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राजनीतिः दम तोड़तीं मानवीय संवेदनाएं

मध्यप्रदेश और झारखंड जैसे राज्यों से इसी तरह की खबरें आती रही हैं कि मृतक का कोई सगा-संबंधी उसकी लाश को कभी पीठ पर लाद कर, तो कभी साइकिल पर रख कर अपने घर ले जा रहा है। कारण सिर्फ यही है कि उसके पास लाश को घर तक ले जाने के लिए एंबुलेंस का किराया नहीं था। कई बार तो हमें ऐसी खबरें भी सुनाई देती हैं कि किसी निजी अस्पताल द्वारा किसी मृत व्यक्ति की लाश उसके परिजनों को केवल इसलिए नहीं सौंपी गई कि उसने अस्पताल का बिल चुकता नहीं किया था।

Author May 16, 2018 3:08 AM
सोनू की मौत के बाद जब पंकज अपने भाई के शव को वापस धामपुर ले जाना चाह रहा था, उस समय उसके पास एंबुलेंस का भाड़ा देने के लिए पांच हजार रुपए नहीं थे।

भारतवर्ष महादानियों और परोपकारियों का देश माना जाता है। अगर हम अपने देश में चारों ओर नजरें उठा कर देखें तो लगभग प्रत्येक राज्य में लंगर, भंडारे, छबीलें, मुफ्त स्वास्थ्य सुविधाएं, गरीब कन्याओं की शादियां, आंखों के मुफ्त ऑपरेशन शिविर, ठंड में गरीबों को स्वेटर और कंबल बांटने, गरीब बच्चों को मुफ्त शिक्षा देने जैसी गतिविधियां संचालित होती दिखाई देती हैं। इन्हें देख कर तो यही प्रतीत होता है कि परोपकारियों के इस देश में किसी गरीब व्यक्ति को किसी भी प्रकार की दुख-तकलीफ नहीं हो सकती। इसमें कोई संदेह भी नहीं कि गरीबों के कल्याण के लिए संचालित होने वाले इस प्रकार के संगठनों से देश के गरीबों को फायदा पहुंचता भी रहता है।

परंतु इसी तस्वीर का दूसरा पहलू इतना भयावह है, जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते। इसी परोपकारी और दानी समाज में हमें ऐसे लोग भी मिल जाएंगे जिन्हें देख कर यह कहने को मजबूर होंगे कि शायद इस पृथ्वी से मानवता समाप्त हो चुकी है और मानवीय संवेदनाएं दम तोड़ चुकी हैं। दिलों को झकझोर कर रख देने वाली ऐसी खबरें सुन कर तो एक बार लगने लगता है कि क्या वास्तव में हमारे देश में गरीबों के कल्याण के लिए कोई संगठन कार्य कर भी रहा है या नहीं? और यदि है भी तो ऐसे संकटकालीन समय में यह संगठन या इनसे जुड़े किसी सदस्य की नजरें उस समय ऐसे लाचार, बेबस व गरीब व्यक्ति पर क्यों नहीं पड़तीं जो अपने जीवन के कठिनतम दौर से गुजर रहा होता है?

पिछले दिनों उत्तराखंड की राजधानी देहरादून से दिल दहला देने वाला एक ऐसा ही समाचार मिला। उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले के धामपुर कस्बे का पंकज नामक निवासी अपने बीमार भाई सोनू को लेकर धामपुर से देहरादून आया। पंकज धामपुर में फलों की रेहड़ी लगा कर परिवार का पालन-पोषण करता है। टीबी से पीड़ित उसके भाई सोनू को धामपुर के अस्पताल से देहरादून के सरकारी अस्पताल में रेफर किया गया था। मात्र दो हजार रुपए जेब में रख कर गरीब पंकज अपने बीमार भाई का इलाज कराने देहरादून पहुंचा। पैसों की तंगी के चलते समुचित जांच आदि न हो पाने के कारण सोनू की मौत हो गई। अस्पताल द्वारा सोनू को जांच की निशुल्क सुविधा इसलिए उपलब्ध नहीं कराई गई कि वह स्थायी रूप से उत्तराखंड का निवासी होने का प्रमाण पत्र उपलब्ध नहीं करा सका।

सोनू की मौत के बाद जब पंकज अपने भाई के शव को वापस धामपुर ले जाना चाह रहा था, उस समय उसके पास एंबुलेंस का भाड़ा देने के लिए पांच हजार रुपए नहीं थे। मजबूर पंकज ने अपने भाई का शव अस्पताल के परिसर में रख कर लोगों से एंबुलेंस के भाड़े के लिए गुहार लगाई, परंतु किसी ने भी उसकी कोई सहायता नहीं की। बजाय इसके, कई लोगों ने उससे यहां तक कहा कि इस तरह की बातें तो यहां रोज-रोज होती रहती हैं, किसी ने कहा कि यदि हम इस तरह लोगों की मदद करते रहे तो हमारा अपना घर चलाना मुश्किल हो जाएगा।

आखिरकार पंकज ने भाई की लाश अपनी पीठ पर रख कर देहरादून से धामपुर का रास्ता पैदल ही तय करने का संकल्प किया और पीठ पर मृतक भाई की लाश लाद कर अस्पताल से धामपुर की ओर निकल पड़ा। देहरादून से धामपुर की दूरी 175 किलोमीटर है। कुछ दूर जाते ही पंकज की मुलाकात कुछ किन्नरोंं से हुई जो अपने एक मरीज को लेकर दून अस्पताल की ओर जा रहे थे। उन्हें पंकज की स्थिति देख संदेह हुआ। किन्नरों ने पंकज से पूरी दास्तान पूछी और बाद में वे उसे अपने साथ वापस अस्पताल परिसर ले गए। किन्नरों ने अपने पास से दो हजार रुपए एंबुलेंस वाले को दिए और खुद जनता से एक हजार रुपए और इकट्ठे किए। इस प्रकार किन्नरों ने ही एक एंबुलेंस के चालक को मात्र तीन हजार रुपए में धामपुर तक जाने और पंकज के भाई सोनू की लाश पहुंचाने का विनम्र आग्रह किया, जिसे एक एंबुलेंस चालक ने स्वीकार कर लिया। इस प्रकार समाज के इस उपेक्षित समझे जाने वाले वर्ग ने तो उस गरीब की सहायता की जबकि खुद को धर्मात्मा, दानी-महादानी, क्रांतिकारी, राष्ट्रवादी व संवेदनशील समझने की गलत फहमियां पालने वाला एक बड़ा तबका पंकज को अपने मृतक भाई की लाश पीठ पर लाद कर 175 किलोमीटर तक की लंबी यात्रा पर जाते हुए देखता रहा।
देहरादून में होने वाली यह घटना इस देश की इस प्रकार की कोई पहली घटना नहीं थी। इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि भविष्य में भी ऐसी घटना नहीं होगी।

इसके पहले भी मध्यप्रदेश और झारखंड जैसे राज्यों से इसी तरह की खबरें आती रही हैं कि मृतक का कोई सगा-संबंधी उसकी लाश को कभी पीठ पर लाद कर, तो कभी साइकिल पर रख कर अपने घर ले जा रहा है। कारण सिर्फ यही है कि उसके पास लाश को घर तक ले जाने के लिए एंबुलेंस का किराया नहीं था। कई बार तो हमें ऐसी खबरें भी सुनाई देती हैं कि किसी निजी अस्पताल द्वारा किसी मृत व्यक्ति की लाश उसके परिजनों को केवल इसलिए नहीं सौंपी गई कि उसने अस्पताल का बिल चुकता नहीं किया था। गोया निजी अस्पतालों के मालिक मृतक का शव भी अपने पास गिरवी रख लेते हैं और जब तक उसके परिजन अस्पताल का पूरा बिल चुकता नहीं कर देते, तब तक मृत मरीज की लाश उसके परिजनों को नहीं सौंपते। ऐसे में जो परिवार अपने बीमार सदस्य के लिए दवा-इलाज के पैसे नहीं जुटा पाता, उसी को अपने परिजन की गिरवी लाश छुड़ाने के लिए लोगों से कर्ज लेना पड़ता है। सोचा जा सकता है कि वह अपने उस मृतक संबंधी का संस्कार, उसके क्रिया-कर्म और मरणोपरांत होने वाले अन्य धार्मिक रीति-रिवाज कैसे पूरे करता होगा?

अत्यंत आश्चर्यजनक तथ्य है कि हमारे देश में एक ओर तो स्वयं को धार्मिक बताने व दिखाने का चलन बेहद तेजी से बढ़ता जा रहा है। तथाकथित गुरुओं, धर्म उपदेशकों और प्रवचनकर्ताओं की बाढ़-सी आई है। तीर्थ यात्रियों व कांवड़ियों की संख्या में दिन-प्रतिदिन तेजी से इजाफा होता जा रहा है। नित नए समाजसेवी संगठनों की कोई न कोई कारगुजारियां सामने आती रहती हैं। देश में दानी और दयालु लोगों की भरमार देखी जा सकती है। अनेकानेक धर्मार्थ संस्थाएं संचालित हो रही हैं। हमारे देश में विभिन्न लंगरों और भंडारों के माध्यम से लाखों लोग निशुल्क भोजन ग्रहण करते हैं। देश के विभिन्न धार्मिक स्थानों में लाखों दान-पात्र लगे देखे जा सकते हैं।

यहां तक कि देश में कई प्रमुख धर्मस्थलों पर ऐसे दानपात्र भी हैं जिनमें रुपए-पैसे नहीं, बल्कि सोने-चांदी के जेवर डाले जाते हैं। गर्मी में शरबत, लस्सी व शीतल जल की छबीलें तो लगभग सभी नगरों, कस्बों और बाजारों में देखी जा सकती हैं। ठंड के दिनों में परोपकारी सज्जनों द्वारा गरीबों को मुफ्त स्वेटर, कंबल व अन्य गरम कपड़े वितरित किए जाने के समाचार सुनाई देते हैं। ऐसे में क्या वजह है कि कोई गरीब व्यक्ति अपने मृतक परिजन की लाश कंधे पर उठाने के लिए सिर्फ इसलिए मजबूर हो जाए कि उसके पास शव को घर तक ले जाने के लिए किसी वाहन को देने हेतु किराया नहीं है? ऐसी घटना के चश्मदीद लोगों की संवेदनहीनता की इससे अधिक इंतहा आखिर और क्या हो सकती है? इतने विशाल और परोपकारी देश के किसी भी हिस्से से ऐसे समाचारों का आना निश्चित रूप से यही साबित करता है कि मानवीय संवेदनाएं शायद अब दम तोड़ रही हैं।

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