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राजनीतिः निवेशकों के हित और जोखिम

यदि सरकार भारत के शेयर और पूंजी बाजार को मजबूत बनाने की डगर पर आगे बढ़ना चाहती है, तो सेबी की भूमिका को और प्रभावी बनाना होगा। सबसे जरूरी तो यह है कि शेयर बाजारों में घोटाले रोकने के लिए डीमैट और पैन की व्यवस्था को और कारगर बनाया जाना चाहिए। छोटे निवेशकों के लिए शेयर बाजार की प्रक्रिया को और सरल बनाना होगा।

Author October 1, 2018 1:24 AM
बाजार विशेषज्ञों ने चेताया है कि देश में आर्थिक सुधारों के बाद अब जिस तरह से बड़े पैमाने पर शेयर बाजार में लंबे समय से सुस्त पड़ी हुई कंपनियों के शेयर की बिक्री 2008 के बाद हाल के दिनों में सर्वाधिक रूप से बढ़ी है, उससे भी शेयर बाजार में जोखिम भी बढ़ गई है।

जयंतीलाल भंडारी

दुनिया के अर्थ विशेषज्ञ भारतीय शेयर बाजार को प्रबल संभावनाओं वाला बता रहे हैं। लेकिन इस समय भारतीय शेयर बाजार में जोखिम के हालात बढ़ गए हैं। सूचकांक 25 सितंबर को घट कर 36652 पर बंद हुआ। इस बड़ी गिरावट के लिए डॉलर के मुकाबले रुपए का 73 के स्तर पर पहुंचना, विदेशी निवेशकों द्वारा शेयर बाजार से निकासी और चीन-अमेरिका के बीच बढ़ता व्यापार युद्ध बड़े कारण रहे। सूचकांक के लुढ़कने के पीछे बुनियादी क्षेत्र के निवेश से जुड़ी बड़ी कंपनी आइएलएंडएफएस का अपने फर्मों की किस्त न चुका पाना प्रमुख कारण रहा। इस वजह से कई बैंक फंड संकट में पड़ गए और कई गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियां भी मुश्किल में हैं। साल 2008 की मंदी के बाद हालत ऐसे हो गए थे कि आम लोग कई सालों तक शेयर बाजार से दूर रहे। पिछले चार साल के दौरान बाजार में फिर से रौनक लौटी।

ऐसे में बाजार पर नजर रखने वाली और उसका नियमन करने वाली संस्थाओं को अच्छी तरह जांच लेना चाहिए कि पिछले दिनों शेयर बाजार में गिरावट जैसी घटनाओं के पीछे कहीं मंदड़ियों का हाथ तो नहीं है। वित्तीय सेवाएं देने वाली वैश्विक कंपनी गोल्डमैन सॉक्स ने 17 सितंबर को भारतीय शेयर बाजार को वास्तविक स्तर से काफी ज्यादा बताते हुए भारत की शेयर बाजार रेटिंग ओवरवेट से घटा कर मार्केट वेट कर दी है। कहा गया है कि भारतीय शेयर बाजार पिछले पांच साल में दोगुने से ज्यादा आकार के हो गए हैं, जबकि अमेरिकी डॉलर के लिहाज से भारतीय शेयर बाजार का 60 आधार अंक ही अच्छा प्रदर्शन हुआ है। ऐसे में भारतीय शेयर बाजार में जोखिम दिखाई दे रही है। इसी तरह, क्रेडिट सुईस ने भी कहा है कि भारतीय शेयर बाजार में अब मुनाफा वसूली का समय दिखाई दे रहा है। इस घटी हुई रेटिंग का भारतीय शेयर बाजार पर नकारात्मक असर हुआ है।

उल्लेखनीय है कि वैश्विक वित्तीय संगठनों की तरह देश और दुनिया के अर्थ विशेषज्ञ कह रहे हैं कि जिस तरह प्रतिकूल आर्थिक परिवेश में भी भारत का शेयर बाजार तेजी से आगे बढ़ रहा है, तब शेयर बाजार में स्पष्ट रूप से खतरे बढ़ गए हैं। खासतौर से छोटे निवेशकों के हितों की सुरक्षा एक बड़ी जरूरत है। यह कोई छोटी बात नहीं है कि इस समय जब डॉलर के मुकाबले रुपया 73 तक फिसल गया है और देश का विदेशी मुद्रा भंडार चार सौ अरब डॉलर से भी कम हो गया है, तब भी देश की विकास दर बढ़ रही है। चालू वित्त वर्ष 2018-19 की पहली तिमाही में विकास दर 8.2 फीसद रही। साथ ही देश का शेयर बाजार लगातार नई ऊंचाइयां छूते हुए दिखाई दे रहा है। यदि हम शेयर बाजार को सूचकांक के आईने में देखें तो साफ होता है कि एक साल में सूचकांक दुनियाभर के विकासशील देशों के शेयर बाजारों की तुलना में शानदार है। हालांकि विदेशी संस्थागत निवेशक भारत से अपना निवेश तेजी से निकाल रहे हैं, वैश्विक व्यापार युद्ध की आशंका से दुनिया के शेयर बाजार लुढ़क रहे हंै और कच्चे तेल की कीमतों में लगातार तेजी आ रही है, बावजूद इन कारणों के भारतीय शेयर बाजार बढ़ा है। भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए यह शुभ संकेत तो है, लेकिन शेयर बाजार के जोखिम पर भी ध्यान देने की जरूरत है।

इस समय आम निवेशकों के कदम शेयर बाजार की ओर तेजी से बढ़ने का एक कारण शेयर बाजार में निवेश पर बढ़ता हुआ रिटर्न भी है। अब तक सोने और संपत्ति की खरीद में निवेश को विश्वसनीय निवेश माना जाता रहा है। लेकिन अब इन दोनों क्षेत्रों में निवेश कम आकर्षक हो गए हैं। इसका बड़ा कारण इन दोनों क्षेत्रों के लिए कर संबंधी नियमों को सख्त बना दिया जाना भी है। पिछले तीन-चार साल से रियल एस्टेट क्षेत्र में नए सरकारी नियमों की सख्ती से बेनामी संपत्तियों की खरीद-बिक्री काफी हद तक प्रतिबंधित हो गई है। इस वजह से कीमतें नीचे आ गई हैं। इससे घबरा कर निवेशकों ने कदम खींच लिए हैं। इसी तरह पिछले कुछ वर्षों में सोने में निवेश पहले जितना लाभप्रद नहीं रह गया है। चूंकि 2014-15 से वर्ष 2017-18 तक म्युचुअल फंड और शेयर बाजार में करीब पंद्रह से बीस फीसद सालाना रिटर्न मिला है, जबकि इस अवधि में सोने से मिलने वाला औसतन रिटर्न करीब साढ़े आठ फीसद ही रहा है। निश्चित रूप से लगातार अच्छे रिटर्न के कारण भी म्युचुअल फंड और शेयर बाजार तेजी से आगे बढ़ रहे हैं।

भारतीय शेयर बाजार के ऊंचाई पर पहुंचने के मौके पर शेयर बाजार से संबंधित कुछ प्रश्नों पर विचार भी जरूरी है। क्या इस समय उद्योग और कारोबार के लिए शेयर बाजार से पर्याप्त धन मिल पा रहा है? आम निवेशक अभी भी शेयर बाजार से दूरी क्यों बनाए हुए है? जो भारत जीडीपी के आधार पर दुनिया की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और क्रय शक्ति के आधार पर दुनिया में तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, जिसकी अर्थव्यवस्था एक खरब डॉलर की हो, क्या वहां कुल जनसंख्या के करीब तीन फीसद लोगों का ही निवेशक के रूप में शेयर बाजार से जुड़ना पर्याप्त है? भारतीय कारोबारियों के पास नए उद्यम शुरू करने या चालू उद्यम को पूरा करने के लिए पर्याप्त धन नहीं है। नए फंड तक भी उनकी पहुंच नहीं है, क्योंकि बैंक अब फंसे हुए कर्ज के मामलों को देखते हुए नए कर्ज देने में काफी सतर्कता बरतने लगे हैं। ऐसे में इस संकट से निकलने का तरीका है नए सिरे से पूंजीकरण करना। इस काम के लिए मजबूत शेयर बाजार की आवश्यकता होगी।

भारत में शेयर बाजार के आगे बढ़ने की अनुकूलताएं मौजूद हैं। लेकिन दूसरी ओर बाजार विशेषज्ञों ने चेताया है कि देश में आर्थिक सुधारों के बाद अब जिस तरह से बड़े पैमाने पर शेयर बाजार में लंबे समय से सुस्त पड़ी हुई कंपनियों के शेयर की बिक्री 2008 के बाद हाल के दिनों में सर्वाधिक रूप से बढ़ी है, उससे भी शेयर बाजार में जोखिम भी बढ़ गई है। ऐसे में शेयर बाजार में हर कदम फूंक-फूंक कर रखना जरूरी है। शेयर बाजार में छोटे निवेशकों के हितों और उनकी पूंजी की सुरक्षा का ध्यान रखा जाना जरूरी है। उल्लेखनीय है कि मई 2018 से जुलाई 2018 के तीन महीनों में स्मॉल और मिड-कैप कंपनियों के शेयरों यानी छोटे शेयरों की कीमतों में कोई चालीस फीसद से ज्यादा की जो अप्रत्याशित गिरावट आई है, उससे अनुचित व्यापार व्यवहार के उल्लंघन का संदेह पैदा होता है। चूंकि छोटे शेयरों में छोटे निवेशकों का काफी धन लगा हुआ है, इसलिए ऐसी तेज गिरावट की सेबी के द्वारा जांच की जानी चाहिए और भविष्य के लिए ऐसे कदम उठाए जाने चाहिए जिससे शेयर बाजार अनुचित व्यापार व्यवहार से बच सके।

यदि सरकार भारत के शेयर और पूंजी बाजार को मजबूत बनाने की डगर पर आगे बढ़ना चाहती है, तो सेबी की भूमिका को और प्रभावी बनाना होगा। सबसे जरूरी तो यह है कि शेयर बाजारों में घोटाले रोकने के लिए डीमैट और पैन की व्यवस्था को और कारगर बनाया जाना चाहिए। छोटे निवेशकों के लिए शेयर बाजार की प्रक्रिया को और सरल बनाना होगा। सरकार और सेबी को गोल्डमैन सॉक्स के द्वारा शेयर बाजार में बताई गई जोखिम और कम प्रतिफल की स्थिति पर तत्काल ध्यान देना चाहिए। बढ़ते हुए आर्थिक सुधारों और शेयर बाजार में धोखाधड़ी रोकने के नए प्रयासों के कारगर क्रियान्वयन के बाद ही बड़े निवेशकों के साथ-साथ छोटे निवेशक भी भारतीय शेयर बाजार में अपने कदम मजबूती से आगे बढ़ाएंगे। तभी शेयर बाजार में मजबूती दिखाई देगी। साथ ही, भारतीय शेयर बाजार भारतीय अर्थव्यवस्था को निवेश के लिए बुनियादी आधार देते हुए दिखाई देंगे।

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