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शिक्षा तंत्र की कमजोर कड़ियां

आइआइटी की प्रवेश परीक्षा में उत्तीर्ण होने वाले कई छात्र बोर्ड परीक्षा में नाकाम हुए हैं, जो लोगों की हैरानी का सबब है। प

Author June 7, 2017 6:13 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

 मनीषा सिंह

अलग-अलग राज्यों के शिक्षा बोर्डों के तहत आधे-अधूरे संसाधनों के बल पर दी जाने वाली शिक्षा और कराई जाने वाली परीक्षा कुछ वैसे ही दृश्य पेश करती है, जैसे फिलहाल बिहार विद्यालय परीक्षा बोर्ड (बीएसइबी) को लेकर सामने आए हैं। एक ओर तो इस परीक्षा में चौंसठ फीसद छात्र फेल हो गए- जिस पर परीक्षार्थियों ने काफी हंगामा खड़ा किया है। यही नहीं, आइआइटी की प्रवेश परीक्षा में उत्तीर्ण होने वाले कई छात्र बोर्ड परीक्षा में नाकाम हुए हैं, जो लोगों की हैरानी का सबब है। पर साथ ही एक बड़ा विवाद बिहार बोर्ड के आर्ट्स टॉपर गणेश कुमार को लेकर पैदा हुआ है। यह बात किसी के गले नहीं उतर रही कि झारखंड के गिरिडीह का रहने वाला गणेश इंटर की पढ़ाई करने के लिए ढाई सौ किलोमीटर दूर बिहार के समस्तीपुर के उच्च माध्यमिक स्कूल में क्यों गया। यही नहीं, जिन विषयों को लेकर उसने टॉप किया है, उनमें उसकी जानकारी का स्तर भी अधकचरा बताया गया है। भले ही राज्य सरकार दावा कर रही है कि पिछले साल के गड़बड़झाले के मद््देनजर इस साल परीक्षा प्रक्रिया में काफी कठोरता बरती गई। उधर, गणेश ने मैट्रिक में उम्र का फर्जी सर्टिफिकेट लगाने का अपराध भी कबूल किया, जिसके लिए उसे गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया है। पिछले साल भी आर्ट्स में टॉपर रही रूबी राय को नकल से परीक्षा पास करने के अपराध में जेल जाना पड़ा था। सरकार ने मामले की जांच कराई थी और बीएसइबी के तत्कालीन अध्यक्ष और सचिव को गिरफ्तार किया गया था।

फर्जीवाड़े और नकल के बल पर परीक्षा में सर्वोच्च स्थान पाने वालों की गिरफ्तारी और नकल के गोरखधंधे में लिप्त लोगों की धरपकड़ से बिहार सरकार एक संदेश देने की कोशिश कर रही है। वह असल में उस कलंक को धोना चाहती है, जो पिछले कुछ वर्षों में बिहार के बारे में ऐसी खबरों के कारण लगा कि वहां कैसे खुलेआम नकल होती है। इस साल सख्ती का परिणाम यह निकला है कि चौंसठ फीसद छात्र फेल हो गए। पिछले साल भी मैट्रिक के आधे से ज्यादा परीक्षार्थी फेल हो गए थे। साल 2016 की परीक्षा में शामिल करीब साढ़े पंद्रह लाख परीक्षार्थियों में से 46.66 फीसद ही सफल हुए थे। मैट्रिक की तरह ही राज्य की इंटर (आर्ट्स) परीक्षा में भी करीब तैंतालीस फीसद परीक्षार्थी फेल घोषित किए गए थे।
लेकिन इतनी सख्ती के बाद भी घपले नहीं रुक पा रहे हैं, यह बात पहले रूबी राय और अब गणेश कुमार के प्रकरण से साफ है। जिस तरह पॉलिटिकल साइंस को प्रिडॉकिल साइंस कहने और उसे पाक-कला से संबंधित विषय बताने वाली छात्रा रूबी राय दोबारा परीक्षा के कई मौके देने के बाद आखिरकार नाकाम साबित हुई थी, उसी तरह गणेश कुमार का संगीत के बारे में ज्ञान बॉलीवुड स्तर का है जिसमें वह टॉप पर है। वक्त आ गया है कि राज्य शिक्षा बोर्डों के बल पर शिक्षा-परीक्षा का तंत्र संचालित कर रहे उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश आदि उत्तरी राज्य इस पर विचार करें कि आखिर क्यों उनकी परीक्षाओं में बिना नकल के छात्रों की कामयाबी पचास प्रतिशत तक भी नहीं पहुंच पाती है। नकल का कलंक धोने के सिलसिले में छात्रों को गिरफ्तार करके या कपड़े उतार कर परीक्षा देने को मजबूर करके (जैसा कि इस साल बिहार के मुजफ्फरपुर में किया गया जहां सेना में भर्ती के उम्मीदवारों को मात्र जांघिया पहन कर परीक्षा देनी पड़ी) कोई समाधान नहीं निकल सकता- यह समझना होगा।

नकल के दोषियों को सींखचों के पीछे भेजते वक्त यह भी देखा जाना चाहिए कि आखिर आज हमारी शिक्षा में बच्चों को किस चीज के लिए प्रेरित किया जा रहा है। असल में वहां सिर्फ एक प्रेरणा है कि कैसे बच्चे हर परीक्षा में अच्छे नंबरों से पास हों ताकि जब किसी नामी कॉलेज और नौकरी की ओर कदम बढ़ाएं तो उन्हें वहां हताश न होना पड़े। परीक्षा में ये नंबर रटंत विद्या से आते हैं, ट्यूशन-कोचिंग से, पर्चा लीक से या नकल से, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। इसके अलावा जिस तरह हर साल ऊंचे-नामी इंजीनियरिंग, प्रबंधन संस्थानों से निकले कुछ छात्रों के लाखों-करोड़ों के शुरुआती पैकेज की चर्चा टीवी-अखबारों में होती है, तो अभिभावक सोचने लगते हैं कि क्या उनका बच्चा भी ऐसा करिश्मा कर पाएगा। ऐसी सोच के साथ वे अभिभावक और छात्र, दोनों नंबरों की होड़ में शामिल हो जाते हैं। पर उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश जैसे राज्यों के सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले वे बच्चे इन सुहाने सपनों को साकार करने के लिए क्या करें, जिन्हें पढ़ाई के लिए कायदे के संसाधन तक नहीं मिल पाते हैं। उन्हें तो अपने स्कूलों में ठीकठाक लैब नहीं मिलती, मास्टरजी के दर्शन भी कभी-कभार ही होते हैं। कई बार बच्चों को मीलों पैदल चल कर स्कूल जाना होता है। गांव-कस्बों की लड़कियों के लिए तो और मुसीबत भी रहती है क्योंकि रास्ते में शोहदे उन्हें परेशान करते हैं। ऐसी स्थिति में उनके सामने दो ही विकल्प होते हैं, या तो पढ़ाई छोड़ दें या फिर जैसे-तैसे परीक्षा पास कर लें।

गांव-कस्बों के स्कूलों में न तो पढ़ाई-लिखाई के माकूल प्रबंध हैं और न ही वहां शिक्षक पूरे साल पढ़ाने के प्रति गंभीर रहते हैं। वहां कई सरकारी स्कूल तो सिर्फ कागजों पर चलते हैं। ऐसे में नियमित स्कूल आने वाले छात्रों को मामूली जानकारियां भी नहीं मिल पाती हैं। पिछले साल स्वयंसेवी संगठन ‘प्रथम’ ने बारहवीं तक के छात्रों पर कई वर्षों में किए गए अध्ययन से एक रिपोर्ट तैयार की थी। इस रिपोर्ट के मुताबिक पांचवीं कक्षा में पढ़ने वाले छात्र ठीक से दूसरी कक्षा की किताबें भी नहीं पढ़ पाते। इन हालात में छात्रों के लिए परीक्षा पास करने के लिए नकल ही एकमात्र जरिया बचता है। चूंकि शिक्षक पढ़ाते नहीं हैं, इसलिए परीक्षा के वक्त छात्रों को नकल से रोकने की हिम्मत नहीं कर पाते हैं।
नकल रोकने वाला तंत्र भी ज्यादातर ऐसे अवसरों पर लापरवाह हो जाता है। कई बार पाया गया है कि परीक्षा केंद्रों पर नकल रोकने को तैनात पुलिस वाले रिश्वत लेकर इस मामले में आंख मूंद लेते हैं। सवाल है कि जब व्यवस्था ही नकल रोकने के बजाय उसे सुचारु रूप से संपन्न कराने में सहयोगी हो जाए तो परीक्षा केंद्रों की वीडियोग्राफी से लेकर छापामार उड़नदस्तों का भला क्या औचित्य रह जाता है?

यही नहीं, जब बात नौकरी की आती है तो उत्तर प्रदेश-बिहार के सरकारी स्कूलों से पढ़ कर आए छात्रों का सीधा मुकाबला शहरी कॉनवेन्ट और सीबीएसइ से निकल कर आए छात्रों से होता है जो अंग्रेजी भाषा की जानकारी से लेकर तमाम विषयों में अपडेट रहते हैं। ऐसी दशा में दसवीं-बारहवीं की परीक्षा के अंक ही उत्तर प्रदेश-बिहार के छात्रों की कुछ लाज ढकते प्रतीत होते हैं। यही वजह है कि इन राज्यों के शिक्षा बोर्डों की परीक्षाओं में नकल और परचा लीक जैसे हथकंडे बरस-दर-बरस आजमाए जाते रहे हैं।
रोजगार के लिए अच्छे अंकों वाले सर्टिफिकेट और डिग्रियों को जितना जरूरी किया जाएगा, नकल और पर्चा लीक की समस्या उतना ही बढ़ती जाएगी। हमारा समाज और नौकरियों का पूरा तंत्र यह सोच पाने में नाकाम रहा है कि योग्यता के आकलन का और क्या तरीका हो सकता है, ताकि उच्च शिक्षा व नौकरियों में योग्य लोग ही चुने जाएं। जब परीक्षा में मिले अंक ही पूरे जीवन में काम आते रहेंगे, तो उसमें धांधलियों की आशंका तो बनी ही रहेगी। ऐसे में चंद गिरफ्तारियां और सजाएं नकल का कलंक पूरी तरह धोने में कारगर नहीं हो सकतीं।

 

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