ताज़ा खबर
 

राजनीति: सफाई के लिए संकल्प की जरूरत

ग्रामीण विकास मंत्रालय और पेयजल एवं स्वच्छता मंत्रालय के पास ग्रामीण इलाकों में स्वच्छ भारत अभियान की जिम्मेदारी है।

Author नई दिल्ली | Published on: October 5, 2016 4:14 AM
swacch bharat mission, narednra modi swacch bharat mission, odf, open defectaion free, sanitation in india, toilets, toilets constructed in 2016महात्मा गांधी के जन्मदिवस पर लॉन्च स्वच्छ भारत मिशन। (Express Photo By Bhupendra Rana, File)

स्वच्छ भारत अभियान शहरों और गांवों की सफाई के लिए शुरू किया गया है। बेशक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वच्छ भारत अभियान को लेकर संजीदा हैं, पर राज्य सरकारें और प्रशासन तंत्र अब भी बेपरवाह बने हुए हैं। करीब दो साल का सफर स्वच्छ भारत अभियान पूरा कर चुका है। शुरुआती दौर में कई नामी-गिरामी लोगों और राजनेताओं ने जिस तरह गली-मुहल्लों में झाडू लेकर सफाई की, उससे एकबारगी ऐसा लगा कि यह अभियान अपने मकसद में पूरी तरह कामयाब होगा। पर विडंबना है कि देश के कई गली-मुहल्ले कूड़े करकट के ढेर से अंटे पड़े हैं। कई स्थानों पर सरकार की ओर से कूड़ेदान की व्यवस्था तक नहीं की गई है। मलेरिया, डेंगू और चिकनगुनिया जैसी बीमारियों के फैलने से यह बात शत-प्रतिशत सिद्ध होती है कि अब भी स्वच्छ भारत अभियान की रफ्तार काफी धीमी है। ऐसा भी नहीं कि स्वच्छ भारत अभियान पूरी तरह शिथिल पड़ गया है, लेकिन इसकी रफ्तार पर सवाल जरूर उठ रहे हैं। इस अभियान को और ज्यादा गति प्रदान करने की जरूरत है।

बीते दो साल के दौरान देश के कई हिस्सों में स्वच्छता अभियान को सफलता मिली है। सर्वेक्षण रैंकिंग में मैसूर को पहला स्थान मिला है। 9.3 लाख की जनसंख्या वाले मैसूर से 402 टन ठोस कचरा रोज निकलता है। जागरूकता की वजह से ही यहां के सभी पैंसठ वार्ड खुले में शौच से मुक्त घोषित किए जा चुके हैं। मैसूर की तरह ही दिल्ली और मुंबई जैसे बड़े शहरों को भी सबक लेना चाहिए चाहिए। दिल्ली में डेंगू और चिकनगुनिया फैला ही है, मुंबई में तो टीबी का प्रकोप भी बढ़ा है। उत्तराखंड के नब्बे शहरी निकायों में कुल 706 वार्ड हैं, जहां 195 वार्डों में शत-प्रतिशत घर-घर कूड़ा इकट्ठा किया जा रहा है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में और ज्यादा इस दिशा में ध्यान केंद्रित करने की जरूरत है। बिहार, उत्तरप्रदेश, राजस्थान और गुजरात जैसे राज्यों को भी इस मिशन को सफल बनाने के लिए तत्काल प्रभाव से एक सशक्त खाका बनाने की आवश्यकता है। इन राज्यों में योजनाएं तो बनी हैं, लेकिन उन पर अमल अभी बाकी है। महज खाका बनाने से यह मिशन कामयाब नहीं हो पाएगा।

इस अभियान को सफल बनाने के लिए नौकरशाही को आंकड़ों में उलझाने वाले काम बंद कर देना चाहिए। सशक्त रणनीति के तहत काम करना चाहिए। यूपीए शासन के दौरान निर्मल भारत अभियान शुरू हुआ था। मोदी सरकार में निर्मल भारत अभियान का नाम बदल कर स्वच्छ भारत अभियान कर दिया। प्रधानमंत्री की अगुआई में इस अभियान को देश भर में शुरू किया गया। इसके तहत 2019 तक 9 करोड़ 8 लाख यानी प्रति मिनट छियालीस शौचालय बनाने का लक्ष्य तय किया गया। पर नौकरशाही द्वारा पेश किए गए आंकड़े बताते हैं कि 2014-15 के दौरान प्रति मिनट ग्यारह शौचालय ही बनाए गए हैं। इसका मतलब साफ है कि इसी रफ्तार से काम चलता रहा तो 2032 के पहले यह लक्ष्य हासिल नहीं हो पाएगा।
सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक, निर्मल भारत अभियान के तहत 2001 से 2010 तक ढाई सौ अरब रुपए आबंटित किए गए, लेकिन सच्चाई यह है कि इस पर मात्र एक सौ पंद्रह अरब रुपए खर्च हो पाए हैं। सरकारी आंकड़ों में केवल इस बात पर जोर दिया जाता है कि कितने शौचालय बनाए गए हैं। निगरानी नहीं की जाती। नियंत्रक और महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट के मुताबिक, निर्मल भारत अभियान के तहत छत्तीसगढ़ में बनाए गए शौचालयों में से साठ फीसद, राजस्थान में पैंसठ फीसद और बिहार में अड़सठ फीसद बेकार पड़े हुए हैं। इनमें पानी पहुंचाने के इंतजाम नहीं हैं। स्वच्छता पर शोध करने वाली एक संस्था ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि बिहार, हरियाणा, मध्यप्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में उनचास फीसद घरों में शौचालय होने के बावजूद कम से कम दो व्यक्ति खुले में शौच जरूर करते हैं।

स्वच्छ भारत अभियान को सफल बनाने के लिए एक लाख छियानबे हजार नौ करोड़ रुपए की मंजूरी मिली है। इस अभियान को 2019 में पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। इस महत्त्वपूर्ण अभियान में शहरी विकास मंत्रालय, ग्रामीण विकास मंत्रालय, पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय, राज्य सरकार, गैर-सरकारी संगठन, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम और निगमों आदि को शामिल किया गया है। इस दौरान पूरे देश में बारह करोड़ शौचालय बनाए जाएंगे। दरअसल, इस अभियान द्वारा भारत को पांच साल में गंदगी मुक्त देश बनाने का लक्ष्य है। इसके अंतर्गत ग्रामीण व शहरी इलाकों में सामुदायिक और सार्वजनिक शौचालय बनाना और पानी की आपूर्ति करना, सड़कें, फुटपाथ, बस्तियां साफ रखना और अपशिष्ट जल को स्वच्छ करना भी शामिल है। शहरी विकास मंत्रालय ने स्वच्छ भारत अभियान के लिए बासठ हजार करोड़ रुपए आबंटित किए हैं। शहरी क्षेत्र में हर घर में शौचालय बनाने, सामुदायिक और सार्वजनिक शौचालय बनाने, ठोस कचरे का उचित प्रबंधन करने के साथ ही देश के चार हजार इकतालीस वैधानिक कस्बों के एक करोड़ चार लाख घरों को इस अभियान में शामिल करने का लक्ष्य है। ढाई लाख से ज्यादा सामुदायिक शौचालयों के निर्माण की योजना उन रिहायशी इलाकों में की गई है, जहां व्यक्तिगत घरेलू शौचालय की उपलब्धता मुश्किल है। इसी तरह बस अड्डे, रेलवे स्टेशन, बाजार आदि जगहों पर ढाई लाख से ज्यादा सार्वजनिक शौचालयों के निर्माण की योजना है।

ग्रामीण विकास मंत्रालय और पेयजल एवं स्वच्छता मंत्रालय के पास ग्रामीण इलाकों में स्वच्छ भारत अभियान की जिम्मेदारी है। देश में करीब ग्यारह करोड़ ग्यारह लाख शौचालयों के निर्माण के लिए एक लाख चौंतीस हजार करोड़ रुपए खर्च किए जा रहे हैं। इसके तहत ग्रामीण इलाकों में ग्रामीण विकास मंत्रालय हर गांव को 2019 तक हर साल बीस लाख रुपए देगा। सरकार ने हर परिवार में व्यक्तिगत शौचालय की लागत बारह हजार रुपए तय की है, ताकि सफाई, नहाने और कपड़े धोने के लिए पर्याप्त पानी की आपूर्ति की जा सके।
ऐसे शौचालय के लिए केंद्र सरकार की तरफ से मिलने वाली सहायता नौ हजार रुपए और इसमें राज्य सरकार का योगदान तीन हजार रुपए निर्धारित किया गया है। इस योजना के अंतर्गत जम्मू-कश्मीर, पूर्वोत्तर के राज्य और विशेष दर्जा प्राप्त राज्यों को मिलने वाली केंद्रीय सहायता राशि दस हजार आठ सौ रुपए होगी और राज्य सरकारों का योगदान बारह सौ रुपए होगा।  अगर पूरे देश में स्वच्छ भारत अभियान की स्थिति पर नजर डालें तो ज्यादातर क्षेत्रों में स्थिति बेहतर है। गुजरात में दिसंबर, 2015 तक 327,880 शौचालय बन चुके थे। मध्यप्रदेश और आंध्र प्रदेश में भी अभियान की स्थिति काफी बेहतर है। दिल्ली और उत्तराखंड में घरों के साथ शौचालय बनाने की तादाद बढ़ी है।
2014-15 के दौरान सभी प्रदेशों और केंद्र शासित प्रदेशों को करीब आठ सौ करोड़ रुपए जारी किए गए। इस दौरान करीब दो लाख व्यक्तिगत घरेलू शौचालयों के अलावा बारह सौ सार्वजनिक शौचालय बनाए गए।

पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय के तहत समय-समय पर स्वच्छ भारत मिशन-ग्रामीण कार्यक्रम की समीक्षा की जाती है। 2014-15 में अट्ठावन लाख चौवन हजार नौ सौ सत्तासी शौचालय बनाए, जो लक्ष्य से ज्यादा रहा। 2015-16 के दौरान अब तक 127.41 लाख शौचालय तैयार हो चुके हैं जो लक्ष्य से ज्यादा है। 2016-17 के लिए डेढ़ करोड़ व्यक्तिगत शौचालय बने, जिनमें 33 लाख 19 हजार 451 यानी 22.13 प्रतिशत एक अगस्त 2016 तक तैयार हो चुके हैं।  राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन के अध्ययन के मुताबिक, 2015-16 के नवंबर माह तक पूरे देश में एक करोड़ नौ लाख शौचालय बनाए गए। पर ग्रामीण क्षेत्रों में करीब 52.1 फीसद लोगों ने इसके इस्तेमाल के प्रति रुचि नहीं दिखाई। हालांकि शहरों में महज 7.5 फीसद लोग खुले में शौच के लिए जाते हैं। लेकिन यह आंकड़ा भी चिंताजनक है और न सिर्फ स्वच्छ भारत अभियान, बल्कि देश की प्रगति के लिए एक बड़ी चुनौती है।

इसी तरह स्वच्छ भारत मिशन की स्वच्छ स्टेटस रिपोर्ट-2016 के अनुसार, ग्रामीण क्षेत्रों में 1 अप्रैल, 2015 से 29 फरवरी, 2016 तक कुल अट्ठानबे लाख चौंसठ हजार शौचालय बनाए गए, जबकि शहरी क्षेत्रों में 1 मार्च तक दस लाख तिरसठ हजार शौचालयों का निर्माण हुआ।  स्वच्छ भारत अभियान के लिए विश्व बैंक ने एक अरब पचास हजार करोड़ डॉलर का ऋण मंजूर किया है। इसका मूल लक्ष्य, गरीबी रेखा से नीचे जीवन-यापन कर रहे सभी परिवारों को शौचालय की सुविधा देना, ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा और स्वच्छता कार्यक्रमों को बढ़ावा देना, गलियों और सड़कों की सफाई तथा घरेलू और पर्यावरण संबंधी सफाई व्यवस्था करना है।

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार, शहरी भारत में हर साल 470 लाख टन ठोस कचरा उत्पन्न होता है। इसके अलावा पचहत्तर प्रतिशत से ज्यादा सीवेज का निपटारा नहीं हो पाता। ठोस कचरे की रिसाइकलिंग भी एक बड़ी समस्या है। भविष्य में बड़ी समस्या से बचने के लिए इन मुद्दों का निपटारा भी किया जाना जरूरी है। इस मिशन की सफलता परोक्ष रूप से भारत में व्यापार के निवेशकों का ध्यान आकर्षित करने, जीडीपी विकास दर बढ़ाने, दुनिया भर से पर्यटकों को आकर्षित करने, रोजगार के स्रोतों में विविधता लाने, स्वास्थ्य लागत को कम करने, मृत्युदर को कम करने, घातक बीमारियों की दर कम करने आदि में सहायक होगी। सफाई अभियान का मुख्य फोकस शौचालय निर्माण और गंदगी का निपटारा नहीं होना चाहिए, बल्कि औद्योगिक कचरा निस्तारण, मृदा और जल प्रदूषण रोकने के लिए भी ठोस उपाय किए जाने की जरूरत है।

 

Hindi News के लिए हमारे साथ फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन, टेलीग्राम पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News AppOnline game में रुचि है तो यहां क्‍लिक कर सकते हैं।

Next Stories
1 राजनीति: युद्ध समस्या का समाधान नहीं
2 राजनीति: पुड़िया को बाजार ले जाने की चुनौती
3 राजनीतिः गांधी के सपनों का स्वराज