तिब्बत पर जिनपिंग का नया दांव

जिनपिंग तिब्बत की धरती से दलाई लामा, भारत और अमेरिका पर दबाव बढ़ा कर चीनी कम्युनिस्ट पार्टी में अपनी स्थिति मजबूत करना चाहते हैं। सीमा समस्या को लंबे समय तक उलझा कर चीन का विरोधियों पर मनौवैज्ञानिक दबाव बनाने का तरीका रहा है और जिनपिंग भी इसे आजमाते नजर आ रहे हैं।

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जिनपिंग। फाइल फोटो।

ब्रह्मदीप अलूने

अंतरराष्ट्रीय राजनीति में हस्तक्षेप को एक तानाशाही दखलंदाजी माना जाता है जो एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र के मामलों को पलटने के लिए करता है। हस्तक्षेप करके किसी राज्य की संप्रभुता को शत्रुतापूर्ण तरीके से चोट पहुंचाना चीन की वैदेशिक नीतियों में शुमार रहा है। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग इसे लगातार बढ़ावा दे रहे हैं। हाल में जिनपिंग ने अचानक तिब्बत की यात्रा कर उसी आक्रामकता का प्रदर्शन किया है। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी इस साल अपनी स्थापना के सौ वर्ष मना रही है। इस मौके पर जिनपिंग ने तिब्बत की ऐतिहासिक और धार्मिक मान्यताओं पर प्रहार करते हुए तिब्बत को कम्युनिस्ट पार्टी का अनुसरण करने और समाजवाद के रास्ते पर चलने की नसीहत दे डाली।

जिनपिंग की तिब्बत यात्रा के सामरिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और धार्मिक संदेश स्पष्ट दिखाई दे रहे हैं। वे ल्हासा में महत्त्वपूर्ण द्रेपुंग मठ भी गए और प्राचीन व धार्मिक तिब्बत के इलाके के धार्मिक और सांस्कृतिक संरक्षण के बारे में जानकारी हासिल की। ल्हासा को चीन ने लंबे समय तक बाहरी दुनिया से बिल्कुल काट रखा था और किसी बाहरी व्यक्ति को तिब्बत और राजधानी ल्हासा जाने की अनुमति आसानी से नहीं दी जाती। इसीलिए इसे प्रतिबंधित शहर कहा जाता है।

दरअसल तिब्बत पर कब्जे के सात दशक बाद भी चीन की उस पर पकड़ उतनी मजबूत नहीं हो पाई है, जितना चीनी कम्युनिस्ट पार्टी चाहती है। इसी कारण जिनपिंग प्रशासन अब तिब्बत में धर्म का कार्ड खेलने की तैयारी कर रहा है। तिब्बत में बौद्ध धर्म के अनुयायियों की बहुलता है, जबकि चीन की कम्युनिस्ट सरकार किसी भी धर्म को नहीं मानती है। इसलिए यहां के लोगों के बीच अपनी पैठ बनाने के लिए जिनपिंग अपना उदार चेहरा दिखाने चाहते हैं। तिब्बत को चीन ने 1951 में अपने नियंत्रण में ले लिया था। इसके बाद तिब्बत के सर्वोच्च धर्मगुरु दलाई लामा ने अपने अनुयायियों के साथ भारत में शरण ले ली थी। तब से वे भारत में ही रहते हैं और तिब्बत को स्वायत्तता देने के लिए चीन की सरकार पर दबाव बनाते रहे हैं। दलाई लामा के प्रभाव को तिब्बत के लोगों में कम करने के लिए चीनी सरकार लगातार प्रयास कर रही है।

चीन तिब्बत की धार्मिक संस्कृति को खत्म कर उसे दक्षिण पश्चिमी क्षेत्र में व्यापार का बड़ा केंद्र बनाने के लिए व्यापक योजनाओं पर काम कर रहा है। यह भी देखा जा रहा है कि दलाई लामा की बढ़ती उम्र को आधार बना कर चीन अपनी ओर से किसी ऐसे व्यक्ति को दलाई लामा के तौर पर स्थापित करने की कोशिश में है जो चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के प्रति निष्ठावान हो। अमेरिका ने चीन की इस नीति का विरोध किया है। पिछले साल तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने नई तिब्बत नीति को मंजूरी देते हुए बौद्ध धर्म के सर्वोच्च धर्मगुरु के चयन में चीनी हस्तक्षेप को रोकने की बात कही थी। इसमें तिब्बत में अमेरिकी वाणिज्य दूतावास स्थापित करने और तिब्बत मसले पर एक अंतरराष्ट्रीय गठबंधन बनाने की बात की गई थी। इस साल मार्च में बाइडेन प्रशासन ने भी इस अमेरिकी प्रतिबद्धता को दोहराया कि दलाई लामा के उत्तराधिकारी के चयन में चीनी सरकार का कोई हाथ नहीं होना चाहिए।

तिब्बत सामरिक रूप से भारत के लिए बेहद महत्त्वपूर्ण है। चीन भारत पर दबाव बढ़ाने के लिए इस मार्ग का उपयोग नेपाल से रिश्ते मजबूत करने के लिए कर रहा है। तिब्बत यात्रा में जिनपिंग न्यिंग्ची रेलवे स्टेशन भी गए। इसे उनकी भारत पर सामरिक दबाव बनाने की कोशिशों के रूप में देखा जा रहा है। यह इलाका सामरिक रूप से इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यहां से कुछ दूर पर ही अरुणाचल प्रदेश की सीमा लगती है। जिनपिंग चीन के पहले बड़े नेता हैं जिन्होंने कई दशकों बाद भारत और चीन की सीमा के पास बसे इस शहर का दौरा किया है। गौरतलब है कि ब्रिटिश राज में 1914 में बनी मैकमोहन रेखा को खारिज कर चीन अरुणाचल प्रदेश को अपना हिस्सा बताता रहा है।

दूसरे विश्व युद्द के बाद बदलते राजनीतिक परिदृश्य में ब्रिटेन की दक्षिण एशिया से बिदाई के बाद माओ ने इस इलाके को कब्जे में लेने की साजिश को बेहद चुपके से अंजाम दिया था। माओ ने सबसे पहले 1949 में तिब्बत को अपना निशाना बनाया। चीन ने भारत से लगती सीमा पर अपनी स्थिति मजबूत की और 1957 में कराकोरम राजमार्ग भी बना लिया। इसके बाद चीन ने आधिकारिक रूप से यह घोषणा भी कर दी कि भारत और चीन सीमा का स्पष्ट विभाजन नहीं हुआ है। चीन ने मैकमोहन रेखा को भी मानने से इंकार कर दिया और अरुणाचल प्रदेश को दक्षिण तिब्बत बताने लगा। चीन अरुणाचल प्रदेश के नब्बे हजार वर्ग किलोमीटर वाले क्षेत्र को दक्षिणी तिब्बत कहता है। वह अरुणाचल में भारतीय प्रधानमंत्री की यात्रा पर भी आपत्ति करता रहा है। उसने अपनी विस्तारवादी आकांक्षाओं को तेज करते हुए अरुणाचल प्रदेश के छह जगहों के नाम अवैधानिक रूप से बदल कर वोग्यैनलिंग, मिला री, काईनदेन गाब री, मेन क्यू का, बूमो ला और नामका पुब री रख दिए हैं। चीनी विशेषज्ञ इसे चीन की क्षेत्रीय संप्रभुता को सुनिश्चित करने के लिए उठाया गया महत्त्वपूर्ण कदम बता चुके हैं।

ल्हासा से न्यिंग्ची रेलमार्ग नेपाल से चीन के आर्थिक संबंधों को मजबूत करने की दृष्टि से भी बेहद अहम है। यह रेल योजना कुल एक हजार सात सौ किलोमीटर की है। इसे सिचुआन-तिब्बत रेल खंड का सामरिक रूप से अति महत्त्वपूर्ण भाग माना जा रहा है। चीन हमेशा से ही नेपाल के साथ विशेष संबंधों का पक्षधर रहा है। तिब्बत पर कब्जे के बाद उसकी सीमाएं नेपाल से जुड़ गई हैं। चीन की नेपाल नीति का मुख्य आधार यह था कि नेपाल में बाहरी शक्तियां अपना प्रभाव न जमा सकें और तिब्बती स्वायत्त क्षेत्र की सुरक्षा हो सके।

दूसरा नेपाल में भारत के प्रभाव को कम किया जाए। उसने नेपाल में अनेक परियोजनाएं आक्रामक ढंग से शुरू कर तिब्बत से सीधी सड़क भारत के तराई क्षेत्रों तक जोड़ी और नेपाल की कुदारी सीमा तक रेल मार्ग बना लिया। इसके साथ ही चीन ने नेपाली कम्युनिस्ट और माओवादी गुटों को आर्थिक व सैन्य मदद देकर भारत विरोधी भावनाएं भड़काने की साजिशों को भी अंजाम दिया। चीन नेपाल के इन मजबूत संबंधों से भारत की आर्थिक और सुरक्षा संबंधी चिंताएं बढ़ना स्वाभाविक है। नेपाल के रास्ते भारत में चीनी सामान की डंपिंग, माओवादी हिंसा के जरिए नेपाल से आंध्र और तमिलनाडु तक रेड कॉरिडोर में आंतरिक सुरक्षा को खतरे, पाक की आइएसआइ की नेपाल में लगातार बढ़ती गतिविधियां, तस्करी और आतंकवादियों का भारत में प्रवेश जैसी चुनौतियां बनी हुई हैं।

माओ की क्षेत्रीय सामरिक नीति पांच उंगलियों के सिद्धांत पर आधारित मानी जाती है। माओ के अनुसार चीन हाथ है तो तिब्बत हथेली। उस तिब्बत की पांच उंगलियां हैं- नेपाल, भूटान, लद्धाख, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश। नेपाल और भारत की सुरक्षा परस्पर एक दूसरे पर निर्भर है। भूटान की सुरक्षा को लेकर भारत अग्रगामी नीति पर रहा है और डोकलाम विवाद में भारत ने उसका पालन भी किया। लद्धाख, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश भारत के भाग हैं। चीन इस स्थिति को बदलने पर आमादा नजर आता है।

लद्दाख में भारत-चीन सीमा पर तनाव अभी खत्म नहीं हुआ है। गलवान घाटी में हुए हिंसक संघर्ष के बाद भी अभी तक दोनों देशों की सेनाओं के बीच कोई पीछे हटने को लेकर कोई सर्वसम्मत समझौता नहीं हुआ है। इसका असर दोनों देशों के सामरिक और आर्थिक संबंधों पर भी पड़ा है। अरुणाचल के पश्चिम में भूटान, उत्तर में चीन, उत्तर पूर्व में तिब्बत और पूर्व में म्यांमा है। अब इन क्षेत्रों में भारत की सामरिक स्थिति बहुत मजबूत है। भारत अपनी पूरब की नीति के तहत सीमाई क्षेत्रों का व्यापक विकास कार्य कर रहा है। चीन की चिंता का एक कारण यह भी है। जाहिर है, जिनपिंग तिब्बत की धरती से दलाई लामा, भारत और अमेरिका पर दबाव बढ़ा कर चीनी कम्युनिस्ट पार्टी में अपनी स्थिति मजबूत करना चाहते हैं। सीमा समस्या को लंबे समय तक उलझा कर चीन का विरोधियों पर मनौवैज्ञानिक दबाव बनाने का तरीका रहा है और जिनपिंग भी इसे आजमाते नजर आ रहे हैं।

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