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चिंताजनक हैं चीन के मंसूबे

चीन पहले से ही अस्सी अरब डॉलर की लगात से चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (सीपीईसी) के निर्माण में लगा है, जिसे भारत अपनी संप्रभुता पर हमला मान रहा है। इसीलिए भारत ने इस सम्मेलन में हिस्सा नहीं लिया।

Author Published on: May 22, 2017 6:04 AM
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ। (फाइल फोटो)

बेजिंग में ‘वन बेल्ट वन रोड’ (ओबीओआर) के दो दिनी शिखर सम्मेलन की शुरुआत करते हुए चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने कहा कि ‘सभी देशों को एक-दूसरे की संप्रभुता, गरिमा और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करना चाहिए।’ शी का यह वक्तव्य चीन की कथनी और करनी में फर्क का ही एक नमूना है, क्योंकि ओबीओआर चीन के विस्तारवादी मंसूबे की देन है।  इस शिखर सम्मेलन में अमेरिका, रूस, तुर्की, विएतनाम, दक्षिण कोरिया, फिलीपीन्स, इंडोनेशिया, श्रीलंका, पाकिस्तान, नेपाल, लाओस और म्यांमा समेत साठ से अधिक देशों ने हिस्सा लिया। चीन ने भारत को भी आमंत्रित किया था, लेकिन चीन पहले से ही अस्सी अरब डॉलर की लगात से चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (सीपीईसी) के निर्माण में लगा है, जिसे भारत अपनी संप्रभुता पर हमला मान रहा है। इसीलिए भारत ने इस सम्मेलन में हिस्सा नहीं लिया। इस गलियारे का बड़ा हिस्सा पाक अधिकृत कश्मीर से गुजरेगा, जिसे भारत अपना भूभाग मानता है।

शी जिनपिंग ने 2013 में कजाकिस्तान और इंडोनेशिया की यात्राओं के दौरान सिल्क रोड आर्थिक गलियारा और इक्कीसवीं सदी के मैरी टाइम सिल्क रोड बनाने के प्रस्ताव रखे थे। इन प्रस्तावों के तहत तीन महाद्वीपों के पैंसठ देशों को सड़क, रेल और समुद्री मार्गों से जोड़ने की योजना है। इन परियोजनाओं पर अब तक चीन साठ अरब डॉलर खर्च कर चुका है। ओबीओआर को मूर्त रूप देने के लिए चीन को यह सुनहरा अवसर दिख रहा है। क्योंकि डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका को संरक्षणवाद की ओर ले जा रहे हैं। ब्रिटेन ने यूरोपीय संघ से बाहर आकर आर्थिक उदारवाद से पीछा छुड़ाने के संकेत दे दिए हैं। जर्मनी में दक्षिणपंथी राष्ट्रवाद का उभार दिख रहा है। ऐसे में चीन भूमंडलीकृत अर्थव्यवस्था में खाली हुए स्थान को भरने के लिए उतावला है।

चीन ने 1962 में भारत पर आक्रमण किया और चालीस हजार वर्ग किलोमीटर जमीन हड़प ली। भारत ने सम्मेलन का बहिष्कार करते हुए कहा कि चीन अंतरराष्ट्रीय नियमों, कानूनों, पारदर्शिता और देशों की संप्रभुता को किनारे रख वैश्विक हितों पर कुठाराघात करने में लगा है। साथ ही भारत ने उन परियोजनाओं को लेकर भी चिंता जताई है जो कई देशों में चीन ने शुरू तो कीं, लेकिन जब लाभ होता दिखाई नहीं दिया तो हाथ खींच लिये। ऐसे में कई देश चीन के कर्जे के चंगुल में तो फंसे ही, अधूरी पड़ी परियोजनाओं के कारण पर्यावरण की हानि भी इन देशों को उठानी पड़ी।

श्रीलंका में चीन की आर्थिक मदद से हम्बनटोटा बंदरगाह बन रहा था, लेकिन चीन ने काम पूरा नहीं किया। इस वजह से श्रीलंका आठ अरब डॉलर कर्ज के शिकंजे में आ गया है। अफ्रीकी देशों में भी ऐसी कई परियोजनाएं अधूरी पड़ी हैं जिनमें चीन ने पूंजी निवेश किया था। इन देशों में पर्यावरण की तो काफी हानि हुई ही, जो लोग पहले से ही वंचित थे उन्हें और संकट में डाल दिया गया। लाओस और म्यांमा ने कुछ साझा परियोजनाओं पर फिर से विचार करने का आग्रह किया है। चीन द्वारा बेलग्रेड और बुडापेस्ट के बीच रेल मार्ग बनाया जा रहा है। इसमें बड़े पैमाने पर हुई शिकायतों की जांच यूरोपीय संघ कर रहा है। यही हश्र कालांतर में सीपीईसी का भी हो सकता है, क्योंकि चीन के साथ पाकिस्तान जो आर्थिक गलियारा बना रहा है, वह ओबीओआर का हिस्सा है। दरअसल, पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था में चीनी कंपनियों का दखल लगातार बढ़ रहा है, वहीं दूसरी तरफ पाकिस्तान चीन से ऊंची ब्याज दरों पर कर्ज भी ले रहा है। इसलिए चीन के नाजायज दखल को मानना भी पाकिस्तान की मजबूरी बनती जा रही है। पाकिस्तान ने 1963 में पाक अधिकृत कश्मीर का 5180 वर्ग किमी क्षेत्र चीन को भेंट कर दिया था। तब से चीन पाक का मददगार हो गया। चीन ने इस क्षेत्र में कुछ सालों के भीतर ही अस्सी अरब डॉलर का पूंजी निवेश किया है। यहां से वह अरब सागर पहुंचने के जुगाड़ में जुट गया है। इसी क्षेत्र में चीन ने सीधे इस्लामाबाद पहुंचने के लिए काराकोरम सड़क मार्ग भी तैयार कर लिया है। इस दखल के बाद चीन पीओके को पाकिस्तान का हिस्सा भी मानने लगा है। यही नहीं, चीन ने भारत की सीमा पर हाइवे बनाने की राह में आखिरी बाधा भी पार कर ली है। उसने समुद्र तल से 3750 मीटर की ऊंचाई पर बर्फ से ढंके गैलोंग्ला पर्वत पर तैंतीस किमी लंबी सुरंग बना कर इस बाधा को दूर कर दिया है। यह सड़क सामरिक नजरिए से बेहद महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि तिब्बत में मोशुओ काउंटी भारत के अरुणाचल का अंतिम छोर है। अभी तक यहां कोई सड़क मार्ग नहीं था। जबकि गिलगित-बल्तिस्तान के लोग इस पूरी परियोजना को शक की निगाह से देख रहे हैं।

वर्ष 1999 में चीन ने मालदीव के मराओ द्वीप को गोपनीय ढंग से लीज पर लिया था। वह इसका उपयोग निगरानी अड््डे के रूप में गुपचुप करता रहा। वर्ष 2001 में चीन के प्रधानमंत्री झू रांन्गजी ने मालदीव की यात्रा की, तब दुनिया को पता चला कि चीन ने मराओ द्वीप लीज पर ले रखा है और वह इसका इस्तेमाल निगरानी अड््डे के रूप में कर रहा है। इसी तरह चीन ने दक्षिणी श्रीलंका के हम्बनटोटा बंदरगाह पर एक डीप वाटर पोर्ट बना रखा है। यह क्षेत्र श्रीलंका के पूर्व राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे के चुनावी क्षेत्र का हिस्सा है। भारतीय रणनीतिक क्षेत्र के हिसाब से यह बंदरगाह बेहद महत्त्वपूर्ण है। यहां से भारत के व्यापारिक और नौसैनिक पोतों की आवाजाही बनी रहती है। बाग्ंलादेश के चटगांव बंदरगाह के विस्तार के लिए चीन करीब 46,675 करोड़ रुपए खर्च कर रहा है। इस बंदरगाह से बांग्लादेश का नब्बे प्रतिशत व्यापार होता है। यहां चीनी युद्धपोतों की मौजदूगी भी बनी रहती है। भारत की कंपनी ने म्यांमा में बंदरगाह का निर्माण किया था, लेकिन इसका फायदा चीन उठा रहा है। चीन यहां एक तेल और गैस पाइपलाइन बिछा रहा है, जो सितवे गैस क्षेत्र से चीन तक तेल व गैस पहुंचाने का काम करेगी। विडंबना यह है कि दक्षिण कोरिया, विएतनाम, फिलीपीन्स और इंडोनेशिया का चीन से दक्षिण चीन सागर विवाद के चलते तनाव बना हुआ है, बावजूद चीन की आर्थिक ताकत के आगे ये देश नतमस्तक दिख रहे हैं।

ओबीओआर के तहत छह आर्थिक गलियारे, अंतरराष्ट्रीय रेलवे लाइन, सड़क और जल मार्ग विकसित किए जाने हैं। चीन ने इनमें 14.5 अरब डॉलर पूंजी निवेश की घोषणा की है। इसके साथ ही एशियन इन्फ्रास्ट्रक्चर इनवेस्टमेंट बैंक से भी पूंजी निवेश कराया जाएगा। इस बैंक में सबसे ज्यादा पूंजी चीन की है। चीन तमाम देशों को स्वप्न दिखा रहा है कि यदि ये कार्य पूरे हो जाएंगे तो एशिया से लेकर यूरोप तक बिना किसी बाधा के व्यापार हो सकेगा। भूटान को छोड़ भारत के सभी पड़ोसी देशों ने ओबीओआर शिखर सम्मेलन में हिस्सा लिया। भारत के लिए यह चिंता की बात है। यदि ओबीओआर का चीन का सपना पूरा होता है तो इन देशों के बाजार चीनी उत्पादों से पट जाएंगे। यही नहीं, इन देशों की सरकारें चीन से महंगी ब्याज दर पर कर्ज लेने को मजबूर हो सकती हैं। फिर ये देश चीन के सामरिक हित साधने को भी विवश हो जाएंगे। ऐसे में भारत को अपने आर्थिक व सामरिक हितों को लेकर बहुत सचेत रहना होगा। हालांकि ओआरओबी की राह आसान नहीं है। क्योंकि यह योजना जितनी बड़ी है, इसकी राह उतनी ही दुर्गम भी है। कई देशों के आपसी तनाव भी बाधा बन सकते हैं। अमेरिका से चीन की होड़ और दक्षिण चीन सागर विवाद का असर भी दिखाई देगा। लिहाजा, ओबीओआर के भविष्य को लेकर अभी कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी।

 

 

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