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राजनीति: कैंसर का विषैला विस्तार

कैंसर पूरे देश में पसरता जा रहा है। नतीजतन, कैंसर से मरने वालों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है। देश में हर साल कैंसर के लाखों नए मामले पंजीकृत हो रहे हैं। कैंसर के बढ़ते खतरे को कम करने लिए संयुक्त राष्ट्र के कुछ महत्त्वपूर्ण सुझावों पर अमल करने की बात कही गई थी। पर इस दिशा में सात साल बाद भी कोई प्रगति नहीं दिख रही है।

Author February 13, 2018 2:00 AM
प्रतीकात्मक चित्र

देश की आजादी के बाद कैंसर से मुक्ति दिलाने के लिए कई योजनाएं भारत सरकार ने शुरू कीं, जिन पर अब तक अरबों रुपए खर्च हो चुके हैं। इसके बावजूद कैंसर फैलता ही जा रहा है। 2015 में कैंसर के नए अस्पताल खोलने और नए शोधों को बढ़ावा देने की योजना बनाई गई, लेकिन अब तक इस दिशा में कोई सुगबुगाहट नहीं है। वर्ष 2010 में भी केंद्र सरकार कैंसर से निपटने के लिए सक्रिय हुई थी और घोषणा की थी कि पूर्वोत्तर के राज्यों के लिए एक कैंसर शोध संस्थान पूर्वोत्तर में ही स्थापित किया जाएगा, ताकि इन राज्यों के लोगों को कैंसर जैसी बीमारी के उपचार के लिए दूरदराज जैसे मुंबई और दिल्ली के अस्पतालों की ओर न भागना पड़े।

इसके अतिरिक्त पूरे देश में कैंसर के खिलाफ बड़े स्तर पर जागरूकता अभियान शुरू करने का भी एलान केंद्र की ओर से किया गया। पर कहीं भी कुछ नहीं हो पाया। दरअसल, अकेले केंद्र या फिर राज्य सरकार कुछ नहीं कर सकती है, इसके लिए सभी को एक मजबूत इच्छाशक्ति के साथ जुटना होगा, विशेष रूप से कैंसर विशेषज्ञों की टीम को गांवों की ओर मोड़ना होगा। कैंसर एक घातक जानलेवा बीमारी है जो पूरे देश में पसरती जा रही है। कैंसर इस समय उफान पर है। नतीजतन, कैंसर से मरने वालों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है। देश में हर साल कैंसर के लाखों नए मामले पंजीकृत हो रहे हैं।  भारत में गर्भाशय के कैंसर के मामले बढ़ रहे हैं। स्तन कैंसर और मुंह कैंसर भी तेजी से फैल रहा है। इसके अलावा फेफड़े का कैंसर, कैंसर के कुल मामलों में 7.9 फीसद है। भारत सरकार ने 2011 में कैंसर के बढ़ते खतरे को कम करने लिए संयुक्त राष्ट्र के कुछ महत्त्वपूर्ण सुझावों पर अमल करने की बात कही, जिसमें तंबाकू नियंत्रण, शराब पर नियंत्रण, मोटापा नियंत्रण और बेहतर पोषण शामिल है। पर इस दिशा में सात साल बाद भी कोई प्रगति नहीं दिख रही है। हालांकि यह चुनौती-भरा कार्य जरूर है लेकिन कम से कम लोगों को जागरूक तो किया ही जा सकता है। यह सही है कि देश की आबादी भी तेजी से बढ़ रही है। ऐसे में बेहतर पोषण सुनिश्चित और व्यवस्थित करना एक बड़ा काम है।

कैंसर पर किए गए एक अध्ययन पर गौर करें तो विकासशील देशों में तंबाकू और अन्य तंबाकू उत्पादों के सेवन में सात फीसद की कमी देखी गई है। खासकर बीड़ी में 9.1 फीसद और सिगरेट में 7 फीसद की कमी आई है। कैंसर विशेषज्ञों का मानना है कि बीड़ी-सिगरेट पर टैक्स में और ज्यादा वृद्धि की जानी चाहिए। नए शोध में यह भी पाया गया है कि तंबाकू चबाने से मुंह, गला, अमाशय, आंखों की रोशनी चले जाने, हाथ-पैरों में विकृति, नपुसंकता, यकृत और फेफड़े के कैंसर का खतरा बढ़ जाता है। शोध में यह भी पाया गया है कि सिगरेट और बीड़ी में बहुत तरह के रसायन होते हैं, जिनमें से सात रसायन ऐसे हैं जो सीधे कैंसर रोग को बढ़ावा देते हैं। भारत में करीब दो सौ करोड़ मिलियन सिगरेट और बीड़ी फूंकी जाती है। इससे सहजता से अनुमान लगाया जा सकता है कि बीड़ी और सिगरेट के धुएं किस तरह से शरीर को नुकसान पहुंचाने के साथ ही कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियों को जन्म देते हैं।

मुंह के कैंसर के रोगियों की सर्वाधिक संख्या भारत में ही है। पूर्वोत्तर के राज्यों में मुंह का कैंसर तेजी से बढ़ रहा है जो वाकई चिंता का बड़ा कारण है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के मुताबिक हर तीसरा भारतीय किसी न किसी रूप में तंबाकू या ध्रूमपान उत्पादों का सेवन करता है। इनमें एक तिहाई लोग कैंसर या दिल की बीमारी से पीड़ित हैं। देश में हर साल साठ हजार व्यक्ति मस्तिष्क कैंसर की चपेट में आते हैं। इनमें उन्नीस फीसद बच्चे होते हैं। ब्रेन ट्यूमर की रोकथाम के लिए राष्ट्रीय कैंसर नियंत्रण कार्यक्रम की शुरुआत की गई है, पर जितनी सफलता मिलनी चाहिए, नहीं मिल पा रही है। ब्रेन ट्यूमर दो माह के बच्चे से लेकर आठ साल तक किसी भी उम्र में हो सकता है। दो से चार वर्ष की आयु वाले बच्चों में ब्रेन ट्यूमर अमूमन बिना कैंसर वाले होते हैं। वैसे चिकित्सकों का मानना है कि सभी ब्रेन ट्यूमर कैंसर नहीं होते। साथ ही अधिकतर ब्रेन ट्यूमर मस्तिष्क के बाहर नहीं फैलते हैं। सबसे बड़ी दिक्कत पर्वतीय जनपदों में कैंसर विशेषज्ञों की कमी है। पर्वतीय जनपदों में कैंसर से मरने वालों की संख्या में तेजी से इजाफा हो रहा है। इसका सबसे बड़ा कारण वहां चिकित्सकों की अनुपलब्धता है। वैसे पर्वतीय राज्यों में सामान्य डॉक्टर भी जाना नहीं चाहते हैं। ऐसे में कैंसर के विशेषज्ञ चिकित्सकों की वहां पर्याप्त उपलब्धता की उम्मीद भला कैसे की जाए! जम्मू-कश्मीर, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश के अलावा पूर्वोत्तर के राज्य आज भी चिकित्सकों की भारी कमी से जूझ रहे हैं। इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि राष्ट्रीय कैंसर नियंत्रण कार्यक्रम को कहां तक सफलता मिल पाएगी! जबकि इस कार्यक्रम के तहत करोड़ों रुपए महज जागरूकता अभियान के नाम पर खर्च किए जा रहे हैं। पर परिणाम वही ढाक के तीन पात।

हाल ही में एम्स के न्यूरोलॉजी विभाग ने एक सर्वे कराया जिसमें पाया गया कि सेलफोन के इस्तेमाल से ब्रेन ट्यूमर का खतरा 1.33 गुना बढ़ जाता है। कैनेडियन ब्राडकॉस्टिंग कॉरपोरेशन ने अपने सर्वे में यह माना है कि अगर सेलफोन जेब, ब्रा या फिर पैंट में भी रखा जाए तो इससे शरीर को मिलने वाला रेडिएशन निरापद सीमा से काफी अधिक होता है। कैंसर के बारे में हुए अध्ययन बताते हैं कि भारत में हर दो मिनट में कैंसर किसी न किसी को अपनी चपेट में ले लेता है। तंबाकू के अलावा बढ़ता प्रदूषण भी कैंसर के लिए काफी हद तक जिम्मेवार है। भारत में तो कैंसर से होने वाली सात फीसद मौतों का कारण देर से पता चलना है। इसके अलावा शहरी क्षेत्रों में स्तन (ब्रेस्ट) कैंसर तेजी से फैल रहा है। जबकि माना जाता है कि शहरी क्षेत्रों की महिलाएं अपनी सेहत को लेकर कहीं ज्यादा जागरूक रहती हैं। शहरों में ब्रेस्ट कैंसर के मामले ज्यादा पाए जाने के पीछे मुख्य कारण कैंसर विशेषज्ञ देर से शादी करना और देर से बच्चे पैदा करना मानते हैं। विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि हर अट्ठाईस में से एक महिला को कैंसर होने की आशंका रहती है।

वर्तमान समय में सर्वाइकल कैंसर भी बढ़ रहा है। सर्वाइकल ऐसी बीमारी है जिससे प्रत्येक घर में कोई न कोई व्यक्ति आज के समय में ग्रसित दिखता है। सर्वाइकल की बीमारी आरामदायक कुर्सी पर बैठने के साथ ज्यादा आरामदायक बिस्तर से भी हो जाती है। लेकिन महत्त्वपूर्ण बात यह है कि सर्वाइकल के छोटे रूप से बढ़ने पर आपको सर्वाइकल कैंसर भी हो सकता है। भारत में इस समय सर्वाइकल कैंसर ने विकराल रूप धारण कर लिया है। ‘इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ मेट्रिक्स एंड ईवैल्यूएशन’ (अमेरिका) की ताजा रिपोर्ट के अनुसार भारत में हर पांचवीं महिला इस बीमारी का शिकार हो रही है। साथ ही, भारत में हर सातवें मिनट में एक महिला सर्वाइकल कैंसर की वजह से अपनी जान गंवाती है। भारत में सर्वाइकल कैंसर का खतरा विदेशों की तुलना में दो गुना है। दुनिया भर में इस बीमारी से जितनी मौतें हो रही हैं, उसकी पच्चीस फीसद मौतें सिर्फ भारत में हो रही हैं।

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