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मरे हुए पर मार

धीरे-धीरे संभावित बदलाव के प्रति मानसिक रूप से तैयार हो जाते हैं या बदलाव के बाद आने वाली कठिनाइयों को अपनी नियति मान लेते हैं।

देश में वस्तु एवं सेवा कर 1 जुलाई 2017 से लागू हो रहा है।

किंवदंती है कि एक राजा को अपने इकलौते बेटे से बेहद लगाव था। राजा बेटे को किसी भी कीमत पर नहीं खोना चाहता था। दरबार के वैद्य-हकीमों ने राजा को मशवरा दिया कि राजकुमार को बचपन से ही हल्का-हल्का जहर दिया जाए। शुरुआती खुराकों की मात्रा बहुत कम होगी और बाद में समय के साथ खुराकों की मात्रा में इजाफा किया जाएगा। धीरे-धीरे नियमित अंतराल पर जहर दिए जाने के कारण राजकुमार का शरीर जहर का आदी हो जाएगा। साथ ही, राजकुमार के शरीर में जहर के प्रति प्रतिरोधक क्षमता भी विकसित हो जाएगी। एक समय आएगा जब राजकुमार पर बड़ी मात्रा में दिए गए जहर का भी असर नहीं होगा।

आर्थिक लफ्जों में ‘नए सामान्य’ (न्यू नॉर्मल) की अवधारणा के मुताबिक धीरे-धीरे संकट के आकार में बढ़ोतरी होने के कारण हम संकट के आदी होते जाते हैं। चूंकि हर नया संकट बड़ा व गंभीर होता है, इसलिए पुराना संकट छोटा जान पड़ता है। बड़े आर्थिक सुधार (जिनसे बड़े पैमाने पर लोगों को परेशानी होने का अंदेशा होता है) भी इसी तर्ज पर लागू किए जाते हैं। पहले महज उस आर्थिक मसले पर चर्चा छेड़ी जाती है। लोगों के कड़े विरोध के बीच चर्चा बंद हो जाती है। फिर उस आर्थिक मसले के संबंध में प्रस्ताव रखा जाता है। विरोध होता है और प्रस्ताव पर राय-मशवरा बंद हो जाता है।लेकिन इन सब कवायदों के जरिए सरकार अपना मकसद पूरा करने में कामयाब हो जाती है। लोग धीरे-धीरे संभावित बदलाव के प्रति मानसिक रूप से तैयार हो जाते हैं या बदलाव के बाद आने वाली कठिनाइयों को अपनी नियति मान लेते हैं। वस्तु व सेवा कर यानी जीएसटी इसका ताजा उदाहरण है। जीएसटी से मिलने वाले फायदों पर कोई दो मत नहीं है लेकिन यह भी सच है कि इसके लागू होने से राज्यों की संविधानप्रदत्त वित्तीय स्वायत्तता में कमी आएगी, साथ ही सबसे बड़ा खमियाजा भी आम लोगों और छोटे कारोबारियों के हिस्से में आएगा।

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खेती-किसानी को आय-कर के दायरे में लाने के नीति आयोग के सुझाव को भी इसी रोशनी में देखा जाना चाहिए। भले ही वित्तमंत्री ने यह कह कर फिलवक्त इस चर्चा पर विराम लगा दिया हो कि कृषि को आय-कर के दायरे में लाने की सरकार की मंशा नहीं है। मगर हमें इससे यह निचोड़ नहीं निकालना चाहिए कि खेती-किसानी पर आय-कर का मामला रफा-दफा हो गया है। नीति आयोग ने कृषि पर आय-कर लगाने के बारे में सुझाव देकर सार्वजनिक विमर्श की दिशा में एक बेहद अहम काम पूरा कर दिया है। कृषि पर आय-कर की चर्चा अब नए स्तर पर पहुंच गई है। अगली बार चर्चा इस बात पर नहीं होगी कि खेती-किसानी पर आय-कर लगाया जाए या नहीं, बल्कि इस बात पर बहस होगी कि कौन-से किसानों को आय-कर के दायरे से बाहर रखा जाए और किन्हें अंदर।
बहरहाल, सवाल यह है कि क्या वाकई खेती-किसानी पर आय-कर लगाया जाना चाहिए? देश की जर्जर हो चली कृषि अर्थव्यवस्था के बारे में कुछ ऐसे मोटे-मोटे तथ्य हैं जो सब लोग जानते हैं। मसलन, राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के हालिया आंकड़ों के मुताबिक 1995 से 2015 के बीच देशभर में 3,18,528 किसानों ने आत्महत्या की है। एनसीआरबी के मुताबिक साल 2015 में 12,602 किसानों और खेतिहर मजदूरों ने आत्महत्या की है। यानी बीते साल के मुकाबले किसानों-खेतिहर मजदूरों के आत्महत्या करने के मामलों में बयालीस फीसद की बढ़ोतरी हुई है। जब देश में औसतन हर 42वें मिनट एक किसान या खेतिहर मजदूर आत्महत्या कर रहा हो, तो यह खेती-किसानी पर छाए गहरे संकट का सबसे बड़ा सबूत है। जिस खेती-किसानी में मौत का खेल रुकने का नाम नहीं ले रहा हो, वहां संकट को टालने के बजाय आय-कर की बात करना एक क्रूर मजाक नहीं, तो और क्या है!

2014 के चुनावी घोषणापत्र में भाजपा ने किसानों को उपज का डेढ़ गुना ज्यादा दाम देने का वादा किया था। क्या सरकार ने उस वादे को पूरा किया? मगर भारतीय कृषिक्षेत्र इससे भी बड़ी कुछ संरचनात्मक किस्म की दिक्कतों से जूझ रहा है। देश की अर्थव्यवस्था में कृषि का हिस्सा महज चौदह फीसद रह गया है लेकिन अब भी देश की आबादी का आधा बोझ खेती-किसानी से रोजी-रोटी कमाने की जद््दोजहद में लगा है। हमारे छियासी फीसद किसान छोटे या मझोले आकार के सीमांत किसान हैं जिनके पास दो हेक्टेयर या इससे कम खेती की जमीन है। उदारीकरण के इस दौर में, जब बड़े पैमाने पर उत्पादन (इकोनॉमी आॅफ द स्केल) अर्थव्यवस्था के हर क्षेत्र का मंत्र बन चुका है, हमारे किसान अपने छोटे-छोटे भूमि के टुकड़ों पर दो जून की रोटी का जुगाड़ करने के लिए खेती करते हैं, उनके पास व्यापारिक फसलों की बड़े पैमाने पर खेती करके वैश्विक बाजार में कारोबार करने का सामर्थ्य और संसाधन नहीं हैं।

1990 के आर्थिक सुधारों के बाद से चाहे जिस भी राजनीतिक दल की सरकार रही हो, सभी ने व्यवस्थित रूप से कृषिक्षेत्र में निवेश कम किया है। खाद, बीज, बिजली, पानी, डीजल और कृषि उपकरणों जैसी कृषि आगतों के उत्पादन और आपूर्ति से सरकार लगभग बाहर निकल चुकी है। कृषि आगतों के दामों में साल-दर-साल बढ़ोतरी हुई है और किसान पूरी तरह बाजार भरोसे हैं। यह दीगर बात है कि किसान की उपज को वाजिब दामों पर खरीदने वाला कोई नहीं है। यही कारण है कि किसान आत्महत्याएं केवल गरीब सूबों तक सीमित नहीं हैं बल्कि तमिलनाडु और महाराष्ट्र जैसे संपन्न सूबों में भी हो रही हैं। खेती-किसानी पर आय-कर की दुआई देने वाले का कहना है कि भारत के किसान पुरानी पड़ चुकी तकनीकों का उपयोग करते हैं, इसलिए उनका प्रति हेक्टेयर उत्पादन कम है। किसानों को चाहिए कि वे नई तकनीक अपनाकर उत्पादन बढ़ाएं, मुक्त बाजार की प्रतिस्पर्धा में भाग लें और सरकार को आय-कर चुकाएं। लेकिन सच यह है कि पंजाब-हरियाणा में प्रति हेक्टेयर उत्पादकता दुनिया के विकसित देशों से भी ज्यादा है। जाहिर है, समस्या की जड़ें कहीं ज्यादा गहरी हैं। सरकारी निवेश में हुई लगातार कमी ने किसानों को पूरी तरह से बाजार के हवाले कर दिया है और ऐसे में मुट्ठीभर कथित बड़े किसान भी आज आय-कर चुकाने की स्थिति में नहीं हैं।

नीति आयोग का कहना है कि हमारे देश का कर-दायरा बहुत सीमित है। यह बात सच है। मिसाल के तौर पर अंकेक्षण वर्ष 2014-15 में केवल 1.91 करोड़ लोगों ने आय-कर चुकाया। दूसरे शब्दों में देश की कुल आबादी के महज डेढ़ फीसद लोग आय-कर चुकाते हैं। दूसरे देशों के मुकाबले हमारे यहां बहुत कम लोग आय-कर चुका रहे हैं। लेकिन इसके लिए केवल किसानों को क्यों सूली पर चढ़ाया जाए? एक करोड़ रुपए से अधिक आमदनी वाले लोगों पर उप-कर लगाने जैसे छिटपुट टोटके करने के बजाए क्यों न सरकार उन पर कर लगाती है? सब जानते हैं कि मझोले कारोबारी, छोटे व्यवसायी और पेशेवर सेवाएं देने वाले लोग कर के दायरे से बच निकलते हैं। उनको कर-दायरे में लाने के लिए क्यों नहीं तंत्र को मजबूत किया जाता है?कुछ बड़े लोग अपनी आमदनी को कृषि आमदनी के रूप में दिखा कर आय-कर से बच निकलते हैं। लेकिन इसके लिए किसानों को निशाना बनाने के बजाय आय-कर विभाग को अपने कर-नियमों में मौजूद झोल दूर करने चाहिए ताकि लोग उनको अपने मतलब के लिए तोड़-मरोड़ न सकें। आय-कर का दायरा बढ़ाने के दूसरे कई बेहतर रास्ते सरकार के पास हैं। इस काम के लिए खेती-किसानी पर आय-कर सबसे अंतिम विकल्प होना चाहिए।

 

 

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