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ग्रामीण रोजगार और अर्थव्यवस्था

इसमें कोई संदेह नहीं कि भारत की समृद्धि का आधार गांव हैं। गांव, खेती और पशुपालन समृद्धि के प्रमुख स्रोत हैं और इनका पूरा आधार भी गांवों में होता है। ऐसे में हमें इन्हीं तीनों पर आधारित छोटे-छोटे उद्योगों की स्थापना ग्रामीण क्षेत्रों में ही करनी होगी और इसी से भारतीय अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी।

employment, jobजब तक राष्ट्र निर्माण के केंद्र में अंतिम आदमी को शामिल नहीं किया जाएगा तब तक उसके सामाजिक-आर्थिक, और सामाजिक-राजनीतिक सम्मान को नहीं लौटाया जा सकता।

राजकुमार भारद्वाज
इस वक्त पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था कोरोना महामारी के दुष्प्रभावों से कराह रही है। भारत की अर्थव्यवस्था को भी गहरा झटका लगा है। लेकिन ऐसे हालात में ही ग्राम्य शक्ति और कृषकों की जिजीविषा ने उपलब्धियों के नए प्रतिमान भी गढ़े हैं। प्रतिकूलताओं को मुंहतोड़ जवाब देने की भारतीय परंपरा में विद्यमान गंवई जीवटता ने अर्थशास्त्रियों के अनुमानों को गलत साबित करते हुए महामारी को परास्त कर दिया है।

वित्त वर्ष 2020-21 की पहली तिमाही में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) 23.9 प्रतिशत तक गिर गया था। लेकिन कृषि एकमात्र ऐसा क्षेत्र था, जिसने सकारात्मक वृद्धि दर्ज की। यह कालखंड महामारी से सर्वाधिक पीड़ित समय था। पूर्णबंदी रबी के मौसम की फसलों के साथ शुरू हुई थी। फिर भी कृषि द्वारा सकल मूल्य वर्धित (जीवीए) पिछले वर्ष (2019-20) की तुलना में 3.4 प्रतिशत तक बढ़ा था। दूसरे शब्दों में, इस क्षेत्र ने राजकोष को पहले तीन महीनों में 14,815 करोड़ रुपए दिए। ट्रैक्टर बिक्री में 38.5 प्रतिशत की वृद्धि हुई। किसानों ने खरीफ के मौसम में ट्रैक्टर जैसी बड़ी सुविधाओं पर भी निवेश किया। 2013-14 के बाद यह पहली बार था जब कृषि ने इस आर्थिक प्रमुखता को हासिल किया था। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआइ) के मुताबिक इस वृद्धि ने देश के कुल घरों की 48.3 प्रतिशत अर्थव्यवस्था को सकारात्मक रूप से प्रभावित किया।

कोरोना संक्रमण के प्रसार को फैलने से रोकने के लिए की गई पूर्णबंदी ने सब कुछ तालों में बंद कर दिया था। औद्योगिक और व्यापारिक गतिविधियां पूरी तरह ठप हो गई थीं और लोग घरों में कैद हो गए थे। बाहर निकलने पर पुलिस डंडे फटकार रही थी। ऐसे में नगरीय जीवन की गति थम गई थी और दुनिया भर के बड़े-बड़े उद्योगपति तक भारी घाटे के कारण हांफने लगे थे। उद्योगों में काम ठप होने से बड़े पैमाने पर छंटनियां हो रही थीं। जो ग्रामीण नगरों में श्रमिक बने हुए थे, वे लंबे समय तक बिना काम के नहीं रह सके, क्योंकि कुछ ही समय के बाद शहरों के लंगर और भंडारे सिमटने लगे थे। शहरों के घरों में काम करने वाली महिलाओं को भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा था। ग्रामीण परिवेश के इन परिश्रमीजनों को दो वक्त की रोटी के लिए सुबह से शाम तक कतारबद्ध खड़े रहना लंबे समय तक स्वीकार्य नहीं था। ऐसे में उनका स्वाभिमान और शक्ति जवाब दे गई थी और वे इसलिए वे अपने-अपने गांवों को लौटने को मजबूर हो गए थे।

ऐसी भीषण परिस्थितियों में भारत के कृषि क्षेत्र और ग्राम्य जीवन ने अपनी संकल्प शक्ति से महामारी के विरुद्ध कमर कसी और अद्भुत कीर्तिमान स्थापित किए। नगरीय अर्थव्यवस्था ठप हो जाने से लोगों का शहरों में टिके रहना कठिन हो गया था। इसलिए दीर्घस्तर पर प्रतिलोम पलायन देखने को मिला, जो नगरों से ग्रामों की ओर था। रोजगार के लिए भटकते नौजवान अपनी मूल जड़ों की ओर लौट गए। नगरों में जब आजीविका का ठौर-ठिकाना नहीं रहा, तो भविष्य की अनिश्चितता ने लोगों को वापस कृषि क्षेत्र में निवेश करने के लिए विवश कर दिया। इस कारण कृषि में जुलाई-अगस्त, 2020 के दौरान भारी निजी निवेश हुआ। गांवों के लोगों ने कृषि से जुड़े कई छोटे-छोटे काम शुरू किए।

साथ ही आस-पास के ग्रामीणों को वाट्सऐप के माध्यम से जोड़ा। इस तरह देश में स्वयं सहायता समूह बना कर सहकारिता के तर्ज पर बड़े काम शुरू होते गए। इसे कृषि क्षेत्र के लिए बड़ा परिवर्तन और उपलब्धि कही जा सकती है। इसी के साथ ग्रामीण महिलाओं ने दालों की बड़ियां, अचार और पापड़ जैसे कुटीर उद्योग भी शुरू किए। उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, मध्यप्रदेश में इस दिशा में बड़ी कामयाबी देखने को मिली। उत्तराखंड सरकार ने वापस लौटे अपने प्रवासियों के लिए जो योजनाएं शुरू की थीं, उनका लाभ उठा खासी संख्या में पर्वतवासी अब अपने गांवों में डट गए हैं। आत्मनिर्भर भारत के साथ आत्मनिर्भर गांव का विमर्श यहां पर बहुत प्रभावशाली तरीके से हो रहा है। मध्यप्रदेश के सतना और उत्तर प्रदेश के मिजार्पुर जिले के गांवों में यह विमर्श जोरों पर हैं। लोगों को दीनदयाल उपाध्याय और गांधीजी के गांव के अर्थशास्त्र की याद आने लगी है। गांवों में भाईचारा, समन्वय लौट रहा है।

इसमें कोई संदेह नहीं कि भारत की समृद्धि का आधार गांव हैं। गांव, खेती और पशुपालन समृद्धि के प्रमुख स्रोत हैं और इनका पूरा आधार भी गांवों में होता है। ऐसे में हमें इन्हीं तीनों पर आधारित छोटे-छोटे उद्योगों की स्थापना ग्रामीण क्षेत्रों में ही करनी होगी और इसी से भारतीय अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी। ग्रामीण जब गांवों में रहते हैं, तो आर्थिक संसाधन कम होते हुए भी वे अधिक स्वाभिमान का जीवन जीते हैं और पैसा बचाते भी हैं। ग्रामीण क्षेत्रों से पलायन कर शहरों में आने वाले साधारण और भोले-भाले लोगों का एक बड़ा वर्ग आर्थिक और मानसिक शोषण का शिकार होता है। वह मलिन बस्तियों में नारकीय जीवन जीता है।

पिछले कुछ वर्षों में देश की सरकार में अंतिम आदमी की चिंता को लेकर काफी हलचल रही और विचार भी हुआ। इससे समाज में अंत्योदय को लेकर उत्साह का वातावरण भी बना है। उसके लिए योजनाएं भी आ रही हैं। कुछ योजनाएं बहुत कारगर भी सिद्ध हो रही हैं, लेकिन हमें ध्यान देना होगा कि अंतिम व्यक्ति को सहायता देने से अधिक जरूरी उसे आत्मनिर्भर बना कर उसका स्वाभिमान लौटाने की सार्थक और त्वरित पहल की आवश्यकता है। यह स्वाभिमान तभी लौटेगा, जब वह अपने और सामूहिक श्रम से खड़ा होगा। इसी से उसमें राष्ट्र का भाव जगेगा।

विनिर्माण क्षेत्र के माध्यम से रोजगार के अवसर बढ़ाने की बात नीति-निर्धारकों और उद्योगपतियों की ओर से कही जाती रही है। इस क्षेत्र में रोजगार हैं, लेकिन स्थायी नहीं है। महात्मा गांधी और दीनदयाल जी हमेशा रोजगार में स्थायित्व की बात करते थे। रोजगार का स्थायित्व भारतीय आर्थिक दर्शन में है। स्थायित्व भारतीय जीवन मूल्यानुगत आर्थिक दर्शन में है, ग्राम संवर्द्धन में है, कृषि और पशुपालन आधारित कुटीर उद्योगों की स्थापना में है, स्वदेशी के भाव में है। जबकि पश्चिमी देशों, चीन आदि के पास दूसरे देशों से बटोरा धन बहुत अधिक है। वे अपने उत्पादों को महंगे दामों पर गरीब और विकाशील देशों में बेचते हैं। वे शहरों के सहारे लंबे समय तक चल सकते हैं, लेकिन भारत के लिए यह संभव नहीं है।

जब तक राष्ट्र निर्माण के केंद्र में अंतिम आदमी को शामिल नहीं किया जाएगा तब तक उसके सामाजिक-आर्थिक, और सामाजिक-राजनीतिक सम्मान को नहीं लौटाया जा सकता। अंतिम आदमी का विकास तभी होगा, जब उसे आगे बढ़ा कर राष्ट्र निर्माण की बात होगी। तभी गांव का और ग्रामीण का भी स्वाभिमान जगेगा, स्थायित्व बढ़ेगा और इसके बढ़ने से ही गांव से नगरों की ओर पलायन रुकेगा। गांवों की आत्मा जगने से ही समृद्ध भारत का सपना साकार हो सकेगा। ध्यान रहे कि गांव की आत्मा और शहर के शरीर से गांवों का स्वरूप बिगड़ेगा। इसलिए जरूरी है कि हम गांव के लोगों को अपने विवेक, सनातन ज्ञान के माध्यम से स्थायित्व की योजनाएं, नीति और कार्यक्रम बनाने के अवसर प्रदान करें। हम शहरवासी अपने गांवों में बने उत्पाद खरीदें, उन्हें उपहार स्वरूप मित्रों, संबंधियों को दें। गांव के उत्पादों में देश है, स्वदेश है, ग्रामीणों का स्वाभिमान है, संस्कार है, गांवों की माटी की सौंधी गंध है।

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