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घरेलू कामगार क्यों हैं लाचार

घरेलू कामगार भारत के मजदूर वर्ग का सबसे शोषित हिस्सा हैं। पुराने समय में घरेलू काम श्रम-दोहन के सामंती ढांचे में अंतर्निहित था। आमतौर पर ऐसा काम या तो बिना वेतन के कराया जाता था या कामगार को खुराकी या जरूरत का कुछ सामान दे दिया जाता था। ज्यादातर, ऐसा काम ‘निम्न’ जातीय समूहों और […]
Author August 7, 2017 05:36 am
प्रतीकात्मक तस्वीर

घरेलू कामगार भारत के मजदूर वर्ग का सबसे शोषित हिस्सा हैं। पुराने समय में घरेलू काम श्रम-दोहन के सामंती ढांचे में अंतर्निहित था। आमतौर पर ऐसा काम या तो बिना वेतन के कराया जाता था या कामगार को खुराकी या जरूरत का कुछ सामान दे दिया जाता था। ज्यादातर, ऐसा काम ‘निम्न’ जातीय समूहों और आदिवासियों से प्रभुत्वशाली, उच्चवर्गीय समूहों द्वारा लिया जाता था। 1931 की जनगणना के अनुसार, उस समय ऐसे कामगारों या ‘नौकरों’ की संख्या 27 लाख थी, जिनमें अधिकांश पुरुष थे। आजादी के बाद सामंती शोषण के खिलाफ बढ़ते संघर्ष और गैर-पारंपरिक कामों की विविधता के कारण इस संख्या में काफी गिरावट आई। 1971 की जनगणना में घरेलू कामगारों की संख्या सिर्फ 67 हजार दर्ज की गई। लेकिन 1990 के दशक में, उदारीकरण की आर्थिक नीतियों के लागू होने के बाद से इस गिरावट के विपरीत, फिर से उछाल आया। वर्ष 1991 की जनगणना में घरेलू कामगारों की संख्या 10 लाख पाई गई। उदारीकरण की नीतियां लागू होने के बाद से हुए राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन (एनएसएसओ) के हर सर्वे में इस संख्या में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की गई है। उदाहरण के तौर पर, एनएसएसओ के 2004-05 के सर्वे में घरेलू कामगारों की संख्या 47 लाख पाई गई; जिसमें से अधिकांश तीस लाख महिलाएं थीं। अगर आज हम इन कामगारों की पृष्ठभूमि देखें तो ज्यादातर बंगाल, असम और झारखंड से आए अंतर्राज्यीय प्रवासी मजदूर हैं।

हाल ही में, अमूमन चुपचाप सभी कुछ सहने वाली इस श्रमिक आबादी ने नोएडा में मालिकों के साथ हुई एक मुठभेड़ में सामूहिक तौर से उनका सामना किया। इस घटना ने फिर एक बार घरेलू कामगारों की व्यापक अति-शोषित स्थिति और उनके तथा मालिकों के हितों में टकराव को उजागर किया है। साथ ही साथ, इस घटना ने पुलिस, मालिकों और दक्षिणपंथी नेताओं के बीच घनिष्ठ गठजोड़ को भी प्रकट किया है। इस गठजोड़ के कारण, घटना के कुछ ही घंटों के भीतर एक श्रमिक मुद््दे और कामगारों के एक महिला कामगार को ढूंढ़ने की जद््दोजहद को एक सांप्रदायिक मुठभेड़ के रूप में पेश किया जाने लगा।घटना के बाद, दोषी मालिकों और उनके समर्थकों ने विरोध कर रहे कामगारों तथा लापता घरेलू कामगार को ‘बांग्लादेशी’ कहना शुरू कर दिया और कुछ ही देर में सोशल मीडिया पर कामगारों के खिलाफ सांप्रदायिक गालियां और घृणापूर्ण संदेश लिखे जाने लगे। साथ ही, सोसाइटी निवासियों ने बंगाल के मालदा और कूचबिहार जिलों के कामगारों को काम से निकालने के लिए एक ‘ब्लैकलिस्ट’ भी बनाई, जिसमें उन्हें गैर-कानूनी ‘बांग्लादेशी प्रवासी’ बताया गया। कुछ ही दिनों के अंदर, प्रशासनिक अधिकारियों ने रिहाइशी इमारतों के सामने उन दुकानों को तोड़ दिया जिन पर झुग्गी-निवासी कामगार अपने रोजमर्रा के सामान के लिए निर्भर थे। इसी बीच, पुलिस ने भी अपनी जांच का पूरा केंद्र सोसाइटी के गेट पर होने वाले ‘दंगे’ को बना दिया और तेरह कामगारों को हिरासत में ले लिया।

पुलिस ने अपनी जांच में उस पहली एफआइआर को भी दरकिनार कर दिया जो घटना के तुरंत बाद पहले लापता हुई महिला घरेलू कामगार ने अपने मालिकों के खिलाफ दर्ज करवाई थी। इस एफआइआर के बाद, पूरी तरह एकपक्षीय ढंग से मालिकों और सोसाइटी निवासियों द्वारा तीन एफआइआर दर्ज करवाई गर्इं और पांच सौ अज्ञात लोगों पर कत्ल करने की कोशिश करने का इल्जाम लगाया गया, वह भी तब जब घटना के दौरान किसी भी निवासी या सुरक्षा गार्ड को कोई चोट नहीं आई थी। इस तरह का गंभीर आरोप लगा कर नोएडा पुलिस गिरफ्तार किए गए तेरह कामगारों और जांच के दौरान गिरफ्तार किसी भी और आदमी के जमानत लेने को भी मुश्किल बना रही है। इस घटना ने फिर एक बार भारतीय राज्य की अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के कन्वेंशन 189 पर सहमति न देने से उपजने वाली त्रासदी को उजागर किया है। ‘घरेलू कामगारों को सम्माननीय काम’ के उद््देश्य के साथ आयोजित इस कन्वेंशन में श्रम कानूनों में बदलाव कर घरेलू काम को भी राजकीय नियमन के अधीन लाए जाने का प्रस्ताव था। नोएडा और अन्य कई जगह ‘दंगे द्वारा समझौता’ करने की इस प्रकार की अन्य घटनाएं श्रम-संबंधों के बड़े हिस्से पर राजकीय नियमन न होने का परिणाम हैं। इस तरह की घटनाएं कामगारों की समस्याओं के प्रति एक उदासीन प्रशासन द्वारा उपजाई त्रासदी को दर्शाती हैं।

राज्य का उदासीन रवैया ही घरेलू कामगारों पर मालिकों की निजी दबंगई के लिए जिम्मेवार है। इस उदासीनता के कारण ही मालिकों को लगभग-न्यायिक ताकत आजमाने की खुली आजादी मिल जाती है। इस प्रकार की तानाशाही शक्ति आरंभिक औपनिवेशिक काल में अंग्रेजों ने मालिकों को अर्ध-दंडदायक अधिकार के तौर पर दे रखी थी, जिसमें मालिकों को कार्य-निर्धारण का पूरा अधिकार होता था और कामगारों की काम छोड़ने या श्रम-संबंध को पुन:नियोजन करने की कोशिश आपराधिक घोषित थी। निस्संदेह, कई महीनों तक लगातार वेतन न दिया जाना और काम छोड़ने में बंदिशें, घरेलू काम को एक प्रकार की बंधुआ मजदूरी के समान बना देते हैं। घरेलू कामगारों की एक आम शिकायत होती है कि उन्हें अक्सर अपना बकाया वेतन मांगने पर चोरी का इल्जाम लगा दिए जाने की धमकी दी जाती है। इस तरह से कई बार घरेलू कामगार वेतन न मिलने पर भी अपने काम को करते रहने को मजबूर होते हैं। जब वेतन मिलता भी है तो कई महीनों का एक साथ मिलता है, जो पहले तय किए गए मासिक वेतन से काफी कम होता है। यही नहीं, घरेलू कामगार उद्योग में कामगारों का अति-शोषण व उत्पीड़न एक आम बात है, जहां कामगारों के घर तक जाकर ‘मैडम’ उन्हें जबरदस्ती काम पर आने को मजबूर करती हैं। उन्हें साप्ताहिक अवकाश न दिया जाना एक व्यापक चलन है। आमतौर पर मजदूरी का बेहद कम दाम मिलता है और इसमें बढ़ोतरी की दर बहुत ही धीमी होती है। बंगाली और आदिवासी कामगारों को खासकर मजदूरी कम दी जाती है।

बेहद कम वेतन पर काम कर रही महिलाओं को इस कारण कई घरों में काम ढूंढ़ना पड़ता है और कई बार उनकी किशोर बेटियों को भी इसी तरह का काम करने को मजबूर होना पड़ता है। मालिकों द्वारा अनियमित वेतन देना, शुरू में मंजूर हुए कार्य से ज्यादा काम लेना और मनमाने ढंग से मजदूरी घटाना, ऐसी आम समस्याएं हैं जो घरेलू कामगारों के खुले शोषण को बनाए रखती हैं। पुरुष मालिकों द्वारा यौन शोषण भी एक आम बात है, पर इस तरह के ज्यादातर मामले नजदीकी पुलिस थाने तक भी नहीं पहुंच पाते हैं।
आमतौर पर, अपने कार्य-संबंधी शर्तों को बदलने की कामगारों की कोशिशें मालिकों की डांट और पिटाई के आगे टिक नहीं पाती हैं। अगर ये तरीके कारगर नहीं होते हैं तो कई मालिक अपने घरेलू कामगारों को इमारत/हाउसिंग सोसाइटी में घुसने से ही रुकवा देते हैं। वहां न घुस पाने से कामगार को अन्य घरों में काम करने से भी हाथ धोना पड़ता है। इस तरह घरेलू कामगारों को अपना वेतन पाने के लिए भी बेरोजगारी झेलने या झूठे इल्जाम लगा दिए जाने का जोखिम उठाना पड़ता है। नोएडा की घटना में भी घरेलू कामगार ने यही बात दोहराई कि अपना वेतन मांगने पर ही उसे पीटा गया था। घरेलू कामगार उद्योग में राजकीय नियमन की कमी से उपजने वाली मालिकों की तानाशाही शक्ति घरेलू कामगारों को लगभग दासता तक पहुंचा देती है। घरेलू कामगारों के खुले शोषण और दयनीय स्थिति को खत्म करने के तकाजे की अब और अवहेलना नहीं की जा सकती, वरना नोएडा जैसी घटनाओं की पुनरावृत्ति हमें आगे भी देखने को मिलेगी।

 

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