ताज़ा खबर
 

कैसे लगेगी बंदूक संस्कृति पर रोक

पूरी दुनिया में मौजूद पैंसठ करोड़ बंदूकों में से लगभग चार करोड़ बंदूकें भारत में हैं और इनमें से 63 लाख यानी मात्र पंद्रह फीसद लोगों के पास ही बंदूक के लाइसेंस हैं।

Author October 17, 2017 05:09 am
इस तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

गृह मंत्रालय की एक रिपोर्ट ने देश में बंदूकों के लाइसेंस से जुड़ी एक सच्चाई उजागर की है, जिसमें देश के तमाम हिस्सों में बंदूक संस्कृति के फैलने का जिक्र किया गया है। यह कैसा संयोग है कि देश में बंदूक संस्कृति से जुड़े आंकड़ों की चर्चा ऐसे समय में हो रही है जब पूरी दुनिया अमेरिका के लास वेगास के एक संगीत समारोह पर अंधाधुंध फायरिंग के चलते पचास से अधिक लोगों की मौत और पांच सौ से अधिक लोगों के घायल होने से सहम गई है। यह उपयुक्त समय है जब अपने देश में भी हथियारों के प्रसार पर बहस होनी चाहिए। आंकड़े बताते हैं कि पूरी दुनिया में मौजूद पैंसठ करोड़ बंदूकों में से लगभग चार करोड़ बंदूकें भारत में हैं और इनमें से 63 लाख यानी मात्र पंद्रह फीसद लोगों के पास ही बंदूक के लाइसेंस हैं। देश में शेष 65 से 85 फीसद गैर-लाइसेंसी हथियार हैं जिनका कोई पंजीकरण तक नहीं है। यहां उल्लेखनीय है कि देश में आतंकवाद की तुलना में अन्य आपराधिक हिंसा से होने वाली मौतों का आंकड़ा चौदह गुना अधिक है। वहीं इससे जुड़ी एक खास बात यह है कि इन कुल हत्याओं में से 12.2 फीसद हत्याओं में बंदूक का प्रयोग हुआ।

अमेरिका में हालात ये हैं कि वहां सत्रह साल से कम उम्र के करीब तेरह सौ बच्चे हर साल बंदूक से घायल होते हैं। भारत के बच्चे भी अब इन हथियारों को खिलौना समझ कर इनका शौक पालने लगे हैं। अपनी निजी सुरक्षा और जान-माल की रक्षा के लिए खरीदे गए ये हथियार यानी बंदूक, पिस्तौल अथवा रिवाल्वर अब स्वयं जिंदगी में बढ़ती हताशा और जीवन में संघर्ष की ताकत कम होने के चलते रक्षक सिद्ध होने के बजाय अपनी जान के दुश्मन ज्यादा बन रहे हैं। आंकड़े बताते हैं कि बंदूक अब खुद की सुरक्षा की तुलना में हत्या और आत्महत्या के काम अधिक आ रही है। इन शस्त्रों की सुलभता के कारण हत्या, आत्महत्या और दुर्योगवश होने वाली मौतों का सिलसिला लगातार बढ़ रहा है।गृह मंत्रालय के ताजा आंकड़ों के मुताबिक देश में इस समय तकरीबन चौंतीस लाख बंदूकों के लाइसेंस जारी हुए हैं। इनमें चौदह लाख के आसपास लाइसेंस अकेले उत्तर प्रदेश में हैं। देश में सबसे कम बंदूकों के लाइसेंस वर्तमान में केंद्रशासित प्रदेशों मसलन दमन और दीव तथा दादरा और नागर हवेली में जारी किए गए हैं। इनके अलावा जम्मू-कश्मीर, मध्यप्रदेश व हरियाणा जैसे प्रदेशों में हथियारों के मामले में स्थिति बाकी प्रदेशों के मुकाबले कुछ बेहतर रही है। आंकड़ों से यह बात भी सामने आई है कि दक्षिण भारत की तुलना में उत्तर भारत में आपराधिक हिंसा अधिक हो रही है।

यह भी उजागर हुआ कि पिछले दस वर्षों में जो हत्याएं आग्नेयास्त्रों के द्वारा की गर्इं, उनमें से लगभग दो तिहाई हत्याएं बिहार, झारखंड व उत्तर प्रदेश में हुर्इं। लिहाजा, इस परिदृश्य को एक और कोण से देखा जाना चाहिए। नीतिकारों के लिए इन प्रदेशों में होने वाली हत्याओं के पीछे छिपी गरीबी व मुफलिसी के साथ-साथ जंगल, जमीन और बेहिसाब पूंजी से जुड़ी गलाकाट होड़ की सामाजिक व आर्थिक पृष्ठभूमि का आकलन भी जरूरी हो जाता है। उदारवादी अर्थव्यवस्था ने अपने देश में भी लाभ के अर्थशास्त्र की नई परिभाषाएं गढ़ी हैं। भारतीय संस्कृति से जुडेÞ बड़े परिवार, समुदाय, आपसी भागीदारी, खूनी रिश्तों में लोक-लिहाज, बड़े-छोटे का भेद तथा वफादारी व गम खाने जैसे परंपरागत मूल्यों को नई वैश्विक आर्थिक प्रतिस्पर्धा व रुतबे के नए अर्थशास्त्र ने निगल लिया है। ध्यान रहे इक्कीसवीं सदी के उभरते नए रुतबे की यह नई दुनिया निहायत स्वयंभू व अकेलेपन की शिकार है। भौतिकवाद की इस दुनिया में व्यक्तिका अकेलापन उसे गुस्सैल व खंूखार बनाने के साथ-साथ असुरक्षित भी बना रहा है। आप मानें या न मानें लेकिन व्यक्तिने अपने चारों ओर आज बेशुमार संपत्ति व पूंजी तथा हथियारों का इतना बड़ा जखीरा जमा कर लिया है जहां वह खुद अपनों से ही बहुत खतरा महसूस कर रहा है।

हथियारों की बढ़ती होड़ का समाजशास्त्र भी आज के व्यक्ति की इसी असुरक्षा के मनोविज्ञान से जुड़ गया है। ऊपर से पुलिस व्यवस्था की कमजोरी, मानवाधिकारों का हनन, राजनीतिक दखलंदाजी, लोकतांत्रिक संस्थाओं में टूटन तथा धार्मिक, आर्थिक व राजनीतिक होड़ के चलते देश में बढ़ती असुरक्षा से भी आग्नेयास्त्रों का चलन बढ़ रहा है। इंडियन आर्म्स एक्ट, 1959 तथा आर्म्स एक्ट रूल्स, 1962 के तहत सरकार ने हथियार का लाइसेंस तभी देना शुरू किया जब उसने समझ लिया कि आवेदक को जान-माल का खतरा है। पर वर्तमान में तो कोई चाहे सांसद हो या उद्योगपति, बिल्डर हो या ठेकेदार, सभी के लिए गैरजरूरी हथियार समाज में अपना रुतबा दिखाने तथा हैसियत जताने का जरिया बन रहे हैं। आज अहिंसा की दुहाई देने वाली राजनीति स्वयं हथियारों के बीच सुरक्षा का आवरण ढूंढ़ रही है। संगठित अपराधों में जिस कदर नित नए हथियारों का प्रयोग हो रहा है वह निश्चय ही देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए नई चुनौती बन कर उभर रहा है। गांव-देहात में पकड़ी जाने वाली देसी बंदूक बनाने की फैक्टरियां बताती हैं कि देश में अवैध हथियारों का कारोबार किस हद तक फैल चुका है। हालांकि आर्म्स एक्ट के अंतर्गत 1987 के बाद से, आतंकवादी गतिविधियों के कारण, अनेक हथियारों को प्रतिबंधित कर दिया गया है। फिर भी राजनीतिक रसूख या पहुंच के चलते रोज हजारों की संख्या में हथियारों के लाइसेंस दिए जा रहे हैं। अकेले उत्तर प्रदेश में लगभग चौदह लाख हथियारों के लाइसेंस जारी किए जा चुके हैं।

कड़वा सच यह है कि देश व समाज के विभिन्न हिस्सों में जिस सीमा तक असुरक्षा का वातावरण तैयार हुआ उसी अनुपात में लोगों को आग उगलने वाले हथियारों की जरूरत महसूस हुई। पर देखने में आ रहा है कि सुरक्षा के मूलभूत अधिकार की आड़ लेकर हथियार धीरे-धीरे स्टेटस सिंबल यानी हैसियत के प्रतीक भी बनते गए हैं। देश में सामाजिक व सांस्कृतिक ताने-बाने के छिन्न-भिन्न होने और सामाजिक नियंत्रण के कमजोर होने से हथियार का दुरुपयोग व्यक्तिके लिए प्रतिष्ठा का विषय बन रहा है।इसमें कोई संदेह नहीं कि विश्व के तमाम देश अब आतंक फैलाने वाली गतिविधियों और कोशिशों के खिलाफ खड़े हो रहे हैं। साथ ही यह भी देखने में आ रहा है कि आतंक को पनाह देने वाले देश धीरे-धीरे दरकिनार हो रहे हैं। पर निजी स्तर पर हथियारों की होड़ में कोई कमी आती नहीं दिख रही है। असल में अमेरिका में दशकों से जड़ें जमाए बैठी बंदूक संस्कृति भारत के लिए भी एक चेतावनी है कि आखिर हथियारों की यह ललक हमें कहां ले जाएगी। यह सच है कि हिंसा प्रतिहिंसा को जन्म देती है। अमेरिका में हथियारों का गैरजरूरी शौक और हथियारों तक लोगों की आसान पहुंच का दुष्परिणाम हमारे सामने है। लास वेगास जैसी घटना अमेरिका में पहली बार नहीं हुई है। जीवन में आक्रामक होने की जगह विनम्रता, असीम उपभोग की जगह संतोष, घृणा के स्थान पर प्रेम तथा अतिवाद की जगह संवाद जैसे भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों के सहारे ही बंदूक संस्कृति को फैलने से रोका जा सकता है। अभी भारत में अमेरिका जैसी स्थिति नहीं आई है। फिर भी अपने देश में बंदूक संस्कृति पर समय रहते रोक लगे, इसकी मांग नागरिक समाज की ओर से आनी चाहिए। अमेरिका के लास वेगास में जो हुआ वह हमारे लिए भी एक चेतावनी है।

 

 

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App