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राजनीति: जीएम तकनीक पर संशय

संयुक्त राष्ट्र ने पूर्वानुमान लगायाहै कि वर्ष 2050 तक दुनिया की आबादी का पेट भरने के लिए आज से सत्तर फीसद ज्यादा खाद्य की जरूरत होगी।

Author Published on: September 6, 2016 3:59 AM
प्रतिकात्मक तस्वीर।

संयुक्त राष्ट्र ने पूर्वानुमान लगायाहै कि वर्ष 2050 तक दुनिया की आबादी का पेट भरने के लिए आज से सत्तर फीसद ज्यादा खाद्य की जरूरत होगी। लिहाजा पैदावार बढ़ाने के लिए खेती में नए प्रयोगों को तरजीह देनी ही होगी। पर दुनिया के हर देश में जीएम प्रौद्योगिकी को लेकर संशय है।

कृषि में जीएम (जेनेटिकली मॉडिफाइड) फसलों की स्वीकृति-अस्वीकृति पर बहस फरवरी 2010 में सामने आई, जब जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रूवल कमेटी (जीइएसी) की अनुशंसा के बावजूद तत्कालीन पर्यावरण राज्यमंत्री जयराम रमेश ने बीटी बैंगन की जीएम खेती को मंजूरी देने से मना कर दिया। दरअसल, जीइएसी ने 14 अक्तूबर, 2009 को बीटी बैंगन को पूरी तरह सुरक्षित घोषित करके इसकी व्यावसायिक खेती को स्वीकृति दे दी थी। लेकिन लोगों और सामाजिक संस्थाओं के भारी विरोध के कारण इसे जयराम रमेश और उनके बाद जयंती नटराजन ने भी स्वीकृति देने से मना कर दिया।  विभिन्न राज्यों की सरकारों ने भी अनेक आधारों पर अपने यहां आनुवंशिक रूप से संशोधित (जीएम) फसलों की खेती को मंजूरी देने से मना कर दिया। मसलन, आंध्र प्रदेश जीइएसी द्वारा किए गए परीक्षणों और जानकारी से संतुष्ट नहीं था। केरल अपने यहां किसी भी प्रकार की जीएम खेती के लिए राजी नहीं था। कर्नाटक को अपने किसानों की परंपरागत खेती की चिंता थी। ओड़िशा का मानना था कि जीएम खेती छोटे किसानों के हित में नहीं होगी। और इसके साथ ही जीएम प्रौद्योगिकी से जुड़े सामाजिक-आर्थिक पक्षों पर व्यापक विचार-विमर्श करने की बात ने तूल पकड़ा। यह महसूस किया गया कि किन्हीं भी प्रकार की जीएम फसलों को मंजूरी देने से पहले इन फसलों के, उपभोक्ताओं के लिए सुरक्षित होने, किसानों के लिए दीर्घकाल तक लाभप्रद होने और पर्यावरण के अनुकूल होने पर, किसी स्वतंत्र वैज्ञानिक संस्था द्वारा व्यापक शोध और अध्ययन किए जाने की जरूरत है। तब यह शोधकार्य स्वायत्त संस्था ‘विकासशील देशों की अनुसंधान एवं सूचना प्रणाली (आरआइएस- रिसर्च ऐंड इन्फॉर्मेशन सिस्टम फॉर डेवलपिंग कन्ट्रीज)’ ने अपने हाथों में लिया।

भारत की अकेली जीएम ‘फसल’ बीटी कॉटन की खेती वर्ष 2002 में, अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनी मोनसैंटो और महाराष्ट्र हाइब्रिड सीड कं. की साझेदारी से शुरू हुई थी। एक दशक तक तो बीटी कपास की खूब अच्छी पैदावार हुई, क्योंकि जीएम फसलों की खासियत यह होती है कि अधिक उर्वर होने के साथ ही, इनमें अधिक कीटनाशकों की जरूरत नहीं होती और ये सूखा-रोधी और बाढ़-रोधी भी होती हैं। लेकिन कुछ सालों के बाद स्थिति वही नहीं रही और बीटी कपास की फसलों में कृमि आने शुरू हो गए। महंगे बीजों, कीटनाशकों और बर्बाद हुई खेती के चलते हजारों बीटी कपास किसानों ने आत्महत्या की।

बहरहाल, 2014 में जर्मनी की गोटिंजेन यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने पूरे विश्व में किए गए अपने कृषि सर्वेक्षणों के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला कि जीएम प्रौद्योगिकी से फसलों की पैदावार में बाईस फीसद की बढ़त होती है, सैंतीस फीसद कम कीटनाशक डालने पड़ते हैं और किसानों की आय अड़सठ फीसद बढ़ जाती है और यह प्रौद्योगिकी विकसित देशों के मुकाबले विकासशील देशों के लिए अधिक लाभकारी है। उधर संयुक्त राष्ट्र ने पूर्वानुमान लगाया है कि वर्ष 2050 तक दुनिया की आबादी का पेट भरने के लिए आज से सत्तर फीसद ज्यादा खाद्य की जरूरत होगी। इसलिए पैदावार बढ़ाने के लिए खेती में नए प्रयोगों को तरजीह देनी ही होगी।  वैज्ञानिक जीएम खेती की तरफदारी करते हैं। इंडियन इंस्टीट्यूट आॅफ साइंस के प्रो जी पद्मनाभन और इंटरनेशनल सेंटर फॉर जेनेटिक इंजीनियरिंग ऐंड बायोटेक्नोलॉजी के प्रो राज भटनागर ने भी बीटी बैंगन की खेती को पूरी तरह सुरक्षित कहा था और कहा था कि इससे लोगों के स्वास्थ्य को कोई खतरा नहीं। कुछ वैज्ञानिक, मसलन कृषि-बायोटेक्नोलॉजी कार्यदल के अध्यक्ष एमएस स्वामीनाथन ने यह भी कहा कि यदि यह प्रौद्योगिकी अपना भी ली जाए, तो कृषि में जैव-विविधता बचाए रखने के लिए, इससे जुड़े विशेष क्षेत्रों को इस प्रौद्योगिकी से अलग रखा जा सकता है।

हालांकि विभिन्न राज्यों में अनेक जीएम फसलों की खेती पर प्रयोग चल रहे हैं, लेकिन अभी तक केवल बीटी कपास पर सरकारी स्वीकृति मिली हुई है, जबकि अमेरिका में मक्का, सोयाबीन, कपास, कनोला, चुकंदर, पपीता, आलू; कनाडा में कनोला, सोयाबीन, चुकंदर; चीन में कपास, पपीता और पॉप्लर; अर्जेंटीना में सोयाबीन, मक्का, कपास, ब्राजील में सोयाबीन, मक्का, कपास तथा बांग्लादेश में बैंगन की जीएम खेती आधिकारिक रूप से होती है। अफ्रीका सहित कुछ अन्य देश हैं जो केवल मक्का और कपास की जीएम खेती करते हैं। फ्रांस और जर्मनी सहित यूरोपीय संघ के उन्नीस देशों में जीएम खेती पर पूर्ण प्रतिबंध है। यूरोपीय संघ के देशों में विदेशों से आयातित खाद्य पर भी लेबलिंग होना जरूरी है कि यह जीएम खाद्य है अथवा गैर-जीएम, जबकि अमेरिका में लेबलिंग अनिवार्य नहीं है। भारत में इस प्रौद्योगिकी का विरोध करने वालों का कहना है कि हमारे देश में कृषि में इतनी जैव-विविधता है, जो जीएम प्रौद्योगिकी को अपनाने से खत्म हो जाएगी। बड़ी बहुदेशीय कंपनियों के एकाधिकार के कारण किसानों को महंगे बीज और कीटनाशक उनसे खरीदने पड़ते हैं। खेती में काम करने वाले बहुत से हाथ भी इसे अपनाने से बेरोजगार हो जाएंगे। जीएम खाद्य का दो तरह से इंसानों के स्वास्थ्य पर प्रभाव पड़ सकता है- एक तो उसे खाने से, दूसरा उन पशुओं के दूध और मांस के जरिए जो जीएम चारे पर पले हों। पर्यावरण पर भी इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

बहरहाल, अब खाद्य सुरक्षा की दृष्टि से भारत इस पर नरम पड़ता दिख रहा है। कहा जा रहा है कि इस प्रौद्योगिकी को अपनाने से भारत के लगभग चौदह करोड़ किसानों को फायदा हो सकता है। अब भारत के आठ राज्यों में चावल, मक्का, सरसों, बैंगन, काबुली चना और कपास की जीएम खेती पर परीक्षण चल रहे हैं। पंजाब में सरसों, मक्का; हरियाणा में मक्का, कपास; दिल्ली में सरसों; राजस्थान में कपास; गुजरात में कपास, मक्का; महाराष्ट्र में बैंगन, चावल, मक्का और कपास; कर्नाटक में कपास और आंध्र प्रदेश में कपास और काबुली चना पर जीएम प्रयोग चल रहे हैं।  गुजरात इंस्टीट्यूट आॅफ डेवलपमेंट रिसर्च, इंडियन एग्रीकल्चरल रिसर्च इंस्टीट्यूट, नेशनल एकेडमी आॅफ एग्रीकल्चरल रिसर्च मैनेजमेंट, इंस्टीट्यूट आॅफ सोशल-इकोनोमिक चेंज, तमिलनाडु एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी और यूनिवर्सिटी आॅफ एग्रीकल्चरल साइंसेज- इन विशेषज्ञ संस्थाओं के साथ मिलकर आरआइएस ने जीएम फसलों से जुड़े विभिन्न पक्षों का व्यापक अध्ययन किया है और पिछले हफ्ते अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। यह रिपोर्ट सरकारों के लिए जीएम फसलों के सामाजिक-आर्थिक मूल्यांकन के दिशा-निर्देश के दस्तावेज प्रस्तुत करती है।

इस अध्ययन में जीएम फसलों से जुड़े पांच महत्त्वपूर्ण पहलुओं पर शोध किया गया है- आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, स्वास्थ्य संबंधी तथा पर्यावरण संबंधी। इसमें बीटी कपास के अलावा, एरोबिक चावल, बीटी बैंगन, सरसों और अन्य फसलों पर भी अध्ययन किया गया है। इसमें बताया गया है कि किसान विभिन्न फसलों की उन्नत किस्मों के बीजों के इच्छुक हैं। हालांकि बहुराष्ट्रीय कंपनियों के एकाधिकार के कारण उन्हें महंगे बीज खरीदने पड़ते हैं, फिर भी वे इनके लिए ज्यादा खर्च करने को तैयार हैं, बशर्ते कि उनकी कमाई में इजाफा हो। कई किसान मानते हैं कि सूखा-रोधी और बाढ़-रोधी जीएम फसलें लाभकारी हो सकती हैं। जीएम फसलों में कम कीटनाशक डालने पड़ते हैं और पैदावार भी अधिक होती है। कीटनाशकों का कम प्रयोग किसानों के स्वास्थ्य और वातावरण के लिए भी फायदेमंद है। इससे भूमि की उत्पादकता पर विपरीत असर नहीं पड़ता और भूजल भी दूषित नहीं होता।
जमीनी सर्वेक्षणों द्वारा अध्ययन किया गया कि क्या अधिक लागत के बावजूद जीएम फसलों से किसानों की पैदावार बढ़ी और इससे उनकी आय भी बढ़ी अथवा नहीं, क्योंकि कीमतें उत्पाद की गुणवत्ता द्वारा तय होती हैं।

अर्थात परंपरागत फसलों के मुकाबले, जीएम फसलों की गुणवत्ता भी आंकी गई। इन फसलों में कम कीटनाशक डालने पड़ते हैं, इसलिए किसानों के स्वास्थ्य की भी रक्षा होती है। कम कीटनाशकों का प्रयोग पशु-पक्षियों और भूमि की उर्वरा शक्ति को बचाए रखने के लिए भी बेहतर है। समझा जाता है कि जीएम खेती में चूंकि कम क्षेत्रफल में ही अधिक पैदावार होती है, इसलिए खेतिहर मजदूरों में बेरोजगारी की समस्या आ सकती है। उसके लिए भी, यहां तर्क दिया गया है कि हालांकि बोआई के समय बेशक कम मजदूरों की जरूरत होगी, लेकिन उपज अधिक होने के कारण कटाई के समय उतने ही अधिक हाथ चाहिए होंगे। सांस्कृतिक दृष्टि से भी समाज पर इस प्रौद्योगिकी का कोई विपरीत प्रभाव पड़ता नहीं पाया गया।
दुनिया के हर देश में, किसानों और उपभोक्ताओं, दोनों में जीएम प्रौद्योगिकी को लेकर संशय है। अत: किसी भी देश में जीएम फसलों की मंजूरी उनके सामाजिक-आर्थिक प्रभाव के मूल्यांकन के बाद ही दी जा सकती है। इस लिहाज से यह रिपोर्ट खासी महत्त्वपूर्ण है। यह जहां इन फसलों के सुरक्षा संबंधी पक्ष को सामने रखती है, वहीं इनके लाभकारी पक्ष पर भी प्रकाश डालती है।

भारत सहित, विश्व के 169 देशों ने 29 जनवरी, 2000 को जीएम प्रौद्योगिकी से जुड़े ‘काटार्गेना प्रोटोकॉल आॅन बायोडायवर्सिटी’ पर हस्ताक्षर किए थे, जो कि 11 सितंबर, 2003 से लागू हो गया। इसके तहत इस प्रौद्योगिकी के विभिन्न पक्षों को सूचीबद्ध किया गया और इसके प्रयोग से होने वाले आर्थिक-सामाजिक प्रभावों का जिक्र किया गया। लेकिन भारत पहला देश है, जहां जीएम प्रौद्योगिकी के आर्थिक-सामाजिक प्रभावों पर, बड़ी गहराई से, वैज्ञानिकों की सात संस्थाओं ने मिल कर व्यापक अध्ययन किया है और शोधपत्र प्रस्तुत किया है।
इस दस्तावेज को दिसंबर, 2016 में मैक्सिको में होने वाले जीएम फसलों से जुड़े अंतरराष्ट्रीय सम्मलेन में अन्य देशों के साथ साझा किया जाएगा।

 

 

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