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राजनीति: सवालों में फिलस्तीन का भविष्य

बदलती परिस्थितियों में फिलस्तीन का भविष्य इजराइल की उस मंशा के अनुसार नजर आ रहा है, जिसके संकेत पूर्व में ही मिल चुके हैं। इजराइल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू का विश्वास रहा है और वे कहते भी आए हैं कि फिलस्तीनी समस्या के समाधान को परे रख कर भी अरब देशों के साथ शांति समझौते किए जा सकते हैं।

Author Updated: November 28, 2020 5:21 AM
फिलस्तीन समस्यामध्यपूर्व अब पारंपरिक प्रतिद्वंद्विता को पीछे छोड़ कर आगे बढ़ रहा है और अरब देशों के लिए फिलस्तीन नीतिगत और निर्णायक मुद्दा नहीं है।

ब्रह्मदीप अलूने

अंतरराष्ट्रीय राजनीति का यथार्थवादी दृष्टिकोण इस बात पर बल देता है कि राष्ट्र की शक्ति का विकास ही उसके हितों को पूर्ण करने का एकमात्र माध्यम है और विदेश नीति संबंधी निर्णय राष्ट्रीय हितों के आधार पर लिए जाने चाहिए, न कि नैतिक सिद्धांतों और भावनात्मक मान्यताओं के आधार पर। 1947 से विश्व राजनीति में उथल-पुथल मचाने वाले इजराइल और फिलस्तीन का जमीनी विवाद अब इन दो राष्ट्रों तक ही सीमित रहने के संकेत मिलने लगे हैं। इस साल अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ‘डील आफ द सेंचुरी’ के दांव में इजराइल, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) और बहरीन ने जब हाथ मिलाया था, तभी यह साफ हो गया था कि मध्यपूर्व अब पारंपरिक प्रतिद्वंद्विता को पीछे छोड़ कर आगे बढ़ रहा है और अरब देशों के लिए फिलस्तीन नीतिगत और निर्णायक मुद्दा बना नहीं रह सकता।

दरअसल, 1947 में संयुक्त राष्ट्र द्वारा फिलस्तीन को स्वतंत्र यहूदी राष्ट्र और अरब राष्ट्र में बांटने की सिफारिश के बाद इस इलाके में संघर्ष का नया दौर शुरू हो गया था। फिलस्तीन को मुसलिम और अरब अस्मिता से जोड़ने वाले ज्यादातर अरब देश इस नीति पर अडिग माने जाते थे कि वे इजराइल के साथ रिश्ते तभी सामान्य करेंगे, जब वह फिलस्तीन के साथ जारी अपने विवाद का निबटारा कर लेगा। लेकिन 1947 से लेकर 2020 तक मध्यपूर्व की भू-रणनीतिक स्थितियों में भारी बदलाव आए। इजराइल को रणनीतिक रूप से घेरने वाले देश आंतरिक अशांति और राजसत्ता की अपनी मजबूरियों से जूझ रहे हैं। इजराइल के उत्तर में लेबनान और पूर्व में सीरिया है। ये दोनों देश गृहयुद्ध से त्रस्त हैं। जबकि दूसरे पड़ोसी जार्डन और मिस्र 1967 के इजराइल-अरब युद्ध के बाद यहूदी राष्ट्र के साथ राजनयिक संबंध स्थापित कर खामोश हैं।

इन सबके बीच इजराइल को मध्यपूर्व से खत्म कर अरब राष्ट्रवाद की अगुवाई के स्वप्न ने ही इस्लामिक दुनिया को दो भागों में बांट दिया है। इजराइल-फिलस्तीन विवाद की परछाई में शिया बाहुल्य ईरान ने लेबनान के आतंकवादी संगठन हिजबुल्ला को भारी मात्रा में हथियार और गोलाबारूद देकर इजराइल पर हमला करने के लिए लगातार प्रोत्साहित किया, वहीं सुन्नी बाहुल्य सऊदी अरब ने फिलस्तीन के चरमपंथी संगठन हमास को हथियार देकर इजराइल को निशाना बनाने की कोशिश की। इस्लामिक दुनिया में बादशाहत कायम रखने के लिए ईरान और सऊदी अरब इजराइल को निशाना बनाते-बनाते आपसी हितों के लिए कालांतर में एक दूसरे के प्रतिद्वंद्वी बन गए।

इजराइल को घेरने के साथ-साथ ईरान मध्यपूर्व के देशों में शिया प्रभाव जमाने के लिए प्रतिबद्धता दिखाने लगा था। सुन्नी बहुल सऊदी अरब को यह बर्दाश्त नहीं था। इसका प्रभाव मध्यपूर्व से लेकर यूरोप तक पड़ा और सीरिया, इराक, लीबिया, लेबनान, यमन से लेकर तुर्की सहित कई देश प्रभावित हुए। मध्यपूर्व पिछले कई सालों से लगातार अस्थिरता के दौर से गुजर रहा है। यमन, सीरिया, इराक और लेबनान जैसे देशों में ईरान समर्थित सेना इन देशों में स्थित सुन्नी प्रशासन के खिलाफ विद्रोहियों को लगातार हथियार और प्रश्रय दे रही है।

ईरान एक मजबूत शिया बाहुल्य देश है जो अमेरिका, इजराइल और सऊदी अरब की आंखों की किरकिरी होने के बाद भी अपने मजबूत राष्ट्रवाद के बूते जिंदा और आबाद है। ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड सीरिया और इराक में कट्टरपंथी सुन्नी एकाधिकार को चुनौती दे रहे हैं और यमन के हूती विद्रोही शिया प्रभाव को उस इलाके में काबिज रखे हुए हैं। दूसरी ओर लेबनान का हिजबुल्ला आतंकी संगठन इजराइल की नाक में दम किए हुए है।

आर्थिक जरूरतें बढ़ने, तेल का घाटा दूर करने और ईरान पर दबाव बढ़ाने के लिए सऊदी अरब ने इस्लामिक स्टेट (आइएस) का दांव खेला था, जिससे सीरिया, इराक और ईरान तबाह हो जाएं, इन देशों के तेल भंडार नष्ट हो जाएं और वह तेल की दुनिया का बादशाह हो जाए। शिया-सुन्नी संघर्ष और आर्थिक फायदों के लिए यह समूचा क्षेत्र ही अस्थिर हो गया। ऐसे में इजराइल के धुर विरोधी देश अब फिलस्तीन से ज्यादा अपने अस्तित्व को बचाने की फिक्र कर रहे हैं। इसी का परिणाम है कि मध्य पूर्व में रणनीतिक साझेदारी में अरब की अगुवाई का सपना देखने वाला सऊदी अरब अब इजराइल का हमराह बन रहा है, जिसकी कल्पना शायद ही किसी ने कभी की होगी। इजराइल अब मध्यपूर्व का सबसे बड़ा रणनीतिक खिलाड़ी बन कर अरब से संबंधों की जो नई इबारत गढ़ रहा है, उससे फिलस्तीन सहित वैश्विक कूटनीतिक में भारी बदलाव होने की संभावना के संकेत मिल रहे हैं।

साल 2015 में अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति बराक ओबामा सरकार ने ईरान से एक परमाणु समझौता किया था, जिसके तहत साल 2016 में अमेरिका और अन्य पांच देशों से ईरान को तेल बेचने और उसके केंद्रीय बैंक को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कारोबार की अनुमति मिली थी। ओबामा के इस समझौते को ईरान के परमाणु कार्यक्रम को सीमित करने की कोशिशों के तौर पर देखा गया था।

सऊदी अरब अमेरिका के इस कदम से नाराज था और इसका प्रभाव ओबामा के जाते ही दिखा। अमेरिकी राष्ट्रपति और आर्थिक हितों को प्राथमिकता में रख कर आगे बढ़ने वाले डोनाल्ड ट्रंप ने सत्ता में आते ही इस समझौते को बेकार बता कर अपने कदम वापस खींच लिए। जबकि ब्रिटेन, जर्मनी और फ्रांस जैसे देश ईरान से हुए समझौते का पालन करना चाहते थे। यूएई और सऊदी अरब जैसे देश यह भलीभांति जानते हैं कि इजराइल के साथ राजनयिक संबंधों का मतलब है कि उन्हें ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस सहित अमेरिका का भरपूर समर्थन मिलेगा और इससे ईरान पर अभूतपूर्व दबाव पड़ेगा।

मध्यपूर्व की राजनीति को तेल की अतंरराष्ट्रीय राजनीति से अलग कर देखना असंभव है। अमेरिका की नजर ईरान के तेल कुओं पर है और वह उस पर दबाव डालने के लिए प्रतिबद्धता दिखाता रहा है जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के भाव में उतार-चढ़ाव पर अमेरिका का नियंत्रण बना रहे। इजराइल और यूएई दोनों ही ईरान को अपना साझा दुश्मन मानते हैं और उन्हें लगता है कि इस तरह का समझौता करके वे ईरान के प्रभाव को कम कर सकते हैं। इजराइल सऊदी अरब से खुफिया जानकारियां साझा करता रहा है और वह शिया देश ईरान के दुश्मनों को आधुनिक हथियार और सुरक्षा उपकरण बेचने के लिए एक बड़े बाजार के रूप में देखता है।

इजराइल के यूएई और सऊदी अरब जैसे देशों से मजबूत होते संबंधों के बाद यह संभावना बढ़ गयी है कि अरब क्षेत्र में उसे मान्यता और वैधता मिलेगी और इससे दूसरे अरब देश भी इजराइल से हाथ मिला सकते हैं। बदलती परिस्थितियों में फिलस्तीन का भविष्य इजराइल की उस मंशा के अनुसार नजर आ रहा है जिसके संकेत पूर्व में ही मिल चुके हैं। इजराइल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू का विश्वास रहा है और वे कहते भी आए हैं कि फिलस्तीनी समस्या के समाधान को परे रख कर भी अरब देशों के साथ शांति समझौते किए जा सकते हैं।

फिलस्तीन की स्थापना के लिए वर्षों से राजनयिक और सैनिक समर्थन देने वाले इस्लामिक देशों के मजबूत स्तंभों के इजराइल के साथ चले जाने से रणनीतिक मायने बदल गए हैं। इससे ईरान और तुर्की के साथ सऊदी अरब की प्रतिद्वंद्विता बढ़ने की आशंका गहरा गई है। इसके दूरगामी परिणाम इस्लामिक देशों में आपसी संघर्ष को बढ़ा सकते हैं। बहरहाल फिलस्तीन के मुद्दे को पीछे छोड़ कर अमेरिका, इजराइल और सऊदी अरब के मजबूत आर्थिक और रणनीतिक संबंध वैश्विक कूटनीति को नई दिशा देते हुए दिखाई दे रहे हैं।

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