इति सिद्धअम्

रिश्ते में तो हम तुम्हारे विपक्ष लगते हैं नाम है कांग्रेस।

सौजन्‍य ट्विटर।

रिश्ते में तो हम तुम्हारे विपक्ष लगते हैं नाम है कांग्रेस। भारत में अब तक सबसे ज्यादा दलित मुख्यमंत्री देनेवाली, दिल्ली दरबार से लिफाफा मुख्यमंत्री की संस्कृति शुरू करनेवाली कांग्रेस ने पंजाब से एक ऐसी चुनौती दे दी है कि उत्तर प्रदेश में हुकूमत की भाषा बदल गई। राजस्थान और मध्यप्रदेश में बुजुर्ग नेताओं के दूध की जली कांग्रेस ने पंजाबी लस्सी को भी फूंक-फूंक कर पीया। अमरिंदर का जाना और चन्नी का मुख्यमंत्री बन कर आना यह भी बता गया कि राहुल गांधी अपने फैसले मनवा पा रहे हैं। देखना होगा कि खेल में सबसे बड़ी चुनौती देनेवाली कांग्रेस पंजाब का मैच जीत पाती है या नहीं।

जानते-समझते उठाए गए कदम, या कहें तो जानबूझकर की गई गलती को उर्दू में दानिस्ता कहते हैं। भाजपा की हर चाल को उस्तादों के उस्ताद वाली मिसाल कह जब राजनीतिक महफिल में वाह-वाह की जा रही थी तो कांग्रेस के रणनीतिकार सोच रहे थे-अमां, हम तो इस स्कूल के हेडमास्टर रह चुके हैं।

जिस सिद्धू को पार्टी का लुटिया डुबाने वाला कह कर राजनीतिक सूत्र कांग्रेस के सारे विधायकों को एक-एक कर संभावित मुख्यमंत्री बता चुके थे, चरणजीत सिंह चन्नी का नाम सामने आते ही वे सभी समाधि में चले गए। सबको खफा-खफा कर चुके सिद्धू के चेहरे की खुशी बता रही थी कि काम पूरा हुआ। कैप्टन अमरिंदर सिंह को ‘अति लोकप्रिय’ बता रहे पत्रकारों को पंजाब में कांग्रेस के पर्यवेक्षक समझा रहे थे कि भले ही सारे टीवी चैनल उनके साथ हैं लेकिन असल में विधायकों का बहुमत उनके खिलाफ है।

पंजाब और हरियाणा वो सूबा है जो भौगोलिक और राजनीतिक रूप से भाजपा की राष्ट्रवादी राजनीति के बहुत करीब हो सकता था। भारत-पाक की औपनिवेशिक स्वतंत्रता के बाद विभाजन का दर्द और लंबे समय तक आतंकवाद झेल चुके पंजाब की राजनीतिक और सामाजिक चेतना में जो सामाजिक न्याय का सुर है उसी के कारण यहां से कांशीराम जैसे नेता निकले। वो कांशीराम जिन्होंने भारतीय राजनीति की दशा और दिशा बदल दी थी। कांशीराम का प्रयोग उत्तर प्रदेश में इतना सफल है कि आज के समय में भी वहां विधानसभा चुनाव आते ही भाजपा अपनी राष्ट्रीय धुन को धीरे कर जाति का ऊंचा राग अलापती है। पंजाब में आज जो हुआ वो न तो कोई गुजरात मॉडल है, न कांग्रेसी। यह विशुद्ध पंजाब मॉडल है और कांग्रेस के पास पंजाब में, पंजाब की तरह व्यवहार करने के अलावा और कोई चारा न था।

79 साल के आत्ममुग्ध हो चुके कैप्टन के चेहरे के साथ चुनाव लड़ना कांग्रेस के लिए नुकसानदेह हो सकता था। गद्दी से चिपके इंसान को हटाना कितना मुश्किल होता है, ये कांग्रेस आलाकमान से बेहतर कौन जान सकता है। अकाली और बसपा का गठबंधन उस 32 फीसद वोटों का दावेदार हो रहा था जो पंजाब में राजनीतिक समीकरण बना और बिगाड़ सकता है। अमरिंदर जिस आरामतलबी से आगे बढ़ रहे थे वह कांग्रेस के लिए खतरे की घंटी थी। यहीं पर अचानक सिद्धू का उदय होता है, और गुरु ऐसे शुरू होते हैं कि बाहरियों को लगा कांग्रेस खेल के बाहर ही हो जाएगी। लेकिन मध्य प्रदेश और राजस्थान में हंगामेदार नुकसान के बाद जिस तरह पंजाब में सत्ता सिद्धूमय होकर दलित चेहरे को हस्तांतरित हो गई उससे तो लगता है कि सिद्धू के जरिए ही सारा समीकरण बनाया गया था। यह दूसरी बात है कि वो अपनी खास शैली में अलग तरह से मुखर हो जाते हैं।

कांग्रेस की आगे की रणनीति हरीश रावत के बयान से झलक गई जिसमें उन्होंने कहा कि पंजाब में विधानसभा का चुनाव सिद्धू के चेहरे के साथ लड़ा जाएगा। यहीं से कांग्रेस का दोहरा चरित्र भी दिखता है। उसने अकाली दल और बसपा की साझा एकता को तोड़ने के लिए चन्नी के चेहरे को तत्काल पेश कर दिया। वहीं आगे के लिए सिद्धू के चेहरे पर भी हामी भर दी। हालांकि रावत के बयान से आई आपदा का प्रबंधन करने के लिए कांग्रेस के अन्य नेताओं ने पूरी कोशिश की।

अगर सिद्धू को तत्काल मुख्यमंत्री पद के लिए आगे कर दिया जाता तो हो सकता है कि अमरिंदर प्रतिक्रिया में भाजपा के दरवाजे तक पहुंच जाते जो एक बड़ा राजनीतिक नुकसान होता। कांग्रेस एक मुंह से चन्नी को आज का तो दूसरे मुंह से सिद्धू को भविष्य का चेहरा बता रही है। वह दलित और जाट-सिख समीकरण दोनों को एक साथ साधना चाहती है।

पंजाब में किसान आंदोलन से बेसाख हुई भाजपा की हालत यह है कि उसे सभी विधानसभा सीटों पर दमदार उम्मीदवार शायद ही मिलें। अकाली दल की भी छवि इस मामले में बहुत अच्छी नहीं है क्योंकि वह सूबे में छवि प्रबंधन के लिए ही भाजपा से अलग हुआ। उसके पहले वह कृषि कानूनों पर उसके साथ था। अकाली दल के नेता इसके लिए सवालों के घेरे में आते रहे हैं। बसपा और आम आदमी पार्टी तो यहां पूरा जोर लगाएगी ही।

बदले घटनाक्रम ने फिलहाल कांग्रेस के लिए संभावनाओं की जमीन तैयार कर दी है। अभी उसके खाते पंजाब को पहला और वर्तमान में देश को एकमात्र दलित मुख्यमंत्री देने का खिताब है। देखना यह है कि कांग्रेस इस ऐतिहासिक मौके का अपने पक्ष में इस्तेमाल कर पाती है या नहीं। किसान आंदोलन ने पंजाब में जो विपक्ष का माहौल तैयार किया है कांग्रेस उसे अपने पक्ष में लाती है या नहीं। हर विधानसभा चुनाव के बाद राज्यों के नाम पर जो एक नया मॉडल गढ़ दिया जा रहा है वो इस बात का गवाह है कि भाजपा हो या कांग्रेस, राजनीतिक दलों के पास अवसर भुनाने के अलावा कोई मॉडल ही नहीं बचा है। पंजाब ने जो एक अलग माहौल तैयार किया है उससे अलग तरह की राजनीति निकल कर आएगी या नहीं, यह भी देखना होगा।

पढें राजनीति समाचार (Politics News). हिंदी समाचार (Hindi News) के लिए डाउनलोड करें Hindi News App. ताजा खबरों (Latest News) के लिए फेसबुक ट्विटर टेलीग्राम पर जुड़ें।

अपडेट