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वायु प्रदूषण की भेंट चढ़ती जिंदगी

वायु प्रदूषण से न केवल मानव समाज, बल्कि प्रकृति को भी भारी नुकसान पहुंच रहा है। जब भी वर्षा होती है प्रदूषक तत्त्व वर्षा जल के साथ मिल कर नदियों, तालाबों और मृदा को प्रदूषित कर देते हैं। अम्लीय वर्षा का जलीय तंत्र पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रही है। अम्लीय वर्षा वनों को भी बड़े पैमाने पर नष्ट कर रही है।

Author March 1, 2017 3:19 AM
वायु प्रदूषण की वजह से मुंह ढंककर स्कूल जाते बच्चे। (source: IE photo by Gajendra Yadav)

 

रीता सि

यह चिंता का विषय है कि वायु प्रदूषण की वजह से भारत में हर मिनट दो लोगों की मौत हो रही है। यह खुलासा दुनिया की जानी-मानी चिकित्सा पत्रिका लांसेट ने किया है। इसमें अड़तालीस प्रमुख वैज्ञानिकों का अध्ययन शामिल है। इस अध्ययन में कहा गया है कि पीएम 2.5 के स्तर के लिहाज से भारत की राजधानी दिल्ली और पटना शहर विश्व के सर्वाधिक प्रदूषित शहरों में हैं। वायु प्रदूषण के कारण हर वर्ष तकरीबन दस लाख भारतीय मौत के मुंह में समा रहे हंै। दक्षिण एशिया में यह आंकड़ा सोलह लाख है। अमेरिका के प्रतिष्ठित हेल्थ इफेक्ट इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट में भी कहा गया है कि भारत की हवा में पीएम 2.5 कणों की हद से ज्यादा मौजूदगी के कारण वर्ष 2015 में ग्यारह लाख समय पूर्व मौतें हुर्इं।
पिछले साल विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी खुलासा किया कि दक्षिण पूर्व एशिया क्षेत्र में वायु प्रदूषण की वजह से हर साल आठ लाख जानें जा रही हैं जिसमें पचहत्तर फीसद से ज्यादा मौतें भारत में हो रही हैं। रिपोर्ट के मुताबिक यह संपूर्ण क्षेत्र आपात स्थिति में है। हर दस में से नौ लोग ऐसी हवा में सांस ले रहे हैं, जो उनकी सेहत के लिए बेहद खतरनाक है। पत्रिका के मुताबिक भारत के कई शहरों में प्रदूषक तत्त्व विश्व स्वास्थ संगठन के तय मापदंड दस माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर से अधिक हैं। भारत की बानवे फीसद जनसंख्या सर्वाधिक वायु प्रदूषित इलाकों में रह रही है।

भारत में वायु प्रदूषण किस तरह जानलेवा साबित हो रहा है यह पिछले साल पहले यूनिवर्सिटी आॅफ शिकागो, हार्वर्ड और येल के अर्थशास्त्रियों की उस रिपोर्ट से उद्घाटित हुआ, जिसमें कहा गया था कि भारत दुनिया के उन देशों में शुमार है, जहां सबसे अधिक वायु प्रदूषण है और जिसकी वजह से यहां के लोगों को समय से तीन साल पहले काल का ग्रास बनना पड़ रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक अगर भारत अपने वायु मानकों को पूरा करने के लिए इस आंकड़े को उलट देता है तो इससे छियासठ करोड़ लोगों के जीवन के 3.2 वर्ष बढ़ जाएंगे। रिपोर्ट के मुताबिक अगर भारत वायु प्रदूषण पर शीध्र नियंत्रण नहीं करता, तो 2025 तक अकेले राजधानी दिल्ली में वायु प्रदूषण से हर वर्ष 26,600 लोगों की मौत होगी।
पिछले साल दुनिया की जानी-मानी पत्रिका ‘नेचर’ ने भी खुलासा किया कि अगर शीघ्र ही वायु की गुणवत्ता में सुधार नहीं हुआ, तो वर्ष 2050 तक प्रत्येक वर्ष छियासठ लाख लोगों की जानें जा सकती हैं। गौरतलब है कि यह रिपोर्ट जर्मनी के मैक्स प्लेंक इंस्टीट्यूट आॅफ केमेस्ट्री के प्रोफेसर जोहान लेलिवेल्ड और उनके शोध दल ने तैयार किया था, जिसमें प्रदूषण फैलने के दो प्रमुख कारण गिनाए गए। एक, पीएम 2.5-एस विषाक्त कण और दूसरा वाहनों से निकलने वाली गैस नाइट्रोजन आक्साइड। रिपोर्ट में आशंका जाहिर की गई कि भारत और चीन में वायु प्रदूषण की समस्या विशेष तौर पर गहरा सकती है। क्योंकि इन देशोें में खाना पकाने के लिए कच्चे र्इंधन का इस्तेमाल होता है, जो प्रदूषण का बड़ा स्रोत है।
अच्छी बात है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने वायु प्रदूषण से होने वाले स्वास्थ्य जोखिमों के बारे में जागरूकता बढ़ाने की अपील की है। लेकिन विडंबना है कि इस पर अमल नहीं हो रहा। भारत में चार साल पहले ‘क्लीन एयर एक्शन प्लान’ के जरिए वायु प्रदूषण से निपटने का संकल्प लिया गया। लेकिन उस पर कोई काम नहीं हो रहा है। नतीजा सामने है। भारत के विभिन्न शहर वायु प्रदूषण की चपेट में हैं। उपग्रहों से लिए गए आंकड़ों के आधार पर तैयार रिपोर्ट के मुताबिक विश्व के 189 शहरों में सर्वाधिक प्रदूषण स्तर भारतीय शहरों में है। मसलन, भारत का सिलिकॉन वैली बंगलुरू वायु प्रदूषण स्तर में वृद्धि के मामले में अमेरिका के पोर्टलैंड शहर के बाद दूसरे स्थान पर है।

कुछ ऐसे ही बदतर हालात देश के अन्य बड़े शहरों के भी हैं। खतरनाक बात यह कि देश के शहरों के वायुमंडल में गैसों का अनुपात बिगड़ता जा रहा है और उसे लेकर किसी तरह की सतर्कता नहीं बरती जा रही। हाल के वर्षों में वायुमंडल में कार्बन डाई आॅक्साइड की मात्रा तकरीबन पच्चीस फीसद वृद्धि हुई है। इसका मुख्य कारण बड़े कल-कारखानें और उद्योगधंधों में कोयले और खनिज तेल का उपयोग है। गौरतलब है कि इनके जलने से सल्फर डाई आॅक्साइड निकलती है, जो मानव जीवन के लिए बेहद खतरनाक है। शहरों का बढ़ता दायरा, कारखानों से निकलने वाला धुंआ, वाहनों की बढ़ती तादाद और मेट्रो का विस्तार तमाम ऐसे कारण हैं, जिनकी वजह से प्रदूषण बढ़ रहा है। वाहनों के धुएं के साथ सीसा, कार्बन मोनोक्साइड और नाइट्रोजन आॅक्साइड के कण निकलते हैं। ये दूषित कण मानव शरीर में कई तरह की बीमारियां पैदा करते हैं। मसलन, सल्फर डाई आॅक्साइड से फेफड़े के रोग, कैडमियम से हृदय रोग, और कार्बन मोनोक्साइड से कैंसर और श्वास संबंधी रोग होते हैं। कारखाने और विद्युत गृह की चिमनियों और स्वचालित मोटरगाड़ियों में विभिन्न र्इंधनों के पूर्ण और अपूर्ण दहन भी प्रदूषण को बढ़ावा देते हैं।

वायु प्रदूषण से न केवल मानव समाज, बल्कि प्रकृति को भी भारी नुकसान पहुंच रहा है। जब भी वर्षा होती है प्रदूषक तत्त्व वर्षा जल के साथ मिल कर नदियों, तालाबों और मृदा को प्रदूषित कर देते हैं। अम्लीय वर्षा का जलीय तंत्र समष्टि पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रही है। नार्वे, स्वीडन, कनाडा और संयुक्त राज्य अमेरिका की महान झीलें अम्लीय वर्षा से प्रभावित हैं। अम्लीय वर्षा वनों को भी बड़े पैमाने पर नष्ट कर रही है। यूरोप महाद्वीप में अम्लीय वर्षा के कारण साठ लाख हेक्टेयर वन क्षेत्र नष्ट हो चुके हैं। ओजोन गैस की परत में दूषित गैसों के कारण एक बड़ा छिद्र हो गया है, जिससे सूर्य की खतरनाक पराबैगनीं किरणें भूपृष्ठ पर पहुंच कर ताप में वृद्धि कर रही है। इससे न केवल कैंसर जैसे असाध्य रोगों में वृद्धि हो रही है, बल्कि पेड़ों से कार्बनिक यौगिकों के उत्सर्जन में बढ़ोत्तरी हुई है। नए शोधों से जानकारी मिली है कि गर्भवती महिलाएं, जो वायु प्रदूषण क्षेत्र में रहती है, उनसे जन्म लेने वाले शिशु का वजन सामान्य शिशुओं की तुलना में कम होता है। शोध के मुताबिक जन्म के समय कम वजन के शिशुओं को आगे चल कर स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। यानी इनमें मधुमेह और हृदय रोग का खतरा बढ़ जाता है।

वायु प्रदूषण का दुष्प्रभाव ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासतों पर भी पड़ रहा है। पिछले साल देश के उनतालीस शहरों के एक सौ अड़तीस स्मारकों पर वायु प्रदूषण के घातक दुष्प्रभाव का अध्ययन किया गया। पाया गया कि शिमला, हसन, मंगलौर, मैसूर, कोट्टयम और मदुरै में पार्टिकुलेट मैटर पॉल्यूशन राष्ट्रीय मानक साठ माइक्रोग्राम क्यूबिक मीटर से भी अधिक है। विश्व बैंक के मुताबिक वायु प्रदूषण से भारत में श्रमबल की दृष्टि से करीब 2.55 लाख करोड़ रुपए का नुकसान होगा। इसी तरह विश्व अर्थव्यवस्था में एक साल में श्रम संबंधी आय में 2.25 अरब डॉलर का नुकसान होता है। विश्व बैंक ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि 2013 में बाहरी और घर के अंदर वायु प्रदूषण जनित बीमारियों के चलते तकरीबन पचपन लाख लोगों की मौत हुई। लांसेट पत्रिका का कहना है कि कोयला से चलने वाले बिजली संयंत्र भी वायु प्रदूषण को बढ़ावा दे रहे हैं। वायु प्रदूषण में उसका अनुपात पचास फीसद है। उचित होगा कि भारत सरकार वायु प्रदूषण की रोकथाम के लिए प्रभावकारी राष्ट्रीय योजना बनाए और उसका कड़ाई से पालन कराए।

 

 

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