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बाल मजदूरी की जड़ें

गरीब से गरीब माता-पिता भी अपने बच्चों को काम में लगाने के बजाय उन्हें स्कूल भेजना चाहते हैं लेकिन ऐसा तभी संभव है जबकि इसके दुष्परिणाम और समस्या की भयावहता से उन्हें अवगत कराया जाए।

मजदूरी करता एक बालक।

देवेंद्र जोशी 

भारत में बालश्रम एक समस्या तो है लेकिन विडंबना यह है कि यहां पहले से ही यह मान कर चला जाता है कि बच्चे इसलिए मजदूरी करते हैं कि इससे उनके परिवार का खर्च चलता है। यह तर्क अपने आप में इसलिए छलावा है कि इसको सच मान लेने का मतलब तो यह होगा कि सबसे गरीब परिवार के प्रत्येक बच्चे को स्कूल की पढ़ाई छोड़ कर काम पर लग जाना चाहिए। जबकि वास्तविकता यह है कि ग्रामीण क्षेत्रों के गरीब परिवारों के ऐसे अनेक बच्चे हैं जो स्कूल जा रहे हैं और उनसे बेहतर आर्थिक स्थिति वाले परिवारों के बच्चे काम में लगे हैं। स्पष्ट है कि गरीबी की दलील की आड़ लेकर बालश्रम की समस्या से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता।  गरीब से गरीब माता-पिता भी अपने बच्चों को काम में लगाने के बजाय उन्हें स्कूल भेजना चाहते हैं लेकिन ऐसा तभी संभव है जबकि इसके दुष्परिणाम और समस्या की भयावहता से उन्हें अवगत कराया जाए। भारत में बाल मजदूरी कहीं प्रगट तो कहीं अप्रगट रूप में कई रूपों में मौजूद है। भारत में बाल मजदूरी के सही आंकडे सामने न आ पाने की एक बड़ी वजह यह है कि बाल मजदूरी को अभी तक सही तरीके से परिभाषित ही नहीं किया जा सका है।

सरकारी अनुमान के अनुसार 1 करोड़ 70 लाख बच्चे बाल मजदूरी के शिकार हैं। अगर खतरनाक उद्योगों में काम करने वाले बच्चों को भी इसमें शामिल कर लिया जाए तो यह संख्या दो करोड़ तक पहुंच जाएगी। यदि स्कूल से बाहर के सभी बच्चों को बाल श्रमिक माना जाए तो यह आंकड़ा दस करोड़ के आसपास होगा। इससे बड़ी विडंबना और क्या हो सकती है कि कृषिप्रधान भारत के कृषिक्षेत्र की बाल मजदूरी सिर्फ इस कारण सामने नहीं आ पाती है कि किसान इस बात से डर जाता है कि उस दिन क्या होगा जब बच्चे कृषि-कार्य से हट जाएंगे! यही वजह है कि बिना गणना किए ही यह मान लिया जाता है कि कृषिक्षेत्र में बाल श्रमिक हैं ही नहीं। जबकि छुपी हुई बेरोजगारी की तरह गांवों में बाल मजदूरी भी एक प्रमुख समस्या है। इस सच्चाई से बचने के लिए यह तक कह कह दिया जाता है कि बच्चों से ऐसा काम लिया जाता है जो उनकी सेहत के लिए फायदेमंद है।  ‘कैम्पेन अगेंस्ट चाइल्ड लेबर’ संस्था के एक अध्ययन के मुताबिक भारत में एक करोड़ 26 हजार से ज्यादा बच्चे बाल मजदूरी के शिकार हैं। इनमें सबसे ज्यादा बाल मजदूर बिहार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र में हैं। गौर करने वाली बात यह है कि बाल मजदूरी के मामले में अव्वल प्रदेशों में से चार उत्तर भारत के हिंदीभाषी राज्य हैं। भारत में अस्सी प्रतिशत बाल श्रमिक ग्रामीण इलाकों में हैं। चौदह से सत्रह वर्ष के आयुवर्ग के तिरसठ प्रतिशत बाल श्रमिक खतरनाक व्यवसायों से जुड़े हैं। बालश्रम रोकने के तमाम दावों के बावजूद भारत अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आइएलओ) की न्यूनतम आयु संधि 1973 (संख्या 138) का अनुमोदन नहीं कर पाया है, जिसमें वैश्विक स्तर पर बच्चों को काम पर रखने के जमीनी नियम-कायदे निर्दिष्ट हैं।

आइएलओ के न्यूनतम आयु से जुड़े निर्देशों का भी भारत में पालन नहीं हो रहा है। जबकि भारत इसका अनुमोदन कर चुका है कि चौदह साल से कम उम्र के बच्चे किसी भी तरह के पेशे में काम पर नहीं रखे जाएंगे। देश के कुल राष्ट्रीय उत्पाद में बच्चों का बचपन भी खप रहा है। भारत में हर ग्यारह बच्चों में से एक अपनी आजीविका खुद चलाता है। यानी वह मजदूरी करता है। 2011 की जनगणना के मुताबिक भारत में 8.4 करोड़ बच्चे स्कूल नहीं जाते हैं। 78 लाख बच्चे ऐसे हैं जिन्हें मजबूरन बाल मजदूरी करनी पड़ती है। बाल श्रम करने वाले बच्चों में 57 प्रतिशत लड़के और 43 प्रतिशत लड़कियां है। यह जानकारी हैरान करने वाली है कि बाल श्रमिकों में छह साल तक के बच्चे भी शामिल हैं। अनुसूचित जाति, जनजाति, ओबीसी और मुसलिम वर्ग में बाल मजदूरी का आंकड़ा चिंताजनक है। बालश्रम पर अर्जेंटीना की राजधानी ब्यूनस आयर्स में आयोजित चौथे वैश्विक सम्मेलन में भाग लेने वाले 190 देशों ने भले ही 2025 तक बाल मजदूरी पूरी तरह समाप्त करने का संकल्प लिया हो लेकिन विश्व में बाल मजदूरी की स्थिति को देखते हुए यह लक्ष्य करीब-करीब असंभव नजर आता है। बाल मजदूरी को समाप्त करने के लिए जिस तरह के बदलाव, तैयारी और मुस्तैदी की जरूरत है वह कहीं दिखाई नहीं दे रही है। आइएलओ के मुताबिक विश्व में पंद्रह करोड़ बाल मजदूर हैं। बाल मजदूरी के काम में लगे आधे बच्चे खतरनाक किस्म के काम में लगे हैं। दुनिया के कई देशों में तंबाकू, गन्ना, कपड़ा, कपास, र्इंट, कॉफी आदि उद्योगों के खतरनाक कामों में बच्चों को लगाया जाता है। भारत में बच्चों को अगरबत्ती और पटाखा फैक्टरी में काम दिया जाता है। जब आम बच्चे तैयार होकर घर से स्कूल के लिए निकलते हैं तब लाखों बच्चे रोजी-रोटी कमाने के लिए घर से निकलते हैं। उनमें से कई तो वापस घर भी नहीं लौट पाते हैं। भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश समेत कई देशों में ये बच्चे अपना और अपने परिवार का पेट पालने के लिए मजदूरी करने को विवश हैं ।

भारत में बाल मजदूरी निरोधक कानून, 1986 से लागू होने के बावजूद बालश्रम अब तक पूरी तरह समाप्त नहीं हो पाया है। इस कानून की शुरू से ही यह विडंबना रही कि इसमें संगठित क्षेत्र पर तो विशेष ध्यान दिया गया लेकिन विशाल असंगठित क्षेत्र को उसके हाल पर छोड़ दिया गया। वैश्वीकरण और नवउदारवाद में तो इस समस्या को लगभग भुला ही दिया गया। आर्थिक प्रगति के आंकड़ों के बरक्स इसकी खबर लेने की किसी ने जरूरत ही महसूस नहीं की कि उन्नति का यह साम्राज्य उन नौनिहालों के श्रम की कीमत पर खड़ा किया गया है जिन्हें कारखाने के बजाय स्कूल में होना चाहिए था। भारत सरकार ने नेशनल चाइल्ड लेबर प्रोजेक्ट (एनसीएलपी) शुरू किया। इसके तहत कुछ सार्थक उपाय किए गए। व्यावसायिक प्रशिक्षण, मिड-डे मील, मानदेय, स्वास्थ्य सेवाएं आदि सभी योजनाओं को बच्चों के विकास से जोड़ा गया। बाल श्रमिकों की समस्या बच्चों की शिक्षा से जुड़ी है। गरीब बच्चों को शिक्षा से जोड़े जाने के लिए उन्हें घर पर ही शिक्षा उपलब्ध कराई जाए या उनके लिए मोबाइल लर्निंग का प्रबंध किया जाए। बाल मजदूरी की समस्या का समाधान बच्चों को शरणार्थी शिविरों में धकेलना नहीं बल्कि उनके लिए प्रशिक्षण की समुचित व्यवस्था करना है। इसके लिए आवश्यक है कि खतरनाक व्यवसायों से बच्चों को छुड़ाने की सरकार की कोशिशों को तेज किया जाए।

बच्चों के बेहतर पुनर्वास का मतलब पीड़ित बच्चों को रिहाइश देना या भूख से बचाना ही नहीं है, उन्हें मनोवैज्ञानिक और मानसिक रूप से सक्रिय बनाए रखना भी जरूरी है। बाल मजदूरी पर चौबीस घंटे सक्रिय तथा मुस्तैद निगरानी व्यवस्था भी आवश्यक है। कानून का डर और नियमों का सख्ती से पालन जितना जरूरी है, स्थायी सहयोग और निरंतर काउंसलिंग भी उतना ही आवश्यक है।दुनिया के बाल श्रमिकों में एक तिहाई हिस्सा भारत के बाल मजदूरों का है। अगर हम चाहते हैं कि भारत हर क्षेत्र में आगे बढ़े, उसका समग्र विकास हो तो सबसे पहले यह सुनिश्चित करना होगा कि भारत से बाल मजदूरी का उन्मूलन हो और बच्चों को उनका अधिकार मिले।

 

 

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