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प्रदूषण मुक्ति के बजटीय प्रयास

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार जलवायु परिवर्तन का दुष्प्रभाव न केवल सेहत पर विपरीत असर डाल रहा है, बल्कि प्रमुख खाद्य उत्पादों, फलों पर भी इसका असर देखा जा रहा है। पिछले साल अप्रैल से दिसंबर तक दो लाख हेक्टेयर से अधिक फसल बर्बाद हुई। इससे वैज्ञानिकों की चेतावनी सच साबित हो रही है कि ऋतुचक्र में आया परिवर्तन कई समस्याओं को जन्म देने वाला होगा।

AIRसांकेतिक फोटो।

नए बजट में दिल्ली समेत बाईस शहरों में बढ़ते प्रदूषण से निपटने के लिए 2,217 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है और पर्यावरण मंत्रालय के लिए 2,869 करोड़ रुपए आबंटित किए गए हैं। पिछले बजट की तुलना में इस बार पर्यावरण को सुधारने के लिए बयालीस गुना ज्यादा धन आबंटित किया गया है। इसमें दस लाख से ज्यादा आबादी वाले शहरों को लक्ष्य किया गया है।

कहा गया है कि धुएं से बेजार होने वाले शहरों के लिए ऐसी नीति बनाई जाएगी, जिससे वायु प्रदूषण की समस्या से निजात मिले। मगर वह कौन-सी नीति होगी, जिससे शहरों को प्रदूषण से निजात मिलेगी, अभी कोई खाका पेश नहीं किया गया है। गौरतलब है कि दिल्ली और एनसीआर में दिवाली के बाद प्रदूषण अति खतरनाक स्तर पर बना हुआ है।

इससे सांस लेने में परेशानी, सिर दर्द, कब्ज, गैस, सांस लेने में दिक्कत, आंखों में दर्द और आलस्य जैसी समस्याएं बनी हुई हैं। प्रदूषण का स्तर पिछले एक महीने में अत्यंत खतरनाक स्तर से भी ज्यादा हो जाना चिंताजनक है। पिछले साल अपैल में प्रदूषण की समस्या दिल्ली सहित तमाम शहरों से खत्म हो गई थी। इसकी वजह प्रदूषण फैलाने वाले सभी कारकों का बंद हो जाना था।

हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों के पराली जलाने और दिवाली के पटाखों से जो पर्यावरण प्रदूषण दिल्ली और आसपास के इलाकों में खतरनाक स्तर पर पहुंचा गया था, वह लगातार बढ़ता जा रहा है। इससे लाखों लोगों को स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से दो-चार होना पड़ा है। सरकारें इस पर चुप्पी साधे हुई हैं।

लासेंट मेडिकल जर्नल मे प्रकाशित अध्ययन के मुताबिक वर्ष 2019 में हुई मौतों में अठारह फीसद वायु प्रदूषण की वजह से हुई थीं। गौरतलब है कि 1990 से 2019 तक वायु प्रदूषण में एक सौ पंद्रह फीसद की बढ़ोत्तरी हुई है। ग्लोबल बर्डन आॅफ डिजीज स्टडी 2019 में कहा गया है कि वायु प्रदूषण की वजह से भारत में 32.5 फीसद मौतें सांस की गंभीर बीमारियों की वजह से हुर्इं।

गौरतलब है यह आंकड़ा देश में हुई कुल मौतों का 17.8 फीसद है। एक आंकड़े के अनुसार श्वास जनित बीमारियों में 16.2 फीसद मौतें स्ट्रोक, 11.2 फीसद निम्न श्वसन संक्रमण, 5.2 फीसद नवजात शिशु रोग, 3.8 फीसद मधुमेह और 1.7 फीसद मौतें फेफड़े के कैंसर से हुर्इं। फेफड़ों में कैंसर के पीछे वायु प्रदूषण के पीएम 2.5 कण सबसे बड़ी वजह माने जाते हैं।

अगर प्रदूषण से होने वाले आर्थिक नुकसान का आकलन करें तो पता चलता है कि महज 2019 में ही जीडीपी का 1.4 फीसद का नुकसान हुआ। यह करीब 2.6 लाख करोड़ रुपए बैठता है। प्रदूषण से जहां वायुमंडल में जहरीले गैस कण बढ़ते हैं वहीं घर के अंदर भी तमाम राज्यों में शुद्ध हवा न मिलने की विकट समस्या है।

जिन राज्यों में घरों में वायु प्रदूषण की गंभीर समस्या है, उनमें बिहार, ओडीशा, असम, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश और अरुणाचल प्रदेश प्रमुख हैं। यानी, इन राज्यों में प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना कारगर ढंग से लागू नहीं हो पाई है। गौरतलब है कि जिन राज्यों में उज्ज्वला योजना घरों में पहुंची है, वहां पिछले वर्षों में घरों के अंदर चौंसठ फीसद प्रदूषण कम हुआ है।

जलवायु सम्मेलनों में हर साल तय होता है कि जिन क्षेत्रों में प्रदूषण फैलाने वाले कारक ज्यादा हैं उन्हें कम करने के लिए क्या करना चाहिए। पर्यावरण प्रदूषण को लेकर 1972 में स्टॉकहोम में संयुक्त राष्ट्र की एक उच्च स्तरीय बैठक हुई थी। उसमें शिरकत करने आए तमाम देशों के नेताओं ने इस बाबत खुलकर अपने सुझाव दिए थे।

उसमें सुझाए गए पर्यावरण क्षरण की विकट समस्या और उससे पैदा होने वाले संकट पर गौर करने पर सहमति भी बनी थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने पर्यावरण की समस्या को दुनिया में बढ़ती गरीबी के साथ जोड़ कर देखने की कवायद की थी। आज भी दुनिया में गरीबी सबसे बड़ी समस्या है और इसकी वजह से बढ़ रहे प्रदूषण पर रोक नहीं लगाई जा सकी है। भारत के गरीब राज्यों में आज भी लकड़ी, कोयले और घास-फूस से महिलाएं भोजन बनाती हैं। इसलिए वहां घरों के अंदर की हवा बेहद प्रदूषित है।

जहां तक पर्यावरण प्रदूषण में ग्रीन हाऊस गैसों की भूमिका की बात है, एक अमेरिकी नागरिक एक साल में 16.6 टन कार्बन डाइआॅक्साइड का उत्सर्जन करता है, जबकि एक भारतीय महज 1.5 टन करता है। एक अमेरिकी बारह भारतीय के बराबर ग्रीन हाऊस गैसें छोड़ने का जिम्मेदार है। आंकड़े के अनुसार भारत विश्व के कुल कार्बन उत्सर्जन का प्रति व्यक्ति महज 1.7 टन करता है।

भारत इसे और कम करने की कोशिश में लगा हुआ है। इसी के तहत भारत में प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना, राष्ट्रीय सौर ऊर्जा मिशन, राष्ट्रीय ऊर्जा कुशलता वृद्धि मिशन, राष्ट्रीय हरित भारत मिशन, राष्ट्रीय सतत बसावट भारत मिशन, हिमालय पारिस्थितिकी प्रणाली, राष्ट्रीय हरित कृषि मिशन तथा जलवायु परिवर्तन के लिए राष्ट्रीय रणनीतिक ज्ञान मिशन पर काम चल रहा है। सौर ऊर्जा, पनचक्की, कूड़ा-करकट से चलने वाले बिजली घर, और जैविक ऊर्जा भी वायु प्रदूषण कम करने में बेहद मददगार साबित हो रहे हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार जलवायु परिवर्तन का दुष्प्रभाव न केवल सेहत पर विपरीत असर डाल रहा है, बल्कि प्रमुख खाद्य उत्पादों, फलों पर भी इसका असर देखा जा रहा है। पिछले साल अप्रैल से दिसंबर तक दो लाख हेक्टेयर से अधिक फसल बर्बाद हुई। इससे वैज्ञानिकों की चेतावनी सच साबित हो रही है कि ऋतुचक्र में आया परिवर्तन कई समस्याओं को जन्म देने वाला होगा।

अंतरराष्ट्रीय कृषि अनुसंधान कंसल्टेटिव ग्रुप के मुताबिक 2050 तक भारत में सूखे के कारण गेंहू के उत्पादन में 560 प्रतिशत की कमी आएगी। गेंहू की इस कमी के कारण भारत के बीस करोड़ लोग भुखमरी के शिकार होंगे। कार्बन डाइआॅक्साइड का संकेंद्रण कई प्रतिशत बढ़ जाने के कारण ऋतुचक्र में बेतहाशा बदलाव आएगा, जिससे हाइपोथर्मिया, दिल और श्वास की बीमारियां लगातार बढ़ेंगी।

इन बीमारियों से मरने वालों की संख्या भी बढ़ेगी। नए शोध से यह पता चला है कि धरती का तापमान बढ़ने से डेंगू, मलेरिया और पीला बुखार जैसी घातक बीमरियों के कीटाणु वायुमंडल में तेजी से पनप और करोड़ों लोगों को अपनी चपेट में ले सकते हैं। वैज्ञानिकों का यह अनुमान सही साबित हो रहा है कि बीतते वक्त के साथ जैसे-जैसे प्रदूषण बढ़ेगा, उसी के साथ बीमारियां, संकट और समस्याएं भी बढ़ेंगी।

इसी तरह कृषि, बागवानी, औषधि और फूल की खेती करने वालों के मुताबिक ऐसे नए रोग उनकी फसलों में दिखने लगे हैं, जो पहले कभी दिखाई नहीं पड़ते थे। उत्तर प्रदेश, लद्दाख, हिमाचल प्रदेश, बिहार, झारखंड, मध्यप्रदेश, जम्मू-कश्मीर, दिल्ली और राजस्थान में ओजोन जनित प्रदूषण बहुत ज्यादा बढ़ गया है। दिल्ली में यमुना का पानी इतना प्रदूषित हो गया है कि वह छूने लायक नहीं रह गया है। नए-नए रोग पनपने लगे हैं। इसी तरह मृदा प्रदूषण से भी मानव, वन्य जीवों, वनस्पतियों और जीव-जंतुओं में तरह-तरह के नए रोग पैदा होने लगे हैं।

पर्यावरण संबंधी इन तमाम आंकड़ों और विश्लेषणों से ऐसे तमाम सवाल उठते हैं जो भारी-भरकम बजट को लेकर हैं। इसमें पहला सवाल यह है कि क्या इंसान, जीव-जंतु और वनस्पतियों को प्रदूषण से छुटकारा दिलाने में यह बजट कुछ कारगर होगा? सवाल यह भी है कि भारी भरकम नए बजट से क्या दिल्ली समेत पर्यावरण प्रदूषण की समस्या से जूझ रहे शहरों को निजात मिलेगी या गंगा की सफाई के नाम पर आबंटित बजट जैसा हश्र इस नए पर्यावरण बजट का भी होगा?

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