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चंपारण की विरासत के रखवाले

बीसवीं सदी के भारत के इतिहास में 1917 का अप्रैल खास महत्त्व रखता है क्योंकि इसी दौर में गांधी ने बिहार के चंपारण में अंग्रेज निलहे जमींदारों के शोषण-दमन के खिलाफ सत्याग्रह-संग्राम शुरू किया था।

Author June 8, 2017 5:25 AM
महात्मा गांधी (File Photo)

श्रीभगवान सिंह

बीसवीं सदी के भारत के इतिहास में 1917 का अप्रैल खास महत्त्व रखता है क्योंकि इसी दौर में गांधी ने बिहार के चंपारण में अंग्रेज निलहे जमींदारों के शोषण-दमन के खिलाफ सत्याग्रह-संग्राम शुरू किया था। अंग्रेजों ने ‘तीन कठिया’ प्रथा लागू कर चंपारण के किसानों को एक बीघा खेत के तीन कट्ठे हिस्से में नील की खेती करने को बाध्य कर दिया था। नील की खेती थकाऊ और जमीन की उर्वरा शक्ति को नष्ट करने वाली थी। इसके लिए किसानों के साथ अंग्रेज निलहे काफी जोर-जबर्दस्ती करते थे। इस अन्यायमूलक प्रथा से किसानों को मुक्ति दिलाने के लिए गांधी ने वहां पर सत्याग्रह आंदोलन चलाया, जो ‘तीन कठिया’ प्रथा को समाप्त करने में कामयाब हुआ।  साल 1917 में रूस में भी क्रांति हुई थी, जिसे विश्व स्तर पर ख्याति और महत्ता प्राप्त हुई। इसकी तुलना में चंपारण सत्याग्रह का दायरा बहुत छोटा था, जिसका संबंध भारत के एक छोटे-से क्षेत्र से था और इसने कोई सत्ता परिवर्तन भी नहीं किया। फिर भी, एक छोटे-से क्षेत्र में होने वाले इस सत्याग्रह-संग्राम के दौरान ऐसी कई अनोखी, अभूतपूर्व घटनाएं घटित हुर्इं, जो आधुनिक भारत के इतिहास में मील का पत्थर सिद्ध हुर्इं। गौरतलब है कि चंपारण-सत्याग्रह के पहले गांधी दक्षिण अफ्रीका में बीस वर्षों तक वहां की गोरी सरकार की रंगभेद-नीति के विरुद्ध अहिंसात्मक संघर्ष करके अपने सत्याग्रह-अस्त्र का सफल प्रयोग कर चुके थे। ‘सत्याग्रह’ शब्द का आविष्कार भी वहीं पर उन्होंने किया था। सत्य और अहिंसा पर आधारित सत्याग्रह का प्रयोग गांधी ने भारत में पहली बार चंपारण में किया और वह भी किसानों के हितार्थ। गांधी ने जिस तरह दक्षिण अफ्रीका में अहिंसा और सत्य का सहारा लेकर अपना आंदोलन चलाया, उसी तरह चंपारण-सत्याग्रह में भी उन्होंने यह काम किया।

यों तो चंपारण के स्थानीय किसान राजकुमार शुक्ल ने 1916 की कांग्रेस के लखनऊ अधिवेशन में गांधी से चंपारण के किसानों का दुख-दर्द दूर करने की गुहार लगाई थी, लेकिन उन्होंने सुनी-सुनाई बातों को आधार न बना कर खुद चंपारण जाकर वस्तुस्थिति को देखने-समझने का निर्णय लिया। गांधी अप्रैल 1917 में कोलकाता से राजकुमार शुक्ल के साथ पटना होते हुए चंपारण पहुंचे। वहां उन्होंने कई दिनों तक हजारों किसानों से बातचीत की। इस कार्य में उन्हें बिहार के तमाम नामी-गिरामी लोगों का सहयोग भी मिला। जब गांधी को यकीन हो गया कि सचमुच इन किसानों के साथ अंग्रेज निलहे जमींदार अत्याचार कर रहे हैं, तो उन्होंने इसके विरुद्ध अपने सत्याग्रह-संग्राम का शंखनाद किया। इसके पहले भारत तो क्या, विश्व प्रसिद्ध फ्रांसीसी और रूसी क्रांतियों में भी ऐसा नहीं हुआ था कि उनके नेताओं ने गांवों में जाकर पीड़ित किसानों से सत्य जानने के लिए उनसे संवाद किया हो। दूसरी महत्त्वपूर्ण बात यह हुई कि जहां फ्रांसीसी और रूसी क्रांतियों में सत्तारूढ़ पक्ष को शत्रु मान कर उनके विरुद्ध रक्तरंजित साधनों का प्रयोग किया गया, वहां गांधी ने सत्ता-पक्ष को शत्रु न मान कर उनके साथ अहिंसा और मैत्री के भाव से संघर्ष करने का आंदोलन चलाया।

चंपारण-सत्याग्रह में सहयोग करने वाले डॉ राजेद्र प्रसाद ने गांधी के सचिव प्यारे लाल की पुस्तक ‘द लास्ट फेज’ की भूमिका में लिखा है, ‘चंपारण पहुंचने पर गांधीजी ने जो पहला काम किया, वह था उनका यह एलान कि वे अंग्रेज बागान मालिकों को अपना दुश्मन नहीं समझते और उनका भला चाहते हैं।’ उनका यह एलान न केवल उत्पीड़कों, बल्कि हमारे जैसे लोगों के लिए भी समझ पाना बहुत मुश्किल था। इसका नतीजा हुआ कि जिनके खिलाफ सत्याग्रह करना था उनका विश्वास और सद्भाव भी उन्हें प्राप्त होता गया, जो इस आंदोलन की सफलता का एक कारण बना।’सचमुच, गांधी ने शत्रुभाव से रहित और मैत्रीभाव से युक्त जिस चंपारण-सत्याग्रह को चलाया, वही आगे चल कर उनके पूरे राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन का आधार बना। यों तो भारत में अहिंसा की दीर्घकालीन परंपरा थी, लेकिन राजनीतिक क्षेत्र में उसका प्रयोग गांधी ने ही पहली बार भारत की धरती पर चंपारण-सत्याग्रह के दौरान किया। सत्ता पलट की मंशा न रखते हुए भी यह सत्याग्रह रक्तरंजित क्रांतियों से अलग रक्तहीन परिवर्तनकारी आंदोलन की मिसाल पेश कर गया। चंपारण-सत्याग्रह का क्षेत्र भले ही एक छोटा-सा क्षेत्र था, लेकिन इसका प्रभाव पूरे देश पर पड़ा जिससे एक भयमुक्त वातावरण का निर्माण हुआ। यह बात विशेष रूप से ध्यान में रखने की है कि गांधी पहले भारतीय नेता थे जिन्होंने चंपारण के जिलाधिकारी की अदालत में सरकारी आदेश की अवज्ञा करने के जुर्म में स्वेच्छा से जेल जाना मंजूर किया। इसके पहले जिन्हें भी राजद्रोह के अपराध में कारावास की सजा हुई थी, उन्होंने अपना बचाव करने की कोशिशें की थीं।

यह कोशिश लोकमान्य तिलक ने भी की थी। लेकिन अपना अपराध स्वीकार करते हुए जेल जाने की तत्परता दिखाने वाले प्रथम व्यक्ति गांधी ही थे और उनके इस साहस ने पूरे देश में उत्साह और निर्भीकता का ऐसा बवंडर पैदा किया कि देश की आजादी के लिए खुशी-खुशी जेल जाने वालों का काफिला बढ़ता ही गया। इस संबंध में चंपारण सत्याग्रह से जुड़े हुए आचार्य जेबी कृपलानी ने लिखा है, ‘यह बताना अप्रासंगिक न होगा कि जिस तरह से गांधी ने कानून भंग किया, वक्तव्य दिया और बाद में उनके विरुद्ध मुकदमा वापस ले लिया गया, उससे जनता में कितना उत्साह पैदा हुआ। इस तरह से भारतीय क्षितिज पर एक नर-नाहर का उदय देखने में आया जिसने ब्रिटिश साम्राज्य की विराट शक्ति की अवहेलना की और जो जेल जाने और वहां की यातनाएं सहने को सहर्ष तैयार था। भारत के लिए यह एक अभूतपूर्व घटना थी। इससे पूर्व जब कभी कोई राष्ट्रीय नेता या कार्यकर्ता किसी राजनीतिक अपराध के लिए गिरफ्तार हुआ तो अपने बचाव के लिए वह एक वकील कर लेता था। गांधी पहली बार चंपारण में ही ‘महात्मा’ के संबोधन से नवाजे गए।’

इसके पहले भारत के इतिहास में ऐसे किसी व्यक्ति का उदाहरण नहीं मिलता जिसने देश के सुदूर पश्चिमी छोर (पोरबंदर) में पैदा होकर देश के सुदूर पूरबी छोर पर जाकर वहां की जनता पर होने वाले जुल्मो-सितम के खिलाफ संघर्ष किया हो। बुद्ध, महावीर, शंकराचार्य आदि ने भी बहुत देश भ्रमण किए, लेकिन उनका उद्देश्य अपने उपदेशों का प्रचार करना, शास्त्रार्थ करना था। गांधी ने अपनी पत्नी, बेटे और गुजरात-महाराष्ट्र से पचास-साठ स्त्री-पुरुषों को लाकर चंपारण की मुहिम में लगा दिया था। यह भी भारत के इतिहास में एक अभूतपूर्व घटना थी। चंपारण सत्याग्रह की एक दूसरी विशेषता इस बात में भी प्रकट हुई कि यह केवल राजनीतिक-आर्थिक मुद्दों या सत्ताधारियों के विरोध तक सीमित नहीं रहा बल्कि इसके जरिए कई रचनात्मक कार्यों का सिलसिला भी शुरू हुआ। चंपारण के भितिहरवा नामक गांव में गांधी ने आश्रम स्थापित कर वहां पर अशिक्षा का अंधकार मिटाने के लिए पाठशाला खोली। इसमें वहां के लोगों को अक्षर ज्ञान से लेकर सफाई, कुटीर उद्योग, छुआछूत, जातिभेद मिटाने जैसे कार्यक्रमों को शामिल कर देश में संघर्ष और रचनात्मकता के सामंजस्य का नया पाठ पढ़ाया जो उनके राष्ट्रीय आंदोलन का भी एक अभिन्न अंग बना रहा।

इस प्रकार देखा जाए तो भारत जैसे विशाल देश के एक छोटे-से कोने में चलाया गया चंपारण-सत्याग्रह पूरे देश में साम्राज्यवादी उत्पीड़न, शोषण के खिलाफ जनता में निर्भीकता और विरोध-संघर्ष की जागृति पैदा करने वाली मशाल सिद्ध हुआ। यह भी ध्यान में रखने की बात है कि गांधी का देश में पहला राजनीतिक आंदोलन किसानों और गांवों के सवाल को लेकर शुरू हुआ और यह सवाल जीवनपर्यंत उनकी सोच और कार्यक्रम का अंग बना रहा कि कैसे भारत के किसानों और गांवों की बदहाली दूर हो तथा किसानों का ग्राम स्वराज्य कायम हो सके। चंपारण-सत्याग्रह का शताब्दी वर्ष सरकारी स्तर पर मनाया जा रहा है, मगर इसकी विरासत तभी फलवती होगी जब सरकारें किसानों और गांवों के दुखदर्द को समझें तथा खेती और ग्रामोद्योग की रक्षा कर सकें। केवल गांधी और चंपारण-सत्याग्रह की विरुदावली गाने से कुछ हासिल होने वाला नहीं है।

 

 

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