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बच्चों की मासूमियत छीनते कार्यक्रम

बच्चों के ऐसे कार्यक्रमों से बाहर होने पर अभिभावक भी जम कर आंसू बहाते नजर आते हैं। कई बार उनके प्रदर्शन के लिए मिले अंकों को लेकर वाद-विवाद भी हो जाता है। ऐसे में बच्चे असहाय महसूस करते हैं।

Author मोनिका शर्मा | July 27, 2017 5:31 AM
पिछले कुछ बरसों से विभिन्न मनोरंजन चैनलों पर गायन, नृत्य, अभिनय और अन्य कई तरह के कौशल प्रदर्शन आधारित रियलिटी-शो प्रसारित किए जा रहे हैं।

बच्चों के निश्छल और कोमल मन को लेकर चिंता व्यक्त करते हुए जाने-माने फिल्मकार शुजित सरकार ने ऐसे रियलिटी टीवी कार्यक्रमों पर प्रतिबंध लगाने की बात की है, जिनमें बच्चों को प्रतिभागी के तौर पर शामिल किया जाता है। शुजित का मानना है कि ऐसे कार्यक्रम बच्चों को न केवल भावनात्मक और शारीरिक रूप से क्षति पहुंचा रहे हैं, बल्कि बहुत कम उम्र में ही उनकी मासूमियत भी छीन रहे हैं। बच्चों के रियलिटी कार्यक्रमों पर प्रतिबंध लगाने की मांग करते हुए उन्होंने अधिकारियों को पत्र लिखा है कि ऐसे प्रदर्शन बालमन के साफ और पवित्र स्वभाव पर गहरा असर डालते हैं। पिछले कुछ बरसों से विभिन्न मनोरंजन चैनलों पर गायन, नृत्य, अभिनय और अन्य कई तरह के कौशल प्रदर्शन आधारित रियलिटी-शो प्रसारित किए जा रहे हैं। देखने में आ रहा है कि टीआरपी के खेल में ये कार्यक्रम बच्चों और उनके बचपने को भी भुनाने लगते हैं। इन कार्यक्रमों का हिस्सा बनने वाले बच्चे मानसिक दबाव और प्रतिस्पर्धा के जाल में फंस कर कम उम्र में ही हार-जीत, धन-दौलत और नाम कमाने जैसी चीजों के दबाव में आ जाते हैं। रियलिटी कार्यक्रमों की कड़ी प्रतियोगिता के इस दौर में अभिभावकों की अपेक्षाओं का स्तर भी बहुत ऊंचा होने लगा है। वे भी अपने बच्चों को जीतते और आगे बढ़ते ही देखना चाहते हैं। टीवी के परदे पर आसानी से देखा जा सकता है कि किस तरह अभिभावक भी बच्चों के साथ जुटे रहते हैं।

बच्चों के ऐसे कार्यक्रमों से बाहर होने पर अभिभावक भी जम कर आंसू बहाते नजर आते हैं। कई बार उनके प्रदर्शन के लिए मिले अंकों को लेकर वाद-विवाद भी हो जाता है। ऐसे में बच्चे असहाय महसूस करते हैं। चैनलों का टीआरपी पाने का दबाव और हर हाल में बच्चे का चमकता भविष्य देखने की माता-पिता की सोच ने, इन मासूमों को मशीन बना दिया है। कई-कई घंटों तक मासूम बच्चे अभ्यास में जुटे रहते हैं। साथ ही निर्णायकों से मिलने वाली टीका-टिप्पणी भी उन्हें कभी बेहतर तो कभी कमतर महसूस कराती है। कई कार्यक्रम ऐसे भी हैं जिनमें देश की जनता से वोट मांगे जाते हैं। वोटों की गिनती के आधार पर ही विजेता चुना जाता है। ऐसे में जो बच्चे पीछे रह जाते हैं उनके मन में नकार दिए जाने का भाव भी घर कर जाता है। इन कार्यक्रमों से जुड़ी ऐसी सभी बातें बच्चों को एक अनचाहे मानसिक दबाव की ओर धकेलती हैं, जबकि हमारे पारिवारिक और शैक्षणिक परिवेश में बच्चों पर पहले से ही बहुत दबाव है।गौरतलब है कि इसी साल शुजित सरकार ने ‘रिलीज द प्रेशर’ नाम की लघु फिल्म भी निर्देशित की थी, जो बच्चों में परीक्षा के तनाव के बारे में थी। निसंदेह रियलिटी कार्यक्रमों को लेकर भी उनकी टिप्पणी चाहे-अनचाहे बच्चों पर आ रहे मानसिक तनाव और दबाव से ही जुड़ी है, क्योंकि इन कार्यक्रमों का हिस्सा बनना मानसिक और शारीरिक रूप से बहुत थकाऊ है। कहना गलत नहीं होगा कि यह भी एक तरह का बालश्रम ही है, जो बच्चों से उनका बचपन छीनकर उन्हें भावनात्मक धरातल पर मायूस कर रहा है।

दर्शकों की वाहवाही जीतने के लिए चैनल के लोग बच्चों की मासूमियत को जम कर भुनाते हैं। ऐसे में बच्चों पर बेहतर प्रदर्शन करने का पूरा दबाव रहता है। यह बेवजह का दबाव न केवल बच्चों को कुंठित बनाता है बल्कि उन्हें अवसाद की ओर भी धकेलता है। रियलिटी शो में बच्चों को हथियार बनाकर परोसे जा रहे भावनात्मक स्वांग और सनसनीखेज रोमांच ने चैनलों को टीआरपी का नया रास्ता सुझा दिया है। दर्शकों के मन-मस्तिष्क को जज्बाती बनाकर टीआरपी बटोरी भी जाती है, जबकि सच तो यह है कि इसके पीछे शुद्ध व्यावसायिक सोच काम करती है। यही वजह है कि भावनाओं और बाजार का जो ताना-बाना बचपन को केंद्र में रख कर बुना जाता है, वह आखिरकार बच्चों के बचपन पर ही भारी पड़ता है। ऐसे में दुखद ही है कि अब इन कार्यक्रमों में बहुत ही कम उम्र के बच्चे भी हिस्सा ले रहे हैं। कुछ साल पहले बच्चों के संरक्षण से जुड़ी एक समिति ने सरकार के समक्ष बच्चों के रियलिटी कार्यक्रमों के लिए कुछ नए दिशा-निर्देशों का प्रस्ताव रखा था। इनमें छोटे बच्चों को इन कार्यक्रमों से अलग रखना भी शामिल था।

दिशा-निर्देशों में एक सुझाव यह भी था कि शो में हिस्सा लेना वाले बच्चे की उम्र बारह से कम न हो। कानून विशेषज्ञों, मनोचिकित्सकों और शिक्षाविदों की इस समिति ने यह सुझाव भी दिया था कि शो के दौरान निर्णायकों की बातचीत और व्यवहार को नियमित करने की जरूरत है। देखने में आता है कई बार कार्यक्रम के निर्णायकों की टिप्पणी बच्चों को अपमानित करने वाली भी होती है, जिससे बच्चे ही नहीं उनके अभिभावक भी आहत हो जाते हैं। ध्यान रहे कि कुछ साल टीवी रियलिटी शो के निर्णायकों द्वारा डांटे जाने पर शिंजिनी सेनगुप्ता नामक प्रतिभागी पक्षाघात की शिकार हो गई थी। टीवी कार्यक्रमों का इंसान के मन-मस्तिष्क पर इतना गहरा असर पड़ता है कि इंसान खुद को उन किरदारों से जोड़कर देखने लगता है। जरा सोचिए कि ये कार्यक्रम तो रियलिटी शो कहे जाते हैं। इनके दर्शकों भी बच्चे ज्यादा हैं। जो कुछ परोसा जाता है उसे हकीकत कह कर परदे पर दिखाया जाता है। ऐसे में बच्चों के दिमाग और दिल पर कितना गहरा प्रभाव पड़ता होगा? अध्ययन यह भी बताते हैं कि रियलिटी शो में दिखाई जाने वाली विषयवस्तु का युवाओं के मस्तिष्क पर भी गहरा असर पड़ता है। फिर बच्चे तो इन्हें हर तरह से वास्तविक ही समझ बैठते हैं।

एसोचैम के एक सर्वे में यह बात भी सामने आई कि छिहत्तर फीसद बच्चे घर में अकेले होने पर टेलीविजन पर रियलिटी शो देखते हैं। ऐसे में भद्दा डांस, घिनौने संवाद, द्विअर्थी गाने और निर्णायकों से अपनी उम्र से परे जाकर मजाक करने की बातें, बच्चों के पूरे व्यवहार और विचार को प्रभावित करती हैं। हुनर दिखाने का मंच बन चुके ये कार्यक्रम बच्चों की शारीरिक और मानसिक सेहत को नुकसान पहुंचा रहे हैं। ग्लैमर और चकाचौंध को देख चुके बच्चे आम जिंदगी में भी सहज नहीं रह पाते। वे या तो बहुत आक्रामक बन जाते हैं या आत्मकेंद्रित। अपने प्रदर्शन को लेकर दबाव और चिंता के कारण वे अनिंद्रा, अपच, चिड़चिड़ाहट और तनाव के शिकार बनते हैं। तेज रोशनी में शूटिंग करने और मेकअप के कारण बच्चों की नाजुक त्वचा को भी नुकसान पहुंचता है। असल में देखा जाए तो बेधड़क द्विअर्थी संवाद बोलते और दर्शकों के मनोरंजन के नाम पर कभी खुद का, तो कभी बड़ों का मजाक बनाते हुए नाचते-गाते बच्चे बहुत कुछ सोचने को विवश करते हैं।

गलाकाट प्रतियोगिता वाले इन प्रदर्शनों अव्वल रहने के लिए जूझ रहे बच्चे कुछ भी कर गुजरने को तैयार दिखते हैं। कभी-कभी तो कम उम्र के इन प्रतिभागियों के कार्यक्रमों में भी जमकर फूहड़ता परोसी जाती है। ऐसे में विचारणीय तो है ही कि कैसे ये मासूम एक चमक-दमक भरे बाजार का हिस्सा बन गए हैं? कैसे उन्हें टीवी परदे पर दिखने और फिर लगातार दिखते रहने के लिए ऊलजुलूल हरकतें करनी पड़ती हैं? किस तरह चैनल की टीआरपी बढ़ाने की जुगत करनी होती है ? कैसे उन्हें बिना थके प्रदर्शन करते रहना पड़ता है?
हालत यह है कि पढ़ाई-लिखाई में ही नहीं दूसरे क्षेत्रों में भी अपने बच्चों को अव्वल देखने की चाह रखने वाले माता-पिता बच्चों को रियलिटी कार्यक्रमों के माध्यम से मशहूर करने की कामना भी पालने लगे हैं। टीवी पर छाए बच्चों से जुड़े रियलिटी कार्यक्रमों ने मासूमों के जीवन में हड़कंप पैदा कर दिया है। कम उम्र में इन्हें प्रतिस्पर्धा और पैसे के मायने समझने पड़ रहे हैं। हुनर आजमाने की जंग के नाम पर अभिभावक भी उन्हें अपना नाम रोशन करने का माध्यम समझ बैठे हैं। कभी कार्यक्रम के अगले पायदान पर न पहुंचने की मायूसी तो कभी दिन रात शूटिंग में खटना। इन मासूमों का बचपन इस स्टारडम के खेल में समय से पहले ही अलविदा हो रहा है। कई बार तो रियलिटी कार्यक्रमों में अच्छे से अच्छा प्रदर्शन करने दबाव इतना ज्यादा होता है कि बच्चों को कड़े मानसिक तनाव से गुजरना पड़ता है। ऐसे में मुनाफे के लिए और मनोरंजन का साधन बने इन प्रदर्शनों पर प्रतिबंध बहुत जरूरी हो गया है।

 

 

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