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आपातकाल और आज के सवाल

शिवदयाल आपातकाल के चालीस साल बाद आपातकाल का डर! उस दुस्वप्न के पुन: घटने का डर! कौन डरता है आपातकाल से? नई पीढ़ी? कतई नहीं, वे उस अनुभव से अनजान हैं- किसी भी दल, वर्ग समूह की नई पौध को आपातकाल नहीं डराता। एक तरह से यह अच्छा ही है। वैसे डर का आपातकाल से […]

Author July 6, 2015 5:43 PM

शिवदयाल

आपातकाल के चालीस साल बाद आपातकाल का डर! उस दुस्वप्न के पुन: घटने का डर! कौन डरता है आपातकाल से? नई पीढ़ी? कतई नहीं, वे उस अनुभव से अनजान हैं- किसी भी दल, वर्ग समूह की नई पौध को आपातकाल नहीं डराता। एक तरह से यह अच्छा ही है।

वैसे डर का आपातकाल से गहन रिश्ता है। डरे हुए लोगों ने ही आखिर देश पर आपातकाल थोपा था। वे उन लोगों से डर गए थे जिन्हें देश को एकाधिकारवादी और अधिनायकवाद की तरफ जाते देख डर लगता था, जो नवस्वतंत्र देशों में लोकतंत्र की हत्या होते देख डरे हुए थे और भारत को किसी भी प्रकार उस हश्र से बचाना चाहते थे, जो भारत की राजसत्ता पर कुछ विशेष वर्ग-समूहों के नियंत्रण और उससे उपजी जड़ता को तोड़ना चाहते थे और आमजन को शक्तिसंपन्न करना चाहते थे। जिन्हें डर था कि सामाजिक-आर्थिक असमानता दूर नहीं हुई, शिक्षा और रोजगार की स्थिति सुधारी नहीं गई, अगर भ्रष्टाचार और विशेषाधिकार को समाप्त नहीं किया गया तो देश में अराजकता और आंतरिक विद्रोह की स्थिति बन सकती थी।

ये लोग स्वतंत्रता आंदोलन के मूल्यों को क्षरित होते देख रहे थे और समाज और राजनीति में नए मूल्य गढ़ने, नई नैतिकता का निर्माण करने को संकल्पित थे। ये लोग, कोई दल नहीं थे, कोई गुट, चौकड़ी, षड्यंत्रकारी समूह नहीं थे। ये लोग आजादी के सत्ताईस साल बाद भी इसके फल से वंचित भारत के साधारण लोग थे। सत्ता पर कब्जा करना उनका लक्ष्य नहीं था, ये लोग व्यवस्था को उत्तरदायी, संवेदनशील और मानवीय बनाना चाहते थे। इसीलिए उसमें मूलभूत परिवर्तन उनको अभीष्ट था।

ये भारत के साधारण लोग जिसके आवाह्न पर खड़े हुए यह सत्ता को ठुकरा कर परिवर्तन के प्रयोगों में जीवन लगाने वाला क्रांतिद्रष्टा नेता था जिसे तत्कालीन सत्ता-प्रतिष्ठान ने देश को अस्थिर करने वाला विदेशी एजेंट घोषित कर दिया। लोग जब इस व्यक्ति के पीछे खड़े हुए तो पीछे-पीछे दल (विरोधी) दौड़े, संगठन दौड़े, संस्थाएं भागीं, एक राष्ट्रव्यापी आंदोलन खड़ा हो गया। साल-डेढ़ साल के अंदर ताबड़तोड़ घटनाएं घटीं। दमन की चक्की चली, लेकिन उलटे आंदोलन और आगे चला गया। तभी इलाहाबाद हाइकोर्ट का फैसला आया जिसमें प्रधानमंत्री के चुनाव को अवैध ठहराया गया। 24 जून, 75 को उच्चतम न्यायालय ने इसे सही ठहराया। एक ओर तो जोर पकड़ता आंदोलन और अब ऊपर से कोर्ट का फरमान।

कायदे से इंदिराजी को पदत्याग कर किसी साथी को कुर्सी दे देनी थी, उनकी साख बचती, लोकतंत्र मजबूत होता- एक नया उदाहरण सामने आता। लेकिन उन्होंने दूसरा रास्ता पकड़ा। आंदोलनकारियों की आशंकाओं और आरोपों की पुष्टि करने वाला रास्ता। ‘प्रतिक्रियावादी’, ‘सांप्रदायिक’, ‘अराजक’ और ‘विघटनकारी’ शक्तियों से डर कर व्यवस्था को बचाने के नाम पर आम आदमी के हित में उन्होंने आम आदमी के मौलिक अधिकारों तक को छीन लिया। संसद, प्रेस की स्वतंत्रता, न्यायपालिका सब बंधक हो गए। उन्नीस महीने तक देश यातनागृह बना रहा।

तब से चालीस साल बीत गए हैं। ऐसा नहीं कि देश को समस्याओं और संकटों का सामना नहीं करना पड़ा, लेकिन आपातकाल की नौबत नहीं आई। आपातकाल के बाद कांग्रेस को हराने वाली जनता पार्टी की सरकार कार्यकाल भी पूरा नहीं कर पाई और ढाई साल में ही गिर गई। उसके बाद केंद्र में अधिक समय तक कांग्रेस का ही शासन रहा है, लेकिन आपातकाल की हद तक कोई नेता या प्रधानमंत्री नहीं गया। वास्तव में सत्तर के दशक में जेपी आंदोलन के अलावा कुछ वामपंथी आंदोलनों के प्रभाव से राजनीति में पारंपरिक सामाजिक वर्गों का वर्चस्व टूटा और नई सामाजिक शक्तियों का उदय हुआ, जो कतई शहरी, औद्योगिक नहीं, खांटी ग्रामीण पृष्ठभूमि से थीं। इसमें हरित क्रांति से संपन्न बना तबका भी था, जो सामाजिक पदानुक्रम में भले ही नीचे हो, ताकत पाकर रंग-ढंग में और सोच में सामंती था।

सत्तर के दशक के बाद की राजनीति में इस वर्ग की पकड़ लगातार मजबूत हुई और नब्बे के दशक तक आते-आते लगभग पूरे उत्तर भारत की राजनीति पर यह काबिज हो गया। आपातकाल के बाद का चालीस साल भारतीय समाज के तीव्र क्षैतिज विभाजन का दौर रहा है- धर्म और जाति के आधार पर, और इसी के साथ गठबंधन सरकार का युग आया। आपातकाल गठबंधन सरकार में अत्यंत विरल घटना है, क्योंकि सत्ता इसमें एक जगह केंद्रित नहीं होती, उसके अनेक केंद्र होते हैं।

आपातकाल के भुक्तभोगी कांग्रेस और माकपा को छोड़ कर लगभग सभी दल रहे। पहले इन्होंने कांग्रेस के खिलाफ मोर्चा बनाया, बाद में भारतीय जनता पार्टी के रामजन्म भूमि आंदोलन में शामिल होने के बाद ‘सांप्रदायिकता बनाम धर्मनिरपेक्षता’ के आधार पर भाजपा के खिलाफ भी मोर्चा बन गया। इसके पहले तक वाम मोर्चा भी भाजपा के साथ कांग्रेस-विरोधी गठबंधन में शामिल रहा था। कांग्रेस ने 1977 की हार के बाद भी 2000 तक तीन कार्यकाल पूरे किए, लेकिन नरसिंह राव की सरकार अल्पमत की सरकार थी।

इंदिराजी से पुन: आपातकाल की उम्मीद नहीं थी, हां कुछ लोगों को राजीव गांधी के प्रचंड बहुमत से जरूर डर लगा था, लेकिन वह कार्यकाल भी गुजर गया। सवाल यह है कि अगर 1977 के बाद इंदिराजी या राजीव गांधी चाहते तब भी क्या आपातकाल लगाना उनके लिए संभव होता? यहां जनता पार्टी का जिक्र करना जरूरी होगा जिसने देश के इतिहास में 1977 में अधिनायकवादी कांग्र्रेस को हराने के अलावा भी एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण योगदान दिया- उसने संविधान संशोधन करके औपचारिक रूप से आंतरिक आपातकाल लगाना लगभग असंभव बना दिया।

लेकिन यह अजीब बात है कि बिना आपातकाल घोषित किए आपातकाल के भुक्तभोगियों ने ही लोकतांत्रिक व्यवहार और मर्यादा के अतिक्रमण में नए कीर्तिमान बनाए हैं, जो कभी-कभी बेहद डरावने भी लगते हैं। राजनीति में अपराधीकरण की प्रक्रिया कांग्रेस के जमाने में ही शुरू हो गई थी, इन्होंने इसे अपराध के राजनीतिकरण के स्तर तक पहुंचाया। संसद और विधानसभाएं आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों का ठिकाना बनने लगीं। एकसत्तावाद, व्यक्तिवाद, वंशवाद और परिवारवाद ज्यादातर दलों की पहचान बन गया। दलों में आंतरिक लोकतंत्र समाप्त हो गया।

एक-एक व्यक्ति बीसियों साल तक पार्टी का प्रधान बना रहता है, जब किसी नए की बारी आती है तो अपनी संतति को आगे कर देता है और दल वाले ऐसे स्वामिभक्त कि उसे स्वीकार भी कर लेते हैं। कम्युनिस्ट पार्टियां इस बीमारी से बची हुई हैं।

लेकिन सत्ता का दुरुपयोग और विरोध की आवाज को दबाने में उन्होंने भी कोई कोर-कसर बाकी न रखी। सबसे ज्वलंत और प्रगट उदाहरण है ‘नंदीग्राम’। पुलिस महकमा, गुंडातंत्र और पार्टी कैडर का सहारा विरोध को कुचलने के लिए नहीं लिया- आज यह दावा कोई पार्टी नहीं कर सकती। आज लेकिन इन सबको इमरजेंसी का डर सताता है!

आपातकाल की आशंका उन लोगों को भी बेचैन कर रही है, जो देश में अध्यक्षीय प्रणाली की वकालत करते नहीं थकते थे। इन लोगों ने पार्टी का प्रधानमंत्री चेहरा आगे करने की मुहिम छेड़ी; जो काम संसदीय दल को करना था उसे पार्टी के जिम्मे छोड़ दिया। यह काम तो आपातकाल लगाने वाली पार्टी, यानी कांग्रेस ने भी नहीं किया। आज ‘व्यक्तिवाद’ और ‘एकसत्तावाद’ का डर ‘राष्ट्रवाद’ पर हावी हो गया लगता है।

यह विडंबना है कि जिस गठबंधन राजनीति ने आपातकाल का खतरा कम किया, उसने शासन-प्रशासन का ऐसा खराब नमूना पेश किया कि लोग एक पार्टी और एक नेता (मजबूत) के पीछे भागने पर मजबूर हो गए। आज एक पार्टी बहुमत में है- 1984 के बाद पहली बार। देश की बागडोर एक ‘मजबूत’, ‘गतिशील’ और हर कहीं दृश्यमान नेता के हाथों में है, जो लोगों की पसंद है और कंपनियों की भी, एक अत्यंत दुर्लभ योग!

आपातकाल के पुन: लौटने की आशंका की जमीन यहीं है। वैसे अधिनायकवाद प्राय: किसी न किसी नारे या जुमले के साथ आता है। 1975 में आपातकाल ‘समाजवाद’ और ‘धर्मनिरपेक्षता’ के नाम पर आया था- ‘सांप्रदायिक’ और ‘फासिस्ट’ शक्तियों को परास्त करने के लिए। निकट भविष्य में भारत में अधिनायकवाद आएगा तो वह ‘राष्ट्रवाद’ के नाम पर ही आएगा- कहीं अधिक आकर्षक, समावेशी और भावप्रवण और आदर्शोन्मुख अभिव्यक्ति!

आपातकाल सवा अरब की आबादी वाले इस देश में दोबारा आएगा या नहीं, यह सवाल बड़ा तो है। लेकिन इससे भी बड़ा सवाल यह है कि अगर आपातकाल आया तो उसके मुकाबले कौन लोग खड़े होंगे? 1975 में मीडिया का कंपनीकरण नहीं हुआ था। मीडिया में लोग रुचि, शौक और प्रतिबद्धता के लिए जाते थे, तब भी मीडिया का प्रतिकार बहुत प्रभावी नहीं हो पाया था।

पत्रकार आज भी शहीद हो रहे हैं। लेकिन मीडिया का चरित्र और स्वरूप बहुत बदल चुका है, उसे झुकाना पहले जितना मुश्किल नहीं होगा। राज्यों के स्तर पर ही मीडिया को नियंत्रित करने की कमोबेश सफल कोशिशें हो चुकी हैं। दूसरी ओर, राजनीतिक दलों में आदर्शवाद के अभाव और व्यक्ति-केंद्रित राजनीति के चलते लोकतंत्र के लिए मर-मिटने की प्रतिबद्धता शायद ही बची है। कम्युनिस्ट पार्टियां 1975 में भी इस सवाल पर बंटी हुई थीं, आज तो वे पहले से कमजोर भी हो चुकी हैं। सबसे बड़े अखिल भारतीय कैडर वाले ‘राष्ट्रवादी’ संगठन संघ ने तो औपचारिक रूप से सर्वसत्तावाद के आगे हथियार डाल दिए थे। रही बात बुद्धिजीवियों की, तो आज के बाजारवादी जमाने में उनकी वह ताब रही नहीं, जनता से वे पहले ही कटे हुए हैं, उस पर उनका प्रभाव भी नहीं है।

दूसरी ओर, पिछले चालीस सालों में राज्य की शक्ति और पहुंच में बहुत वृद्धि हुई है, उसकी एजेंसियों में लोकतंत्र और जनता के अधिकारों के प्रति अवमानना का भाव भी पहले से अधिक है, जब-तब इसके दृष्टांत मिलते रहते हैं। आपातकाल आ ही गया तो जनता पर जुल्म और बढ़ेगा! तो क्या सवा अरब का यह देश सर्वसत्तावाद के आगे घुटने टेक देगा? शक्ति अगर राज्य की बढ़ी है तो जनता की भी बढ़ी है। पंचायत के रूप में ही हमारे यहां संस्थाओं का अखिल भारतीय नेटवर्क है, पहले से कहीं अधिक सजग, शिक्षित और जागरूक और अधिकारों के प्रति सचेत नागरिक हैं जो जरूरत पड़ने पर सड़कों पर भी उतर आते हैं।

अभिव्यक्ति और संवाद के अनेक विश्वसनीय विकल्प आज प्रौद्योगिकी ने आम जनता को उपलब्ध कराए हैं। नकार और प्रतिकार के अनेक साधन उसके पास मौजूद हैं। देश भर में जमीनी लोकतंत्रावादी आंदोलनों की विरासत आज भी है। दूसरी ओर विश्व जनमत सब कहीं लोकतंत्र के पक्ष में है। हमारे यहां चालीस साल में बड़ी-बूढ़ी हुई पीढ़ियों ने बंदिश में जीवन नहीं जिया- वे बंधन को सहजता से नहीं लेंगे।

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