीं हैं।

 

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