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राजनीति: दुनिया के लिए संकट बनता मोटापा

मोटापा न सिर्फ उनके व्यक्तित्व को बेढब कर देता है, बल्कि उनकी कार्य क्षमता पर भी काफी बुरा असर डालता है।

Author Updated: September 28, 2016 4:03 AM
प्रतिकात्मक फोटो

इसे विडंबना नहीं तो और क्या कहेंगे कि आज जहां एक तरफ दुनिया की आबादी के एक बड़े हिस्से को खाने के लिए भरपेट अन्न नहीं मिल रहा और वह भुखमरी से अभिशप्त रहने या अधपेट रह कर जीवन गुजारने को विवश है, तो वहीं दूसरी तरफ इसी दुनिया की आबादी के एक दूसरे बड़े हिस्से में बढ़ रहा मोटापा धीरे-धीरे इसके लिए एक बड़ा संकट बनता जा रहा है। यह बात चौंकाने वाली अवश्य है, पर सच है कि आज मोटापा दुनिया के लिए धूम्रपान और आतंकवाद के बाद तीसरा सबसे बड़ा संकट बन चुका है। इस तथ्य का खुलासा मैकेंजी ग्लोबल इंस्टीट्यूट (एमजीआइ) द्वारा कुछ समय पहले जारी की गई एक अध्ययन-रिपोर्ट से हुआ है।

रिपोर्ट के अनुसार, आज दुनिया में सामान्य से अधिक वजन वाले लोगों समेत पूरी तरह मोटापे से ग्रस्त लोगों की संख्या लगभग 2.1 अरब है जो कि वैश्विक आबादी का तीस प्रतिशत है। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि लोगों में बढ़ रहे मोटापे के चलते आज वैश्विक अर्थव्यवस्था को प्रतिवर्ष तकरीबन दो हजार अरब डॉलर का नुकसान उठाना पड़ रहा है। रिपोर्ट में यह आशंका भी जताई गई है कि अगर दुनिया में इसी तरह मोटापा बढ़ता रहा तो अगले डेढ़ दशक में दुनिया की आधी आबादी पूरी तरह से इसकी चपेट में आ सकती है। गौर करने वाली बात यह भी है कि विकासशील देशों में मोटापे की समस्या का प्रकोप कुछ अधिक ही है।

आंकड़ों के मुताबिक विकासशील देशों में स्वास्थ्य के मद में होने वाले कुल खर्च में मोटापे से निजात दिलाने वाले खर्च की हिस्सेदारी यों तो अधिकतम सात प्रतिशत है, लेकिन अगर इसमें मोटापाजनित बीमारियों के खर्च को भी जोड़ दें तो यह आंकड़ा बीस प्रतिशत के पास पहुंच जाता है। इन तथ्यों को देखते हुए सर्वाधिक चिंताजनक प्रश्न यह उठता है कि अभी जब दुनिया में तीस फीसद लोग कमोबेश मोटापे से ग्रस्त हैं, तब यह समस्या वैश्विक अर्थव्यवस्था को दो हजार अरब डॉलर यानी वैश्विक जीडीपी के 2.8 प्रतिशत का नुकसान पहुंचा रही है। ऐसे में उक्त रिपोर्ट के अनुसार अगर अगले डेढ़ दशक में दुनिया की आधी आबादी पूरी तरह से इसकी चपेट में आ गई, तब यह वैश्विक अर्थव्यवस्था को कितनी हानि पहुंचाएगा? संभव है कि तब मोटापा दुनिया के लिए सबसे बड़ी और चुनौतीपूर्ण समस्या बन जाए, एक ऐसी समस्या, जिसके लिए दुनिया किसी भी तरह से तैयार न हो।

आमतौर पर यह माना जाता है कि मोटापा आर्थिक रूप से संपन्न पश्चिमी देशों की समस्या है, लेकिन यह धारणा पूरी तरह से सही नहीं है। क्योंकि भारत जैसे विकासशील देश में भी यह समस्या धीरे-धीरे अपने पांव पसार रही है। यह उल्लेखनीय है कि मोटापे के मामले में भारत का स्थान दुनिया में तीसरा है। पिछले दिनों ग्लोबल अलायंस फॉर इंप्रूव्ड न्यूट्रिशन (गेन) द्वारा किए गए एक अध्ययन में यह बात सामने आई है कि मोटापे के मामले में अमेरिका व चीन के बाद दुनिया में तीसरा स्थान भारत का ही है। इसी अध्ययन रिपोर्ट के अनुसार दुनिया के कुल मोटापाग्रस्त किशोरों का ग्यारह फीसद और वयस्कों का बीस फीसद अकेले भारत में है। भारत की अधिकांश आबादी भोजन प्रेमी है। लिहाजा, यहां स्वादिष्ट भोजनों की विविधता है। पहले लोग यह भोजन करने के बाद खेती और दूसरे कामों में कठिन शारीरिक श्रम करते थे, जिससे वह भोजन शरीर में कैलोरी की मात्रा नहीं बढ़ा पाता था।
अब आज के इस सुविधाभोगी दौर में लोग खा तो पहले जैसे रहे हैं या उससे कहीं बढ़ कर ज्यादा कैलोरी वाले भोजन कर रहे हैं, पर शारीरिक श्रम बहुत कम या न के बराबर कर रहे हैं। फलस्वरूप मोटापे व अधिक शारीरिक वजन की समस्या दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ रही है। इस संदर्भ में भारत का हालिया राष्ट्रीय पारिवारिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण भी उल्लेखनीय है, जिसके अनुसार भारत में बीस फीसद से अधिक शहरी लोग अतिभारित या मोटे हैं। इन बातों से स्पष्ट है कि मोटापा अब पश्चिमी देशों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह यह धीरे-धीरे पूरी दुनिया को अपनी चपेट में लेता जा रहा है।

इसी क्रम में अगर इस बात पर विचार करें कि आखिर मोटापा किस प्रकार वैश्विक अर्थव्यवस्था पर बुरा असर डालता है तो कई चीजें हमारे सामने आती हैं। दरअसल, मोटापा एक ऐसी समस्या है जो न सिर्फ इससे ग्रस्त व्यक्तियों के निजी व्यक्तित्व को बेढब बनाता है, बल्कि उनके समग्र कार्य-कलाप, कार्य-क्षमता व गतिविधियों को भी बुरी तरह से प्रभावित करता है। इसको थोड़ा और अच्छे से समझने की कोशिश करें तो एक तरफ तो मोटे व्यक्तियों की खाद्य आवश्यकता सामान्य व्यक्ति से कहीं अधिक होती है, वहीं दूसरी तरफ वे अपने सामान्य से अधिक वजन के कारण सामान्य वजनी लोगों की अपेक्षा काफी सुस्त व ढुलमुल रवैये वाले हो जाते हैं। साथ ही मोटापे के कारण उनमें अनेक प्रकार की मोटापाजनित बीमारियां घर कर लेती हैं, जिनके इलाज में भी बहुत व्यय होता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि मोटापे से ग्रस्त लोगों की स्वास्थ्य संबंधी लागत जहां सामान्य व्यक्ति से बहुत अधिक होती है, वहीं सुस्त व ढुलमुल रवैये के कारण उनकी उत्पादकता का स्तर काफी कम होता है। सीधे शब्दों में कहें तो मोटे व्यक्तियों में खपत बहुत अधिक होती है जबकि उनके सुस्त व ढुलमुल रवैये के कारण उनकी उत्पादकता बेहद कम होती है। अब मोटे लोगों में खपत और उत्पादकता के बीच का यह असंतुलन ही वह कारण है कि आज मोटापा वैश्विक अर्थव्यवस्था को भारी हानि पहुंचा रहा है।

हालांकि ऐसा नहीं है कि आज दुनिया इस समस्या को लेकर बिलकुल भी सचेत नहीं है। दुनिया में मोटापे को नियंत्रित करने के लिए कमोबेश प्रयास किए जा रहे हैं। एमजीआइ के उपर्युक्त अध्ययन में ही दुनिया में मोटापे की रोकथाम के लिए किए जा रहे करीब छह दर्जन प्रयासों का उल्लेख किया गया है। इनमें खाद्य पदार्थों पर कैलोरी व पोषण की जानकारी देने से लेकर जन-स्वास्थ्य जैसे अभियान चलाने तक के उपायों की लंबी फेहरिस्त है। हालांकि अध्ययन में पाया यही गया है कि इनमें से अधिकतर प्रयास मोटापे की रोकथाम में कोई खास कारगर नहीं हो रहे। विचार करें तो इन उपायों के विशेष रूप से कारगर न रहने के पीछे मूल कारण जागरूकता का अभाव ही है। होता यह है कि मोटापा उन्हीं लोगों को सर्वाधिक चपेट में लेता है जो खान-पान के विषय में अजागरूक, केवल स्वादलोभी व बेहद आलसी होते हैं। ऐसे लोग स्वाद लेने के चक्कर में उच्च कैलोरीयुक्त खाना तो खूब खाते हैं, लेकिन आलस के मारे उस कैलोरी की मात्रा को नियंत्रित करने के लिए कोई विशेष व्यायाम आदि नहीं करते। परिणाम यह होता है कि उनके शरीर में धीरे-धीरे कैलोरी की मात्रा काफी अधिक हो जाती है और वे मोटापे की समस्या से ग्रस्त हो जाते हैं।

फास्ट फूड का बढ़ता चलन भी मोटापे की समस्या को और बढ़ा रहा है। दरअसल भारत में दोनों तरह का कुपोषण काफी है। एक तरफ अभावजनित कुपोषण है। पर्याप्त पोषक आहार न मिलने से देश के चालीस से पैंतालीस फीसद बच्चों का अपेक्षित शारीरिक विकास नहीं हो पाता है, जिससे उनमें हमेशा रोग-प्रतिरोधक क्षमता की कमी बनी रहती है। दूसरी तरफ, ऐसा कुपोषण है जो अभावजनित तो नहीं है, पर खान-पान की ऐसी संस्कृति की देन है जिसमें सेहत की परवाह नहीं की जाती। अत: कुल मिला कर स्पष्ट है कि मोटापे की समस्या की रोकथाम के लिए सबसे पहली आवश्यकता जागरूकता लाने की है।

अब चूंकि मोटापा किसी एक देश की समस्या नहीं है, इससे दुनिया का कमोबेश हर देश प्रभावित है, ऐसे में इसकी रोकथाम की खातिर जागरूकता लाने के लिए वैश्विक स्तर पर प्रयास किया जाना चाहिए। जागरूकता अभियानों के जरिए लोगों को यह समझाने की जरूरत है कि मोटापा न सिर्फ उनके व्यक्तित्व को बेढब कर देता है, बल्कि उनकी कार्य क्षमता पर भी काफी बुरा असर डालता है। इसके अतिरिक्त मोटापे से बचने के उपायों के विषय में भी लोगों को जागरूक किए जाने की जरूरत है। जैसे, तली-भुनी, अत्यधिक शुगरयुक्त चीजों को खाने से परहेज, फल व हरी सब्जियों का अधिकाधिक सेवन, कैलोरी को संतुलित रखने के लिए नियमित व्यायाम आदि मोटापे से बचने के तमाम उपायों के विषय में लोगों को बताया जा सकता है। इसके अलावा इस दिशा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा संयुक्त राष्ट्र में रखी गई ‘अंतरराष्ट्रीय योग दिवस’ की सोच को इस वैश्विक संस्था की मान्यता मिलना भी काफी कारगर सिद्ध हो सकता है।

अंतरराष्ट्रीय योग दिवस जैसी चीज से योग व व्यायाम आदि को लेकर लोगों में स्वत: ही काफी जागरूकता आएगी। अब अगर लोग अपने जीवन में नियमित योग व व्यायाम को स्थान देने लगें तो मोटापे की समस्या को छूमंतर होने में ज्यादा समय नहीं लगेगा। अत: कुल मिला कर कहने का आशय यही है कि अगर दुनिया को मोटापे की इस समस्या से- जो काफी विकराल रूप ले चुकी है तथा आगे और विकराल हो सकती है- से बचना है तो उसे अभी से इस दिशा में गंभीर होते हुए उपर्युक्त प्रयास करने की जरूरत है। क्योंकि अगर अभी इस समस्या को लेकर गंभीरता न दिखाई गई तो हो सकता है एक समय ऐसा आ जाए जब दुनिया के लिए मोटापे से मुक्ति पाना तो दूर, इसको झेलना मुश्किल हो जाएगा।

 

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