युवाओं को नए विमर्श में लाने की जरूरत

यह कैसी शिक्षा है, जो केवल पैसा कमाना सिखाती है। जो शिक्षा मां-बाप को बच्चों से दूर कर देती है।

Technical education
सांकेतिक फोटो।

राजकुमार भारद्वाज

यह कैसी शिक्षा है, जो केवल पैसा कमाना सिखाती है। जो शिक्षा मां-बाप को बच्चों से दूर कर देती है। देश, समाज के मुद्दों पर चर्चा करने से अधिकांश छात्र बचते या एक जैसा मत रखते हैं। कई बार तो लगता है कि वे क्षमतावान नहीं हैं या पैसे और केवल पैसे का लक्ष्य उनकी प्रतिभा और क्षमता को चुकता कर रहा है।

पिछले चार वर्षों में देश के कई विश्वविद्यालयों, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों, भारतीय प्रबंधन संस्थानों के शिक्षकों और छात्रों से संवाद हुआ है। कुछ छात्र भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान और भारतीय प्रबंधन संस्थानों में प्रवेश के लिए आठवीं कक्षा के बाद ही कोटा जैसे शहरों से कोचिंग लेकर आए थे। वे शरीर से बहुत स्वस्थ और ऊर्जावान बेशक नहीं थे, पर उनमें धन कमाने की ललक अकूत थी। ऐसे कुछ दृश्य- शाम के सवा आठ बजे हैं। देश के एक नामी प्रौद्योगिकी संस्थान का वार्षिकोत्सव है। काफी सारे छात्र-छात्राएं खड़े हैं और गा रहे हैं- मुझे दौलत दो, मुझे दौलत दो, … तो मैं चाहता हूं, यही तो मैं चाहता हूं।

इस कार्यक्रम में हिंदुस्तानी गायन परंपरा के गायकों के साथ पाश्चात्य शैली के गायक भी बुलाए गए हैं। भयंकर शोर है। बातचीत में एक छात्र कहता है, ‘इंजीनियर या मैनेजर बनने का सपना नहीं है, सपना तो पैसा कमाने का, केवल पैसा कमाने और विदेश जाने का है।’ उसके साथ खड़ा छात्र कहता है, ‘हमें आठवीं कक्षा में घर वालों ने कोटा भेजा था, मोटा पैसा खर्च करके कोचिंग लेने के बाद यहां दाखिला मिला है। विदेश तो जाना ही है। और वहां केवल पैसा कमाने के लिए जाएंगे।’

भारत सरकार में अतिरिक्त सचिव, अच्छी छवि के एक नौकरशाह ने बताया कि उन्होंने दोनों बेटियों को देश के प्रतिष्ठित संस्थानों में पढ़ाया। इच्छा थी कि कम से कम एक आइएएस जरूर बने, लेकिन दोनों ने मना कर दिया। समझाने और जोर से बोलने पर बागी हो गर्इं। बड़ी अमेरिका चली गई और दूसरी एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में प्रबंधक बन गई। वह भी इंग्लैंड जाने की तैयारी में है।

दिल्ली के एक नामी अस्पताल में कार्यरत एक स्नायु चिकित्सक के पिता परेशान हैं कि उन्होंने अपने बेटे को इंजीनियर और डॉक्टर बना दिया। इंजीनियर पहले विदेश चला गया और अब डॉक्टर जाने की तैयारी में है। पिता कहते हैं, ‘अब हम गांव चले जाएंगे, हालांकि वहां के अलग खतरे हैं, ग्रामीण अब कितना स्वीकार करेंगे। डॉक्टर बेटा इसलिए किसी पश्चिमी देश में जाना चाहता है कि यहां उसकी बेटी के लिए अच्छा स्कूल नहीं है। यह अलग बात है कि धन कमाने के चक्कर में डॉक्टर दंपत्ति के पास बेटी के साथ बिताने के लिए समय नहीं है। उसके खेलने के लिए दो सुंदर कुत्ते ला दिए हैं।’

यह कैसी शिक्षा है, जो केवल पैसा कमाना सिखाती है। जो शिक्षा मां-बाप को बच्चों से दूर कर देती है। देश, समाज के मुद्दों पर चर्चा करने से अधिकांश छात्र बचते या एक जैसा मत रखते हैं। हाल में केंद्रीय मंत्रिमंडल में हुए बदलाव पर एक भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान के एक दर्जन से अधिक छात्रों की एक ही टिप्पणी थी, हमें इस सबसे क्या लेना-देना। यहां तक कि कोरोना से खराब हुई देश की आर्थिक स्थिति पर भी वे उदासीन हैं। कई बार तो लगता है कि वे क्षमतावान नहीं हैं या पैसे और केवल पैसे का लक्ष्य उनकी प्रतिभा और क्षमता को चुकता कर रहा है। इन संस्थानों में दर्शन, समाजशास्त्र, मनोविज्ञान जैसे विषयों के विभागों की हालत खराब है।

राष्ट्र के सामान्य नागरिकों द्वारा दिए गए कर से सरकार उन पर विशेष व्यय कर रही है। ऐसे में देश के सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों को समझना और उनके लिए सक्रिय रहना उनका महत्त्वपूर्ण कर्तव्य है। पैसा कमाना, कारखाने लगाना और भौतिक संसार के सुख भोगना ही उनके लिए सब कुछ नहीं है। इन संस्थानों के अधिकतर छात्र अपने हितों के लिए आंदोलन करना तो दूर, आपस में चर्चा तक से बचते हैं। जबकि राजनीतिक, सामाजिक मुद्दों पर मर्यादित होकर तर्कपूर्ण चर्चा कर राष्ट्र के प्रश्नों का समाधान ढूंढ़ना उनका सबसे पहला धर्म है।

निष्क्रियता, और वह भी युवास्था में, बहुत बड़ी चिंता का विषय है। अक्सर छात्र-छात्राएं ऐसी तकनीक के शोध पर चर्चा करते हैं, जिसमें मानव श्रम का कम से कम उपयोग हो। प्रबंधन के छात्र यह कहते हुए सुने जा सकते हैं कि मानव संसाधन प्रबंधक के रूप में वे पुराने कर्मचारियों को अयोग्य ठहरा कर अपनों की कैसे भर्ती करें या कम वेतन के कर्मियों की नियुक्ति कर अपने मालिक को कैसे प्रसन्न करें। तार्किक, मानवोपयोगी, सामाजिक-राजनीतिक, आर्थिक-राजनीतिक बदलावों पर विमर्श देश और उसके नागरिकों को आगे ले जाने के लिए होता है। इस सबमें छात्रों की कोई रुचि नहीं है।

पिछले कई वर्षों से यह देखने में आ रहा है कि कई प्रौद्योगिकी संस्थान अपनी रैंक अच्छी दिखाने के लिए अपने यहां के प्लेसमेंट सेल का अत्यधिक उपयोग करते हैं। अखबारों में भी इस तरह दर्शाया जाता है कि उनके संस्थान के छात्र को विदेश में इतने करोड़ का पैकेज मिला। इसका उद्देश्य सिर्फ यही होता है कि हमारा प्रौद्योगिकी संस्थान औरों से बेहतर है।

इसके लिए निजी संस्थान काफी विज्ञापन देते हैं। जब इस प्रकार की बातों को समाचार पत्रों के माध्यम से प्रायोजित किया जाता है, तो विद्यार्थियों और उनके परिजनों में यह बात घर कर जाती है कि आइआइटी में पढ़ने का मतलब कई करोड़ का पैकेज प्राप्त करना है। फिर माता-पिता अपने बच्चों पर बचपन से ही आइआइटी जैसे संस्थानों में प्रवेश लेने के लिए दबाव डालना शुरू कर देते हैं। इसका पता इससे चलता है कि पिछले कुछ वर्षों में बच्चे आठवीं के बाद ही दूसरे शहरों के कोचिंग संस्थानों में पढ़ना शुरू कर देते हैं। इससे न सिर्फ बच्चों का अपने परिवार से भावात्मक संबंध कम होता है, बल्कि उनकी खानपान, रहन-सहन की आदतें भी खराब हो जाती हैं।

पता चला है कि आइआइटी जैसे संस्थानों के विद्यार्थियों को अपने यहां नौकरी पर रख कर कंपनियों को बैंकों से कर्ज भी आसानी से मिल जाता है। इस प्रकार की व्यवस्था को दूर करने के लिए आवश्यक है कि आइआइटी जैसे बड़े संस्थान भी स्वरोजगार को समाज में प्रतिस्थापित करने के लिए कार्य करें और उनकी रैंकिंग का एक मुख्य बिंदु यह भी होना चाहिए कि किस आइआइटी का स्वरोजगार स्थापित करने के क्षेत्र में भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में कितना योगदान रहा।

भारतीय संस्कृति से जोड़े रखने के लिए आइआइटी और आइआइएम जैसे संस्थानों में एक विषय होना ही चाहिए।आइआइटी और आइआइएम जैसे संस्थान विदेशी भाषाओं के पाठ्यक्रम भी अपने यहां चलाते हैं, जिससे विद्यार्थियों में विदेश जाने की भावना प्रबल होती है। विदेशी भाषाओं के साथ क्या राष्ट्र और जीवन मूल्यों को बढ़ाने वाली संस्कृत प्रमुखता से नहीं पढ़ाई जानी चाहिए? संस्थान वेद, उपनिषद की आधिकारिक कक्षाएं अपने यहां शुरू करें, तो विद्यार्थियों का भारतीय संस्कृति से जुड़ाव होगा। पंडित दीनदयाल उपाध्याय कहते थे, ‘अध्यात्म का संचार करुणा, दया, प्रेम, कृपा, सहिष्णुता, सेवा-स्पर्श का भाव पैदा करता है।

यही मार्ग मनुष्य में एकात्म मानववाद के भाव को जन्म देता है और उसे उत्कृष्टता के सर्वोच्च शिखर पर ले जाता है।’ तो क्या इन संस्थानों में सनातन भारतीय परंपरा को केंद्र में रख कर अध्यात्म संचार का एक औपचारिक पाठ्यक्रम प्रारंभ नहीं किया जाना चाहिए। इससे छात्र तनाव, संत्रास और आत्महत्याओं से भी बचेंगे। संस्थानों में तकनीक, अभियांत्रिकी की देशज परंपराओं, इतिहास, दर्शन, मनोविज्ञान, समाजशास्त्र, भारतीय अर्थशास्त्र, राजनीतिक विज्ञान जैसे विषयों को अधिक पोषित-पल्लवित करने की आवश्यकता है। यहां पर ऐतिहासिक, सामाजिक, राजनीतिक, सनातन भारतीय सामाजिक-सांस्कृतिक विषयों पर खुले मन से विमर्श करने की भी महती आवश्यकता है। यह सब यहां पढ़ने वाले छात्रों, शिक्षकों और उनसे से आगे वाली पीढ़ियों को मानवीय उत्कृष्टता की ओर ले जाएगा।

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