jansatta artical Increasing Dangers of Urbanization written by Devendra Joshi - राजनीति: शहरीकरण के बढ़ते खतरे - Jansatta
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राजनीति: शहरीकरण के बढ़ते खतरे

शहरों में झुग्गी-झोपड़ियों की संख्या धीरे-धीरे बढ़ रही है। इसलिए यह भय स्वाभाविक ही है कि आने वाले वर्षों में भारत कहीं शहरी मलिन बस्तियों वाला देश न बन जाए। दिल्ली, कोलकाता, पटना जैसे महानगरों में जल निकासी की माकूल व्यवस्था न होने के कारण थोड़ी-सी बरसात में बाढ़ का पानी शहर में घुस कर जनजीवन ठप कर देता है। महानगरों में भूमिगत सीवर प्रणाली तो अपना ली गई, लेकिन नालियां जाम होने की समस्या बनी रहती है। पॉलीथिन, घरों से निकलने वाले अपशिष्ट और कचरा सीवर के सबसे बड़े दुश्मन हैं।

Author February 15, 2018 2:20 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

देवेंद्र जोशी

अनियोजित शहरीकरण आज किसी एक प्रदेश की नहीं, बल्कि पूरे देश की समस्या है। आजादी के सत्तर सालों में जहां कस्बे शहर, शहर नगर और नगर महानगर बनते चले गए, वहीं गांवों की स्थिति में कोई खास बदलाव नहीं आया। गांव आज भी गांव ही है। वही आबोहवा, आंचलिक संस्कृति, एक-दूसरे के सुख-दुख में हिस्सा बंटाने का आत्मीय भाव, अभाव में भी संतुष्टि और इस सबसे बढ़ कर छोटी-सी घटना के घटित होने पर सारे गांव के एकजुट हो जाने का संवेदनशील रवैया। गांव के मूल चरित्र में आज भी कोई बदलाव नहीं आया है। मूल्य, परंपरा और संस्कृति के संरक्षण की दृष्टि से यह शुभ संकेत है। जबकि इस दौरान शहरों और नगरों की संस्कृति और सभ्यता में अनियोजित शहरीकरण के कारण आए बदलाव ने पूरी दुनिया ही बदल कर रख दी है। तेजी से हो रहे शहरीकरण और नगरीकरण का ही नतीजा है कि चार लेन वाली सड़कों पर सरपट दौड़ती गाड़ियों, चौराहों पर चमचमाती तेज लाइटें और सड़कों पर रेंगती की भीड़ के बीच जीवन का असली मकसद जैसे कहीं खो गया है। मनुष्य मशीनों और शहर समस्याओं के केंद्र बन कर रह गए हैं।

नगरों, शहरों और महानगरों के आकर्षण में हर कोई गांव छोड़ कर शहर में आ बसना चाहता है, बगैर इस बात की पड़ताल किए कि शहर इसके लिए तैयार हैं भी या नहीं। यह प्रवृत्ति स्वाभाविक और युगीन है। शहर विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। अच्छी शिक्षा, अच्छा जीवन, अच्छे कामकाज, रोजगार और अच्छी चिकित्सा की तलाश में लोग शहरों की ओर भाग रहे हैं। एक अनुमान के अनुसार एक करोड़ लोग हर हफ्ते रोजी-रोटी और तरक्की के सपने संजोए गांवों से शहरों की ओर चले आते हैं। चाहे शहरी चकाचौंध का आकर्षण हो या रोजी-रोटी कमाने की मजबूरी, सच्चाई यह है कि दुनिया की करीब आधी आबादी शहरों में बसने लगी है। वातावरण में हर साल घुलने वाली अस्सी फीसद कार्बन डाई आक्साइड इन्हीं शहरों से आती है। वर्ल्ड रिसोर्स इंस्टीट्यूट के मुताबिक विकासशील देशों में शहरी आबादी साढ़े तीन फीसद सालाना की दर से बढ़ रही है, जबकि विकसित देशों में यह वृद्धि दर मात्र एक फीसद है। संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के मुताबिक अगले बीस सालों में शहरी आबादी जितनी बढ़ेगी, उसका 95 फीसद बोझ विकासशील देशों पर पड़ेगा। यानी सन 2030 तक विकासशील देशों में दो अरब लोग शहरों में रहने लगेंगे। संयुक्त राष्ट्र का यह भी आकलन है कि अगर शहरों पर बढ़ रहे आबादी के बोझ और बढ़ते प्रदूषण को नियंत्रित नहीं किया गया तो एक करोड़ से ज्यादा आबादी वाले बड़े शहरों पर भविष्य में बाढ़ और अन्य प्राकृतिक आपदाओं का खतरा बढ़ जाएगा। शहरों पर ज्यों-ज्यों आबादी का बोझ बढ़ रहा है, लोगों को मिलने वाली सुविधाओं में कमी आ रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक विकासशील देशों में सत्तर फीसद से ज्यादा आबादी यानी करीब नब्बे करोड़ लोग झुग्गी-झोपड़ी में रहते हैं। ऐसे में जहां उनके लिए स्वास्थ्य संबंधी परेशानी बढ़ी है, वहीं पर्यावरण को भी गंभीर नुकसान पहुंचा है। प्रदूषण के चलते शहरों में हर साल करीब दस लाख लोग असमय मौत के शिकार हो जाते हैं। शहरीकरण के कारण रोजमर्रा की समस्याएं भी बढ़ी हैं। इनमें जनसंख्या वृद्धि, गरीबी, बेकारी, अपराध, बाल अपराध, महिला उत्पीड़न, भीड़भाड़, गंदी बस्तियां, आवास की कमी, बिजली एवं जल आपूर्ति की कमी, प्रदूषण, मदिरा पान और अन्य मादक पदार्थों का सेवन, संचार एवं यातायात संबंधी समस्याएं प्रमुख हैं। शहरीकरण के कारण नगरों और महानगरों में आवास की स्थिति बद से बदतर होती जा रही है। यह कहावत प्रचलित है कि कामकाज की तलाश में आने वालों को नगरों-महानगरों में रहने के लिए घर के अलावा सब कुछ मिल जाएगा।

मुंबई की स्थिति तो यह है कि यहां छह गुणा आठ की एक खोली में चार-पांच लोग अपना जीवन गुजारने को मजबूर हैं। यही नहीं, दुनिया की सबसे बड़ी झोपड़पट्टी बस्ती मुंबई में ही है। फिर भी यहां डेढ़ लाख लोग फुटपाथ पर रात गुजारते हैं। कोलकाता की स्थिति तो और भी दयनीय है। यहां छह लाख लोग फुटपाथ पर रात गुजारने को मजबूर हैं। देश की राजधानी दिल्ली की सतहत्तर फीसद आबादी गंदी बस्तियों में निवास करती है। सघन शहरीकरण का एक प्रभाव भाव-शून्यता, संवेदनहीनता और उदासीनता के रूप में भी देखने को मिलता है। व्यक्ति अपनी समस्याओं में ही इतना उलझा है कि उसे आस-पड़ोस की भी खबर नहीं होती है। बहुमंजिला इमारत के ऊपरी माले पर रहने वाला व्यक्ति नीचे वाले को नहीं जानता। कई बार ऐसा हुआ है कि एकाकी रहने वाले व्यक्ति की मृत्यु का उसके आसपास के लोगों को आठ-दस दिन बाद तब पता चला जब कमरे से दुर्गंध आने लगी। शहरी लोग दूसरों के मामले में उलझना नहीं चाहते। यहां तक कि दुर्घटना, खून-खराबा जैसी अप्रत्याशित गंभीर स्थिति में भी लोग तमाशबीन बने खड़े-खड़े देखते रहते हैं।

जल संरक्षण से लेकर पर्यावरण संरक्षण और ग्लोबल वार्मिंग तक जितनी भी चिंताएं हैं, उनके मूल में कहीं न कहीं विकास की वह अवधारणा है जो कभी औद्योगीकरण तो कभी शहरीकरण के नाम पर प्रकृति और पर्यावरण को निगल रही है। अतीत में नगरों की बसावट सुनियोजित होती थी। यही वजह है कि पुराने नगर नदी किनारे बसा करते थे। लेकिन बीते कुछ दशकों में जिसे जहां जगह मिली, वहीं बस्ती बसा ली। साल दर साल कस्बों, नगरों, महानगरों की संख्या में निरंतर वृद्धि होती जा रही है। 2001 से 2011 के बीच देश में 2532 नए कस्बे अस्तित्व में आए। 1971 में एक लाख से अधिक आबादी वाले शहरों की संख्या मात्र एक सौ इक्यावन थी, जो आज बढ़ कर दोगुनी अर्थात तीन सौ दो हो गई है। यही हाल दस लाख और इससे अधिक आबादी वाले शहरों का है। शहरों में झुग्गी-झोपड़ियों की संख्या धीरे-धीरे बढ़ रही है। इसलिए यह भय स्वाभाविक ही है कि आने वाले वर्षों में भारत कहीं शहरी मलिन बस्तियों वाला देश न बन जाए। दिल्ली, कोलकता, पटना जैसे महानगरों में जल निकासी की माकूल व्यवस्था न होने के कारण थोड़ी-सी बरसात में बाढ़ का पानी शहर में घुस कर जनजीवन ठप कर देता है। महानगरों में भूमिगत सीवर प्रणाली तो अपना ली गई, लेकिन नालियां जाम होने की समस्या बनी रहती है। पॉलीथिन, घरों से निकलने वाले अपशिष्ट और कचरा सीवर के सबसे बड़े दुश्मन हैं।

नए-नए नगर-महानगर बनें, इससे भला किसे एतराज हो सकता है! लेकिन उसके अनुरूप सड़क, बिजली, पानी, आवास, यातायात, साफ-सफाई की व्यवस्था भी तो जुटाई जाए। पर्यावरण को हो रहे नुकसान का प्रमुख कारण अनियोजित शहरीकरण है। बीते दो-तीन दशकों में जिला मुख्यालयों से लगे कस्बों के इर्द-गिर्द धड़ल्ले से खेत, तालाब और जंगलों को वैध-अवैध तरीकों से कंक्रीट के जंगल में तब्दील कर दिए जाने का ही नतीजा है कि आज शहरों में ताजी हवा तलाश पाना मुश्किल होता जा रहा है। इस सबसे बचाव का एक ही उपाय है। लोग जिस काम धंधे की तलाश में गांव छोड़ कर शहर आते हैं, अगर गांव में ही ऐसी व्यवस्था जुटा दी जाए जिससे कि उनकी क्षमता, योग्यता और आजीविका की तलाश पूरी हो जाए तो पलायन भी रुक सकेगा और अनियोजित शहरीकरण से उत्पन्न होने वाली समस्याओं पर भी एक हद तक नियंत्रण पाया जा सकेगा।

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