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बैंकिंग सुधार की कठिन डगर

मौजूदा समय में अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए सरकारी बैंकों में आमूलचूल परिवर्तन लाने की दरकार है।

Author November 27, 2017 5:20 AM
तस्वीर का इस्तेमाल प्रतिकात्मक तौर पर। (फाइल फोटो)

मौजूदा समय में अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए सरकारी बैंकों में आमूलचूल परिवर्तन लाने की दरकार है। समस्या की गंभीरता को देखते हुए बैंकों के पुनर्पूंजीकरण के लिए सरकार ने उन्हें 2.11 लाख करोड़ रुपए देने की योजना बनाई है। अर्थव्यवस्था में तेजी लाने, विकास दर को बढ़ाने और रोजगार सृजन में बढ़ोतरी लाने के लिए बैंकों को मजबूत करना जरूरी है। सरकार के इस कदम को जीएसटी के बाद सबसे अहम सुधार माना जा रहा है। कहा जा रहा है कि इससे वित्तवर्ष 2019 में जीडीपी वृद्धि दर में बढ़ोतरी होगी और फंसे हुए कर्ज व अनुत्पादक परिसंपत्तियों की समस्या लगभग समाप्त हो जाएगी और बैंक बेसल तृतीय के विविध मानकों को आसानी से पूरा कर सकेंगे। साथ ही, आने वाले दिनों में भी बैंक सुधारात्मक कार्यों को जारी रख सकेंगे। प्रस्तावित पुनर्पूंजीकरण की व्यवस्था को तीन हिस्सों में बांटा गया है। कुल राशि में 18,000 करोड़ रुपए बजट से दिए जाएंगे; 58,000 करोड़ रुपए बाजार से इक्विटी के रूप में जुटाए जाएंगे और 1.35 लाख करोड़ रुपए सरकार द्वारा पुनर्पूंजीकरण बॉन्ड के रूप में उपलब्ध कराए जाएंगे। इस प्रक्रिया को दो साल में पूरा किया जाएगा, लेकिन अधिकांश पूंजी अगली चार तिमाहियों में बैंकों को दी जाएगी। जानकारों के मुताबिक वृहद आर्थिक स्थिति पर सरकार के इस कदम का कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा। सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यन के अनुसार, पुनर्पूंजीकरण बॉन्ड से सरकारी खजाने पर 9,000 करोड़ रुपए ब्याज का बोझ पड़ेगा। सुब्रमण्यन के मुताबिक बॉन्ड से राजकोषीय घाटा बढ़ेगा या नहीं, यह अपनाई गई लेखा विधि पर निर्भर करेगा। अंतरराष्ट्रीय लेखा मानक के तहत इस तरह के बॉन्ड से राजकोषीय घाटा नहीं बढ़ता है, क्योंकि यह उसके दायरे में नहीं आता है, लेकिन लेखा की भारतीय प्रणाली को अपनाने से इस बॉन्ड से राजकोषीय घाटे में बढ़ोतरी हो सकती है। देखा जाए तो लंबी अवधि में वृहद अर्थव्यवस्था पर इसका एक ही नकारात्मक प्रभाव, सरकारी कर्ज में इजाफे के रूप में पड़ेगा, लेकिन इससे रेटिंग एजेंसियों के रुख पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा।

सरकार 1.35 लाख करोड़ रुपए के बैंक पुनर्पूंजीकरण बॉन्ड की पहली किस्त दिसंबर के पहले हफ्ते में जारी कर सकती है। दस साल की अवधि के बॉन्ड में दूसरी सरकारी प्रतिभूतियों के अनुरूप तकरीबन 7 प्रतिशत की ब्याज दर दी जा सकती है। अलग-अलग किस्तों की परिपक्वता अवधि अलग-अलग हो सकती है। बॉन्डों को जारी करने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए सरकार बैंकों और भारतीय रिजर्व बैंक के साथ बातचीत कर रही है। फिलहाल यह तय नहीं हुआ है कि पहली किस्त में कुल कितनी राशि के बॉन्ड जारी किए जाएंगे या फिर किन बैंकों को बॉन्ड जारी किए जाएंगे। ये बॉन्ड 2.11 लाख करोड़ रुपए के व्यापक पुनर्पूंजीकरण कार्यक्रम का हिस्सा हैं। माना जा रहा है कि कमजोर बैंकों को प्रावधानों की जरूरतों को पूरा करने के लिए पूंजी मिलेगी, जबकि मजबूत बैंकों को उनके विकास के लिए भी पूंजी दी जाएगी। सरकार 1990 के दशक के मध्य में जारी किए गए बैंक पुनर्पूंजीकरण बॉन्ड की तरह ही बॉन्ड जारी करना चाहती है। ये जीरो-कूपन बॉन्ड नहीं होंगे। उस कालखंड में 20,000 करोड़ रुपए के पुनर्पूंजीकरण बॉन्ड जारी किए गए थे। 1990 के दशक के मध्य में जारी किए गए बॉन्ड को बैंकों को परिपक्व होने तक अपने पास रखना था और 2007 के बाद ही द्वितीयक या शेयर बाजार में उनके कारोबार की अनुमति दी गई। नए पुनर्पूंजीकरण बॉन्ड भी शुरू में इसी तरह के हो सकते हैं। यह भी कहा जा रहा है कि सरकार खुद ये बॉन्ड जारी करेगी और इनके बदले बैंक के शेयरों को रखने के लिए होल्डिंग कंपनी नहीं बनाई जाएगी।

इधर, बैंकों के पुनर्पूंजीकरण के लिए सरकार ने रिजर्व बैंक से विशेष लाभांश मांगा है। इस मुद््दे पर सरकार की रिजर्व बैंक के साथ बातचीत चल रही है। पुनर्पूंजीकरण की प्रक्रिया में किस बैंक को कितनी पूंजी मिलेगी यह इस बात पर निर्भर करेगा कि उस बैंक ने फंसी परिसंपत्तियों की समस्या से निपटने के लिए क्या कदम उठाए हैं। इस क्रम में दिवालिया कानून के तहत भेजे गए मामलों की क्या स्थिति है और दिवालिया कानून के प्रावधान कितने कारगर साबित हो रहे हैं इस पर भी विचार किया जाएगा। पुनर्पूंजीकरण बॉन्ड की कुल राशि को दो हिस्सों में बांटा जाएगा, जिसमें एक हिस्सा प्रावधान के लिए होगा और दूसरा हिस्सा विकास की जरूरतों को पूरा करने के लिए। वित्तीय सेवा विभाग के सचिव राजीव कुमार ने साफ तौर पर कहा है कि पुनर्पूंजीकरण की प्रक्रिया बिना शर्त नहीं होगी। इस योजना का लाभ लेने के लिए बैंकों को अपने प्रदर्शन सुधारने होंगे। बैंकों को पुनर्पूंजीकरण की प्रक्रिया शुरू होने से पहले अपने फंसे कर्ज का कुछ हिस्सा बट्टे खाते में डाल कर अपने बहीखाता को साफ-सुथरा करना होगा।

सवाल यह भी उठ रहा है कि सरकार के इस कदम से निजी बैंकों और एनबीएफसी (गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों) पर क्या असर पड़ेगा। माना जा रहा है कि इस सरकारी मदद के बाद भी शीर्ष तीन सरकारी बैंकों के अलावा शेष बैंक केवल 6 से 8 प्रतिशत आरओई (इक्विटी पर प्रतिफल) हासिल कर सकेंगे। वे ऋण-वृद्घि में बहुत तेजी नहीं ला पाएंगे। ऋण के मामले में बड़े सरकारी बैंक पहले की तरह बड़े तथा मझोले आकार के कॉरपोरेट ऋण पर ही ध्यान केंद्रित करेंगे, लेकिन इस क्षेत्र में गलाकाट प्रतिस्पर्धा के साथ-साथ शुद्घ ब्याज मार्जिन बहुत कम है। साथ ही, इस क्षेत्र को दिए जा रहे ऋण के फंसने की प्रबल आशंका है, जबकि असुरक्षित खुदरा ऋण, सूक्ष्म वित्त, सस्ते आवास, सूक्ष्म और छोटे मझोले उद्यम आदि क्षेत्रों में निजी क्षेत्र का ध्यान बना रहेगा, जिसके कारण उनके क्रेडिट विकास की अपार संभावनाएं बनी रहेंगी और उनके कर्ज के भी फंसने की संभावना न्यून रहेगी। लिहाजा, वर्तमान परिवेश में सरकारी बैंकों को भी चाहिए कि वे निजी क्षेत्र की तरह ऊर्जा, बुनियादी क्षेत्र और बड़ी परियोजनाओं को ऋण देने के बजाय खुदरा कर्ज बाजार पर ध्यान केंद्रित करें।
पुनर्पूंजीकरण की पहल से सरकारी बैंकों के शेयरों की कीमतों में बढ़ोतरी जरूर हुई, लेकिन यह बढ़ोतरी एकतरफा कारणों से हुई। सरकारी बैंकों में फंसे हुए कर्ज की समस्या दिनोंदिन गहराती जा रही है। चालू वित्तवर्ष की सितंबर तिमाही में 38 सूचीबद्ध बैंकों के समग्र फंसे हुए कर्ज में 1.32% की बढ़ोतरी हुई, जो राशि में 8.40 खरब रुपए है, जिसमें सरकारी बैंकों का हिस्सा 7.34 खरब रुपए है।

सरकार अब भी सरकारी बैंकों में अपनी हिस्सेदारी को कम नहीं करना चाहती है, क्योंकि ऐसा करने से उसके लिए सामाजिक सरोकारों को पूरा करना संभव नहीं हो सकेगा। बहरहाल, सरकार के ताजा कदम से अर्थव्यवस्था में मजबूती, कीमतों में स्थिरता, रोजगार सृजन में तेजी, विकास दर आदि में इजाफा हो सकता है, साथ ही इससे बैंक पूंजी-पर्याप्तता अनुपात, बेसल तृतीय के विविध मानकों और जोखिम के मानकों को पूरा करने में समर्थ हो सकेंगे।
आज बैंकों में आमूलचूल सुधार लाने की जरूरत है। सबसे महत्त्वपूर्ण तकाजा मानव संसाधन और संचालन सुधार का है। क्या सरकारी बैंकों के प्रदर्शन को बेहतर करने के लिए विशिष्ट कौशल वाले पेशवरों को लाना चाहिए? क्या निर्णय प्रक्रिया में बाहरी हस्तक्षेप को खत्म करने की जरूरत है? बैंकों के बोर्ड या वरिष्ठ प्रबंधन को क्या और स्वायत्तता दी जानी चाहिए? ये ऐसे सवाल हैं, जिनके ठोस जबाव सरकार को ही खोजने होंगे। सरकारी बैंकों को बार-बार पूंजी उपलब्ध कराना समस्या का समाधान नहीं है।

 

 

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