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राजनीति: विज्ञान के लिए राष्ट्रीय नीति की जरूरत

सीएसआइआर का एक सर्वे बताता है कि हर साल जो करीब तीन हजार अनुसंधान-पत्र तैयार होते हैं, उनमें कोई नया विचार नहीं होता। वैज्ञानिकों और वैज्ञानिक संस्थानों की कार्यकुशलता का पैमाना वैज्ञानिक शोधपत्रों का प्रकाशन और पेटेंटों की संख्या है। लेकिन इन दोनों ही क्षेत्रों में गिरावट आई है। देश के हालात ऐसे हैं कि आज के इस आधुनिक युग में भी ‘विज्ञान’ आम आदमी से काफी दूर है।

वैज्ञानिक शोध के मामले में दुनिया के कई छोटे देश हमसे आगे निकल चुके हैं।(प्रतिकात्मक तस्वीर)

हाल में विज्ञान के सबसे बड़े सालाना सम्मेलन- भारतीय विज्ञान कांग्रेस का इंफल में उद्घाटन करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि वैज्ञानिक आम लोगों के फायदे के लिए अनुसंधान करें और वैज्ञानिक उपलब्धियों को समाज तक पहुंचाएं। इससे युवाओं में वैज्ञानिक चेतना जाग्रत होगी और शोध-अनुसंधान का माहौल भी बनेगा। असल में पिछले एक सौ चार सालों से चल रहे विज्ञान कांग्रेस के इस आयोजन का भी मुख्य उद्देश्य आम आदमी तक विज्ञान का लाभ पहुंचा कर सतत शोध और विकास को बढ़ावा देना है। लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि अभी भी देश में विज्ञान, वैज्ञानिक संचार, विज्ञान चेतना और उत्कृष्ट वैज्ञानिक शोध का अभाव दिखता है। विज्ञान कांग्रेस जैसे बड़े आयोजन भी अब एक रस्म अदायगी बन कर रह गए हैं। पिछले कई दशकों से देश में एक भी ऐसा वैज्ञानिक शोध नहीं हुआ जिसे दुनिया उसकी विशिष्ट देन के कारण पहचान सके। हम आज भी 1930 में रमन प्रभाव की खोज के लिए भारतीय वैज्ञानिक सीवी रमन को मिले नोबेल पर खुशी मना रहे हैं। देश में बुनियादी विज्ञान और शोध की स्थिति ठीक नहीं है। प्रधानमंत्री ने कई महत्त्वपूर्ण मंचों से यह भरोसा दिया है कि सरकार देश में शोध और अनुसंधान का माहौल बनाएगी। लेकिन सच तो यह है कि देश में विज्ञान के बुनियादी विकास के लिए अभी भी लक्ष्यपरक राष्ट्रीय नीति नहीं बनी है। विज्ञान के लिए बजट भी बहुत कम है। हर साल विज्ञान कांग्रेस में कहा जाता है कि सरकार विज्ञान के लिए बजट में जीडीपी का दो फीसद खर्च करेगी, लेकिन यह वादा हमेशा अधूरा रह जाता है। इस बार भी केंद्रीय बजट में विज्ञान और प्रौद्योगिकी के पूरे क्षेत्र का बजट जीडीपी का लगभग एक फीसद ही आवंटित किया गया। प्रधानमंत्री ने दावा किया है कि 2030 तक विज्ञान और तकनीक के मामले में भारत दुनिया के शीर्ष तीन देशों में शामिल हो जाएगा। लेकिन सच्चाई यह है कि विज्ञान के क्षेत्र में भारत को शीर्ष पर लाने के लिए हमें जमीनी स्तर पर बहुत कुछ करना होगा। सबसे पहले देश में वैज्ञानिक शोध और आविष्कार का माहौल बनाना होगा। साथ ही देश में विज्ञान के कमजोर बुनियादी ढांचे को दुरुस्त करना होगा।

वैज्ञानिक शोध के मामले में दुनिया के कई छोटे देश हमसे आगे निकल चुके हैं। रमन प्रभाव की खोज के बाद भी हम उस पर और आगे शोध नहीं कर पाए और रमन स्कैनर का विकास दूसरे देशों ने किया। यह हमारी नाकामी नहीं तो और क्या है! एक रिपोर्ट के अनुसार वैश्विक स्तर पर शोधपत्रों के प्रकाशन के मामले में भी भारत, चीन और अमेरिका से काफी पीछे है। अमेरिका में हर साल भारत से दस गुना ज्यादा और चीन में सात गुना ज्यादा शोधपत्र प्रकाशित होते हैं। ब्राजील में भी हमसे तीन गुना अधिक शोधपत्र प्रकाशित होते हैं। शोधपत्रों के प्रकाशन में वैश्विक स्तर पर हमारी हिस्सेदारी महज दो फीसद है। शोध और विकास पर भारत अपने सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी का केवल 0.88 फीसद खर्च करता है, जबकि यही आंकड़ा अमेरिका में 2.8, चीन में 1.9, ब्रिटेन में 1.8 और रूस में 1.1 फीसद है। भारत में प्रति दस हजार लोगों पर केवल चार वैज्ञानिक शोध करने वाले हैं, जबकि अमेरिका और ब्रिटेन, दोनों में यह आंकड़ा उनयासी का है। जबकि रूस में अट्ठावन और चीन में अठारह का है। विज्ञान और तकनीक में योगदान के मामले में विश्व में भारत इक्कीसवें नंबर पर है। इस रैंकिंग का आधार यह है कि कौन-सा देश वैज्ञानिक शोध में कितनी हिस्सेदारी कर रहा है। यह हिस्सेदारी शोध और अनुसंधान पत्रों से तय होती है। विज्ञान और तकनीक में किसी देश के योगदान को वैज्ञानिक व तकनीकी विषयों में पीएचडी करने वालों की संख्या से भी नापा जा सकता है। इस मामले में भारत की स्थिति अच्छी नहीं है। हमारे पास सीएसआइआर जैसी संस्थाएं हैं, कई स्तरीय अनुसंधान केंद्र हैं और विश्वविद्यालयों में विज्ञान विभाग भी हैं। लेकिन सीएसआइआर का एक सर्वे बताता है कि हर साल जो करीब तीन हजार अनुसंधान-पत्र तैयार होते हैं, उनमें कोई नया विचार नहीं होता। वैज्ञानिकों और वैज्ञानिक संस्थानों की कार्यकुशलता का पैमाना वैज्ञानिक शोधपत्रों का प्रकाशन और पेटेंटों की संख्या है। लेकिन इन दोनों ही क्षेत्रों में गिरावट आई है। देश के हालात ऐसे हैं कि आज के इस आधुनिक युग में भी ‘विज्ञान’ आम आदमी से काफी दूर है। हम अभी तक आम आदमी में वैज्ञानिक चेतना का विकास नहीं कर पाए हैं और यही वजह है कि देश में अंधविश्वास का बोलबाला है, खासतौर से गांव और कस्बों में अंधविश्वास की जड़ें काफी गहरी हैं।

आज जरूरत लोगों में वैज्ञानिक सोच पैदा करने की है। देश के विकास में विज्ञान का महत्त्वपूर्ण योगदान है और हर नागरिक को विज्ञान से जोड़े बिना सर्वांगीण विकास संभव नहीं है। विज्ञान संचार की दिशा में केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को काफी काम करना है। समाज के हर तबके तक विज्ञान और तकनीक की पहुंच होनी चाहिए। डिजिटल कनेक्टिविटी के साथ विज्ञान की बुनियादी समझ को विकसित करने के लिए एक तंत्र की जरूरत है। देश में शोध और अनुसंधान का माहौल होगा तभी ‘मेक इन इंडिया’ का सपना भी पूरा हो सकेगा और हम प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भी पूरी तरह से आत्मनिर्भर हो सकेंगे। विज्ञान की चर्चा अक्सर बड़ी वैज्ञानिक उपलब्धियों तक सिमट कर रह जाती है। आज सबसे ज्यादा जरूरत इस बात की है कि देश में विज्ञान की शिक्षा की स्थिति कैसे सुधरे, और दूसरा यह कि जन-समस्याओं के निराकरण में विज्ञान का उपयोग कैसे बढ़ाया जाए। देश में विज्ञान की शिक्षा के लिए स्कूली स्तर पर प्रयोगशालाओं की भारी कमी है। समझने और प्रयोग करके सीखने के बजाय विद्यार्थियों के सिर्फ रटने पर जोर दिया जाता है, जो एक घातक प्रवृत्ति है। स्कूल के बाद विश्वविद्यालय स्तर पर भी विज्ञान शिक्षा की स्थिति ठीक नहीं है। इस पर तत्काल ध्यान देने की जरूरत है। इस बार विज्ञान कांग्रेस का मूल विषय था- विज्ञान और तकनीक से दूर लोगों तक इसकी पहुंच को आसान बनाना, यानी वैज्ञानिक समुदाय का ध्यान ऐसी नई खोजों पर होना चाहिए जो आम आदमी की जिंदगी बदल सकते हैं।

किसी भी राष्ट्र की प्रगति विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में शिक्षा और अनुसंधान में हुई निरंतर वृद्धि पर निर्भर करती है। इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए हमारा अनुसंधान अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप होना चाहिए। अभी हालत यह है कि सरकार सिर्फ सरकारी संस्थाओं को प्रोत्साहित करती है और उनकी आर्थिक मदद करती है, जबकि बुनियादी अनुसंधान के विकास के लिए सरकार को निजी विश्वविद्यालयों को भी अपने साथ जोड़ना होगा। बेहतर निजी संस्थानों को आर्थिक मदद भी करनी होगी जिससे वे भी अपना योगदान दे सकें। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि उच्च शिक्षा के क्षेत्र में आज पंचानबे प्रतिशत निजी संस्थान हैं, जबकि सिर्फ पांच प्रतिशत सरकारी संस्थान हैं। देश में आधारभूत विज्ञान के विकास के लिए हमें सरकारी के साथ-साथ निजी क्षेत्र की भी भागीदारी बढ़ानी पड़ेगी। आज जरूरत है विज्ञान के विषय में गंभीरता से एक राष्ट्रीय नीति बनाने और उस पर संजीदगी से अमल करने की। विज्ञान विषय में पीएचडी उपाधि के बाद भी बेरोजगारी का दंश शोध की संभावनाओं को खत्म कर देता है। मेधावी छात्रों को विज्ञान विषय पढ़ने के लिए आकर्षित करने, विज्ञान के छात्रों और शोधार्थियों को रोजगार की गारंटी देने जैसे कदम भी उठाने होंगे, ताकि देश में वैज्ञानिक शोध और आविष्कार का एक सकारात्मक माहौल बने।

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