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नवोन्मेषक मौजूद, निवेशक नदारद

‘भारत नवोन्मेष विकास कार्यक्रम’ (इंडिया इनोवेशन ग्रोथ प्रोग्राम) में दस साल में मात्र चार सौ नवोन्मेषकों को मदद दी जा सकी।

Author April 6, 2017 05:35 am
प्रतीकात्मक तस्वीर।

पंजाब और हरियाणा में फसलों की कटाई के बाद लगाई जाने वाली आग के धुंए से दिल्ली का दम घुटने लगता है। पर ऐसा नहीं कि खेतों में आग केवल इन्हीं दो राज्यों में लगाई जाती है। उत्तर प्रदेश के संत कबीर नगर के किसान सुरेंद्र सिंह के अनुसार उनके यहां खेतों में आग लगाने से कई दिन तक आसमान धुंए से भरा रहता था, कई बार आसपास की झुग्गियों में आग भी लग जाती थी, जिससे जान-माल के नुकसान का खतरा रहता था। इसीलिए उन्होंने एक ऐसा कंबाइन हार्वेस्टर तैयार किया, जो गेहूं के साथ-साथ डंठल को भी जमीन से निकाल देता है। ऐसा ही कंबाइन हार्वेस्टर मध्यप्रदेश के अशोक नगर के किसान राजपाल सिंह नावरिया और बिहार में आरा के सुनील कुमार ने भी विकसित किया है।

तीनों की यह अपनी उपलब्धि है, जो उन्होंने स्थानीय जरूरतों को समझते हुए निरंतर कोशिश से हासिल की है। तीनों के ये कंबाइन हार्वेस्टर यहां राष्ट्रपति भवन में आयोजित नवोन्मेष उत्सव (इनोवेशन फेस्टिवल) में प्रदर्शित किए गए थे। इस प्रदर्शनी में एक ऐसा वॉकर भी था, जिसका इस्तेमाल सीढ़ियों पर चढ़ते-उतरते हुए भी किया जा सकता था और इसे बनाया था पटना की नौवीं कक्षा की छात्रा शालिनी ने। उसे इसका विचार अपने बीमार दादाजी को वॉकर से चलते हुए देख कर आया, जो बाजार में उपलब्ध वॉकर से ऊंची-नीची जगहों पर चल पाने में असमर्थ थे। चेन्नई के दसवीं कक्षा के छात्र आकाश ने एक ऐसा उपकरण तैयार किया है, जिसे कोई भी व्यक्ति अपने कान पर लगा कर पता कर सकता है कि उसे दिल का सुप्त दौरा (साइलेंट हार्टअटैक) पड़ने का खतरा तो नहीं है।

भीड़ भरी बस में पायदान पर खड़े यात्रियों के दुर्घटनाग्रस्त हो जाने की खबरें आम हैं। तमिलनाडु के ही चार छात्रों ने एक ऐसा लॉक सिस्टम तैयार किया है, जिससे जब तक पायदान खाली नहीं होगा, बस चल नहीं पाएगी। ऐसे ही करीब पैंसठ नवोन्मेष इस प्रदर्शनी में प्रस्तुत किए गए थे। ये सभी ऐसे मौलिक विज्ञान आधारित रचनात्मक कार्य हैं, जिनसे हमारा सामाजिक और आर्थिक जीवन आसान और उन्नत हो सकेगा, पर्यावरण और पानी जैसी विश्वव्यापी विकट समस्याओं के हल में मदद मिलेगी। प्रयास स्थानीय होते हुए भी प्रभाव विश्वव्यापी होंगे। परंपरागत परिभाषा के मुताबिक इनमें से किसी भी नवोन्मषक को वैज्ञानिक नहीं कहा जा सकता, पर अलवर के सुभाष औला का कहना था- ‘राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने पुरस्कार देते हुए जब मुझसे कहा कि अब तुम एक वैज्ञानिक हो, तो मैं सोचने लगा कि यह क्या! लोग तो मुझे पागल कहते हैं।’

औला उन 847 ग्रासरूट नवोन्मेषकों (इनोवेटर्स) में से हैं, जिन्हें ‘राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम इग्नाइट पुरस्कार’ से नवाजा जा चुका है और उन दस ग्रासरूट नवोन्मेषकों में से भी हैं, जिन्हें राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने अपने ‘इन-रेजिडेंट’ कार्यक्रम के तहत पंद्रह दिन तक राष्ट्रपति भवन की मेहमानवाजी दी। यह इन सबके काम को एक तरह से देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद की ओर से सलाम भी था। राष्ट्रपति भवन की समृद्ध सांस्कृतिक और ऐतिहासिक परंपराओं से अभिभूत देश के दूरदराज गांव-शहरों से आए इन पढ़-अपढ़ बाल-युवा नवोन्मेषकों का कहना था- यहां आने का अर्थ है, हमारे उत्पाद को पेटेंट मिल जाना। अब हम कोई भी अपना नया विचार या उत्पाद किसी औद्योगिक या वित्तीय संस्थान के पास लेकर जाएंगे तो वह हमें बाहर से ही भगा नहीं देगा। हमारी बात सुनेगा।’

असल में यही तो वह संदेश है, जो राष्ट्रपति मुखर्जी अपने ‘नवोन्मेष उत्सव’ के जरिए देश भर के औद्योगिक और वित्तीय जगत को देना चाहते हैं। दस मार्च को इस उत्सव के समापन दिवस पर राष्ट्रपति भवन के कल्चरल सेंटर के वेस्ट हॉल में ‘स्टार्ट-अप, इनक्यूबेशन और वित्तीय नवाचार सम्मेलन’ को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा- ‘हमें अपने आप से यह सवाल पूछना होगा कि क्या नवोन्मेष आधारित स्टार्ट-अप को वित्तीय मदद करने के लिए नीतिगत और संस्थागत प्रबंधों में बदलाव की जरूरत है और जवाब एकदम साफ होगा- हां।’ उनका आगे कहना था कि ‘एक नवोन्मेषक उद्यमी को वित्तीय मदद जब तक मिलती है, तब तक वह हताश हो चुका होता है। नीति निर्माताओं के लिए यह चिंता का विषय होना चाहिए, क्योंकि इसी कारण बड़ी संख्या में ऐसे जमीनी स्तर पर किए जा रहे रचनात्मक प्रयोग शक्ल लेने से पहले ही खत्म हो जाते हैं।

जिस देश में हर साल दस लाख तकनीकी छात्र शिक्षण संस्थाओं से बाहर आते हों, जब तक हम हर साल कम से कम बीस हजार ऐसे विचारों और प्रयोगों में निवेश नहीं करेंगे, विकास के क्षेत्र में कोई बड़ी उपलब्धि हासिल नहीं कर सकते। अभी तो हमारे यहां मात्र हजार-दो हजार नवोन्मेष आधारित स्टार्ट-अप को ही वित्तीय मदद मिल पा रही है।’ केंद्रीय विज्ञान और तकनीक विभाग की ओर से सार्वजनिक और निजी भागीदारी में 2007 से चलाए जा रहे ‘भारत नवोन्मेष विकास कार्यक्रम’ (इंडिया इनोवेशन ग्रोथ प्रोग्राम) में दस साल में मात्र चार सौ नवोन्मेषकों को मदद दी जा सकी और साढ़े तीन सौ वाणिज्यिक समझौते हुए। जाहिर है, बड़ी कंपनियों या वित्तीय संस्थानों की इनमें कोई रुचि नहीं। आमजन के उपयोग में आने वाले किसी भी रचनात्मक विचार को हकीकत में उतरने से पहले कई स्तरों से गुजरना होता है और हर स्तर पर हौसला और आत्मविश्वास के साथ-साथ तकनीक, प्रयोग और परीक्षण की जरूरत होती है।

इनमें से हर चीज के लिए पैसे की जरूरत पड़ती है। मान लीजिए कि उत्पाद तैयार भी हो गया तो उसे बाजार में उतारना दूरदराज गांव के किसी व्यक्ति के लिए संभव नहीं। उसके लिए किसी न किसी उद्यमी को ही आगे आना पड़ेगा। भारत सरकार के स्टार्ट-अप और मेक इन इंडिया कार्यक्रम को सफल बनाना है, तो जमीनी स्तर पर किए जा रहे ऐसे हजारों रचनात्मक कार्यों को संबल देना होगा। यही कारण है कि केंद्रीय विज्ञान और तकनीक विभाग ने अब ‘भारत नवोन्मेष विकास कार्यक्रम’ को और तीन साल के लिए बढ़ाते हुए ‘भारत नवोन्मेष विकास कार्यक्रम 2.0 (आइआइजीपी 2.0) के नाम से शुरू किया है और इसमें विदेशी कंपनी लॉकहीड मार्टिन कॉपोर्रेशन के अलावा टाटा ट्रस्ट को भी जोड़ा है। टाटा ट्रस्ट इस कार्यक्रम के तहत तैयार उत्पादों की सामाजिक क्षेत्र में उपयोगिता का आकलन कर उसे बढ़ावा देने में योगदान करेगा।

अभी तक लॉकहीड मार्टिन कॉपोर्रेशन औद्योगिक क्षेत्र में ग्रासरूट इनोवेशंस को आगे बढ़ाने में मदद कर रहा था। राष्ट्रपति भवन के नवोन्मेष उत्सव में आइआइजीपी 2.0 की शुरुआत भी की गई। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने इसकी शुरुआत करते हुए कहा कि ‘मुझे खुशी है कि हमारे देश के अति प्रमुख उद्योगपतियों में से एक रतन टाटा भी सरकार की इस पहल में सहयोग करने को यहां हमारे साथ खड़े हैं।’ रतन टाटा का कहना था कि इनोवेशन और स्टार्ट-अप जैसे शब्दों से हमारे दिमाग में भारी लाभ की बात आती है, पर हम अक्सर भूल जाते हैं कि अधिकतर स्टार्ट अप्स ने ऐसे उत्पादों को जन्म दिया, जिनसे आम आदमी को लाभ हुआ है।

इसलिए टाटा ट्रस्ट उस वातावरण को बनाने में अपनी जिम्मेदारी निभाएगा, जिससे नए विचारों को जगह मिले और इनोवेटर्स अपने उत्पाद को बाजार तक ले जा सकें। निजी क्षेत्र इस दिशा में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।’ विभाग के मंत्री हर्षवर्धन प्रसन्न थे कि टाटा ट्रस्ट जैसी बड़ी कंपनी के साथ आ जाने के बाद अब देश की अन्य बड़ी कंपनियां, जो अभी तक इस कार्यक्रम से परहेज कर रही थीं, आगे आएंगी, जिससे स्टार्ट-अप कार्यक्रम में तेजी का माहौल बनेगा। पर क्या सच में ऐसा होगा?

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